औपनिवेशिक विरासत पर राष्ट्रीय विमर्श की मांग, 'औपनिवेशिक पीड़ितों के लिए राष्ट्रीय स्मृति दिवस' का प्रस्ताव

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नई दिल्ली, 17 जुलाई 2026: भारत और ब्रिटेन के बदलते संबंधों को केवल व्यापार और कूटनीति के नजरिए से नहीं, बल्कि दोनों देशों के साझा औपनिवेशिक इतिहास और उसके दीर्घकालिक प्रभावों के संदर्भ में भी समझने की आवश्यकता है। इसी विचार के साथ नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में उरज़ू मीडिया द्वारा ‘टर्म्स ऑफ ट्रेड: इंडिया, ब्रिटेन एंड द लॉन्ग शैडो ऑफ एम्पायर’ विषय पर एक सार्वजनिक संवाद आयोजित किया गया। कार्यक्रम के अंत में विशेषज्ञों ने ‘औपनिवेशिक पीड़ितों के लिए राष्ट्रीय स्मृति दिवस’   स्थापित करने की दिशा में व्यापक राष्ट्रीय विमर्श शुरू करने का आह्वान किया।
 
यह आयोजन भारत और ब्रिटेन के बीच 15 जुलाई 2026 से प्रभावी हुए व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (सीईटीए) के तुरंत बाद हुआ। वक्ताओं का कहना था कि दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग और रणनीतिक साझेदारी महत्वपूर्ण है, लेकिन इस संबंध को ऐतिहासिक संदर्भों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उनका मानना था कि भविष्य की संतुलित और न्यायसंगत साझेदारी के लिए औपनिवेशिक इतिहास की गंभीर और तथ्यपरक समझ भी उतनी ही आवश्यक है।
 
संवाद के समापन पर सभी विशेषज्ञों और गणमान्य अतिथियों ने इतिहासकारों, शिक्षाविदों, नागरिक समाज संगठनों, संग्रहालयों, सार्वजनिक संस्थानों और नीति-निर्माताओं के साथ व्यापक परामर्श प्रक्रिया शुरू करने की प्रतिबद्धता जताई। इस प्रक्रिया के माध्यम से ‘औपनिवेशिक पीड़ितों के लिए राष्ट्रीय स्मृति दिवस’ की स्थापना और उसकी उपयुक्त तिथि तय करने का प्रस्ताव रखा गया। वक्ताओं का कहना था कि ऐसा स्मृति दिवस केवल अतीत को याद करने का माध्यम नहीं होगा, बल्कि इतिहास से सीख लेकर भविष्य की नीतियों और सामाजिक चेतना को मजबूत करने का अवसर भी बनेगा।
 
कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने औपनिवेशिक शासन के आर्थिक, सामाजिक, कानूनी और सांस्कृतिक प्रभावों पर अपने विचार रखे। पैनल में ईग्रो फाउंडेशन के सीईओ एवं संस्थापक निदेशक डॉ. चरण सिंह, अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति एवं डब्ल्यूटीओ विशेषज्ञ प्रो. अभिजीत दास, अर्थशास्त्री एवं इतिहासकार प्रसेनजीत के. बसु, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर प्रो. प्रभु मोहापात्रा, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस तथा यूके-केन्या स्थित म्यूज़ियम ऑफ ब्रिटिश कोलोनियलिज़्म की संचार टीम सदस्य चांदिनी जसवाल शामिल थीं। कार्यक्रम का संचालन रिचा जैन कालरा ने किया।
 
चर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि उपनिवेशवाद केवल राजनीतिक शासन का विषय नहीं था, बल्कि उसने भारत की आर्थिक संरचना, व्यापार व्यवस्था, उद्योग, कृषि, श्रम, प्रवासन, कानूनी संस्थानों और प्रशासनिक ढांचे को गहराई से प्रभावित किया। उनका मानना था कि लगभग दो शताब्दियों के औपनिवेशिक शासन ने भारत की विकास यात्रा की दिशा बदल दी, जिसके प्रभाव आज भी कई नीतिगत और संस्थागत क्षेत्रों में दिखाई देते हैं।
 
वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि इतिहास की संतुलित और प्रमाण-आधारित समझ बेहतर नीति-निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उनके अनुसार, अतीत के अनुभवों का गंभीर अध्ययन सार्वजनिक संस्थानों को अधिक मजबूत बनाने, आर्थिक निर्णयों को ऐतिहासिक संदर्भों में समझने और स्वतंत्रता के बाद भारत की विकास यात्रा का व्यापक मूल्यांकन करने में सहायक हो सकता है।
 
कार्यक्रम के अंतिम चरण में नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, छात्रों, मीडिया प्रतिनिधियों और नागरिक समाज के सदस्यों ने संवादात्मक सत्र में भाग लिया। इस दौरान इस बात पर व्यापक सहमति बनी कि भारत और ब्रिटेन के संबंधों में भविष्य की संभावनाओं के साथ-साथ साझा इतिहास पर भी खुले, तथ्यपरक और रचनात्मक संवाद की आवश्यकता है। विशेषज्ञों ने कहा कि औपनिवेशिक विरासत पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा से न केवल इतिहास की बेहतर समझ विकसित होगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी भारत की सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत यात्रा को अधिक गहराई से समझने का अवसर मिलेगा।

