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सेमीकंडक्टर क्रांति: आत्मनिर्भर भारत का अगला अध्याय
नई दिल्ली
किसी भी राष्ट्र की तकनीकी क्षमता का आकलन केवल इस बात से नहीं होता कि वह कितनी डिजिटल सेवाएँ प्रदान करता है या कितने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपभोग करता है।
वास्तविक शक्ति इस बात में निहित होती है कि वह उन तकनीकों का निर्माण कितनी हद तक स्वयं कर सकता है, जिन पर आधुनिक अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और भविष्य की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा आधारित है। आज सेमीकंडक्टर उसी रणनीतिक महत्व का संसाधन बन चुके हैं, जो कभी तेल या इस्पात हुआ करते थे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर रक्षा प्रणालियों तक, 5जी संचार से लेकर इलेक्ट्रिक वाहनों तक—लगभग हर आधुनिक तकनीक की बुनियाद सेमीकंडक्टर पर टिकी है।
इसी परिप्रेक्ष्य में भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं, बल्कि तकनीकी संप्रभुता और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक दीर्घकालिक राष्ट्रीय रणनीति के रूप में उभरती है। लंबे समय तक भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला में मुख्यतः एक उपभोक्ता और डिज़ाइन प्रतिभा के स्रोत के रूप में मौजूद रहा। चिप निर्माण और उससे जुड़ी महत्वपूर्ण विनिर्माण क्षमताएँ विदेशों पर निर्भर थीं। पिछले कुछ वर्षों में यह स्थिति बदलने लगी है। अब उद्देश्य केवल चिप का उपयोग करना नहीं, बल्कि उसके डिज़ाइन से लेकर निर्माण, पैकेजिंग और उन्नत तकनीकों तक पूरी वैल्यू चेन में भारत की भागीदारी सुनिश्चित करना है।
आत्मनिर्भरता की नई औद्योगिक रणनीति
इसी सोच के साथ इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन की शुरुआत हुई, जिसने भारत की औद्योगिक नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया। पहली बार सेमीकंडक्टर क्षेत्र को मिशन मोड में विकसित करने की व्यापक रणनीति अपनाई गई, जिसमें सिलिकॉन वेफर फैब्रिकेशन, असेंबली, टेस्टिंग, पैकेजिंग, कंपाउंड सेमीकंडक्टर, चिप डिज़ाइन और आवश्यक कंपोनेंट्स के निर्माण तक पूरी मूल्य श्रृंखला को शामिल किया गया।
जो लक्ष्य कुछ वर्ष पहले तक महत्वाकांक्षी माना जाता था, वह आज धीरे-धीरे वास्तविकता का रूप ले रहा है। सरकार अब तक ₹1.64 लाख करोड़ से अधिक के सेमीकंडक्टर निवेश प्रस्तावों को मंजूरी दे चुकी है। विभिन्न राज्यों में स्थापित हो रही ये परियोजनाएँ इस बात का संकेत हैं कि भारत अब केवल नीति निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि ज़मीनी स्तर पर उत्पादन क्षमता विकसित करने की दिशा में भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
नीति से उत्पादन तक की यात्रा
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 1.0 का सबसे बड़ा उद्देश्य घरेलू और वैश्विक निवेशकों के लिए स्पष्ट प्रोत्साहन ढाँचा तैयार करना था। इसी के तहत सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन यूनिट्स, ओएसएटी (OSAT) और एटीएमपी (ATMP) सुविधाओं के साथ-साथ कंपाउंड सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को बढ़ावा दिया गया। इसके समानांतर डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना के माध्यम से भारत की डिज़ाइन क्षमताओं को भी मज़बूत करने का प्रयास किया गया।
इस नीति का असर अब ज़मीन पर दिखाई देने लगा है। गुजरात में माइक्रोन टेक्नोलॉजी की इकाई ने वाणिज्यिक उत्पादन शुरू कर दिया है, जो इस मिशन की पहली बड़ी परिचालन उपलब्धि मानी जा रही है। वहीं टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, टाटा-पीएसएमसी और केन्स सेमीकॉन जैसी परियोजनाएँ तेज़ी से निर्माण के अंतिम चरण में पहुँच चुकी हैं और निकट भविष्य में उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है।
विशेष रूप से गुजरात के धोलेरा में विकसित हो रही टाटा-पीएसएमसी परियोजना भारत की पहली सिलिकॉन वेफर फैब्रिकेशन सुविधा स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इसके अलावा राजस्थान और गुजरात में स्वीकृत नई परियोजनाएँ यह दर्शाती हैं कि सरकार सेमीकंडक्टर विनिर्माण को देश के विभिन्न क्षेत्रों तक विस्तारित करने की रणनीति पर काम कर रही है।
