कांग्रेस का आरोप: ट्रम्प के दबाव में भारत ने चाबहार पोर्ट से नियंत्रण छोड़ा, 1100 करोड़ बर्बाद

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विदेश मंत्रालय का इनकार, भारत ने चाबहार प्रोजेक्ट को अमेरिका की छूट के तहत जारी रखा; रणनीतिक और आर्थिक महत्व बरकरार

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में ईरान के चाबहार पोर्ट पर भारत का नियंत्रण छोड़ दिया। पार्टी ने एक्स प्लेटफॉर्म पर ट्वीट कर लिखा कि इस परियोजना में भारत ने 120 मिलियन डॉलर (करीब 1100 करोड़ रुपए) खर्च किए थे, जो अब बर्बाद हो चुके हैं।

विदेश मंत्रालय का इनकार
इस आरोप पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सख्त इनकार किया। उन्होंने कहा कि भारत की चाबहार पोर्ट से जुड़ी परियोजनाएं जारी हैं और इन्हें आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका से बातचीत हो रही है। जायसवाल ने बताया कि अमेरिका ने भारत को पहले 27 अक्टूबर 2025 तक ईरान पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद पोर्ट से जुड़े काम जारी रखने के लिए छूट दी थी, जिसे अब 26 अप्रैल 2026 तक बढ़ा दिया गया है।

अमेरिकी दबाव और रणनीति
अमेरिका की यह नीति ईरान पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बनाने के लिए अपनाई जा रही है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि ईरान पोर्ट और अन्य आय स्रोतों से जुटाई गई कमाई का इस्तेमाल अपने परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल विकास तथा पश्चिम एशिया में प्रभाव बढ़ाने के लिए करता है। 2018 में अमेरिका के ईरान से परमाणु समझौते से बाहर निकलने के बाद लागू ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति के तहत चाबहार परियोजना पर निगरानी रखी जा रही है।

चाबहार पोर्ट के फायदे
भारत के लिए चाबहार पोर्ट रणनीतिक और आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके जरिए भारत बिना पाकिस्तान के रास्ते सेंट्रल एशिया और अफगानिस्तान तक माल पहुंचा सकता है। पोर्ट भारत के निर्यात को बढ़ाने और लॉजिस्टिक खर्च कम करने में मदद करता है। इसके अलावा, भारत ने पोर्ट के विकास में भारी निवेश किया है, जो भविष्य में सुरक्षित रहेगा। चाबहार पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के समीप स्थित है, इसलिए यह चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को काउंटर करने का अवसर भी देता है।

परियोजना का इतिहास और निवेश
भारत ने 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान इस पोर्ट को लेकर बातचीत शुरू की। 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 800 करोड़ रुपए निवेश की घोषणा की। 2016 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ईरान और अफगानिस्तान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। भारत ने पोर्ट के एक टर्मिनल के लिए 700 करोड़ और विकास के लिए 1250 करोड़ रुपए का निवेश तय किया।

विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ईरान में हिरासत में लिए गए 10 भारतीय नागरिकों के लिए कांसुलर एक्सेस की मांग कर रहा है। भारत-ईरान व्यापार पर नजर बनी हुई है, और दोनों देशों के बीच जारी बातचीत से परियोजना में किसी प्रकार की बाधा नहीं आने की संभावना है।

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www.dainikjagranmpcg.com
17 Jan 2026 By Nitin Trivedi

कांग्रेस का आरोप: ट्रम्प के दबाव में भारत ने चाबहार पोर्ट से नियंत्रण छोड़ा, 1100 करोड़ बर्बाद

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कांग्रेस ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में ईरान के चाबहार पोर्ट पर भारत का नियंत्रण छोड़ दिया। पार्टी ने एक्स प्लेटफॉर्म पर ट्वीट कर लिखा कि इस परियोजना में भारत ने 120 मिलियन डॉलर (करीब 1100 करोड़ रुपए) खर्च किए थे, जो अब बर्बाद हो चुके हैं।

विदेश मंत्रालय का इनकार
इस आरोप पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सख्त इनकार किया। उन्होंने कहा कि भारत की चाबहार पोर्ट से जुड़ी परियोजनाएं जारी हैं और इन्हें आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका से बातचीत हो रही है। जायसवाल ने बताया कि अमेरिका ने भारत को पहले 27 अक्टूबर 2025 तक ईरान पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद पोर्ट से जुड़े काम जारी रखने के लिए छूट दी थी, जिसे अब 26 अप्रैल 2026 तक बढ़ा दिया गया है।

अमेरिकी दबाव और रणनीति
अमेरिका की यह नीति ईरान पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बनाने के लिए अपनाई जा रही है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि ईरान पोर्ट और अन्य आय स्रोतों से जुटाई गई कमाई का इस्तेमाल अपने परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल विकास तथा पश्चिम एशिया में प्रभाव बढ़ाने के लिए करता है। 2018 में अमेरिका के ईरान से परमाणु समझौते से बाहर निकलने के बाद लागू ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति के तहत चाबहार परियोजना पर निगरानी रखी जा रही है।

चाबहार पोर्ट के फायदे
भारत के लिए चाबहार पोर्ट रणनीतिक और आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके जरिए भारत बिना पाकिस्तान के रास्ते सेंट्रल एशिया और अफगानिस्तान तक माल पहुंचा सकता है। पोर्ट भारत के निर्यात को बढ़ाने और लॉजिस्टिक खर्च कम करने में मदद करता है। इसके अलावा, भारत ने पोर्ट के विकास में भारी निवेश किया है, जो भविष्य में सुरक्षित रहेगा। चाबहार पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के समीप स्थित है, इसलिए यह चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को काउंटर करने का अवसर भी देता है।

परियोजना का इतिहास और निवेश
भारत ने 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान इस पोर्ट को लेकर बातचीत शुरू की। 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 800 करोड़ रुपए निवेश की घोषणा की। 2016 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ईरान और अफगानिस्तान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। भारत ने पोर्ट के एक टर्मिनल के लिए 700 करोड़ और विकास के लिए 1250 करोड़ रुपए का निवेश तय किया।

विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ईरान में हिरासत में लिए गए 10 भारतीय नागरिकों के लिए कांसुलर एक्सेस की मांग कर रहा है। भारत-ईरान व्यापार पर नजर बनी हुई है, और दोनों देशों के बीच जारी बातचीत से परियोजना में किसी प्रकार की बाधा नहीं आने की संभावना है।

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