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क्या दिमागी निजता के लिए नए संवैधानिक अधिकार की जरूरत? न्यूरल डिवाइस और AI के दौर में तेज हुई बहस
Priyanka Mathur
ब्रेन वेव पढ़ने वाले पहनने योग्य उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल ने 'कॉग्निटिव लिबर्टी' और 'कॉग्निटिव प्राइवेसी' को लेकर नई कानूनी और संवैधानिक चर्चा शुरू कर दी है
आज दुनिया तेजी से ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां इंसान और तकनीक के बीच की दूरी लगातार कम होती जा रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) और वेयरेबल न्यूरल डिवाइस जैसी तकनीकें अब केवल वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंच रही हैं। ऐसे हेडबैंड और न्यूरल बैंड विकसित किए जा रहे हैं, जो मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि यानी ब्रेन वेव्स को रिकॉर्ड कर सकते हैं। इनका इस्तेमाल गेमिंग, ध्यान (Meditation), हेल्थ मॉनिटरिंग, शिक्षा और कार्यस्थल पर उत्पादकता बढ़ाने जैसे उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है। लेकिन इन तकनीकों के साथ एक बड़ा सवाल भी सामने आया है—क्या इंसान के विचार, मानसिक गतिविधियां और ब्रेन डेटा को भी उतनी ही कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए, जितनी उसकी निजी जानकारी या बायोमेट्रिक डेटा को मिलती है?
इसी बहस के केंद्र में दो नए शब्द तेजी से चर्चा में हैं—कॉग्निटिव लिबर्टी (Cognitive Liberty) और कॉग्निटिव प्राइवेसी (Cognitive Privacy)। कॉग्निटिव लिबर्टी का अर्थ है कि हर व्यक्ति को अपने विचारों, मानसिक प्रक्रियाओं और निर्णयों पर पूर्ण नियंत्रण का अधिकार हो। वहीं कॉग्निटिव प्राइवेसी का मतलब है कि किसी व्यक्ति के दिमाग से जुड़ा डेटा उसकी स्पष्ट अनुमति के बिना न तो एकत्र किया जाए और न ही उसका विश्लेषण या व्यावसायिक इस्तेमाल किया जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि आज के समय में स्मार्टवॉच, फिटनेस बैंड और मोबाइल फोन पहले से ही लोगों की लोकेशन, हार्ट रेट, नींद और स्वास्थ्य संबंधी डेटा इकट्ठा करते हैं। यदि भविष्य में ब्रेन वेव रिकॉर्ड करने वाले उपकरण आम हो जाते हैं, तो तकनीकी कंपनियों के पास लोगों की भावनाओं, तनाव, एकाग्रता, मानसिक स्थिति और संभावित व्यवहार से जुड़ी अत्यंत संवेदनशील जानकारी भी पहुंच सकती है। यही कारण है कि कई कानूनी विशेषज्ञ इस डेटा को दुनिया का सबसे निजी डेटा मान रहे हैं।
कार्यस्थलों पर भी इस तकनीक को लेकर बहस तेज हो रही है। कुछ कंपनियां भविष्य में ऐसे उपकरणों का उपयोग कर्मचारियों की एकाग्रता, थकान या कार्य क्षमता को मापने के लिए करना चाहेंगी। समर्थकों का तर्क है कि इससे कार्यस्थल अधिक सुरक्षित और उत्पादक बन सकते हैं। उदाहरण के लिए, खदानों, विमानन या भारी मशीनों से जुड़े कार्यों में यदि किसी कर्मचारी की मानसिक थकान का समय रहते पता चल जाए, तो दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि यदि नियोक्ता कर्मचारियों के मानसिक डेटा तक पहुंचने लगें, तो इससे निजता, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
