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स्थानीय सीएसआर का बढ़ना – क्यों कॉर्पोरेट फंडिंग अब भारत के अंदर तक पहुंच रही है
Digital Desk
पिछले कई वर्षों से भारत में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) का खर्च एक तय पैटर्न पर चलता रहा है। ज़्यादातर फंड बड़े शहरों और उनके आसपास के इलाकों में खर्च होते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि कंपनियों के ऑफिस वहीं होते हैं, काम करने की सुविधा वहां बेहतर होती है और प्रोजेक्ट्स के नतीजों को मापना भी आसान होता है। दूसरी तरफ, छोटे शहरों और औद्योगिक जिलों में काफी आर्थिक गतिविधि होने के बावजूद, उन्हें CSR का कम हिस्सा मिलता था।
सत्वा कंसल्टिंग की रिपोर्ट “CSR’s Next Act” बताती है कि अब यह स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है। कंपनी के डेटा और जिला स्तर के आंकड़ों के आधार पर यह रिपोर्ट दिखाती है कि सीएसआर का पैसा अब छोटे शहरों, औद्योगिक क्षेत्रों और कुछ ज़रूरतमंद इलाकों की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, बड़े शहरों का असर अभी भी बना हुआ है।
भारत में सीएसआर का नियम कंपनी अधिनियम 2013 के तहत लागू हुआ था, जिसके अनुसार योग्य कंपनियों को अपने औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2 प्रतिशत सामाजिक कामों पर खर्च करना होता है। समय के साथ यह एक बड़ा फंड बन गया है। आज 4,000 से ज़्यादा कंपनियां मिलकर हर साल करीब ₹30,000 करोड़ सीएसआर पर खर्च करती हैं, जो विकास के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
सीएसआर का भौगोलिक वितरण
इतने बड़े स्तर के बावजूद, सीएसआर का पैसा बराबर तरीके से नहीं बंटा है। कई सालों तक बड़े शहरों को लगभग एक-तिहाई सीएसआर फंड मिलता रहा। कंपनियां आमतौर पर उन जगहों पर पैसा लगाती थीं जहां उनका ऑफिस होता है या जहां पहले से भरोसेमंद पार्टनर मौजूद होते हैं। साथ ही, रिपोर्टिंग और परिणाम दिखाने की ज़रूरत ने भी बड़े शहरों में सीएसआर को सीमित रखा।
अब इसमें बदलाव दिख रहा है। पिछले तीन सालों में छोटे शहरों में सीएसआर खर्च 55 प्रतिशत बढ़ा है। वहीं, औद्योगिक जिलों में भी तेज़ी से वृद्धि हुई है। मदुरै, वाराणसी, मैसूर और वडोदरा जैसे शहरों में सीएसआर फंड में अच्छा खासा इजाफा हुआ है, जिससे पता चलता है कि अब सीएसआर का फैलाव बढ़ रहा है।
औद्योगिक जिलों का हिस्सा अब काफी बढ़ गया है। FY22 से FY24 के बीच इन इलाकों में सीएसआर फंड 120 प्रतिशत बढ़ा, जबकि कुल सीएसआर खर्च में 30 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई। इन जिलों का कुल सीएसआर में हिस्सा 4.4 प्रतिशत से बढ़कर 7.4 प्रतिशत हो गया है। ओडिशा के झारसुगुड़ा जिले को लगभग ₹549 करोड़ मिले, जबकि रायगढ़, जामनगर और बल्लारी को ₹295 से ₹402 करोड़ के बीच फंड मिला। यह ज़्यादातर मेटल, माइनिंग और एनर्जी कंपनियों के कारण हुआ है, जो अपने काम के आसपास सीएसआरकरती हैं।
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सीएसआर प्रोजेक्ट्स अब ज़्यादा स्थानीय स्तर पर भी केंद्रित हो रहे हैं। FY22 से FY24 के बीच करीब 85 प्रतिशत प्रोजेक्ट्स सिर्फ एक जिले पर केंद्रित थे और कुल खर्च का दो-तिहाई हिस्सा इन्हीं पर हुआ। इसका मतलब है कि कंपनियां अब एक जगह पर लगातार काम करने पर ज़ोर दे रही हैं।
