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31 जुलाई महाकाल भस्म आरती: त्रिशूल, त्रिनेत्र और त्रिपुंड से सजे बाबा महाकाल, दिव्य दर्शन को उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
धर्म डेस्क
सावन माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि पर विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में प्रातःकालीन भस्म आरती श्रद्धा और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हुई। बाबा महाकाल का त्रिशूल, त्रिनेत्र और त्रिपुंड से विशेष श्रृंगार किया गया, जिसके दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे।
सावन माह का प्रत्येक दिन भगवान शिव के भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, लेकिन शुक्रवार, 31 जुलाई 2026 को उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में आयोजित भस्म आरती ने श्रद्धालुओं को अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव प्रदान किया। सावन माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि पर तड़के लगभग 4 बजे मंदिर के कपाट खोले गए और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान महाकाल की प्रातःकालीन पूजा-अर्चना आरंभ हुई। मंदिर परिसर 'हर-हर महादेव' और 'जय श्री महाकाल' के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। मंदिर के कपाट खुलते ही पुजारियों ने गर्भगृह में विराजमान सभी देवी-देवताओं का विधि-विधान से पूजन किया। इसके पश्चात भगवान महाकाल का पवित्र जल से जलाभिषेक किया गया। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और विभिन्न फलों के रस से तैयार पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। इस वैदिक अनुष्ठान के दौरान पूरे गर्भगृह में आध्यात्मिक वातावरण छाया रहा और श्रद्धालु मंत्रोच्चार के साथ भगवान शिव का स्मरण करते रहे।
अभिषेक के बाद भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार किया गया। भांग, चंदन, सुगंधित इत्र और आकर्षक आभूषणों से ज्योतिर्लिंग को अलंकृत किया गया। बाबा महाकाल के मस्तक पर त्रिशूल, त्रिनेत्र और त्रिपुंड अंकित किया गया, जिसने उनके दिव्य स्वरूप को और अधिक भव्य बना दिया। यह श्रृंगार शिवभक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। भस्म आरती की परंपरा के अनुसार भस्म अर्पित करने से पहले प्रथम घंटाल बजाया गया और 'हरिओम' का पवित्र जल भगवान को अर्पित किया गया। इसके बाद वैदिक मंत्रों और रुद्रपाठ के बीच भगवान का ध्यान किया गया। कपूर आरती के उपरांत ज्योतिर्लिंग को विधिपूर्वक वस्त्र से आच्छादित कर पवित्र भस्म अर्पित की गई। महाकाल मंदिर की यह प्राचीन परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं।

भस्म अर्पण के पश्चात भगवान महाकाल का दिव्य अलंकरण किया गया। उन्हें रजत निर्मित शेषनाग का मुकुट, रजत की मुण्डमाल, रुद्राक्ष की मालाएं और रंग-बिरंगे सुगंधित पुष्प अर्पित किए गए। मनमोहक फूलों और आकर्षक आभूषणों से सजे बाबा महाकाल का स्वरूप अत्यंत दिव्य और अलौकिक दिखाई दे रहा था। गर्भगृह में उपस्थित श्रद्धालु इस अनुपम दृश्य को देखकर भावविभोर हो उठे। धार्मिक मान्यता के अनुसार भस्म अर्पण के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार स्वरूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु दूर-दूर से उज्जैन पहुंचते हैं। सावन माह में इस आरती का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि इस अवधि में भगवान शिव की आराधना विशेष फलदायी मानी जाती है।
भस्म आरती के बाद श्रद्धालुओं ने नंदी महाराज के दर्शन किए और परंपरा के अनुसार उनके कानों में अपनी मनोकामनाएं व्यक्त कीं। ऐसी मान्यता है कि नंदी महाराज भक्तों की प्रार्थना भगवान शिव तक पहुंचाते हैं और सच्चे मन से मांगी गई इच्छाएं पूर्ण होती हैं। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं और पूरा वातावरण भक्ति, श्रद्धा और उत्साह से ओत-प्रोत रहा। सावन के पावन अवसर पर महाकाल मंदिर में सुरक्षा और व्यवस्थाओं के भी विशेष इंतजाम किए गए थे। श्रद्धालुओं को व्यवस्थित रूप से दर्शन कराने के लिए मंदिर प्रशासन और सुरक्षा कर्मी लगातार सक्रिय रहे। सुबह से ही भक्तों का मंदिर पहुंचना शुरू हो गया था और दिनभर दर्शन का क्रम जारी रहा।
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे भगवान शिव का अत्यंत जागृत एवं चमत्कारी धाम माना जाता है। यहां प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती विश्वभर में अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। सावन के दौरान इस आरती में शामिल होना भक्तों के लिए विशेष आध्यात्मिक अनुभव माना जाता है। 31 जुलाई की भस्म आरती ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ भगवान महाकाल की आराधना करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, मानसिक शांति और आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है। बाबा महाकाल के दिव्य दर्शन कर श्रद्धालु स्वयं को धन्य महसूस करते हुए मंदिर से लौटे और सभी ने परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और मंगल की कामना की।