गेमिंग और मनोरंजन उद्योग में भी न्यूरल डिवाइस तेजी से विकसित किए जा रहे हैं। कई कंपनियां ऐसे हेडसेट बना रही हैं जो खिलाड़ी की मानसिक प्रतिक्रिया के आधार पर गेम का अनुभव बदल सकते हैं। इसी तरह शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी इन उपकरणों से नई संभावनाएं पैदा हो रही हैं। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इन तकनीकों से मिलने वाले लाभों के साथ-साथ इनके दुरुपयोग की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसी वजह से दुनिया के कई देशों में यह चर्चा शुरू हो चुकी है कि क्या मौजूदा गोपनीयता कानून भविष्य की इन तकनीकों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि वर्तमान डेटा संरक्षण कानूनों के दायरे को बढ़ाकर न्यूरल डेटा को भी संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी की श्रेणी में रखा जा सकता है। वहीं कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों का मत है कि मानसिक स्वतंत्रता इतनी मूलभूत है कि इसके लिए अलग संवैधानिक सुरक्षा की आवश्यकता हो सकती है।
भारत में भी यह विषय आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण हो सकता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। वर्ष 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ मामले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना था। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यदि न्यूरल डेटा का व्यापक उपयोग होने लगे, तो अदालतों के सामने यह प्रश्न आ सकता है कि क्या मानसिक गतिविधियों और ब्रेन डेटा की सुरक्षा भी इसी अधिकार के दायरे में आती है या इसके लिए अलग कानूनी व्यवस्था की जरूरत होगी।
कुछ तकनीकी विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे रहे हैं कि न्यूरल डेटा के लिए विशेष नियम बनाए जाएं। इनके अनुसार किसी भी कंपनी या संस्था को व्यक्ति की स्पष्ट और सूचित सहमति (Informed Consent) के बिना ब्रेन डेटा एकत्र करने, साझा करने या व्यावसायिक उपयोग की अनुमति नहीं होनी चाहिए। साथ ही नागरिकों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे अपने न्यूरल डेटा को कभी भी हटाने या उसके उपयोग पर रोक लगाने की मांग कर सकें।
हालांकि इस मुद्दे पर अभी कोई वैश्विक सहमति नहीं बनी है। कुछ देशों में इस दिशा में प्रारंभिक कानूनों और नीतियों पर विचार किया जा रहा है, जबकि कई जगह यह बहस अभी अकादमिक और नीति स्तर तक सीमित है। तकनीकी कंपनियां भी कहती हैं कि उनके अधिकांश वर्तमान उपभोक्ता उपकरण सीमित प्रकार की ब्रेन गतिविधि रिकॉर्ड करते हैं और उनसे किसी व्यक्ति के विचारों को पढ़ना संभव नहीं है। दूसरी ओर विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे तकनीक अधिक उन्नत होगी, कानूनी ढांचे को भी उसी गति से विकसित करना होगा।
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क्या दिमागी निजता के लिए नए संवैधानिक अधिकार की जरूरत? न्यूरल डिवाइस और AI के दौर में तेज हुई बहस
Priyanka Mathur
आज दुनिया तेजी से ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां इंसान और तकनीक के बीच की दूरी लगातार कम होती जा रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) और वेयरेबल न्यूरल डिवाइस जैसी तकनीकें अब केवल वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंच रही हैं। ऐसे हेडबैंड और न्यूरल बैंड विकसित किए जा रहे हैं, जो मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि यानी ब्रेन वेव्स को रिकॉर्ड कर सकते हैं। इनका इस्तेमाल गेमिंग, ध्यान (Meditation), हेल्थ मॉनिटरिंग, शिक्षा और कार्यस्थल पर उत्पादकता बढ़ाने जैसे उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है। लेकिन इन तकनीकों के साथ एक बड़ा सवाल भी सामने आया है—क्या इंसान के विचार, मानसिक गतिविधियां और ब्रेन डेटा को भी उतनी ही कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए, जितनी उसकी निजी जानकारी या बायोमेट्रिक डेटा को मिलती है?
