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भोपाल-ग्वालियर ग्रीनफील्ड कॉरिडोर को मिली रफ्तार, 80 किमी घटेगी दूरी
भोपाल,(म.प्र.)
नए 4-लेन ग्रीनफील्ड कॉरिडोर के लिए इसी महीने डीपीआर टेंडर होंगे जारी, सफर का समय भी करीब डेढ़ से दो घंटे तक कम होने की उम्मीद
मध्य प्रदेश में सड़क संपर्क को बेहतर बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया जा रहा है। भोपाल और ग्वालियर के बीच नया 4-लेन ग्रीनफील्ड कॉरिडोर बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने की प्रक्रिया जल्द शुरू होने वाली है और इसके लिए इसी महीने टेंडर जारी किए जाने की तैयारी चल रही है। नया कॉरिडोर बनने के बाद भोपाल और ग्वालियर के बीच की दूरी में करीब 80 किलोमीटर तक की कमी आएगी, जिससे यात्रा करने वाले लोगों को समय और ईंधन दोनों की बचत होगी।
वर्तमान में भोपाल से ग्वालियर पहुंचने के लिए लगभग 425 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। सड़क मार्ग से यह सफर आमतौर पर सात से आठ घंटे में पूरा होता है। हालांकि प्रस्तावित ग्रीनफील्ड कॉरिडोर बनने के बाद यह दूरी घटकर लगभग 340 से 350 किलोमीटर रह जाएगी। अधिकारियों के अनुसार नए मार्ग के जरिए दोनों शहरों के बीच यात्रा का समय भी घटकर करीब साढ़े पांच घंटे रह सकता है। इससे न केवल यात्रियों को राहत मिलेगी बल्कि माल परिवहन की लागत में भी कमी आने की संभावना है।
मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम (एमपीआरडीसी) इस परियोजना को बीओटी यानी बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर मॉडल पर विकसित करने की योजना बना रहा है। प्रारंभिक स्तर पर परियोजना की रूपरेखा तैयार कर ली गई है और अब डीपीआर तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। यदि सभी प्रक्रियाएं तय समय पर पूरी होती हैं तो अगले तीन वर्षों के भीतर इस कॉरिडोर का निर्माण कार्य पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
अधिकारियों के अनुसार प्रदेश में तेजी से बढ़ रहे यातायात दबाव को देखते हुए नए वैकल्पिक मार्गों की जरूरत महसूस की जा रही है। खासकर ऐसे शहरों के बीच जहां आर्थिक, प्रशासनिक और व्यावसायिक गतिविधियां अधिक हैं। भोपाल प्रदेश की राजधानी है जबकि ग्वालियर उत्तर मध्य प्रदेश का एक प्रमुख शहर माना जाता है। दोनों शहरों के बीच प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग यात्रा करते हैं। ऐसे में एक तेज और आधुनिक सड़क संपर्क लंबे समय से आवश्यक माना जा रहा था।
महाराष्ट्र में विकसित कुछ आधुनिक सड़क परियोजनाओं के अध्ययन के बाद मध्य प्रदेश में भी इसी तरह के ग्रीनफील्ड कॉरिडोर विकसित करने पर सहमति बनी। राज्य सरकार और एमपीआरडीसी पहले से कई बड़े ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इनमें भोपाल-इंदौर, भोपाल-मंदसौर, सागर-सतना, सागर-जबलपुर और जबलपुर-आशापुर कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं शामिल हैं। कई परियोजनाओं की डीपीआर तैयार की जा चुकी है जबकि कुछ योजनाएं प्रारंभिक चरण में हैं।
एमपीआरडीसी के प्रबंध संचालक भरत यादव के अनुसार प्रदेश में सड़क नेटवर्क को आधुनिक बनाने की दिशा में लगातार काम किया जा रहा है। उनका कहना है कि जिन मार्गों पर यातायात का दबाव तेजी से बढ़ रहा है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर विकसित किया जा रहा है। ग्रीनफील्ड कॉरिडोर बनने से यात्रा समय कम होगा, सड़क सुरक्षा बेहतर होगी और परिवहन क्षेत्र को नई गति मिलेगी।