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17 Jul 2026 By Priyanka

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नई दिल्ली, 17 जुलाई 2026: भारत और ब्रिटेन के बदलते संबंधों को केवल व्यापार और कूटनीति के नजरिए से नहीं, बल्कि दोनों देशों के साझा औपनिवेशिक इतिहास और उसके दीर्घकालिक प्रभावों के संदर्भ में भी समझने की आवश्यकता है। इसी विचार के साथ नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में उरज़ू मीडिया द्वारा ‘टर्म्स ऑफ ट्रेड: इंडिया, ब्रिटेन एंड द लॉन्ग शैडो ऑफ एम्पायर’ विषय पर एक सार्वजनिक संवाद आयोजित किया गया। कार्यक्रम के अंत में विशेषज्ञों ने ‘औपनिवेशिक पीड़ितों के लिए राष्ट्रीय स्मृति दिवस’   स्थापित करने की दिशा में व्यापक राष्ट्रीय विमर्श शुरू करने का आह्वान किया।
 
यह आयोजन भारत और ब्रिटेन के बीच 15 जुलाई 2026 से प्रभावी हुए व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (सीईटीए) के तुरंत बाद हुआ। वक्ताओं का कहना था कि दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग और रणनीतिक साझेदारी महत्वपूर्ण है, लेकिन इस संबंध को ऐतिहासिक संदर्भों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उनका मानना था कि भविष्य की संतुलित और न्यायसंगत साझेदारी के लिए औपनिवेशिक इतिहास की गंभीर और तथ्यपरक समझ भी उतनी ही आवश्यक है।
 
संवाद के समापन पर सभी विशेषज्ञों और गणमान्य अतिथियों ने इतिहासकारों, शिक्षाविदों, नागरिक समाज संगठनों, संग्रहालयों, सार्वजनिक संस्थानों और नीति-निर्माताओं के साथ व्यापक परामर्श प्रक्रिया शुरू करने की प्रतिबद्धता जताई। इस प्रक्रिया के माध्यम से ‘औपनिवेशिक पीड़ितों के लिए राष्ट्रीय स्मृति दिवस’ की स्थापना और उसकी उपयुक्त तिथि तय करने का प्रस्ताव रखा गया। वक्ताओं का कहना था कि ऐसा स्मृति दिवस केवल अतीत को याद करने का माध्यम नहीं होगा, बल्कि इतिहास से सीख लेकर भविष्य की नीतियों और सामाजिक चेतना को मजबूत करने का अवसर भी बनेगा।
 
कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने औपनिवेशिक शासन के आर्थिक, सामाजिक, कानूनी और सांस्कृतिक प्रभावों पर अपने विचार रखे। पैनल में ईग्रो फाउंडेशन के सीईओ एवं संस्थापक निदेशक डॉ. चरण सिंह, अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति एवं डब्ल्यूटीओ विशेषज्ञ प्रो. अभिजीत दास, अर्थशास्त्री एवं इतिहासकार प्रसेनजीत के. बसु, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर प्रो. प्रभु मोहापात्रा, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस तथा यूके-केन्या स्थित म्यूज़ियम ऑफ ब्रिटिश कोलोनियलिज़्म की संचार टीम सदस्य चांदिनी जसवाल शामिल थीं। कार्यक्रम का संचालन रिचा जैन कालरा ने किया।
 
चर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि उपनिवेशवाद केवल राजनीतिक शासन का विषय नहीं था, बल्कि उसने भारत की आर्थिक संरचना, व्यापार व्यवस्था, उद्योग, कृषि, श्रम, प्रवासन, कानूनी संस्थानों और प्रशासनिक ढांचे को गहराई से प्रभावित किया। उनका मानना था कि लगभग दो शताब्दियों के औपनिवेशिक शासन ने भारत की विकास यात्रा की दिशा बदल दी, जिसके प्रभाव आज भी कई नीतिगत और संस्थागत क्षेत्रों में दिखाई देते हैं।
 
वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि इतिहास की संतुलित और प्रमाण-आधारित समझ बेहतर नीति-निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उनके अनुसार, अतीत के अनुभवों का गंभीर अध्ययन सार्वजनिक संस्थानों को अधिक मजबूत बनाने, आर्थिक निर्णयों को ऐतिहासिक संदर्भों में समझने और स्वतंत्रता के बाद भारत की विकास यात्रा का व्यापक मूल्यांकन करने में सहायक हो सकता है।
 
कार्यक्रम के अंतिम चरण में नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, छात्रों, मीडिया प्रतिनिधियों और नागरिक समाज के सदस्यों ने संवादात्मक सत्र में भाग लिया। इस दौरान इस बात पर व्यापक सहमति बनी कि भारत और ब्रिटेन के संबंधों में भविष्य की संभावनाओं के साथ-साथ साझा इतिहास पर भी खुले, तथ्यपरक और रचनात्मक संवाद की आवश्यकता है। विशेषज्ञों ने कहा कि औपनिवेशिक विरासत पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा से न केवल इतिहास की बेहतर समझ विकसित होगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी भारत की सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत यात्रा को अधिक गहराई से समझने का अवसर मिलेगा।
https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/demand-for-national-discussion-on-colonial-legacy-proposal-for-national/article-59041

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