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संसद के मानसून सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक में सियासी टकराव, 40 दल पहुंचे; विपक्ष ने बीच बैठक किया सांकेतिक वॉकआउट
Digital Desk
तीन घंटे चली सर्वदलीय बैठक में सरकार ने सभी दलों से संसद की कार्यवाही सुचारु रखने में सहयोग मांगा, TMC के बागी सांसदों के गुट को बुलाने पर विपक्ष ने आपत्ति जताई
नई दिल्ली में संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से ठीक एक दिन पहले रविवार को सियासी गतिविधियां तेज रहीं। संसद भवन की एनेक्सी बिल्डिंग में सरकार की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक करीब तीन घंटे तक चली। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके समेत करीब 40 राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल हुए। सरकार ने सभी दलों के सामने आगामी सत्र के कामकाज को लेकर अपनी प्राथमिकताएं रखीं और संसद के दोनों सदनों को बिना अनावश्यक व्यवधान के चलाने के लिए सहयोग मांगा। हालांकि बैठक के दौरान TMC से अलग हुए सांसदों के एक समूह की मौजूदगी को लेकर विवाद खड़ा हो गया और कई विपक्षी दलों ने इसका विरोध करते हुए सांकेतिक वॉकआउट किया।
सर्वदलीय बैठक के बाद संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि चर्चा के दौरान सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने मुद्दे और सुझाव सामने रखे। उनका कहना था कि संसद की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को इसमें सहयोग करना होगा। सरकार की कोशिश है कि महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के साथ प्रस्तावित विधायी कामकाज भी पूरा किया जाए। दूसरी तरफ विपक्ष मानसून सत्र के दौरान कई राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगने की तैयारी में है।
संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त 2026 तक प्रस्तावित है। इस अवधि में कुल 19 बैठकें होने की बात कही गई है। सत्र के दौरान सरकार कई विधायी विषयों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है, जबकि विपक्ष अलग-अलग मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की मांग कर सकता है। मानसून सत्र के शुरुआती दिनों के विधायी एजेंडे पर भी सभी की नजर रहेगी। किसी भी नए विधेयक को पेश किए जाने की अंतिम और आधिकारिक स्थिति संबंधित सदन की सूचीबद्ध कार्यसूची से स्पष्ट होगी।
सर्वदलीय बैठक में सबसे ज्यादा विवाद TMC से अलग हुए सांसदों के गुट को आमंत्रित किए जाने को लेकर हुआ। तृणमूल कांग्रेस और कई अन्य विपक्षी दलों ने सवाल उठाया कि जब इस समूह की संसदीय स्थिति और मान्यता को लेकर प्रक्रिया पर विवाद बना हुआ है, तब उसे अलग राजनीतिक समूह के रूप में बैठक में किस आधार पर जगह दी गई। विपक्षी नेताओं ने इसी मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराया और कुछ समय के लिए बैठक से बाहर चले गए।
TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके, झारखंड मुक्ति मोर्चा, आम आदमी पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, वाम दलों और शिवसेना (यूबीटी) समेत विपक्ष के कई दलों ने आपत्ति दर्ज कराई। उनका सवाल था कि तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों के समूह की स्थिति को लेकर जब संसदीय और कानूनी प्रक्रियाएं पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं, तब उनके प्रतिनिधियों को सर्वदलीय बैठक में अलग पहचान के साथ बुलाने का आधार क्या है। विपक्ष ने इस मामले में दल-बदल से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का भी हवाला दिया।
इस पूरे विवाद के बीच सुदीप बंदोपाध्याय की बैठक में मौजूदगी भी चर्चा का विषय बनी। उन्होंने खुद को नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI के नेता के रूप में बैठक में शामिल होने की बात कही। विपक्ष ने इसी दावे को लेकर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। विपक्षी दलों का कहना है कि सांसदों के किसी समूह को नई राजनीतिक पहचान मिलने, संसदीय दल की स्थिति तय होने और अयोग्यता से जुड़े मामलों के बीच स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।