फिर भी, सीएसआर और विकास की ज़रूरत के बीच पूरी तरह संतुलन नहीं है। लगभग 75 प्रतिशत सीएसआर खर्च 200 से कम जिलों में ही हो रहा है, और इनमें से कई जगहों पर गरीबी कम है। जबकि ज़्यादा गरीब जिलों को अभी भी कम फंड मिल रहा है। इसका मतलब है कि सीएसआर फैल तो रहा है, लेकिन ज़रूरत के हिसाब से अभी सही तरीके से नहीं पहुंच रहा।
भारत के जिलों तक गहराई से पहुंच
आकांक्षी जिलों में सीएसआर निवेश धीरे-धीरे बढ़ रहा है। FY15 में जहां इनका हिस्सा 1.3 प्रतिशत था, वहीं FY24 में यह बढ़कर 4.5 प्रतिशत हो गया है। इस बदलाव में सरकारी कंपनियों की बड़ी भूमिका रही है, जिन्होंने अपने सीएसआर का लगभग 11 प्रतिशत इन जिलों में खर्च किया है, जो निजी कंपनियों से काफी ज़्यादा है।
₹10 करोड़ से ज़्यादा सीएसआर बजट वाली बड़ी कंपनियां भी अब इन इलाकों में निवेश बढ़ा रही हैं। FY24 में उनके कुल सीएसआर का करीब 5 प्रतिशत हिस्सा आकांक्षी जिलों में गया। सेक्टर के हिसाब से BFSI, एनर्जी और माइनिंग कंपनियों ने इसमें सबसे ज़्यादा योगदान दिया है।
कंपनी का आकार भी सीएसआर खर्च को प्रभावित करता है। छोटी कंपनियां ज़्यादातर अपने राज्य या मुख्यालय के आसपास ही खर्च करती हैं, जबकि बड़ी कंपनियां कई राज्यों और जिलों में काम करती हैं।
सीएसआर के काम करने के तरीके में भी बदलाव आया है। पहले NGOs मुख्य भूमिका निभाते थे, लेकिन अब विश्वविद्यालय, अस्पताल, इनक्यूबेटर और कॉर्पोरेट फाउंडेशन जैसी संस्थाओं को भी ज़्यादा फंड मिल रहा है। FY24 में लगभग 20 प्रतिशत सीएसआर फंड ऐसे संस्थानों के जरिए खर्च हुआ।
कुल मिलाकर, सीएसआर का स्वरूप बदल रहा है। अब यह सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों और औद्योगिक इलाकों तक पहुंच रहा है। आने वाले समय में यह देखना ज़रूरी होगा कि यह बदलाव कितना आगे बढ़ता है और क्या सीएसआर का पैसा उन जगहों तक पहुंचता है जहां इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
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स्थानीय सीएसआर का बढ़ना – क्यों कॉर्पोरेट फंडिंग अब भारत के अंदर तक पहुंच रही है
Digital Desk
सत्वा कंसल्टिंग की रिपोर्ट “CSR’s Next Act” बताती है कि अब यह स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है। कंपनी के डेटा और जिला स्तर के आंकड़ों के आधार पर यह रिपोर्ट दिखाती है कि सीएसआर का पैसा अब छोटे शहरों, औद्योगिक क्षेत्रों और कुछ ज़रूरतमंद इलाकों की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, बड़े शहरों का असर अभी भी बना हुआ है।
भारत में सीएसआर का नियम कंपनी अधिनियम 2013 के तहत लागू हुआ था, जिसके अनुसार योग्य कंपनियों को अपने औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2 प्रतिशत सामाजिक कामों पर खर्च करना होता है। समय के साथ यह एक बड़ा फंड बन गया है। आज 4,000 से ज़्यादा कंपनियां मिलकर हर साल करीब ₹30,000 करोड़ सीएसआर पर खर्च करती हैं, जो विकास के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
सीएसआर का भौगोलिक वितरण
इतने बड़े स्तर के बावजूद, सीएसआर का पैसा बराबर तरीके से नहीं बंटा है। कई सालों तक बड़े शहरों को लगभग एक-तिहाई सीएसआर फंड मिलता रहा। कंपनियां आमतौर पर उन जगहों पर पैसा लगाती थीं जहां उनका ऑफिस होता है या जहां पहले से भरोसेमंद पार्टनर मौजूद होते हैं। साथ ही, रिपोर्टिंग और परिणाम दिखाने की ज़रूरत ने भी बड़े शहरों में सीएसआर को सीमित रखा।
