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पश्चिमी नेताओं की चीन यात्राएं बढ़ीं: ट्रम्प की नीतियों से बदल रहा वैश्विक संतुलन
अंतराष्ट्रीय न्यूज
दो महीने में 5 पश्चिमी नेता बीजिंग पहुंचे; यूरोप और अमेरिका के बीच टैरिफ विवाद और कूटनीतिक दबाव चीन के लिए अवसर
बीजिंग। पश्चिमी देशों के नेताओं की चीन यात्राओं में हाल ही में तेजी देखी जा रही है। पिछले दो महीनों में पांच प्रमुख पश्चिमी नेता—ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, फिनलैंड और आयरलैंड के प्रमुख—बीजिंग पहुंचे हैं। बुधवार को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर 3 दिन के दौरे पर चीन पहुंचे।
विश्लेषकों का कहना है कि यह प्रवृत्ति अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक नीतियों और टैरिफ धमकियों से प्रभावित है। ट्रम्प ने नाटो, ग्रीनलैंड और ग्लोबल ट्रेड जैसे मुद्दों पर विवादित रुख अपनाया, जिससे यूरोपीय सहयोगियों में अमेरिका पर भरोसा कमजोर हुआ। ट्रेड फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रम्प ने 10-25% तक टैरिफ लगाया, जिससे वित्तीय अनिश्चितता और मंदी की आशंका बढ़ी।
ब्रिटिश पीएम स्टार्मर ने चीन में व्यापार और निवेश के अवसर तलाशने के साथ-साथ कूटनीतिक रिश्तों को रीसेट करने की कोशिश की। इसी तरह, कनाडाई पीएम मार्क कार्नी ने 16 जनवरी को 2017 के बाद पहली बार चीन का दौरा किया। कनाडा और चीन ने आर्थिक और राजनीतिक तनावों को भुलाकर ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ स्थापित करने पर सहमति दी।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, फिनलैंड और आयरलैंड के नेताओं ने भी चीन के साथ व्यापार और बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने फ्रांस और आयरलैंड के नेताओं के साथ बीजिंग से बाहर तक मुलाकात की, जो विदेशी नेताओं के लिए दुर्लभ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी देशों की यह पहल सिर्फ आर्थिक कारणों से नहीं, बल्कि ट्रम्प की अमेरिका-प्रथम नीतियों के तहत ग्लोबल भरोसे में कमी को देखते हुए कूटनीतिक जरूरत के तहत हो रही है। चीन इस समय खुद को जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है और पश्चिमी देशों को आकर्षित करने में सक्रिय है।
जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज अगले महीने चीन दौरे पर जाएंगे, साथ में उद्योग और कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भी ले जाएंगे। उनका मुख्य उद्देश्य चीन के साथ व्यापार के रास्तों को खुला रखना और अमेरिकी टैरिफ के संभावित प्रभाव से बचना है।
पिछले कुछ वर्षों में यह प्रवृत्ति स्पष्ट हुई है कि पश्चिमी देश चीन के साथ सीमित, लेकिन स्थिर और संभाले हुए संबंध चाहते हैं, ताकि वैश्विक स्तर पर अकेले न पड़ें और आर्थिक अवसरों को सुरक्षित कर सकें।
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