केवल निर्माण नहीं, सम्पूर्ण इकोसिस्टम का विकास
भारत की रणनीति केवल फैक्ट्री लगाने तक सीमित नहीं है। सेमीकंडक्टर उद्योग की सफलता उसके पूरे इकोसिस्टम पर निर्भर करती है। इसी कारण डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव योजना के तहत अनेक चिप डिज़ाइन परियोजनाओं को सहायता दी गई है, जिनसे सफल टेप-आउट, पेटेंट फाइलिंग और एक हजार से अधिक विशेषज्ञ इंजीनियरों के प्रशिक्षण जैसे परिणाम सामने आए हैं।
इसके साथ ही आवश्यक इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स के घरेलू निर्माण पर भी समान रूप से ध्यान दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के जेवर में लगभग ₹6,750 करोड़ की लागत वाली एडवांस्ड प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) निर्माण परियोजनाएँ इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। इन इकाइयों में उच्च घनत्व वाले मल्टी-लेयर पीसीबी का उत्पादन होगा, जिनका अब तक बड़ा हिस्सा भारत आयात करता रहा है। घरेलू उत्पादन से आयात निर्भरता कम होगी और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र को नई गति मिलेगी।
मिशन 2.0 : अगला चरण
पहले चरण में मजबूत आधार तैयार करने के बाद अब सरकार ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 की घोषणा की है। यदि पहला चरण विनिर्माण क्षमताएँ विकसित करने पर केंद्रित था, तो दूसरा चरण पूरी मूल्य श्रृंखला में गहराई लाने का प्रयास है।
इस चरण में सेमीकंडक्टर निर्माण उपकरण, विशेष रसायन और मटेरियल, एडवांस्ड पैकेजिंग तकनीक, कंपाउंड सेमीकंडक्टर, स्वदेशी बौद्धिक संपदा (IP), अनुसंधान संस्थान और कौशल विकास पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है। केंद्रीय बजट 2026-27 में इसके लिए अलग वित्तीय प्रावधान इस बात का संकेत हैं कि सरकार इस मिशन को दीर्घकालिक रणनीति के रूप में आगे बढ़ा रही है।
रणनीतिक आवश्यकता, केवल औद्योगिक महत्व नहीं
आज सेमीकंडक्टर केवल इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग तक सीमित नहीं हैं। रक्षा प्रणालियों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, 5जी संचार, इलेक्ट्रिक वाहनों, अंतरिक्ष कार्यक्रमों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा में इनकी भूमिका निर्णायक है। ऐसे में इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता का भी प्रश्न बन चुकी है।
इसी उद्देश्य से भारत ने अमेरिका, ताइवान, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी तकनीकी महाशक्तियों की अग्रणी कंपनियों के साथ सहयोग बढ़ाया है। इन साझेदारियों से जहाँ उन्नत तकनीक और निवेश भारत आ रहे हैं, वहीं घरेलू क्षमताओं के विकास को भी नई गति मिल रही है।
एक दीर्घकालिक परिवर्तन की शुरुआत
अब तक की प्रगति यह स्पष्ट करती है कि भारत की सेमीकंडक्टर नीति केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रही। नीति निर्माण से लेकर निवेश स्वीकृति, निर्माणाधीन परियोजनाओं और वाणिज्यिक उत्पादन तक एक सतत प्रगति दिखाई देती है। प्रत्येक नई परियोजना आयात पर निर्भरता कम करने, रोज़गार सृजन, कुशल मानव संसाधन विकसित करने और वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला में भारत की स्थिति को मजबूत करने की दिशा में योगदान दे रही है।
भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा अभी अपने प्रारंभिक चरण में है, लेकिन इसकी दिशा स्पष्ट दिखाई देती है। यदि पहले चरण ने आधार तैयार किया है, तो दूसरा चरण उस आधार को तकनीकी नेतृत्व में बदलने का प्रयास है। आने वाले वर्षों में इस मिशन की सफलता केवल इस बात से नहीं आँकी जाएगी कि कितनी फैक्ट्रियाँ स्थापित हुईं, बल्कि इससे भी कि भारत वैश्विक तकनीकी व्यवस्था में अपनी भूमिका किस हद तक बदल सका।
आख़िरकार, सेमीकंडक्टर केवल चिप्स नहीं हैं। वे उस तकनीकी क्षमता के प्रतीक हैं, जिस पर भविष्य की अर्थव्यवस्थाएँ, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा आधारित होंगी। भारत की यह यात्रा इसी व्यापक परिवर्तन की दिशा में उठाया गया एक निर्णायक कदम है।
