डेनमार्क की PM ने ट्रम्प को झुकने पर किया मजबूर, घरेलू राजनीति में मिला बड़ा फायदा

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ग्रीनलैंड विवाद के बीच मेटे फ्रेडरिक्सन की लोकप्रियता बढ़ी, सोशल डेमोक्रेट्स को सर्वे में 9 सीटों का उछाल

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच पैदा हुए कूटनीतिक टकराव ने डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन को घरेलू राजनीति में अप्रत्याशित बढ़त दिलाई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी और उसके बाद डेनमार्क की सख्त प्रतिक्रिया ने फ्रेडरिक्सन को एक मजबूत राष्ट्रवादी नेता के रूप में स्थापित किया है। इसका सीधा असर उनकी पार्टी सोशल डेमोक्रेट्स की लोकप्रियता पर पड़ा है, जिसे हालिया सर्वे में 9 अतिरिक्त सीटों का लाभ मिलता दिख रहा है।

मेगाफॉन नाम की डेनिश कंसल्टेंसी के ताजा सर्वे के मुताबिक, सोशल डेमोक्रेट पार्टी को अब संसद की 41 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि दिसंबर 2025 में यह आंकड़ा 32 सीटों तक सिमट गया था। वोट शेयर भी बढ़कर 22.7% हो गया है। डेनमार्क की संसद में कुल 179 सीटें हैं और फ्रेडरिक्सन फिलहाल गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही हैं।

यह बदलाव ऐसे समय में आया है, जब नवंबर 2025 के स्थानीय चुनावों में सोशल डेमोक्रेट्स को करारी हार का सामना करना पड़ा था। राजधानी कोपनहेगन में पार्टी ने 100 साल में पहली बार सत्ता गंवाई थी, जिससे फ्रेडरिक्सन की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने लगे थे। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, ग्रीनलैंड विवाद ने उस नकारात्मक माहौल को पूरी तरह पलट दिया।

जनवरी की शुरुआत में राष्ट्रपति ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को किसी भी तरीके से अमेरिका में शामिल करने की बात कही थी। ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और इस बयान को वहां की संप्रभुता पर सीधी चुनौती माना गया। इसके जवाब में प्रधानमंत्री फ्रेडरिक्सन ने न केवल सार्वजनिक रूप से कड़ा रुख अपनाया, बल्कि यूरोपीय देशों को भी इस मुद्दे पर एकजुट किया। बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच ट्रम्प को यह कहना पड़ा कि अमेरिका जबरदस्ती ग्रीनलैंड पर कब्जा नहीं करेगा।

डेनमार्क में इस घटनाक्रम को राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़कर देखा गया। राजनीतिक मामलों की जानकार ऐन रासमुसेन का कहना है कि संकट के समय सरकार के साथ जनता का खड़ा होना स्वाभाविक है। उन्होंने इसे कोविड महामारी के दौरान देखी गई राष्ट्रीय एकजुटता से तुलना की है।

हालांकि फ्रेडरिक्सन का राजनीतिक सफर हमेशा सहज नहीं रहा है। कोरोना काल में 1.7 करोड़ मिंक को मारने के फैसले ने उनकी छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया था। इस फैसले के बाद उनकी लोकप्रियता 79% से गिरकर 34% तक आ गई थी। अब ग्रीनलैंड विवाद ने उन्हें उस छवि से बाहर निकालने में मदद की है।

डेनमार्क में अगला आम चुनाव 1 नवंबर 2026 से पहले होना अनिवार्य है। मौजूदा हालात को देखते हुए यह अटकलें तेज हैं कि फ्रेडरिक्सन इस बढ़त को भुनाने के लिए समय से पहले चुनाव का ऐलान कर सकती हैं। 2022 में भी उन्होंने ऐसा ही दांव खेला था और सत्ता में वापसी की थी।

विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रम्प के खिलाफ सख्त रुख अपनाने से केवल डेनमार्क ही नहीं, बल्कि कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी वामपंथी और मध्यमार्गी दलों को राजनीतिक लाभ मिला है। यह संकेत देता है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव कई बार घरेलू राजनीति की दिशा बदल सकता है।

