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सभ्यता का उदय: जब ऋचाओं से रक्त और दर्शन की गंध आई
जीवन के मंत्र
वैदिक गाथा उपन्यास त्रयी पर एक विवेचना
ऋग्वेद केवल मंत्रों की ध्वनियाँ नहीं हैं, बल्कि वे उस आदि-संघर्ष की गूँज हैं जिसने आर्यावर्त के भविष्य की पटकथा लिखी थी। लेखक भागवत जायसवाल की तीन कृतियाँ—'इंद्र', 'ब्रह्मर्षि युद्ध' और 'दशराज्ञ युद्ध'—इतिहास के उन धुंधले पन्नों को पलटती हैं, जिन्हें अक्सर हमने केवल किंवदंतियों में सुना है। प्रलेक प्रकाशन द्वारा प्रस्तुत यह त्रयी देवताओं को स्वर्ग के सिंहासन से उतारकर संघर्ष की धूल भरी धरती पर खड़ा करती है।
1. इंद्र: देवत्व से पूर्व का मानवीय संघर्ष
श्रृंखला की पहली कड़ी 'इंद्र' हमें उस महानायक से मिलवाती है जो मात्र 'वर्षा का देवता' नहीं, बल्कि 'ऋत' (ब्रह्मांडीय व्यवस्था) का रक्षक है। यह कहानी सिंहासन के मोह की नहीं, बल्कि अराजकता के विरुद्ध एक संकल्प की है।
सार: कश्यप की संतानों के बीच का गृहयुद्ध, नए आर्यवर्त का निर्माण, अलग अलग लोकों की गाथा।
विशेष: लेखक ने इंद्र के भीतर के द्वंद्व को उकेरा है—जहाँ अपनों के विरुद्ध शस्त्र उठाना मजबूरी है और कुल की रक्षा एक बोझ। 'वज्र' धारण करने से पहले की पीड़ा इस पुस्तक का प्राण है।
2. ब्रह्मर्षि युद्ध: जब विचार शस्त्रों से अधिक घातक हुए
जहाँ तलवारें थक जाती हैं, वहाँ 'विचार' युद्ध शुरू करते हैं। यह पुस्तक सभ्यता के वैचारिक ध्रुवीकरण की वह कहानी है, जहाँ राजा केवल मोहरे थे और ऋषियों का मस्तिष्क असली युद्धक्षेत्र।
विवाद: परंपरा बनाम नवाचार, समानता बनाम शुद्धता।
दर्शन: यह कृति सिद्ध करती है कि शस्त्र केवल शरीर काटते हैं, लेकिन एक ऋषि का विचार पूरी सभ्यता की दिशा बदल देता है। ब्रह्मा के मानस पुत्रों के बीच का यह कूटनीतिक द्वंद्व रोंगटे खड़े कर देने वाला है।
3. दशराज्ञ युद्ध: आर्यवर्त का तनाव और परुष्णी तट पर नियति का निर्णय
त्रयी का समापन भारत के ज्ञात इतिहास के भीषणतम रक्तपात के साथ होता है। परुष्णी नदी का तट साक्षी है—वशिष्ठ की कठोर मर्यादा और विश्वामित्र के विद्रोही तेवरों के बीच के महासंग्राम का।
महानायक: परशुराम, सहस्त्रार्जुन और सुदास।
प्रश्न: क्या शांति की स्थापना के लिए महाविनाश अनिवार्य है? यह पुस्तक युद्ध की विभीषिका के बीच से 'महासृजन' का मार्ग तलाशती है।
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तुलनात्मक एक दृष्टि
| पुस्तक | मुख्य विषय | प्रमुख धुरी |
| इंद्र | व्यवस्था की स्थापना | इंद्र, अदिति, कश्यप |
| ब्रह्मर्षि युद्ध | वैचारिक व कूटनीतिक संघर्ष | वशिष्ठ, विश्वामित्र, वेद |
| दशराज्ञ युद्ध | आर्यावर्त का सबसे बड़ा सैन्य संघर्ष | सुदास, परशुराम, सहस्त्रार्जुन |
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समीक्षक की राय: क्यों ज़रूरी है यह त्रयी?
भागवत जायसवाल की लेखनी की सबसे बड़ी शक्ति उनका गहन शोध है। उन्होंने पौराणिक पात्रों को उनके मानवीय गुणों और दोषों के साथ 'रक्त-मांस' के मनुष्य के रूप में प्रस्तुत किया है। यह पढ़ते हुए हमें अहसास होता है कि हज़ारों साल पहले का सत्ता संघर्ष आज के दौर से कितना मिलता-जुलता है।
अंतिम शब्द: यदि आप अपनी जड़ों को केवल प्रार्थनाओं में नहीं, बल्कि उस पसीने और रक्त में खोजना चाहते हैं जिसने भारतवर्ष की नींव रखी, तो यह त्रयी आपके संग्रह में अनिवार्य होनी चाहिए।
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प्रकाशन विवरण:
लेखक: भागवत जायसवाल
प्रकाशक: प्रलेक प्रकाशन
विधा: ऐतिहासिक/पौराणिक उपन्यास
उपलब्धता: अमेज़न, फ्लिपकार्ट और प्रमुख बुक स्टोर्स पर।
Kitabo-ki-baten
सिंहासन का मोह नहीं, यह व्यवस्था का संकल्प है!
हम उन्हें 'देवराज' कहते हैं, हम उन्हें 'स्वर्ग का स्वामी' जानते हैं... लेकिन क्या हमें पता है कि एक साधारण मनुष्य से 'वज्रधारी' बनने के बीच इंद्र ने कितनी आहुतियाँ दी थीं?
लेखक भागवत जायसवाल की कृति 'इंद्र' पौराणिक कथाओं के उस धुंध को साफ करती है जहाँ इंद्र केवल वर्षा के देवता नहीं, बल्कि अराजकता के विरुद्ध खड़े एक योद्धा हैं। कश्यप की संतानों के बीच छिड़ा गृहयुद्ध और अपनों के ही विरुद्ध शस्त्र उठाने की वह विवशता—यह कहानी है 'ऋत' (ब्रह्मांडीय व्यवस्था) को बचाने की।
क्या आप भारतवर्ष के पहले महानायक के मानवीय पक्ष को जानने के लिए तैयार हैं?
पुस्तक: इंद्र (ऋत का रक्षक)
लेखक: भागवत जायसवाल (@BhagwatJaiswal)
प्रकाशक: प्रलेक प्रकाशन
Nirmala_pathak
"शस्त्र केवल हाथ काटते हैं, लेकिन व्यवस्था को जन्म देने वाला संकल्प इतिहास बदल देता है।"
भगवान या इंसान? लेखक भागवत की पुस्तक 'इंद्र' हमें उस कालखंड में ले जाती है जहाँ मर्यादाएँ गढ़ी जा रही थीं। यह स्वर्ग के राजा की नहीं, बल्कि उस बेटे की गाथा है जिसने कुल की रक्षा के लिए अपने सुखों का त्याग किया।
वैदिक काल का सबसे अनकहा अध्याय अब आपके सामने है।
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क्या आप जानते हैं 'इंद्र' बनने की असली कीमत?
सिंहासन के पीछे का त्याग।
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देवराज बनने से पहले की उस अग्निपरीक्षा को महसूस करें, जिसने भारत की नींव रखी। भागवत की कलम से निकली एक अद्भुत ऋग्वैदिक गाथा— 'इंद्र'। आज ही अपनी प्रति मंगवाएँ! [amazon]
