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जीवन में जब रास्ता न दिखे, तब गीता के ये 10 उपदेश याद रखें
जीवन के मंत्र
भगवद गीता जीवन को उद्देश्यपूर्ण, संतुलित और शांत बनाने की राह दिखाती है। यह कर्म, ज्ञान और भक्ति के माध्यम से व्यक्ति को अपने स्वधर्म की पहचान कराती है और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है।
जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब व्यक्ति उलझन, निराशा और असमंजस में फँस जाता है। तब न बाहरी सलाह काम आती है, न तर्क। ऐसे समय में भगवद गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को समझने और संभालने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका बन जाती है। गीता के उपदेश कर्मयोग, आत्म-ज्ञान, मन-नियंत्रण और ईश्वर-विश्वास पर आधारित हैं, जो हर परिस्थिति में धैर्य, स्पष्टता और सही दिशा देते हैं।
गीता के 10 प्रमुख जीवन उपदेश
1. कर्म करो, फल की चिंता मत करो
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”
मनुष्य का अधिकार केवल कर्म पर है, परिणाम पर नहीं। जब हम फल की चिंता छोड़कर पूरी निष्ठा से कर्म करते हैं, तब तनाव कम होता है और कार्य की गुणवत्ता बढ़ती है।
2. मन ही मित्र और शत्रु है
संयमित मन सबसे बड़ा सहायक बनता है, जबकि असंयमित मन व्यक्ति को भ्रम और भय में डाल देता है। मन पर नियंत्रण ही आत्म-विकास की कुंजी है।
3. आत्मा अमर है
गीता सिखाती है कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। शरीर नश्वर है, इसलिए भय, शोक और मृत्यु की चिंता व्यर्थ है।
4. मोह, क्रोध और लोभ का त्याग करें
ये तीन भावनाएँ मनुष्य को बाँधती हैं और दुख का कारण बनती हैं। इनसे मुक्त होकर ही सच्ची शांति मिलती है।
5. समभाव रखें
सुख-दुख, लाभ-हानि, सफलता-असफलता—इन सभी में समान भाव रखना ही सच्चे ज्ञानी की पहचान है।
6. ईश्वर की शरण में जाएँ
पूर्ण समर्पण और विश्वास से भय समाप्त होता है। जब व्यक्ति अहंकार छोड़कर ईश्वर पर भरोसा करता है, तब जीवन सरल हो जाता है।
7. पुरुषार्थ करें, भाग्य पर निर्भर न रहें
गीता कर्म को सर्वोच्च मानती है। निरंतर प्रयास से ही परिस्थितियाँ और भाग्य दोनों बदले जा सकते हैं।
8. बुद्धि और विवेक से निर्णय लें
भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि विवेक से किया गया कार्य सफलता और मानसिक शांति दोनों देता है।
9. वर्तमान में जिएँ
जो बीत गया, उस पर शोक न करें। जो है, उस पर अहंकार न करें। और जो आने वाला है, उसकी चिंता न करें।
10. निंदा से विचलित न हों
निंदा और आलोचना जीवन का हिस्सा हैं। जो अपने लक्ष्य पर अडिग रहता है, वही आगे बढ़ता है।
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