आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में एक शिकायत आम होती जा रही है—नाम याद नहीं रहते, तारीखें भूल जाती हैं और कुछ देर पहले कही गई बातें दिमाग से निकल जाती हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह समस्या अब सिर्फ बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं रही। 20–40 साल की उम्र के लोग भी खुद को “भूलक्कड़” कहने लगे हैं। विशेषज्ञ इसे किसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी से ज़्यादा लाइफस्टाइल से जुड़ी समस्या मानते हैं।
क्या हो रहा है और किसे हो रहा है?यह स्थिति उन लोगों में ज्यादा देखी जा रही है जो लंबे समय तक स्क्रीन पर रहते हैं, मल्टीटास्किंग करते हैं और जिनका सोने-जागने का समय तय नहीं है। ऑफिस मीटिंग, ऑनलाइन नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया और लगातार बदलती सूचनाओं के बीच दिमाग को आराम का मौका नहीं मिल पाता। नतीजा—याददाश्त की पकड़ ढीली पड़ने लगती है।
क्यों बढ़ रही है यह समस्या?डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह मेंटल ओवरलोड है। दिमाग एक समय में सीमित जानकारी ही ठीक से प्रोसेस कर सकता है, लेकिन हम उसे बिना रुके डेटा से भर रहे हैं। इसके अलावा—
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नींद की कमी या खराब नींद
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लगातार मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल
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हर काम के लिए फोन पर निर्भरता
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तनाव और बेचैनी
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शारीरिक गतिविधि की कमी
ये सभी कारण मिलकर दिमाग की “वर्किंग मेमोरी” को कमजोर कर देते हैं।
कैसे काम करती है याददाश्त और कहां गड़बड़ होती है?याददाश्त तीन स्तरों पर काम करती है—जानकारी को लेना, उसे समझना और फिर ज़रूरत पड़ने पर याद करना। आज की जीवनशैली में समस्या पहले ही स्तर पर आ जाती है। जब ध्यान भटका हो, तो दिमाग जानकारी को सही से दर्ज ही नहीं करता। ऐसे में बाद में उसे याद न कर पाना स्वाभाविक है।
क्या यह अल्ज़ाइमर या डिमेंशिया का संकेत है?विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि ज्यादातर मामलों में यह किसी गंभीर बीमारी का लक्षण नहीं होता। यह फंक्शनल मेमोरी इश्यू है, जो सही आदतों से सुधर सकता है। हालांकि, अगर भूलने की समस्या तेजी से बढ़े, रोज़मर्रा के काम प्रभावित होने लगें या व्यक्तित्व में बदलाव दिखे, तो डॉक्टर से सलाह ज़रूरी है।
इस ‘नई बीमारी’ से कैसे बचें?
समाधान किसी दवा से ज्यादा आदतों में बदलाव से जुड़ा है
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एक समय में एक ही काम करें
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सोने-जागने का समय तय रखें
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मोबाइल पर हर छोटी बात नोट करने की आदत कम करें
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रोज़ थोड़ा समय बिना स्क्रीन के बिताएं
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हल्का व्यायाम और ध्यान को रूटीन में शामिल करें
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बातचीत के दौरान पूरी तरह मौजूद रहें
भूलना इंसानी स्वभाव है, लेकिन जब यह रोज़मर्रा की परेशानी बन जाए तो उसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। यह कोई नई बीमारी नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली का आईना है। अगर हम दिमाग को उतना ही महत्व दें जितना शरीर को देते हैं, तो नाम, तारीखें और बातें फिर से साथ देने लगेंगी।
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