एक समय था जब अकेले रहना सामान्य बात मानी जाती थी। खाली समय में इंसान खुद से बात करता, सोचता, टहलता या बस चुपचाप बैठा रहता था। लेकिन आज की तेज़ रफ्तार, डिजिटल और सोशल लाइफस्टाइल में खुद के साथ समय बिताना धीरे-धीरे एक दुर्लभ आदत बनता जा रहा है। यही वजह है कि अब इसे एक स्किल यानी कौशल के रूप में देखा जाने लगा है।
हमेशा कनेक्टेड रहने का दबाव
आज मोबाइल, सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स ने हमें हर पल “उपलब्ध” बना दिया है। काम खत्म होने के बाद भी नोटिफिकेशन, कॉल और अपडेट पीछा नहीं छोड़ते। ऐसे में जब कोई व्यक्ति खुद के साथ बैठता है, बिना फोन देखे या किसी से बात किए, तो उसे बेचैनी होने लगती है। यह बेचैनी इस बात का संकेत है कि हम अकेलेपन के आदी नहीं रहे।
अकेलापन नहीं, आत्म-संपर्क
खुद के साथ समय बिताना अकेलापन नहीं है, बल्कि आत्म-संपर्क है। यह वह समय होता है जब व्यक्ति अपनी भावनाओं, विचारों और जरूरतों को समझ पाता है। लगातार लोगों के बीच रहने और दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश में हम अक्सर खुद की आवाज़ सुनना भूल जाते हैं। यही कारण है कि आज कई लोग यह भी नहीं समझ पाते कि वे सच में चाहते क्या हैं।
मल्टीटास्किंग ने छीना सुकून
आज का इंसान एक साथ कई काम करने में गर्व महसूस करता है। लेकिन इस मल्टीटास्किंग ने दिमाग को हमेशा व्यस्त और थका हुआ रखा है। खुद के साथ समय बिताने के लिए दिमाग का शांत होना ज़रूरी है, जो अब आसान नहीं रहा। जब व्यक्ति बिना किसी बाहरी刺激 के बैठता है, तो उसे लगता है कि वह “कुछ नहीं कर रहा”, जबकि असल में वह खुद को समझने की प्रक्रिया में होता है।
मानसिक स्वास्थ्य से सीधा जुड़ावमनोवैज्ञानिकों के अनुसार, जो लोग नियमित रूप से खुद के साथ समय बिताते हैं, वे भावनात्मक रूप से अधिक संतुलित होते हैं। उन्हें अपनी सीमाएं पता होती हैं और वे रिश्तों में भी ज़्यादा स्पष्ट रहते हैं। इसके उलट, जो लोग हर वक्त दूसरों के साथ या स्क्रीन में उलझे रहते हैं, उनमें तनाव, भ्रम और असंतोष की संभावना अधिक होती है।
इसलिए बन गई है यह एक स्किल
आज के माहौल में खुद के साथ समय बिताने के लिए जानबूझकर कोशिश करनी पड़ती है। फोन से दूरी बनाना, सोशल शोर से बाहर निकलना और अपने विचारों के साथ सहज रहना आसान नहीं है। यही वजह है कि यह अब एक नेचुरल आदत नहीं, बल्कि सीखी जाने वाली स्किल बन चुकी है।
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