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"काश दिल मान गया होता..." छतरपुर में टीआई अरविंद कुजूर की आत्महत्या के पीछे छिपी कहानी
Satyakatha

जवानी में “दिल है कि मानता नहीं” जैसे जुमले भले ही शायराना लगें, लेकिन जब उम्र ढलने लगे तो दिल को समझाना जरूरी हो जाता है। अफसोस कि छतरपुर कोतवाली के टीआई अरविंद कुजूर दिल को न समझा सके और नतीजतन उन्हें अपनी जान देनी पड़ी।
6 मार्च को टीआई कुजूर की रक्तरंजित लाश उनके सरकारी निवास में बरामद की गई। जांच में सामने आया कि उन्होंने अपनी ही सर्विस रिवॉल्वर से सिर में गोली मारकर आत्महत्या की। मौके पर कोई सुसाइड नोट नहीं मिला, लेकिन पूरे घटनाक्रम की कड़ियाँ 21 वर्षीय महिला मित्र "राशि" (परिवर्तित नाम) और उसके साथी मोनू ठाकुर की ओर इशारा करती रहीं।
रिश्तों की हदें, खामोश सौदे और ब्लैकमेलिंग
राशि को टीआई कुजूर ने “अंडरकवर एजेंट” बना रखा था। वह न केवल हर महीने 50 से 70 हजार रुपये नकद देती थी, बल्कि कीमती मोबाइल, कार, ज्वेलरी और अन्य उपहार भी भेंट किए जाते थे। इन सबके पीछे उनकी कोशिश यही थी कि वह राशि को अपने करीब बनाए रखें।
कुछ समय बाद राशि ने मोनू ठाकुर नामक युवक को अपने मित्र के रूप में कुजूर से मिलवाया। यहीं से कुजूर और राशि के रिश्तों में खटास शुरू हो गई। मोनू, कुजूर पर हावी होने लगा और धीरे-धीरे दोनों ने टीआई को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया।
राशि, टीआई से पन्ना रोड स्थित एक पॉश कॉलोनी में प्लॉट की मांग कर रही थी और उसके इनकार करने पर साख को खत्म कर देने की धमकियाँ दी जा रही थीं।
पिछला कल और वर्तमान की परछाई
टीआई कुजूर का सेवाकाल भी विवादों से अछूता नहीं रहा। मंडला में उनके खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज हुआ था, जिसके बाद उन्होंने पीड़िता से विवाह कर मामला निपटा लिया था। बाद में विभाग में पुनः बहाली हो गई। पन्ना और छतरपुर में उनकी कार्यशैली सख्त लेकिन विवादित मानी जाती थी।
आखिरी 30 घंटे और आत्मघात का फैसला
5 मार्च की सुबह 10 बजे से 6 मार्च शाम 5 बजे तक राशि और मोनू, कुजूर के घर पर थे। उसके एक घंटे बाद ही कुजूर ने खुद को गोली मार ली। यह संयोग नहीं, बल्कि परिस्थितियों की मजबूत श्रृंखला थी जिसने इस आत्मघात की नींव रखी।
पुलिस की जांच और खुलते राज
पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल चैट्स और अन्य सबूतों के आधार पर मामला गंभीर माना और दोनों आरोपियों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का केस दर्ज किया। पूछताछ में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए, जैसे—मोनू की महंगी स्कॉर्पियो गाड़ी भी कुजूर से मिली थी और राशि द्वारा लगातार की जा रही डिमांड्स, जिससे साफ था कि ब्लैकमेलिंग का खेल चरम पर था।
जब निजी रिश्ते पेशे की सीमाएं लांघ जाएं...
टीआई कुजूर की आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि व्यवस्था, नैतिकता और व्यक्तिगत नियंत्रण की विफलता की कहानी है। जब निजी रिश्ते, सार्वजनिक कर्तव्यों की सीमाएं पार करने लगें, तो न केवल व्यक्ति टूटता है, बल्कि संस्थाएं भी प्रश्नों के घेरे में आ जाती हैं।