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सेमीकंडक्टर क्रांति: आत्मनिर्भर भारत का अगला अध्याय
नई दिल्ली
वास्तविक शक्ति इस बात में निहित होती है कि वह उन तकनीकों का निर्माण कितनी हद तक स्वयं कर सकता है, जिन पर आधुनिक अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और भविष्य की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा आधारित है। आज सेमीकंडक्टर उसी रणनीतिक महत्व का संसाधन बन चुके हैं, जो कभी तेल या इस्पात हुआ करते थे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर रक्षा प्रणालियों तक, 5जी संचार से लेकर इलेक्ट्रिक वाहनों तक—लगभग हर आधुनिक तकनीक की बुनियाद सेमीकंडक्टर पर टिकी है।
इसी परिप्रेक्ष्य में भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं, बल्कि तकनीकी संप्रभुता और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक दीर्घकालिक राष्ट्रीय रणनीति के रूप में उभरती है। लंबे समय तक भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला में मुख्यतः एक उपभोक्ता और डिज़ाइन प्रतिभा के स्रोत के रूप में मौजूद रहा। चिप निर्माण और उससे जुड़ी महत्वपूर्ण विनिर्माण क्षमताएँ विदेशों पर निर्भर थीं। पिछले कुछ वर्षों में यह स्थिति बदलने लगी है। अब उद्देश्य केवल चिप का उपयोग करना नहीं, बल्कि उसके डिज़ाइन से लेकर निर्माण, पैकेजिंग और उन्नत तकनीकों तक पूरी वैल्यू चेन में भारत की भागीदारी सुनिश्चित करना है।
आत्मनिर्भरता की नई औद्योगिक रणनीति
इसी सोच के साथ इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन की शुरुआत हुई, जिसने भारत की औद्योगिक नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया। पहली बार सेमीकंडक्टर क्षेत्र को मिशन मोड में विकसित करने की व्यापक रणनीति अपनाई गई, जिसमें सिलिकॉन वेफर फैब्रिकेशन, असेंबली, टेस्टिंग, पैकेजिंग, कंपाउंड सेमीकंडक्टर, चिप डिज़ाइन और आवश्यक कंपोनेंट्स के निर्माण तक पूरी मूल्य श्रृंखला को शामिल किया गया।
जो लक्ष्य कुछ वर्ष पहले तक महत्वाकांक्षी माना जाता था, वह आज धीरे-धीरे वास्तविकता का रूप ले रहा है। सरकार अब तक ₹1.64 लाख करोड़ से अधिक के सेमीकंडक्टर निवेश प्रस्तावों को मंजूरी दे चुकी है। विभिन्न राज्यों में स्थापित हो रही ये परियोजनाएँ इस बात का संकेत हैं कि भारत अब केवल नीति निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि ज़मीनी स्तर पर उत्पादन क्षमता विकसित करने की दिशा में भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
नीति से उत्पादन तक की यात्रा
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 1.0 का सबसे बड़ा उद्देश्य घरेलू और वैश्विक निवेशकों के लिए स्पष्ट प्रोत्साहन ढाँचा तैयार करना था। इसी के तहत सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन यूनिट्स, ओएसएटी (OSAT) और एटीएमपी (ATMP) सुविधाओं के साथ-साथ कंपाउंड सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को बढ़ावा दिया गया। इसके समानांतर डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना के माध्यम से भारत की डिज़ाइन क्षमताओं को भी मज़बूत करने का प्रयास किया गया।
इस नीति का असर अब ज़मीन पर दिखाई देने लगा है। गुजरात में माइक्रोन टेक्नोलॉजी की इकाई ने वाणिज्यिक उत्पादन शुरू कर दिया है, जो इस मिशन की पहली बड़ी परिचालन उपलब्धि मानी जा रही है। वहीं टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, टाटा-पीएसएमसी और केन्स सेमीकॉन जैसी परियोजनाएँ तेज़ी से निर्माण के अंतिम चरण में पहुँच चुकी हैं और निकट भविष्य में उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है।
विशेष रूप से गुजरात के धोलेरा में विकसित हो रही टाटा-पीएसएमसी परियोजना भारत की पहली सिलिकॉन वेफर फैब्रिकेशन सुविधा स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इसके अलावा राजस्थान और गुजरात में स्वीकृत नई परियोजनाएँ यह दर्शाती हैं कि सरकार सेमीकंडक्टर विनिर्माण को देश के विभिन्न क्षेत्रों तक विस्तारित करने की रणनीति पर काम कर रही है।