TMC की ओर से 91वें संविधान संशोधन और दल-बदल विरोधी प्रावधानों का मुद्दा भी उठाया गया। विपक्ष का तर्क है कि सांसदों के किसी अलग समूह की स्थिति तय करने में संविधान की दसवीं अनुसूची और उससे जुड़े नियम महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में यदि किसी सांसद के खिलाफ अयोग्यता का मामला लंबित है या नई राजनीतिक इकाई की संसदीय स्थिति स्पष्ट नहीं है, तो सरकार और संसद प्रशासन को पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से सामने रखनी चाहिए।
बैठक में हुए विवाद के बावजूद सरकार ने चर्चा को उपयोगी बताया। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू के मुताबिक अलग-अलग दलों ने अपनी प्राथमिकताएं सरकार के सामने रखीं और आगामी सत्र को बेहतर तरीके से चलाने पर बातचीत हुई। सरकार चाहती है कि सदन में मुद्दों पर बहस हो और निर्धारित समय का अधिकतम उपयोग किया जाए। विपक्ष की ओर से भी जनहित और राजनीतिक महत्व के मुद्दों के लिए पर्याप्त समय देने की मांग सामने आने की संभावना है।
मानसून सत्र के दौरान वंदे मातरम से जुड़े विषय को लेकर भी राजनीतिक चर्चा बनी हुई है। किसी नए विधेयक या प्रस्ताव की वास्तविक प्रकृति संसद की आधिकारिक कार्यसूची से ही स्पष्ट होगी। वंदे मातरम से जुड़े ऐतिहासिक और राजनीतिक विषय पहले भी संसद में चर्चा का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में इस मुद्दे से संबंधित किसी नए विधायी प्रस्ताव को लेकर सरकार की ओर से आधिकारिक संसदीय दस्तावेज सामने आने पर तस्वीर साफ होगी।
संसद का कोई भी बड़ा सत्र शुरू होने से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाने का मुख्य उद्देश्य सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद स्थापित करना होता है। इसमें सरकार प्रस्तावित विधायी एजेंडे की जानकारी देती है, जबकि विपक्ष और अन्य राजनीतिक दल उन मुद्दों को सामने रखते हैं जिन्हें वे संसद में उठाना चाहते हैं। इसके अलावा संवेदनशील विषयों पर सहमति बनाने, चर्चा के लिए समय तय करने और दोनों सदनों में कामकाज को बेहतर ढंग से संचालित करने की कोशिश भी की जाती है।
हालांकि सर्वदलीय बैठक में सहमति बनने के बाद भी संसद का पूरा सत्र बिना हंगामे के चले, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। कई बार किसी ताजा राजनीतिक घटनाक्रम, जांच, आर्थिक फैसले, विदेश नीति, कानून-व्यवस्था या अन्य मुद्दों को लेकर विपक्ष तत्काल चर्चा की मांग करता है। सरकार और विपक्ष के बीच चर्चा के नियम और समय को लेकर सहमति नहीं बनने पर सदन की कार्यवाही प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि मानसून सत्र से पहले हुई इस बैठक को आने वाले राजनीतिक टकराव और संसदीय रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए 20 सांसदों का मामला भी मानसून सत्र में राजनीतिक बहस का विषय बन सकता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन सांसदों की नई राजनीतिक पहचान और संसद में उनकी बैठने की व्यवस्था को लेकर पिछले कुछ समय से घटनाक्रम तेजी से बदले हैं। विपक्ष का कहना है कि केवल अलग सीटिंग व्यवस्था मिलना और किसी समूह को औपचारिक संसदीय मान्यता मिलना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए इस पूरे मामले में लोकसभा अध्यक्ष के स्तर पर होने वाली संवैधानिक और संसदीय कार्रवाई पर नजर रहेगी।
इसी तरह शिवसेना की अंदरूनी राजनीति से जुड़े सांसदों की बैठने की व्यवस्था में बदलाव का मामला भी चर्चा में है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट से अलग होकर दूसरे खेमे में गए सांसदों की संसदीय स्थिति को लेकर हुए बदलाव के बाद विपक्ष दल-बदल कानून के इस्तेमाल और उसके अलग-अलग मामलों में लागू होने के तरीके पर सवाल उठा सकता है। मानसून सत्र में ऐसे मुद्दे सरकार के विधायी एजेंडे के साथ-साथ राजनीतिक बहस को भी तेज कर सकते हैं।