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31 जुलाई महाकाल भस्म आरती: त्रिशूल, त्रिनेत्र और त्रिपुंड से सजे बाबा महाकाल, दिव्य दर्शन को उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
धर्म डेस्क
सावन माह का प्रत्येक दिन भगवान शिव के भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, लेकिन शुक्रवार, 31 जुलाई 2026 को उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में आयोजित भस्म आरती ने श्रद्धालुओं को अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव प्रदान किया। सावन माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि पर तड़के लगभग 4 बजे मंदिर के कपाट खोले गए और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान महाकाल की प्रातःकालीन पूजा-अर्चना आरंभ हुई। मंदिर परिसर 'हर-हर महादेव' और 'जय श्री महाकाल' के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। मंदिर के कपाट खुलते ही पुजारियों ने गर्भगृह में विराजमान सभी देवी-देवताओं का विधि-विधान से पूजन किया। इसके पश्चात भगवान महाकाल का पवित्र जल से जलाभिषेक किया गया। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और विभिन्न फलों के रस से तैयार पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। इस वैदिक अनुष्ठान के दौरान पूरे गर्भगृह में आध्यात्मिक वातावरण छाया रहा और श्रद्धालु मंत्रोच्चार के साथ भगवान शिव का स्मरण करते रहे।
अभिषेक के बाद भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार किया गया। भांग, चंदन, सुगंधित इत्र और आकर्षक आभूषणों से ज्योतिर्लिंग को अलंकृत किया गया। बाबा महाकाल के मस्तक पर त्रिशूल, त्रिनेत्र और त्रिपुंड अंकित किया गया, जिसने उनके दिव्य स्वरूप को और अधिक भव्य बना दिया। यह श्रृंगार शिवभक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। भस्म आरती की परंपरा के अनुसार भस्म अर्पित करने से पहले प्रथम घंटाल बजाया गया और 'हरिओम' का पवित्र जल भगवान को अर्पित किया गया। इसके बाद वैदिक मंत्रों और रुद्रपाठ के बीच भगवान का ध्यान किया गया। कपूर आरती के उपरांत ज्योतिर्लिंग को विधिपूर्वक वस्त्र से आच्छादित कर पवित्र भस्म अर्पित की गई। महाकाल मंदिर की यह प्राचीन परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं।

भस्म अर्पण के पश्चात भगवान महाकाल का दिव्य अलंकरण किया गया। उन्हें रजत निर्मित शेषनाग का मुकुट, रजत की मुण्डमाल, रुद्राक्ष की मालाएं और रंग-बिरंगे सुगंधित पुष्प अर्पित किए गए। मनमोहक फूलों और आकर्षक आभूषणों से सजे बाबा महाकाल का स्वरूप अत्यंत दिव्य और अलौकिक दिखाई दे रहा था। गर्भगृह में उपस्थित श्रद्धालु इस अनुपम दृश्य को देखकर भावविभोर हो उठे। धार्मिक मान्यता के अनुसार भस्म अर्पण के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार स्वरूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु दूर-दूर से उज्जैन पहुंचते हैं। सावन माह में इस आरती का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि इस अवधि में भगवान शिव की आराधना विशेष फलदायी मानी जाती है।
भस्म आरती के बाद श्रद्धालुओं ने नंदी महाराज के दर्शन किए और परंपरा के अनुसार उनके कानों में अपनी मनोकामनाएं व्यक्त कीं। ऐसी मान्यता है कि नंदी महाराज भक्तों की प्रार्थना भगवान शिव तक पहुंचाते हैं और सच्चे मन से मांगी गई इच्छाएं पूर्ण होती हैं। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं और पूरा वातावरण भक्ति, श्रद्धा और उत्साह से ओत-प्रोत रहा। सावन के पावन अवसर पर महाकाल मंदिर में सुरक्षा और व्यवस्थाओं के भी विशेष इंतजाम किए गए थे। श्रद्धालुओं को व्यवस्थित रूप से दर्शन कराने के लिए मंदिर प्रशासन और सुरक्षा कर्मी लगातार सक्रिय रहे। सुबह से ही भक्तों का मंदिर पहुंचना शुरू हो गया था और दिनभर दर्शन का क्रम जारी रहा।
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे भगवान शिव का अत्यंत जागृत एवं चमत्कारी धाम माना जाता है। यहां प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती विश्वभर में अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। सावन के दौरान इस आरती में शामिल होना भक्तों के लिए विशेष आध्यात्मिक अनुभव माना जाता है। 31 जुलाई की भस्म आरती ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ भगवान महाकाल की आराधना करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, मानसिक शांति और आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है। बाबा महाकाल के दिव्य दर्शन कर श्रद्धालु स्वयं को धन्य महसूस करते हुए मंदिर से लौटे और सभी ने परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और मंगल की कामना की।