इसी बहस के केंद्र में दो नए शब्द तेजी से चर्चा में हैं—कॉग्निटिव लिबर्टी (Cognitive Liberty) और कॉग्निटिव प्राइवेसी (Cognitive Privacy)। कॉग्निटिव लिबर्टी का अर्थ है कि हर व्यक्ति को अपने विचारों, मानसिक प्रक्रियाओं और निर्णयों पर पूर्ण नियंत्रण का अधिकार हो। वहीं कॉग्निटिव प्राइवेसी का मतलब है कि किसी व्यक्ति के दिमाग से जुड़ा डेटा उसकी स्पष्ट अनुमति के बिना न तो एकत्र किया जाए और न ही उसका विश्लेषण या व्यावसायिक इस्तेमाल किया जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि आज के समय में स्मार्टवॉच, फिटनेस बैंड और मोबाइल फोन पहले से ही लोगों की लोकेशन, हार्ट रेट, नींद और स्वास्थ्य संबंधी डेटा इकट्ठा करते हैं। यदि भविष्य में ब्रेन वेव रिकॉर्ड करने वाले उपकरण आम हो जाते हैं, तो तकनीकी कंपनियों के पास लोगों की भावनाओं, तनाव, एकाग्रता, मानसिक स्थिति और संभावित व्यवहार से जुड़ी अत्यंत संवेदनशील जानकारी भी पहुंच सकती है। यही कारण है कि कई कानूनी विशेषज्ञ इस डेटा को दुनिया का सबसे निजी डेटा मान रहे हैं।
कार्यस्थलों पर भी इस तकनीक को लेकर बहस तेज हो रही है। कुछ कंपनियां भविष्य में ऐसे उपकरणों का उपयोग कर्मचारियों की एकाग्रता, थकान या कार्य क्षमता को मापने के लिए करना चाहेंगी। समर्थकों का तर्क है कि इससे कार्यस्थल अधिक सुरक्षित और उत्पादक बन सकते हैं। उदाहरण के लिए, खदानों, विमानन या भारी मशीनों से जुड़े कार्यों में यदि किसी कर्मचारी की मानसिक थकान का समय रहते पता चल जाए, तो दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि यदि नियोक्ता कर्मचारियों के मानसिक डेटा तक पहुंचने लगें, तो इससे निजता, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
गेमिंग और मनोरंजन उद्योग में भी न्यूरल डिवाइस तेजी से विकसित किए जा रहे हैं। कई कंपनियां ऐसे हेडसेट बना रही हैं जो खिलाड़ी की मानसिक प्रतिक्रिया के आधार पर गेम का अनुभव बदल सकते हैं। इसी तरह शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी इन उपकरणों से नई संभावनाएं पैदा हो रही हैं। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इन तकनीकों से मिलने वाले लाभों के साथ-साथ इनके दुरुपयोग की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसी वजह से दुनिया के कई देशों में यह चर्चा शुरू हो चुकी है कि क्या मौजूदा गोपनीयता कानून भविष्य की इन तकनीकों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि वर्तमान डेटा संरक्षण कानूनों के दायरे को बढ़ाकर न्यूरल डेटा को भी संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी की श्रेणी में रखा जा सकता है। वहीं कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों का मत है कि मानसिक स्वतंत्रता इतनी मूलभूत है कि इसके लिए अलग संवैधानिक सुरक्षा की आवश्यकता हो सकती है।
भारत में भी यह विषय आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण हो सकता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। वर्ष 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ मामले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना था। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यदि न्यूरल डेटा का व्यापक उपयोग होने लगे, तो अदालतों के सामने यह प्रश्न आ सकता है कि क्या मानसिक गतिविधियों और ब्रेन डेटा की सुरक्षा भी इसी अधिकार के दायरे में आती है या इसके लिए अलग कानूनी व्यवस्था की जरूरत होगी।
कुछ तकनीकी विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे रहे हैं कि न्यूरल डेटा के लिए विशेष नियम बनाए जाएं। इनके अनुसार किसी भी कंपनी या संस्था को व्यक्ति की स्पष्ट और सूचित सहमति (Informed Consent) के बिना ब्रेन डेटा एकत्र करने, साझा करने या व्यावसायिक उपयोग की अनुमति नहीं होनी चाहिए। साथ ही नागरिकों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे अपने न्यूरल डेटा को कभी भी हटाने या उसके उपयोग पर रोक लगाने की मांग कर सकें।
हालांकि इस मुद्दे पर अभी कोई वैश्विक सहमति नहीं बनी है। कुछ देशों में इस दिशा में प्रारंभिक कानूनों और नीतियों पर विचार किया जा रहा है, जबकि कई जगह यह बहस अभी अकादमिक और नीति स्तर तक सीमित है। तकनीकी कंपनियां भी कहती हैं कि उनके अधिकांश वर्तमान उपभोक्ता उपकरण सीमित प्रकार की ब्रेन गतिविधि रिकॉर्ड करते हैं और उनसे किसी व्यक्ति के विचारों को पढ़ना संभव नहीं है। दूसरी ओर विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे तकनीक अधिक उन्नत होगी, कानूनी ढांचे को भी उसी गति से विकसित करना होगा।
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