लिव-इन से वैध विवाह नहीं बनता: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया, बिना तलाक दूसरी पत्नी-बच्चों को नहीं मिलेगा कानूनी अधिकार

बिलासपुर (छ.ग.)

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पहली शादी रहते दूसरा रिश्ता कानूनन शून्य, संपत्ति और उत्तराधिकार पर केवल वैध विवाह से जन्मे बच्चों का हक

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में साफ किया है कि लिव-इन रिलेशनशिप या आपसी सहमति से बना रिश्ता पति-पत्नी का वैधानिक दर्जा नहीं दे सकता। अदालत ने कहा कि यदि किसी महिला की पहली शादी कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुई है, तो उस दौरान किसी अन्य पुरुष के साथ बना संबंध और उससे जुड़े दावे कानूनन मान्य नहीं होंगे।

यह फैसला उस अपील पर आया, जिसमें एक महिला और उसकी दो बेटियों ने एक व्यक्ति को पति और पिता घोषित करने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।

मामले के अनुसार, महिला की पहली शादी वर्ष 1960 में हुई थी, जो कभी कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुई। बाद के वर्षों में वह दूसरे पुरुष के साथ पति-पत्नी की तरह रहने लगी और इसी आधार पर स्वयं को उसकी पत्नी तथा बेटियों को उसकी संतान घोषित करने की मांग की गई।

फैमिली कोर्ट ने पहले ही यह मानते हुए दावा खारिज कर दिया था कि यह विवाद मुख्य रूप से संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़ा है तथा प्रस्तुत साक्ष्य वैधानिक विवाह को सिद्ध नहीं करते। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत जब तक पहली शादी विधिक रूप से समाप्त न हो, दूसरा विवाह स्वतः शून्य माना जाएगा। न तो तलाक का कोई प्रमाण प्रस्तुत किया गया और न ही पहले पति की मृत्यु का कोई साक्ष्य दिया गया। ऐसे में दूसरा रिश्ता कानूनन मान्य नहीं हो सकता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शादी के दौरान जन्मे बच्चों को कानून उसी पति की संतान मानता है, जिससे महिला की वैध शादी हुई हो। किसी अन्य व्यक्ति द्वारा बच्चों को स्वीकार कर लेने मात्र से पितृत्व या उत्तराधिकार का अधिकार उत्पन्न नहीं होता।

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने टिप्पणी की कि वैधानिक प्रावधानों को भावनात्मक आधार या आपसी सहमति से बदला नहीं जा सकता। सरकारी दस्तावेजों और रिकॉर्ड में आज भी बच्चों के पिता के रूप में पहले पति का ही नाम दर्ज होना इस तथ्य को और मजबूत करता है।

अंततः अदालत ने कहा कि अपीलकर्ताओं को संबंधित व्यक्ति की पत्नी या संतान का कानूनी दर्जा नहीं दिया जा सकता और न ही उन्हें उसकी संपत्ति या उत्तराधिकार पर कोई अधिकार मिलेगा। यह फैसला वैवाहिक कानून और पारिवारिक अधिकारों को लेकर एक स्पष्ट और निर्णायक संदेश देता है।

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