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योगी से हिंदू होने का प्रमाण मांगने पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का सरकार पर तीखा हमला
नेशनल न्यूज
40 दिन का अल्टीमेटम, गोमाता को राज्यमाता घोषित करने और गोमांस निर्यात रोकने की मांग
उत्तर प्रदेश की राजनीति और धर्म के संबंधों पर एक नई बहस छिड़ गई है। ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके धार्मिक दावों को ठोस निर्णयों के माध्यम से साबित करने की मांग की है। वाराणसी में शुक्रवार को आयोजित प्रेस वार्ता में शंकराचार्य ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में आस्था केवल प्रतीकों से नहीं, बल्कि नीतिगत फैसलों से परखी जानी चाहिए।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान शंकराचार्य ने कहा कि हाल ही में प्रयागराज माघ मेले के समय उनसे उनकी पहचान को लेकर औपचारिक प्रमाण मांगा गया था, जिसे उन्होंने प्रस्तुत किया। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि यदि किसी धार्मिक पद पर बैठे व्यक्ति से प्रमाण मांगा जा सकता है, तो शासन चलाने वाले व्यक्ति से उसके दावों का व्यावहारिक प्रमाण मांगना भी असंगत नहीं है।
उन्होंने उत्तर प्रदेश में गो-संरक्षण की स्थिति को लेकर सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। शंकराचार्य के अनुसार, राज्य से बड़े पैमाने पर गोमांस निर्यात होना उस विचारधारा से मेल नहीं खाता, जो स्वयं को सनातन परंपरा से जोड़कर देखती है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में गो-भक्ति और हिंदू मूल्यों की पक्षधर है, तो उसे गोमाता को राज्यमाता का दर्जा देना चाहिए और गोमांस के निर्यात पर प्रभावी रोक लगानी चाहिए।
शंकराचार्य ने मुख्यमंत्री को इन मुद्दों पर कार्रवाई के लिए 40 दिनों का समय दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह समयसीमा चेतावनी नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। यदि इस अवधि में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो संत समाज इसे केवल प्रतीकात्मक धार्मिकता मानेगा।
यह बयान ऐसे समय आया है, जब माघ मेले के दौरान प्रशासन और संतों के बीच तनाव को लेकर पहले ही सवाल उठ चुके हैं। शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि गोहत्या निषेध की मांग करने वाले साधु-संतों और अनुयायियों को अनदेखा किया गया और उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया गया।
उन्होंने यह भी घोषणा की कि मार्च के दूसरे सप्ताह में लखनऊ में देशभर के संत, महंत और आचार्य एकत्र होंगे। इस बैठक का उद्देश्य किसी व्यक्ति को निशाना बनाना नहीं, बल्कि यह तय करना होगा कि सार्वजनिक जीवन में धर्म और आस्था की भूमिका क्या होनी चाहिए और उसे कैसे निभाया जाए।
राजनीतिक गलियारों में इस बयान को लेकर हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने माघ मेले के दौरान संतों के साथ हुए व्यवहार को परंपराओं के विरुद्ध बताया है, जबकि सत्तारूढ़ पक्ष की ओर से अब तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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