बारिश और टूटती फसल ने किया किसानों का हाल बेहाल, दिवाली के बाद भी प्याज महंगा होना मुश्किल

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महाराष्ट्र के किसानों के लिए यह साल आर्थिक और मौसमीय संकटों का प्रतीक बन गया है। लगातार बारिश ने खेतों को तबाह कर दिया और जो थोड़ी-बहुत फसल बची, वह बाजार में बिकने पर भी घाटे में जा रही है। प्याज, टमाटर, आलू से लेकर अनार और सोयाबीन तक की फसल ने किसानों की कमर तोड़ दी है।

किसानों ने पूरे साल मेहनत कर प्याज की खेती की और करीब 66,000 रुपये खर्च किए, लेकिन 7.5 क्विंटल प्याज के बदले उन्हें सिर्फ 664 रुपये मिले। सुदाम का कहना है, "अब तो प्याज को खाद बना देना ही बेहतर है, बेचने में भी नुकसान हो रहा है।"

अनार और सीताफल की खेती करने वाले किसानों की हालत भी चिंताजनक है। माणिकराव ज़ेंडे ने अनार पर 1.5 लाख और सीताफल पर 1 लाख रुपये खर्च किए, लेकिन बारिश ने पौधों को पूरी तरह नुकसान पहुंचाया। मजबूरी में उन्होंने अपनी प्याज की फसल को जोत दिया, क्योंकि बाजार में बेचने पर और अधिक घाटा हो रहा था।

एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी लासलगांव में भी मंदी का माहौल है। यहां प्याज की कीमतें 500 से 1,400 रुपये प्रति क्विंटल के बीच हैं, यानी औसतन 10-11 रुपये प्रति किलो। मार्च-अप्रैल में आई बंपर फसल और लगातार बारिश ने प्याज की गुणवत्ता को बर्बाद कर दिया है। नासिक के अधिकारियों के अनुसार, यहां की लगभग 80% फसल बर्बाद हो चुकी है।

शहरों में दिवाली की रौनक है, लेकिन गांवों में त्योहार की चमक गायब है। ग्रामीण बाजार सूने हैं और लोग छोटी-छोटी जरूरतें भी पूरा करने में असमर्थ हैं। नासिक के APMC सदस्य के अनुसार, "इस बार दिवाली सिर्फ शहरों तक सीमित रह गई। किसानों के पास पैसे नहीं हैं, इसलिए गांवों में बाजार ठप हैं।"

बढ़ते आयात ने भी स्थानीय किसानों को नुकसान पहुंचाया है। उत्तर प्रदेश और गुजरात से आया प्याज और आलू महाराष्ट्र के बाजारों में भर गया, जिससे स्थानीय किसानों की मुश्किलें और बढ़ गईं। सोयाबीन किसानों की फसल भी बारिश में डूब गई।

सरकारी नीतियों पर भी सवाल उठ रहे हैं। जब प्याज के दाम बढ़ते हैं तो निर्यात पर रोक लग जाती है, जिससे किसान अंतरराष्ट्रीय बाजार से वंचित रह जाते हैं। वहीं, जब दाम गिरते हैं, तो सरकार खरीदी नहीं करती। किसानों का कहना है कि सरकार को इस समय उनके साथ खड़ा होना चाहिए।

त्योहारों के बाद प्याज के दाम बढ़ सकते हैं, लेकिन किसानों के हाथ में बेचने लायक प्याज कम बची है और जो बचे हैं, उनकी हालत इतनी खराब है कि अच्छे दाम मिलना मुश्किल नजर आता है।

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22 Oct 2025 By दैनिक जागरण

बारिश और टूटती फसल ने किया किसानों का हाल बेहाल, दिवाली के बाद भी प्याज महंगा होना मुश्किल

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किसानों ने पूरे साल मेहनत कर प्याज की खेती की और करीब 66,000 रुपये खर्च किए, लेकिन 7.5 क्विंटल प्याज के बदले उन्हें सिर्फ 664 रुपये मिले। सुदाम का कहना है, "अब तो प्याज को खाद बना देना ही बेहतर है, बेचने में भी नुकसान हो रहा है।"

अनार और सीताफल की खेती करने वाले किसानों की हालत भी चिंताजनक है। माणिकराव ज़ेंडे ने अनार पर 1.5 लाख और सीताफल पर 1 लाख रुपये खर्च किए, लेकिन बारिश ने पौधों को पूरी तरह नुकसान पहुंचाया। मजबूरी में उन्होंने अपनी प्याज की फसल को जोत दिया, क्योंकि बाजार में बेचने पर और अधिक घाटा हो रहा था।

एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी लासलगांव में भी मंदी का माहौल है। यहां प्याज की कीमतें 500 से 1,400 रुपये प्रति क्विंटल के बीच हैं, यानी औसतन 10-11 रुपये प्रति किलो। मार्च-अप्रैल में आई बंपर फसल और लगातार बारिश ने प्याज की गुणवत्ता को बर्बाद कर दिया है। नासिक के अधिकारियों के अनुसार, यहां की लगभग 80% फसल बर्बाद हो चुकी है।

शहरों में दिवाली की रौनक है, लेकिन गांवों में त्योहार की चमक गायब है। ग्रामीण बाजार सूने हैं और लोग छोटी-छोटी जरूरतें भी पूरा करने में असमर्थ हैं। नासिक के APMC सदस्य के अनुसार, "इस बार दिवाली सिर्फ शहरों तक सीमित रह गई। किसानों के पास पैसे नहीं हैं, इसलिए गांवों में बाजार ठप हैं।"

बढ़ते आयात ने भी स्थानीय किसानों को नुकसान पहुंचाया है। उत्तर प्रदेश और गुजरात से आया प्याज और आलू महाराष्ट्र के बाजारों में भर गया, जिससे स्थानीय किसानों की मुश्किलें और बढ़ गईं। सोयाबीन किसानों की फसल भी बारिश में डूब गई।

सरकारी नीतियों पर भी सवाल उठ रहे हैं। जब प्याज के दाम बढ़ते हैं तो निर्यात पर रोक लग जाती है, जिससे किसान अंतरराष्ट्रीय बाजार से वंचित रह जाते हैं। वहीं, जब दाम गिरते हैं, तो सरकार खरीदी नहीं करती। किसानों का कहना है कि सरकार को इस समय उनके साथ खड़ा होना चाहिए।

त्योहारों के बाद प्याज के दाम बढ़ सकते हैं, लेकिन किसानों के हाथ में बेचने लायक प्याज कम बची है और जो बचे हैं, उनकी हालत इतनी खराब है कि अच्छे दाम मिलना मुश्किल नजर आता है।

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