इकोनॉमिक सर्वे की चेतावनी: देश के 40% गिग वर्कर्स की आय 15 हजार से कम, न्यूनतम कमाई तय करने की सिफारिश

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प्लेटफॉर्म जॉब्स में अस्थिर आय पर सरकार की चिंता, वेटिंग टाइम का भुगतान और एल्गोरिदम कंट्रोल पर सुधार के संकेत

संसद में आज  पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने भारत की तेजी से बढ़ती गिग इकोनॉमी की जमीनी हकीकत सामने रख दी है। सर्वे के अनुसार, फूड डिलीवरी, क्विक कॉमर्स, राइड-हेलिंग और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े लगभग 40 प्रतिशत गिग वर्कर्स की मासिक कमाई 15 हजार रुपये से भी कम है। रिपोर्ट में इसे सामाजिक और आर्थिक अस्थिरता का संकेत बताते हुए गिग वर्कर्स के लिए न्यूनतम कमाई तय करने की सिफारिश की गई है।

सर्वे में कहा गया है कि गिग वर्कर्स की आय न तो तय है और न ही नियमित। इसी कारण उन्हें बैंकिंग सुविधाएं, लोन और बीमा जैसी बुनियादी वित्तीय सेवाओं तक पहुंचने में दिक्कत होती है। सरकार का मानना है कि नीतियां ऐसी होनी चाहिए, जिससे लोग मजबूरी में नहीं बल्कि विकल्प के तौर पर गिग वर्क को अपनाएं।

वेटिंग टाइम के भुगतान का सुझाव
इकोनॉमिक सर्वे में यह भी सिफारिश की गई है कि गिग वर्कर्स को केवल काम पूरा करने के लिए ही नहीं, बल्कि काम के इंतजार में बिताए गए समय के लिए भी भुगतान मिलना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक, प्लेटफॉर्म आधारित नौकरियों में वेटिंग पीरियड अक्सर लंबा होता है, लेकिन इस दौरान श्रमिकों को कोई पारिश्रमिक नहीं दिया जाता।

एल्गोरिदम से बढ़ा दबाव
सर्वे में प्लेटफॉर्म कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे एल्गोरिदम पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि काम का बंटवारा, रेटिंग, इंसेंटिव और कमाई—सब कुछ एल्गोरिदम के जरिए तय होता है। इससे वर्कर्स पर लगातार बेहतर प्रदर्शन का दबाव बना रहता है, जो थकान, तनाव और बर्नआउट जैसी समस्याओं को जन्म दे रहा है।

तेजी से बढ़ रही गिग वर्कफोर्स
आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2021 में देश में गिग वर्कर्स की संख्या 77 लाख थी, जो वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर करीब 1.2 करोड़ हो गई है। यानी चार साल में लगभग 55 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। फिलहाल कुल वर्कफोर्स में इनकी हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से अधिक है। अनुमान है कि 2029-30 तक नॉन-एग्रीकल्चर सेक्टर की कुल नौकरियों में गिग वर्क की हिस्सेदारी 6.7 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।

कंपनियों को निवेश की सलाह
सर्वे में डिलीवरी और प्लेटफॉर्म कंपनियों से अपील की गई है कि वे अपने वर्कर्स की ट्रेनिंग और जरूरी संसाधनों में निवेश करें। रिपोर्ट के मुताबिक, संसाधनों और कौशल की कमी के कारण कई गिग वर्कर्स बेहतर नौकरियों की ओर आगे नहीं बढ़ पाते।

GDP में बड़ा योगदान
सरकार का आकलन है कि वर्ष 2030 तक गिग इकोनॉमी का भारत की GDP में योगदान करीब 2.35 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। हाल के महीनों में जोमैटो, स्विगी जैसे प्लेटफॉर्म्स के वर्कर्स द्वारा बेहतर वेतन और कामकाजी परिस्थितियों को लेकर किए गए प्रदर्शनों के बीच, सर्वे की ये सिफारिशें नीति निर्माण के लिहाज से अहम मानी जा रही हैं।

