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दुर्ग निगम कमिश्नर पर निजी काम निकलवाने का आरोप, कर्मचारी की याचिका पर हाईकोर्ट ने कार्रवाई पर लगाई रोक
बिलासपुर (छ.ग.)
फल, चावल, मूवी टिकट और रिचार्ज की कथित मांगों से जुड़ी चैट्स अदालत में पेश, निलंबन को बताया प्रतिशोधात्मक
छत्तीसगढ़ के दुर्ग नगर निगम से जुड़ा एक मामला इन दिनों प्रशासनिक हलकों और न्यायिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। नगर निगम के एक कर्मचारी ने आयुक्त पर निजी फरमाइशें पूरी कराने और इनकार करने पर निलंबित करने का गंभीर आरोप लगाया है। कर्मचारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उसके खिलाफ जारी अनुशासनात्मक कार्रवाई पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।
मामला दुर्ग नगर निगम में कार्यरत सहायक ग्रेड-3 कर्मचारी भूपेंद्र गोइर से जुड़ा है, जिन्होंने हाईकोर्ट में दायर याचिका में दावा किया है कि निगम आयुक्त ने उनसे बार-बार व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुएं मंगवाईं। याचिका के अनुसार, इनमें फल, चावल, मूवी टिकट, गैस सिलेंडर और डिजिटल रिचार्ज जैसी मांगें शामिल थीं। कर्मचारी का कहना है कि इन मांगों को पूरा न कर पाने के बाद उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई।
याचिकाकर्ता ने अदालत में व्हाट्सएप चैट्स के स्क्रीनशॉट भी पेश किए हैं, जिनमें कथित तौर पर निगम आयुक्त द्वारा निजी कार्यों के लिए निर्देश दिए जाने का उल्लेख है। कर्मचारी का आरोप है कि उनसे न केवल घरेलू सामान मंगवाया गया, बल्कि बंगले के डीटीएच और वाई-फाई रिचार्ज तक कराने को कहा गया। इसके अलावा कुछ प्रशासनिक बैठकों को लेकर भी उनसे राय मांगी गई, जो उनके पद और दायित्वों से बाहर बताया गया।
भूपेंद्र गोइर के अनुसार, उनकी नियुक्ति वर्ष 2014 में चपरासी के पद पर हुई थी और 2019 में पदोन्नति के बाद उन्हें सहायक ग्रेड-3 बनाया गया। जुलाई 2025 में उन्हें कुछ नियुक्तियों और पदोन्नतियों में कथित अनियमितता को लेकर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। कर्मचारी का कहना है कि वह केवल फाइल प्रस्तुत करने की भूमिका में थे और अंतिम निर्णय वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा लिए गए थे।
नोटिस के जवाब के बावजूद अगस्त 2025 में उन्हें निलंबित कर दिया गया और बाद में जांच रिपोर्ट के आधार पर बर्खास्तगी की प्रक्रिया शुरू की गई। कर्मचारी ने इस पूरी कार्रवाई को बदले की भावना से प्रेरित बताते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।
मामले की सुनवाई जस्टिस पी.पी. साहू की एकल पीठ में हुई। अदालत में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जांच प्रक्रिया नियमों के अनुरूप नहीं थी और बिना किसी गवाह के बयान दर्ज किए ही दंड का प्रस्ताव तैयार कर लिया गया। हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया जांच में गंभीर खामियां पाते हुए अनुशासनात्मक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी।
अदालत ने नगर निगम प्रशासन और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 23 फरवरी को निर्धारित की गई है। यह प्रकरण न केवल प्रशासनिक जवाबदेही, बल्कि सरकारी पदों के दुरुपयोग के सवालों को भी सामने लाता है, जिस पर आगे की सुनवाई में स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।
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