घरेलू हिंसा कानून को दबाव का जरिया नहीं बनाया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने FIR रद्द की

छत्तीसगढ़

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स्पष्ट तथ्य और घटना का विवरण न होने पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को रद्द किया, पति और बहनों के खिलाफ केस समाप्त

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी को परेशान या दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने यह निर्णय दिया। इसके तहत उत्तरप्रदेश के बलिया निवासी प्रकाश सिंह और उनकी दो बहनों के खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी गई।

मामला सूरजपुर के जेएमएफसी कोर्ट में घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत चल रहा था। प्रकाश सिंह की पत्नी ने आरोप लगाया था कि शादी के बाद से उसे दहेज और मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। इसके साथ ही उसने अपने बड़े बेटे को अपनी निसंतान बहन को गोद देने की इच्छा जताई, जिस पर पति ने विरोध किया। पत्नी ने इसके बाद पति और ससुराल वालों के खिलाफ कई अदालतों में केस दर्ज कराए, ताकि उन पर दबाव बनाया जा सके।

हाईकोर्ट ने पाया कि 19 अक्टूबर 2022 को तैयार की गई डोमेस्टिक इंसिडेंट रिपोर्ट में किसी भी घटना का स्पष्ट विवरण नहीं था। रिपोर्ट में यह नहीं लिखा था कि कब, कहां और किसने प्रताड़ना दी। बेंच ने कहा कि केवल “मानसिक प्रताड़ना” और “दहेज की मांग” जैसे अस्पष्ट शब्दों के आधार पर गंभीर कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में संरक्षण अधिकारी की जिम्मेदारी होती है कि वे रिपोर्ट में सभी तथ्य दर्ज करें। घटना का समय, स्थान, आरोपी की पहचान और प्रताड़ना का स्वरूप रिपोर्ट में स्पष्ट होना चाहिए। अगर विवाद दहेज से जुड़ा है तो मांगी गई राशि या वस्तु का विवरण भी देना आवश्यक है।

अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत डोमेस्टिक इंसिडेंट रिपोर्ट (धारा 9(1)(b)) को अहम दस्तावेज माना गया है। इसे मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत करना और सभी तथ्य शामिल करना अनिवार्य है। रिपोर्ट अधूरी होने पर मामले की कार्यवाही कमजोर पड़ जाती है और कानून का दुरुपयोग होता है।

इस निर्णय में हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि न्यायिक प्रक्रिया को वैवाहिक विवाद या बच्चों की कस्टडी में दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल करना कानून का उल्लंघन है। बेंच ने कहा कि किसी को परेशान करने या मनमाने आरोप लगाने के लिए अधिनियम का इस्तेमाल करना स्वीकार्य नहीं है।

इस फैसले के बाद प्रकाश सिंह और उनकी बहनों के खिलाफ दर्ज FIR निरस्त हो गई, जिससे उनका नाम कानूनी कार्रवाई से मुक्त हो गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा कानून का उद्देश्य केवल महिलाओं की सुरक्षा और संरक्षण है, न कि किसी को परेशान करने या दबाव बनाने का जरिया।

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www.dainikjagranmpcg.com
22 Jan 2026 By Nitin Trivedi

घरेलू हिंसा कानून को दबाव का जरिया नहीं बनाया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने FIR रद्द की

छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी को परेशान या दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने यह निर्णय दिया। इसके तहत उत्तरप्रदेश के बलिया निवासी प्रकाश सिंह और उनकी दो बहनों के खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी गई।

मामला सूरजपुर के जेएमएफसी कोर्ट में घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत चल रहा था। प्रकाश सिंह की पत्नी ने आरोप लगाया था कि शादी के बाद से उसे दहेज और मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। इसके साथ ही उसने अपने बड़े बेटे को अपनी निसंतान बहन को गोद देने की इच्छा जताई, जिस पर पति ने विरोध किया। पत्नी ने इसके बाद पति और ससुराल वालों के खिलाफ कई अदालतों में केस दर्ज कराए, ताकि उन पर दबाव बनाया जा सके।

हाईकोर्ट ने पाया कि 19 अक्टूबर 2022 को तैयार की गई डोमेस्टिक इंसिडेंट रिपोर्ट में किसी भी घटना का स्पष्ट विवरण नहीं था। रिपोर्ट में यह नहीं लिखा था कि कब, कहां और किसने प्रताड़ना दी। बेंच ने कहा कि केवल “मानसिक प्रताड़ना” और “दहेज की मांग” जैसे अस्पष्ट शब्दों के आधार पर गंभीर कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में संरक्षण अधिकारी की जिम्मेदारी होती है कि वे रिपोर्ट में सभी तथ्य दर्ज करें। घटना का समय, स्थान, आरोपी की पहचान और प्रताड़ना का स्वरूप रिपोर्ट में स्पष्ट होना चाहिए। अगर विवाद दहेज से जुड़ा है तो मांगी गई राशि या वस्तु का विवरण भी देना आवश्यक है।

अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत डोमेस्टिक इंसिडेंट रिपोर्ट (धारा 9(1)(b)) को अहम दस्तावेज माना गया है। इसे मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत करना और सभी तथ्य शामिल करना अनिवार्य है। रिपोर्ट अधूरी होने पर मामले की कार्यवाही कमजोर पड़ जाती है और कानून का दुरुपयोग होता है।

इस निर्णय में हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि न्यायिक प्रक्रिया को वैवाहिक विवाद या बच्चों की कस्टडी में दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल करना कानून का उल्लंघन है। बेंच ने कहा कि किसी को परेशान करने या मनमाने आरोप लगाने के लिए अधिनियम का इस्तेमाल करना स्वीकार्य नहीं है।

इस फैसले के बाद प्रकाश सिंह और उनकी बहनों के खिलाफ दर्ज FIR निरस्त हो गई, जिससे उनका नाम कानूनी कार्रवाई से मुक्त हो गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा कानून का उद्देश्य केवल महिलाओं की सुरक्षा और संरक्षण है, न कि किसी को परेशान करने या दबाव बनाने का जरिया।

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