- Hindi News
- राज्य
- मध्य प्रदेश
- मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, सिंघवी बोले- फैसला कानूनी रूप से ग...
मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, सिंघवी बोले- फैसला कानूनी रूप से गलत
मध्य प्रदेश
राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार का नामांकन खारिज होने के खिलाफ याचिका पर सुनवाई, निजी शिकायत के आधार पर कार्रवाई को चुनौती
मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र रद्द किए जाने का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई के दौरान कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने नामांकन निरस्त किए जाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने अदालत के सामने दलील दी कि जिस निजी शिकायत के आधार पर मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज किया गया, उस मामले में अब तक किसी सक्षम अदालत ने संज्ञान तक नहीं लिया है। ऐसे में नामांकन रद्द करने का फैसला कानून की भावना और चुनावी प्रक्रिया दोनों के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सिंघवी ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33ए के तहत उम्मीदवारों को केवल उन्हीं आपराधिक मामलों की जानकारी देना अनिवार्य होता है, जिनमें सक्षम अदालत द्वारा आरोप तय किए जा चुके हों और जिन अपराधों में दो वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान मामले में न तो कोई आरोप तय हुए हैं और न ही अदालत ने किसी प्रकार का संज्ञान लिया है। ऐसे में निजी शिकायत के आधार पर उम्मीदवार का नामांकन खारिज करना कानूनी रूप से उचित नहीं माना जा सकता।
मामला उस समय चर्चा में आया जब कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन ने 8 जून को राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल किया था। अगले दिन 9 जून को नामांकन पत्रों की जांच यानी स्क्रूटनी के दौरान भारतीय जनता पार्टी की ओर से उनके नामांकन पर आपत्ति दर्ज कराई गई। भाजपा का आरोप था कि नटराजन ने अपने खिलाफ लंबित एक मामले की जानकारी नामांकन पत्र में शामिल नहीं की। इस आपत्ति पर विचार करने के बाद रिटर्निंग अधिकारी ने उनका नामांकन निरस्त कर दिया था। इसके बाद यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया।
नामांकन रद्द होने के बाद कांग्रेस ने तत्काल सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। पार्टी की ओर से देर रात ऑनलाइन याचिका दायर की गई और मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की गई। कांग्रेस ने अदालत से यह भी अनुरोध किया था कि अंतिम निर्णय आने तक चुनाव परिणामों की घोषणा पर रोक लगाई जाए। हालांकि अदालत ने तत्काल कोई अंतरिम राहत नहीं दी और मामले को नियमित सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
सुनवाई के दौरान कांग्रेस की ओर से यह भी कहा गया कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी उम्मीदवार के खिलाफ केवल आरोप या शिकायत दर्ज होना और अदालत द्वारा उस पर संज्ञान लेना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। यदि किसी मामले में अभी तक न्यायिक प्रक्रिया प्रारंभ ही नहीं हुई है, तो उसे छिपाई गई जानकारी मानना उचित नहीं होगा। पार्टी का कहना है कि नामांकन रद्द करने का निर्णय जल्दबाजी में लिया गया और इससे एक उम्मीदवार के चुनाव लड़ने के अधिकार पर असर पड़ा है।
दूसरी ओर भाजपा ने अदालत में दायर अपने हलफनामे में दावा किया है कि उम्मीदवार को अपने खिलाफ लंबित मामले की जानकारी देनी चाहिए थी। भाजपा का कहना है कि मतदाताओं और निर्वाचन प्रक्रिया के हित में उम्मीदवारों से संबंधित सभी महत्वपूर्ण जानकारियां सार्वजनिक होना आवश्यक हैं। पार्टी का तर्क है कि चुनावी पारदर्शिता लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है और जानकारी छिपाने के किसी भी प्रयास को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
मीनाक्षी नटराजन ने भी अपने नामांकन रद्द किए जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे राजनीतिक साजिश बताया है। उनका कहना है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करना है। उन्होंने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर करने के लिए इस तरह की कार्रवाई की गई। नटराजन का कहना है कि उन्होंने कानून के अनुसार सभी आवश्यक जानकारियां प्रस्तुत की थीं और उनका नामांकन रद्द करना अनुचित है।
यह मामला केवल एक उम्मीदवार के नामांकन तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में उम्मीदवारों द्वारा दी जाने वाली जानकारी और उसकी कानूनी व्याख्या से भी जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। विशेष रूप से यह स्पष्ट हो सकता है कि निजी शिकायत, लंबित मामला और अदालत द्वारा संज्ञान लेने की स्थिति को चुनावी दस्तावेजों में किस तरह देखा जाना चाहिए। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों की व्याख्या इस मामले में अहम भूमिका निभाएगी। अदालत को यह तय करना होगा कि क्या केवल किसी शिकायत का अस्तित्व उम्मीदवार पर जानकारी देने का दायित्व बनाता है या फिर इसके लिए अदालत द्वारा औपचारिक संज्ञान और आरोप तय होने जैसी प्रक्रिया आवश्यक है। यही बिंदु पूरे विवाद का केंद्र बना हुआ है।