केवल निर्माण नहीं, सम्पूर्ण इकोसिस्टम का विकास
भारत की रणनीति केवल फैक्ट्री लगाने तक सीमित नहीं है। सेमीकंडक्टर उद्योग की सफलता उसके पूरे इकोसिस्टम पर निर्भर करती है। इसी कारण डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव योजना के तहत अनेक चिप डिज़ाइन परियोजनाओं को सहायता दी गई है, जिनसे सफल टेप-आउट, पेटेंट फाइलिंग और एक हजार से अधिक विशेषज्ञ इंजीनियरों के प्रशिक्षण जैसे परिणाम सामने आए हैं।
इसके साथ ही आवश्यक इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स के घरेलू निर्माण पर भी समान रूप से ध्यान दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के जेवर में लगभग ₹6,750 करोड़ की लागत वाली एडवांस्ड प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) निर्माण परियोजनाएँ इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। इन इकाइयों में उच्च घनत्व वाले मल्टी-लेयर पीसीबी का उत्पादन होगा, जिनका अब तक बड़ा हिस्सा भारत आयात करता रहा है। घरेलू उत्पादन से आयात निर्भरता कम होगी और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र को नई गति मिलेगी।
मिशन 2.0 : अगला चरण
पहले चरण में मजबूत आधार तैयार करने के बाद अब सरकार ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 की घोषणा की है। यदि पहला चरण विनिर्माण क्षमताएँ विकसित करने पर केंद्रित था, तो दूसरा चरण पूरी मूल्य श्रृंखला में गहराई लाने का प्रयास है।
इस चरण में सेमीकंडक्टर निर्माण उपकरण, विशेष रसायन और मटेरियल, एडवांस्ड पैकेजिंग तकनीक, कंपाउंड सेमीकंडक्टर, स्वदेशी बौद्धिक संपदा (IP), अनुसंधान संस्थान और कौशल विकास पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है। केंद्रीय बजट 2026-27 में इसके लिए अलग वित्तीय प्रावधान इस बात का संकेत हैं कि सरकार इस मिशन को दीर्घकालिक रणनीति के रूप में आगे बढ़ा रही है।
रणनीतिक आवश्यकता, केवल औद्योगिक महत्व नहीं
आज सेमीकंडक्टर केवल इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग तक सीमित नहीं हैं। रक्षा प्रणालियों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, 5जी संचार, इलेक्ट्रिक वाहनों, अंतरिक्ष कार्यक्रमों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा में इनकी भूमिका निर्णायक है। ऐसे में इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता का भी प्रश्न बन चुकी है।
इसी उद्देश्य से भारत ने अमेरिका, ताइवान, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी तकनीकी महाशक्तियों की अग्रणी कंपनियों के साथ सहयोग बढ़ाया है। इन साझेदारियों से जहाँ उन्नत तकनीक और निवेश भारत आ रहे हैं, वहीं घरेलू क्षमताओं के विकास को भी नई गति मिल रही है।
एक दीर्घकालिक परिवर्तन की शुरुआत
अब तक की प्रगति यह स्पष्ट करती है कि भारत की सेमीकंडक्टर नीति केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रही। नीति निर्माण से लेकर निवेश स्वीकृति, निर्माणाधीन परियोजनाओं और वाणिज्यिक उत्पादन तक एक सतत प्रगति दिखाई देती है। प्रत्येक नई परियोजना आयात पर निर्भरता कम करने, रोज़गार सृजन, कुशल मानव संसाधन विकसित करने और वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला में भारत की स्थिति को मजबूत करने की दिशा में योगदान दे रही है।
भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा अभी अपने प्रारंभिक चरण में है, लेकिन इसकी दिशा स्पष्ट दिखाई देती है। यदि पहले चरण ने आधार तैयार किया है, तो दूसरा चरण उस आधार को तकनीकी नेतृत्व में बदलने का प्रयास है। आने वाले वर्षों में इस मिशन की सफलता केवल इस बात से नहीं आँकी जाएगी कि कितनी फैक्ट्रियाँ स्थापित हुईं, बल्कि इससे भी कि भारत वैश्विक तकनीकी व्यवस्था में अपनी भूमिका किस हद तक बदल सका।
आख़िरकार, सेमीकंडक्टर केवल चिप्स नहीं हैं। वे उस तकनीकी क्षमता के प्रतीक हैं, जिस पर भविष्य की अर्थव्यवस्थाएँ, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा आधारित होंगी। भारत की यह यात्रा इसी व्यापक परिवर्तन की दिशा में उठाया गया एक निर्णायक कदम है।
