मध्यप्रदेश की जेलों में कैदियों की बढ़ती संख्या और उसमें विचाराधीन बंदियों की अधिकता एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में आ गई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने NCRB (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो) की ताजा जेल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि प्रदेश की जेलों में बंद कुल कैदियों में लगभग 50 प्रतिशत विचाराधीन हैं, जिनमें सबसे अधिक संख्या आदिवासियों की है। देशभर में कैदियों की संख्या के मामले में मध्यप्रदेश तीसरे स्थान पर है, जबकि पहले और दूसरे स्थान पर बिहार और उत्तर प्रदेश हैं।
उमंग सिंघार ने शनिवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर बताया कि मध्यप्रदेश की 132 जेलों में इस समय 45,543 कैदी बंद हैं। राज्य की कुल जेल क्षमता लगभग 30 हजार है, लेकिन मौजूदा संख्या क्षमता से करीब 152 प्रतिशत अधिक है। इससे जेलों में भीड़भाड़, स्वास्थ्य और मानवाधिकार से जुड़े गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि प्रदेश में 22,946 कैदी विचाराधीन हैं, यानी जिन पर अभी आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं या जिनके मामलों की सुनवाई चल रही है। इन विचाराधीन कैदियों में 21 प्रतिशत आदिवासी, 19 प्रतिशत दलित और करीब 40 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से हैं। इस तरह लगभग 80 प्रतिशत विचाराधीन कैदी सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से आते हैं।
नेता प्रतिपक्ष का कहना है कि यह आंकड़े न्यायिक प्रक्रिया में मौजूद असमानताओं की ओर इशारा करते हैं। गरीबी, कानूनी जानकारी की कमी और जमानत राशि जुटा न पाने के कारण हजारों लोग वर्षों तक जेल में बंद रहने को मजबूर हैं। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया।
इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियां भी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। शीर्ष अदालत ने लंबे समय तक विचाराधीन कैदियों को जेल में रखने पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि बिना दोष सिद्ध हुए किसी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से बंद रखना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिए हैं कि वे मामलों की नियमित समीक्षा करें और जमानत प्रक्रिया को सरल बनाएं।
यदि दोषी कैदियों की बात करें तो प्रदेश में लगभग 22 हजार सजा पाए कैदी हैं, जिनमें करीब आधी संख्या आदिवासी और दलित समुदाय से है। यह स्थिति जेल व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक ढांचे पर भी सवाल उठाती है।
उमंग सिंघार ने सरकार और न्यायपालिका से अपील की है कि विचाराधीन मामलों की सुनवाई में तेजी लाई जाए, जमानत से जुड़े नियमों को व्यवहारिक बनाया जाए और जेल सुधारों को प्राथमिकता दी जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो जेलों की भीड़ और सामाजिक असमानता दोनों ही और गहराएंगी।