-----------------
हमारे आधिकारिक प्लेटफॉर्म्स से जुड़ें –
🔴 व्हाट्सएप चैनल: https://whatsapp.com/channel/0029VbATlF0KQuJB6tvUrN3V
🔴 फेसबुक: Dainik Jagran MP/CG Official
🟣 इंस्टाग्राम: @dainikjagranmp.cg
🔴 यूट्यूब: Dainik Jagran MPCG Digital
📲 सोशल मीडिया पर जुड़ें और बने जागरूक पाठक।
👉 आज ही जुड़िए
मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, सिंघवी बोले- फैसला कानूनी रूप से गलत
मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र रद्द किए जाने का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई के दौरान कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने नामांकन निरस्त किए जाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने अदालत के सामने दलील दी कि जिस निजी शिकायत के आधार पर मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज किया गया, उस मामले में अब तक किसी सक्षम अदालत ने संज्ञान तक नहीं लिया है। ऐसे में नामांकन रद्द करने का फैसला कानून की भावना और चुनावी प्रक्रिया दोनों के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सिंघवी ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33ए के तहत उम्मीदवारों को केवल उन्हीं आपराधिक मामलों की जानकारी देना अनिवार्य होता है, जिनमें सक्षम अदालत द्वारा आरोप तय किए जा चुके हों और जिन अपराधों में दो वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान मामले में न तो कोई आरोप तय हुए हैं और न ही अदालत ने किसी प्रकार का संज्ञान लिया है। ऐसे में निजी शिकायत के आधार पर उम्मीदवार का नामांकन खारिज करना कानूनी रूप से उचित नहीं माना जा सकता।
मामला उस समय चर्चा में आया जब कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन ने 8 जून को राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल किया था। अगले दिन 9 जून को नामांकन पत्रों की जांच यानी स्क्रूटनी के दौरान भारतीय जनता पार्टी की ओर से उनके नामांकन पर आपत्ति दर्ज कराई गई। भाजपा का आरोप था कि नटराजन ने अपने खिलाफ लंबित एक मामले की जानकारी नामांकन पत्र में शामिल नहीं की। इस आपत्ति पर विचार करने के बाद रिटर्निंग अधिकारी ने उनका नामांकन निरस्त कर दिया था। इसके बाद यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया।
नामांकन रद्द होने के बाद कांग्रेस ने तत्काल सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। पार्टी की ओर से देर रात ऑनलाइन याचिका दायर की गई और मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की गई। कांग्रेस ने अदालत से यह भी अनुरोध किया था कि अंतिम निर्णय आने तक चुनाव परिणामों की घोषणा पर रोक लगाई जाए। हालांकि अदालत ने तत्काल कोई अंतरिम राहत नहीं दी और मामले को नियमित सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
सुनवाई के दौरान कांग्रेस की ओर से यह भी कहा गया कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी उम्मीदवार के खिलाफ केवल आरोप या शिकायत दर्ज होना और अदालत द्वारा उस पर संज्ञान लेना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। यदि किसी मामले में अभी तक न्यायिक प्रक्रिया प्रारंभ ही नहीं हुई है, तो उसे छिपाई गई जानकारी मानना उचित नहीं होगा। पार्टी का कहना है कि नामांकन रद्द करने का निर्णय जल्दबाजी में लिया गया और इससे एक उम्मीदवार के चुनाव लड़ने के अधिकार पर असर पड़ा है।
दूसरी ओर भाजपा ने अदालत में दायर अपने हलफनामे में दावा किया है कि उम्मीदवार को अपने खिलाफ लंबित मामले की जानकारी देनी चाहिए थी। भाजपा का कहना है कि मतदाताओं और निर्वाचन प्रक्रिया के हित में उम्मीदवारों से संबंधित सभी महत्वपूर्ण जानकारियां सार्वजनिक होना आवश्यक हैं। पार्टी का तर्क है कि चुनावी पारदर्शिता लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है और जानकारी छिपाने के किसी भी प्रयास को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
मीनाक्षी नटराजन ने भी अपने नामांकन रद्द किए जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे राजनीतिक साजिश बताया है। उनका कहना है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करना है। उन्होंने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर करने के लिए इस तरह की कार्रवाई की गई। नटराजन का कहना है कि उन्होंने कानून के अनुसार सभी आवश्यक जानकारियां प्रस्तुत की थीं और उनका नामांकन रद्द करना अनुचित है।
यह मामला केवल एक उम्मीदवार के नामांकन तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में उम्मीदवारों द्वारा दी जाने वाली जानकारी और उसकी कानूनी व्याख्या से भी जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। विशेष रूप से यह स्पष्ट हो सकता है कि निजी शिकायत, लंबित मामला और अदालत द्वारा संज्ञान लेने की स्थिति को चुनावी दस्तावेजों में किस तरह देखा जाना चाहिए। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों की व्याख्या इस मामले में अहम भूमिका निभाएगी। अदालत को यह तय करना होगा कि क्या केवल किसी शिकायत का अस्तित्व उम्मीदवार पर जानकारी देने का दायित्व बनाता है या फिर इसके लिए अदालत द्वारा औपचारिक संज्ञान और आरोप तय होने जैसी प्रक्रिया आवश्यक है। यही बिंदु पूरे विवाद का केंद्र बना हुआ है।