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नई दिल्ली में संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से ठीक एक दिन पहले रविवार को सियासी गतिविधियां तेज रहीं। संसद भवन की एनेक्सी बिल्डिंग में सरकार की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक करीब तीन घंटे तक चली। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके समेत करीब 40 राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल हुए। सरकार ने सभी दलों के सामने आगामी सत्र के कामकाज को लेकर अपनी प्राथमिकताएं रखीं और संसद के दोनों सदनों को बिना अनावश्यक व्यवधान के चलाने के लिए सहयोग मांगा। हालांकि बैठक के दौरान TMC से अलग हुए सांसदों के एक समूह की मौजूदगी को लेकर विवाद खड़ा हो गया और कई विपक्षी दलों ने इसका विरोध करते हुए सांकेतिक वॉकआउट किया।
सर्वदलीय बैठक के बाद संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि चर्चा के दौरान सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने मुद्दे और सुझाव सामने रखे। उनका कहना था कि संसद की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को इसमें सहयोग करना होगा। सरकार की कोशिश है कि महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के साथ प्रस्तावित विधायी कामकाज भी पूरा किया जाए। दूसरी तरफ विपक्ष मानसून सत्र के दौरान कई राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगने की तैयारी में है।
संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त 2026 तक प्रस्तावित है। इस अवधि में कुल 19 बैठकें होने की बात कही गई है। सत्र के दौरान सरकार कई विधायी विषयों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है, जबकि विपक्ष अलग-अलग मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की मांग कर सकता है। मानसून सत्र के शुरुआती दिनों के विधायी एजेंडे पर भी सभी की नजर रहेगी। किसी भी नए विधेयक को पेश किए जाने की अंतिम और आधिकारिक स्थिति संबंधित सदन की सूचीबद्ध कार्यसूची से स्पष्ट होगी।
सर्वदलीय बैठक में सबसे ज्यादा विवाद TMC से अलग हुए सांसदों के गुट को आमंत्रित किए जाने को लेकर हुआ। तृणमूल कांग्रेस और कई अन्य विपक्षी दलों ने सवाल उठाया कि जब इस समूह की संसदीय स्थिति और मान्यता को लेकर प्रक्रिया पर विवाद बना हुआ है, तब उसे अलग राजनीतिक समूह के रूप में बैठक में किस आधार पर जगह दी गई। विपक्षी नेताओं ने इसी मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराया और कुछ समय के लिए बैठक से बाहर चले गए।
TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके, झारखंड मुक्ति मोर्चा, आम आदमी पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, वाम दलों और शिवसेना (यूबीटी) समेत विपक्ष के कई दलों ने आपत्ति दर्ज कराई। उनका सवाल था कि तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों के समूह की स्थिति को लेकर जब संसदीय और कानूनी प्रक्रियाएं पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं, तब उनके प्रतिनिधियों को सर्वदलीय बैठक में अलग पहचान के साथ बुलाने का आधार क्या है। विपक्ष ने इस मामले में दल-बदल से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का भी हवाला दिया।
इस पूरे विवाद के बीच सुदीप बंदोपाध्याय की बैठक में मौजूदगी भी चर्चा का विषय बनी। उन्होंने खुद को नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI के नेता के रूप में बैठक में शामिल होने की बात कही। विपक्ष ने इसी दावे को लेकर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। विपक्षी दलों का कहना है कि सांसदों के किसी समूह को नई राजनीतिक पहचान मिलने, संसदीय दल की स्थिति तय होने और अयोग्यता से जुड़े मामलों के बीच स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।
