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बच्चों में बढ़ता चिड़चिड़ापन बना पेरेंट्स की चिंता, बदलती लाइफस्टाइल पर उठे सवाल
लाइफस्टाइल डेस्क
बच्चों में बढ़ता चिड़चिड़ापन एक सामाजिक और पारिवारिक मुद्दा बनता जा रहा है। यह संकेत देता है कि बच्चों की मानसिक जरूरतों को समझने और उनकी लाइफस्टाइल में बदलाव करने का समय आ गया है। सही संवाद, धैर्य और संतुलन के साथ इस समस्या को शुरुआती स्तर पर ही संभाला जा सकता है
शहरों से लेकर कस्बों तक, हाल के दिनों में बच्चों के व्यवहार में बढ़ता चिड़चिड़ापन माता-पिता और विशेषज्ञों दोनों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। छोटी बातों पर गुस्सा, बात न मानना, बार-बार रोना या चुप हो जाना—ये संकेत अब घर-घर में देखे जा रहे हैं। बाल मनोविशेषज्ञों का कहना है कि यह महज जिद या शरारत नहीं, बल्कि बदलती लाइफस्टाइल और मानसिक दबाव का नतीजा है।
क्या हो रहा है बच्चों के साथ
विशेषज्ञों के मुताबिक, 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों में चिड़चिड़ापन तेजी से बढ़ा है। यह बदलाव खासतौर पर शहरी इलाकों में ज्यादा देखा जा रहा है। लंबे स्क्रीन टाइम, सीमित शारीरिक गतिविधि और पढ़ाई का दबाव बच्चों की भावनात्मक सेहत को प्रभावित कर रहा है।
क्यों बढ़ रही है समस्या
कोविड के बाद बच्चों की दिनचर्या में बड़ा बदलाव आया। ऑनलाइन क्लास, मोबाइल और वीडियो गेम ने बच्चों को घर के भीतर सीमित कर दिया। खेलकूद और सामाजिक मेलजोल की कमी ने उनके भीतर बेचैनी और अधीरता बढ़ाई। मनोचिकित्सकों का मानना है कि भावनाएं व्यक्त न कर पाने पर बच्चे गुस्से के जरिए प्रतिक्रिया देते हैं।
माता-पिता की भूमिका पर सवाल
परिवारों में कामकाजी माता-पिता की संख्या बढ़ने से बच्चों के साथ संवाद का समय कम हुआ है। कई मामलों में बच्चे खुद को अनसुना महसूस करते हैं। भोपाल के एक चाइल्ड काउंसलर के अनुसार, “जब बच्चे की बात बार-बार टाली जाती है, तो वह व्यवहार के जरिए ध्यान खींचने की कोशिश करता है।”
पढ़ाई और तुलना का दबाव
स्कूलों में प्रतिस्पर्धा, बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा और लगातार तुलना बच्चों के मानसिक संतुलन को बिगाड़ रही है। कई बच्चे डर और तनाव के कारण चिड़चिड़े हो जाते हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर आत्मविश्वास और सीखने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।
समाधान क्या कहते हैं विशेषज्ञ
बाल विशेषज्ञ मानते हैं कि चिड़चिड़ापन एक चेतावनी संकेत है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। बच्चों के लिए संतुलित दिनचर्या, पर्याप्त नींद और खुलकर बातचीत जरूरी है। साथ ही स्क्रीन टाइम सीमित करना और आउटडोर गतिविधियों को बढ़ावा देना अहम माना जा रहा है।
मनोवैज्ञानिकों का सुझाव है कि अगर बच्चे का व्यवहार लंबे समय तक असामान्य बना रहे, तो पेशेवर सलाह लेने से नहीं हिचकना चाहिए। स्कूल और पेरेंट्स के बीच समन्वय भी जरूरी है, ताकि बच्चे पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
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