प्रदेश में प्रस्तावित अन्य ग्रीनफील्ड परियोजनाएं भी काफी महत्वाकांक्षी मानी जा रही हैं। भोपाल-मंदसौर कॉरिडोर की लंबाई लगभग 256 किलोमीटर प्रस्तावित है और इसकी अनुमानित लागत 11,550 करोड़ रुपए आंकी गई है। इस मार्ग पर 13 इंटरचेंज विकसित किए जाने की योजना है और वर्ष 2029-30 तक निर्माण पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसी तरह सागर-सतना कॉरिडोर की लंबाई 218.20 किलोमीटर होगी, जिस पर करीब 9,850 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। इस परियोजना के पूरा होने के बाद यात्रा समय छह से सात घंटे के बजाय करीब साढ़े तीन घंटे रह जाएगा।
जबलपुर-आशापुर ग्रीनफील्ड कॉरिडोर भी प्रदेश की बड़ी परियोजनाओं में शामिल है। लगभग 256 किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर 17 हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च का अनुमान लगाया गया है। इसके साथ ही मौजूदा सड़क नेटवर्क को भी मजबूत करने की योजना बनाई गई है ताकि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बेहतर बनाया जा सके।
नए ग्रीनफील्ड कॉरिडोर केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं होते बल्कि इनके आसपास आर्थिक गतिविधियों का भी विस्तार होता है। नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित होते हैं, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क मजबूत होता है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। भोपाल-ग्वालियर कॉरिडोर के मामले में भी ऐसी ही संभावनाएं देखी जा रही हैं। सड़क बनने के बाद दोनों शहरों के बीच व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है और मध्य प्रदेश के कई जिलों को बेहतर कनेक्टिविटी का लाभ मिलेगा।
बीओटी मॉडल की बात करें तो इसमें परियोजना लागत का 20 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार और 20 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाता है। शेष 60 प्रतिशत निवेश निर्माण एजेंसी या निजी भागीदार द्वारा किया जाता है। इसके बदले उन्हें तय अवधि तक टोल संग्रह का अधिकार दिया जाता है। सरकार का मानना है कि इस मॉडल से बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट बिना अतिरिक्त वित्तीय दबाव के तेजी से पूरे किए जा सकते हैं।
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भोपाल-ग्वालियर ग्रीनफील्ड कॉरिडोर को मिली रफ्तार, 80 किमी घटेगी दूरी
भोपाल,(म.प्र.)
मध्य प्रदेश में सड़क संपर्क को बेहतर बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया जा रहा है। भोपाल और ग्वालियर के बीच नया 4-लेन ग्रीनफील्ड कॉरिडोर बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने की प्रक्रिया जल्द शुरू होने वाली है और इसके लिए इसी महीने टेंडर जारी किए जाने की तैयारी चल रही है। नया कॉरिडोर बनने के बाद भोपाल और ग्वालियर के बीच की दूरी में करीब 80 किलोमीटर तक की कमी आएगी, जिससे यात्रा करने वाले लोगों को समय और ईंधन दोनों की बचत होगी।
वर्तमान में भोपाल से ग्वालियर पहुंचने के लिए लगभग 425 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। सड़क मार्ग से यह सफर आमतौर पर सात से आठ घंटे में पूरा होता है। हालांकि प्रस्तावित ग्रीनफील्ड कॉरिडोर बनने के बाद यह दूरी घटकर लगभग 340 से 350 किलोमीटर रह जाएगी। अधिकारियों के अनुसार नए मार्ग के जरिए दोनों शहरों के बीच यात्रा का समय भी घटकर करीब साढ़े पांच घंटे रह सकता है। इससे न केवल यात्रियों को राहत मिलेगी बल्कि माल परिवहन की लागत में भी कमी आने की संभावना है।
मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम (एमपीआरडीसी) इस परियोजना को बीओटी यानी बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर मॉडल पर विकसित करने की योजना बना रहा है। प्रारंभिक स्तर पर परियोजना की रूपरेखा तैयार कर ली गई है और अब डीपीआर तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। यदि सभी प्रक्रियाएं तय समय पर पूरी होती हैं तो अगले तीन वर्षों के भीतर इस कॉरिडोर का निर्माण कार्य पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