TMC की ओर से 91वें संविधान संशोधन और दल-बदल विरोधी प्रावधानों का मुद्दा भी उठाया गया। विपक्ष का तर्क है कि सांसदों के किसी अलग समूह की स्थिति तय करने में संविधान की दसवीं अनुसूची और उससे जुड़े नियम महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में यदि किसी सांसद के खिलाफ अयोग्यता का मामला लंबित है या नई राजनीतिक इकाई की संसदीय स्थिति स्पष्ट नहीं है, तो सरकार और संसद प्रशासन को पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से सामने रखनी चाहिए।
बैठक में हुए विवाद के बावजूद सरकार ने चर्चा को उपयोगी बताया। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू के मुताबिक अलग-अलग दलों ने अपनी प्राथमिकताएं सरकार के सामने रखीं और आगामी सत्र को बेहतर तरीके से चलाने पर बातचीत हुई। सरकार चाहती है कि सदन में मुद्दों पर बहस हो और निर्धारित समय का अधिकतम उपयोग किया जाए। विपक्ष की ओर से भी जनहित और राजनीतिक महत्व के मुद्दों के लिए पर्याप्त समय देने की मांग सामने आने की संभावना है।
मानसून सत्र के दौरान वंदे मातरम से जुड़े विषय को लेकर भी राजनीतिक चर्चा बनी हुई है। किसी नए विधेयक या प्रस्ताव की वास्तविक प्रकृति संसद की आधिकारिक कार्यसूची से ही स्पष्ट होगी। वंदे मातरम से जुड़े ऐतिहासिक और राजनीतिक विषय पहले भी संसद में चर्चा का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में इस मुद्दे से संबंधित किसी नए विधायी प्रस्ताव को लेकर सरकार की ओर से आधिकारिक संसदीय दस्तावेज सामने आने पर तस्वीर साफ होगी।
संसद का कोई भी बड़ा सत्र शुरू होने से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाने का मुख्य उद्देश्य सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद स्थापित करना होता है। इसमें सरकार प्रस्तावित विधायी एजेंडे की जानकारी देती है, जबकि विपक्ष और अन्य राजनीतिक दल उन मुद्दों को सामने रखते हैं जिन्हें वे संसद में उठाना चाहते हैं। इसके अलावा संवेदनशील विषयों पर सहमति बनाने, चर्चा के लिए समय तय करने और दोनों सदनों में कामकाज को बेहतर ढंग से संचालित करने की कोशिश भी की जाती है।
हालांकि सर्वदलीय बैठक में सहमति बनने के बाद भी संसद का पूरा सत्र बिना हंगामे के चले, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। कई बार किसी ताजा राजनीतिक घटनाक्रम, जांच, आर्थिक फैसले, विदेश नीति, कानून-व्यवस्था या अन्य मुद्दों को लेकर विपक्ष तत्काल चर्चा की मांग करता है। सरकार और विपक्ष के बीच चर्चा के नियम और समय को लेकर सहमति नहीं बनने पर सदन की कार्यवाही प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि मानसून सत्र से पहले हुई इस बैठक को आने वाले राजनीतिक टकराव और संसदीय रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए 20 सांसदों का मामला भी मानसून सत्र में राजनीतिक बहस का विषय बन सकता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन सांसदों की नई राजनीतिक पहचान और संसद में उनकी बैठने की व्यवस्था को लेकर पिछले कुछ समय से घटनाक्रम तेजी से बदले हैं। विपक्ष का कहना है कि केवल अलग सीटिंग व्यवस्था मिलना और किसी समूह को औपचारिक संसदीय मान्यता मिलना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए इस पूरे मामले में लोकसभा अध्यक्ष के स्तर पर होने वाली संवैधानिक और संसदीय कार्रवाई पर नजर रहेगी।
इसी तरह शिवसेना की अंदरूनी राजनीति से जुड़े सांसदों की बैठने की व्यवस्था में बदलाव का मामला भी चर्चा में है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट से अलग होकर दूसरे खेमे में गए सांसदों की संसदीय स्थिति को लेकर हुए बदलाव के बाद विपक्ष दल-बदल कानून के इस्तेमाल और उसके अलग-अलग मामलों में लागू होने के तरीके पर सवाल उठा सकता है। मानसून सत्र में ऐसे मुद्दे सरकार के विधायी एजेंडे के साथ-साथ राजनीतिक बहस को भी तेज कर सकते हैं।
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