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30 Jan 2026 By Nitin Trivedi

डेनमार्क की PM ने ट्रम्प को झुकने पर किया मजबूर, घरेलू राजनीति में मिला बड़ा फायदा

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ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच पैदा हुए कूटनीतिक टकराव ने डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन को घरेलू राजनीति में अप्रत्याशित बढ़त दिलाई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी और उसके बाद डेनमार्क की सख्त प्रतिक्रिया ने फ्रेडरिक्सन को एक मजबूत राष्ट्रवादी नेता के रूप में स्थापित किया है। इसका सीधा असर उनकी पार्टी सोशल डेमोक्रेट्स की लोकप्रियता पर पड़ा है, जिसे हालिया सर्वे में 9 अतिरिक्त सीटों का लाभ मिलता दिख रहा है।

मेगाफॉन नाम की डेनिश कंसल्टेंसी के ताजा सर्वे के मुताबिक, सोशल डेमोक्रेट पार्टी को अब संसद की 41 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि दिसंबर 2025 में यह आंकड़ा 32 सीटों तक सिमट गया था। वोट शेयर भी बढ़कर 22.7% हो गया है। डेनमार्क की संसद में कुल 179 सीटें हैं और फ्रेडरिक्सन फिलहाल गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही हैं।

यह बदलाव ऐसे समय में आया है, जब नवंबर 2025 के स्थानीय चुनावों में सोशल डेमोक्रेट्स को करारी हार का सामना करना पड़ा था। राजधानी कोपनहेगन में पार्टी ने 100 साल में पहली बार सत्ता गंवाई थी, जिससे फ्रेडरिक्सन की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने लगे थे। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, ग्रीनलैंड विवाद ने उस नकारात्मक माहौल को पूरी तरह पलट दिया।

जनवरी की शुरुआत में राष्ट्रपति ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को किसी भी तरीके से अमेरिका में शामिल करने की बात कही थी। ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और इस बयान को वहां की संप्रभुता पर सीधी चुनौती माना गया। इसके जवाब में प्रधानमंत्री फ्रेडरिक्सन ने न केवल सार्वजनिक रूप से कड़ा रुख अपनाया, बल्कि यूरोपीय देशों को भी इस मुद्दे पर एकजुट किया। बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच ट्रम्प को यह कहना पड़ा कि अमेरिका जबरदस्ती ग्रीनलैंड पर कब्जा नहीं करेगा।

डेनमार्क में इस घटनाक्रम को राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़कर देखा गया। राजनीतिक मामलों की जानकार ऐन रासमुसेन का कहना है कि संकट के समय सरकार के साथ जनता का खड़ा होना स्वाभाविक है। उन्होंने इसे कोविड महामारी के दौरान देखी गई राष्ट्रीय एकजुटता से तुलना की है।

हालांकि फ्रेडरिक्सन का राजनीतिक सफर हमेशा सहज नहीं रहा है। कोरोना काल में 1.7 करोड़ मिंक को मारने के फैसले ने उनकी छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया था। इस फैसले के बाद उनकी लोकप्रियता 79% से गिरकर 34% तक आ गई थी। अब ग्रीनलैंड विवाद ने उन्हें उस छवि से बाहर निकालने में मदद की है।

डेनमार्क में अगला आम चुनाव 1 नवंबर 2026 से पहले होना अनिवार्य है। मौजूदा हालात को देखते हुए यह अटकलें तेज हैं कि फ्रेडरिक्सन इस बढ़त को भुनाने के लिए समय से पहले चुनाव का ऐलान कर सकती हैं। 2022 में भी उन्होंने ऐसा ही दांव खेला था और सत्ता में वापसी की थी।

विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रम्प के खिलाफ सख्त रुख अपनाने से केवल डेनमार्क ही नहीं, बल्कि कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी वामपंथी और मध्यमार्गी दलों को राजनीतिक लाभ मिला है। यह संकेत देता है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव कई बार घरेलू राजनीति की दिशा बदल सकता है।

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