अधिकारियों के अनुसार प्रदेश में तेजी से बढ़ रहे यातायात दबाव को देखते हुए नए वैकल्पिक मार्गों की जरूरत महसूस की जा रही है। खासकर ऐसे शहरों के बीच जहां आर्थिक, प्रशासनिक और व्यावसायिक गतिविधियां अधिक हैं। भोपाल प्रदेश की राजधानी है जबकि ग्वालियर उत्तर मध्य प्रदेश का एक प्रमुख शहर माना जाता है। दोनों शहरों के बीच प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग यात्रा करते हैं। ऐसे में एक तेज और आधुनिक सड़क संपर्क लंबे समय से आवश्यक माना जा रहा था।
महाराष्ट्र में विकसित कुछ आधुनिक सड़क परियोजनाओं के अध्ययन के बाद मध्य प्रदेश में भी इसी तरह के ग्रीनफील्ड कॉरिडोर विकसित करने पर सहमति बनी। राज्य सरकार और एमपीआरडीसी पहले से कई बड़े ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इनमें भोपाल-इंदौर, भोपाल-मंदसौर, सागर-सतना, सागर-जबलपुर और जबलपुर-आशापुर कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं शामिल हैं। कई परियोजनाओं की डीपीआर तैयार की जा चुकी है जबकि कुछ योजनाएं प्रारंभिक चरण में हैं।
एमपीआरडीसी के प्रबंध संचालक भरत यादव के अनुसार प्रदेश में सड़क नेटवर्क को आधुनिक बनाने की दिशा में लगातार काम किया जा रहा है। उनका कहना है कि जिन मार्गों पर यातायात का दबाव तेजी से बढ़ रहा है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर विकसित किया जा रहा है। ग्रीनफील्ड कॉरिडोर बनने से यात्रा समय कम होगा, सड़क सुरक्षा बेहतर होगी और परिवहन क्षेत्र को नई गति मिलेगी।
प्रदेश में प्रस्तावित अन्य ग्रीनफील्ड परियोजनाएं भी काफी महत्वाकांक्षी मानी जा रही हैं। भोपाल-मंदसौर कॉरिडोर की लंबाई लगभग 256 किलोमीटर प्रस्तावित है और इसकी अनुमानित लागत 11,550 करोड़ रुपए आंकी गई है। इस मार्ग पर 13 इंटरचेंज विकसित किए जाने की योजना है और वर्ष 2029-30 तक निर्माण पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसी तरह सागर-सतना कॉरिडोर की लंबाई 218.20 किलोमीटर होगी, जिस पर करीब 9,850 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। इस परियोजना के पूरा होने के बाद यात्रा समय छह से सात घंटे के बजाय करीब साढ़े तीन घंटे रह जाएगा।
जबलपुर-आशापुर ग्रीनफील्ड कॉरिडोर भी प्रदेश की बड़ी परियोजनाओं में शामिल है। लगभग 256 किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर 17 हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च का अनुमान लगाया गया है। इसके साथ ही मौजूदा सड़क नेटवर्क को भी मजबूत करने की योजना बनाई गई है ताकि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बेहतर बनाया जा सके।
नए ग्रीनफील्ड कॉरिडोर केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं होते बल्कि इनके आसपास आर्थिक गतिविधियों का भी विस्तार होता है। नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित होते हैं, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क मजबूत होता है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। भोपाल-ग्वालियर कॉरिडोर के मामले में भी ऐसी ही संभावनाएं देखी जा रही हैं। सड़क बनने के बाद दोनों शहरों के बीच व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है और मध्य प्रदेश के कई जिलों को बेहतर कनेक्टिविटी का लाभ मिलेगा।
बीओटी मॉडल की बात करें तो इसमें परियोजना लागत का 20 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार और 20 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाता है। शेष 60 प्रतिशत निवेश निर्माण एजेंसी या निजी भागीदार द्वारा किया जाता है। इसके बदले उन्हें तय अवधि तक टोल संग्रह का अधिकार दिया जाता है। सरकार का मानना है कि इस मॉडल से बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट बिना अतिरिक्त वित्तीय दबाव के तेजी से पूरे किए जा सकते हैं।