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www.dainikjagranmpcg.com
29 Jan 2026 By ANKITA

इकोनॉमिक सर्वे की चेतावनी: देश के 40% गिग वर्कर्स की आय 15 हजार से कम, न्यूनतम कमाई तय करने की सिफारिश

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संसद में आज  पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने भारत की तेजी से बढ़ती गिग इकोनॉमी की जमीनी हकीकत सामने रख दी है। सर्वे के अनुसार, फूड डिलीवरी, क्विक कॉमर्स, राइड-हेलिंग और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े लगभग 40 प्रतिशत गिग वर्कर्स की मासिक कमाई 15 हजार रुपये से भी कम है। रिपोर्ट में इसे सामाजिक और आर्थिक अस्थिरता का संकेत बताते हुए गिग वर्कर्स के लिए न्यूनतम कमाई तय करने की सिफारिश की गई है।

सर्वे में कहा गया है कि गिग वर्कर्स की आय न तो तय है और न ही नियमित। इसी कारण उन्हें बैंकिंग सुविधाएं, लोन और बीमा जैसी बुनियादी वित्तीय सेवाओं तक पहुंचने में दिक्कत होती है। सरकार का मानना है कि नीतियां ऐसी होनी चाहिए, जिससे लोग मजबूरी में नहीं बल्कि विकल्प के तौर पर गिग वर्क को अपनाएं।

वेटिंग टाइम के भुगतान का सुझाव
इकोनॉमिक सर्वे में यह भी सिफारिश की गई है कि गिग वर्कर्स को केवल काम पूरा करने के लिए ही नहीं, बल्कि काम के इंतजार में बिताए गए समय के लिए भी भुगतान मिलना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक, प्लेटफॉर्म आधारित नौकरियों में वेटिंग पीरियड अक्सर लंबा होता है, लेकिन इस दौरान श्रमिकों को कोई पारिश्रमिक नहीं दिया जाता।

एल्गोरिदम से बढ़ा दबाव
सर्वे में प्लेटफॉर्म कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे एल्गोरिदम पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि काम का बंटवारा, रेटिंग, इंसेंटिव और कमाई—सब कुछ एल्गोरिदम के जरिए तय होता है। इससे वर्कर्स पर लगातार बेहतर प्रदर्शन का दबाव बना रहता है, जो थकान, तनाव और बर्नआउट जैसी समस्याओं को जन्म दे रहा है।

तेजी से बढ़ रही गिग वर्कफोर्स
आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2021 में देश में गिग वर्कर्स की संख्या 77 लाख थी, जो वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर करीब 1.2 करोड़ हो गई है। यानी चार साल में लगभग 55 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। फिलहाल कुल वर्कफोर्स में इनकी हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से अधिक है। अनुमान है कि 2029-30 तक नॉन-एग्रीकल्चर सेक्टर की कुल नौकरियों में गिग वर्क की हिस्सेदारी 6.7 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।

कंपनियों को निवेश की सलाह
सर्वे में डिलीवरी और प्लेटफॉर्म कंपनियों से अपील की गई है कि वे अपने वर्कर्स की ट्रेनिंग और जरूरी संसाधनों में निवेश करें। रिपोर्ट के मुताबिक, संसाधनों और कौशल की कमी के कारण कई गिग वर्कर्स बेहतर नौकरियों की ओर आगे नहीं बढ़ पाते।

GDP में बड़ा योगदान
सरकार का आकलन है कि वर्ष 2030 तक गिग इकोनॉमी का भारत की GDP में योगदान करीब 2.35 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। हाल के महीनों में जोमैटो, स्विगी जैसे प्लेटफॉर्म्स के वर्कर्स द्वारा बेहतर वेतन और कामकाजी परिस्थितियों को लेकर किए गए प्रदर्शनों के बीच, सर्वे की ये सिफारिशें नीति निर्माण के लिहाज से अहम मानी जा रही हैं।

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