अब इसमें बदलाव दिख रहा है। पिछले तीन सालों में छोटे शहरों में सीएसआर खर्च 55 प्रतिशत बढ़ा है। वहीं, औद्योगिक जिलों में भी तेज़ी से वृद्धि हुई है। मदुरै, वाराणसी, मैसूर और वडोदरा जैसे शहरों में सीएसआर फंड में अच्छा खासा इजाफा हुआ है, जिससे पता चलता है कि अब सीएसआर का फैलाव बढ़ रहा है।
औद्योगिक जिलों का हिस्सा अब काफी बढ़ गया है। FY22 से FY24 के बीच इन इलाकों में सीएसआर फंड 120 प्रतिशत बढ़ा, जबकि कुल सीएसआर खर्च में 30 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई। इन जिलों का कुल सीएसआर में हिस्सा 4.4 प्रतिशत से बढ़कर 7.4 प्रतिशत हो गया है। ओडिशा के झारसुगुड़ा जिले को लगभग ₹549 करोड़ मिले, जबकि रायगढ़, जामनगर और बल्लारी को ₹295 से ₹402 करोड़ के बीच फंड मिला। यह ज़्यादातर मेटल, माइनिंग और एनर्जी कंपनियों के कारण हुआ है, जो अपने काम के आसपास सीएसआरकरती हैं।
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सीएसआर प्रोजेक्ट्स अब ज़्यादा स्थानीय स्तर पर भी केंद्रित हो रहे हैं। FY22 से FY24 के बीच करीब 85 प्रतिशत प्रोजेक्ट्स सिर्फ एक जिले पर केंद्रित थे और कुल खर्च का दो-तिहाई हिस्सा इन्हीं पर हुआ। इसका मतलब है कि कंपनियां अब एक जगह पर लगातार काम करने पर ज़ोर दे रही हैं।
फिर भी, सीएसआर और विकास की ज़रूरत के बीच पूरी तरह संतुलन नहीं है। लगभग 75 प्रतिशत सीएसआर खर्च 200 से कम जिलों में ही हो रहा है, और इनमें से कई जगहों पर गरीबी कम है। जबकि ज़्यादा गरीब जिलों को अभी भी कम फंड मिल रहा है। इसका मतलब है कि सीएसआर फैल तो रहा है, लेकिन ज़रूरत के हिसाब से अभी सही तरीके से नहीं पहुंच रहा।
भारत के जिलों तक गहराई से पहुंच
आकांक्षी जिलों में सीएसआर निवेश धीरे-धीरे बढ़ रहा है। FY15 में जहां इनका हिस्सा 1.3 प्रतिशत था, वहीं FY24 में यह बढ़कर 4.5 प्रतिशत हो गया है। इस बदलाव में सरकारी कंपनियों की बड़ी भूमिका रही है, जिन्होंने अपने सीएसआर का लगभग 11 प्रतिशत इन जिलों में खर्च किया है, जो निजी कंपनियों से काफी ज़्यादा है।
₹10 करोड़ से ज़्यादा सीएसआर बजट वाली बड़ी कंपनियां भी अब इन इलाकों में निवेश बढ़ा रही हैं। FY24 में उनके कुल सीएसआर का करीब 5 प्रतिशत हिस्सा आकांक्षी जिलों में गया। सेक्टर के हिसाब से BFSI, एनर्जी और माइनिंग कंपनियों ने इसमें सबसे ज़्यादा योगदान दिया है।
कंपनी का आकार भी सीएसआर खर्च को प्रभावित करता है। छोटी कंपनियां ज़्यादातर अपने राज्य या मुख्यालय के आसपास ही खर्च करती हैं, जबकि बड़ी कंपनियां कई राज्यों और जिलों में काम करती हैं।
सीएसआर के काम करने के तरीके में भी बदलाव आया है। पहले NGOs मुख्य भूमिका निभाते थे, लेकिन अब विश्वविद्यालय, अस्पताल, इनक्यूबेटर और कॉर्पोरेट फाउंडेशन जैसी संस्थाओं को भी ज़्यादा फंड मिल रहा है। FY24 में लगभग 20 प्रतिशत सीएसआर फंड ऐसे संस्थानों के जरिए खर्च हुआ।
कुल मिलाकर, सीएसआर का स्वरूप बदल रहा है। अब यह सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों और औद्योगिक इलाकों तक पहुंच रहा है। आने वाले समय में यह देखना ज़रूरी होगा कि यह बदलाव कितना आगे बढ़ता है और क्या सीएसआर का पैसा उन जगहों तक पहुंचता है जहां इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
