- Hindi News
- राज्य
- मध्य प्रदेश
- मऊगंज सिविल अस्पताल की बदहाल व्यवस्था उजागर, डॉक्टर गायब, कर्मचारी करते मिले इलाज
मऊगंज सिविल अस्पताल की बदहाल व्यवस्था उजागर, डॉक्टर गायब, कर्मचारी करते मिले इलाज
मऊगंज,(म.प्र.)
वायरल वीडियो के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप, आउटसोर्स कर्मचारियों और निजी सहायकों द्वारा मरीजों को इंजेक्शन लगाने व दवाइयां देने के आरोप, अस्पताल की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले के सिविल अस्पताल से सामने आई तस्वीरों ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें डॉक्टरों की अनुपस्थिति के बीच आउटसोर्स कर्मचारियों और निजी सहायकों द्वारा मरीजों का इलाज किए जाने के आरोप सामने आए हैं। वीडियो सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है और पूरे मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
बताया जा रहा है कि अस्पताल में इन दिनों मरीजों की संख्या लगातार बढ़ी हुई है। सुबह से लेकर दोपहर तक ओपीडी और वार्डों में मरीजों की लंबी कतारें लगी रहती हैं। लेकिन इसी बीच कई डॉक्टरों के ड्यूटी पर मौजूद नहीं रहने की शिकायतें भी सामने आई हैं। मरीजों और उनके परिजनों का आरोप है कि इलाज के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है, जबकि कई बार डॉक्टर अस्पताल में उपलब्ध ही नहीं होते। ऐसे हालात में अस्पताल की व्यवस्था अन्य कर्मचारियों के भरोसे चलती दिखाई देती है।
वायरल वीडियो में कुछ ऐसे दृश्य दिखाई दे रहे हैं, जिन्होंने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। वीडियो में कथित तौर पर डॉक्टर के निजी सहायक मरीजों को देखते हुए नजर आ रहे हैं। वहीं मल्टी स्किल्ड ग्रुप-डी के आउटसोर्स कर्मचारी मरीजों को दवाइयां देते और इंजेक्शन लगाते दिखाई दे रहे हैं। यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि चिकित्सा से जुड़े ऐसे कार्य केवल प्रशिक्षित और अधिकृत स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा किए जाने चाहिए।
अस्पताल की स्थिति को लेकर एक और चिंताजनक पहलू सामने आया है। वार्डों में मरीजों की संख्या क्षमता से अधिक होने के कारण कई बेड पर दो-दो मरीजों को भर्ती किए जाने की बात कही जा रही है। भीषण गर्मी के बीच मरीजों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पाने की शिकायत भी सामने आई है। कुछ परिजनों का कहना है कि स्ट्रेचर और अन्य बुनियादी संसाधनों की कमी के कारण उन्हें मरीजों को खुद उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना पड़ता है।
वीडियो में एक बुजुर्ग मरीज को कुर्सी पर बैठाकर इंजेक्शन लगाया जाता दिखाई देता है। आरोप है कि इंजेक्शन लगाने वाला व्यक्ति प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ का सदस्य नहीं था। वीडियो में कई बार सुई लगाने की कोशिश होती दिखती है, जिससे मरीज को असुविधा होती नजर आती है। इस दृश्य ने सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं और तेज कर दी हैं। कई लोगों ने इसे मरीजों की सुरक्षा के साथ गंभीर लापरवाही बताया है।
मरीजों के परिजनों का कहना है कि अस्पताल में पहले भी डॉक्टरों और स्टाफ की कमी की शिकायतें सामने आती रही हैं। उनका आरोप है कि समय पर विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं होने से मरीजों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई लोगों का कहना है कि यदि प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह निभा रहा होता, तो गैर-चिकित्सकीय कर्मचारियों को इस तरह की भूमिका निभाने की जरूरत नहीं पड़ती। मरीजों को दवा देना, इंजेक्शन लगाना और उपचार से जुड़े अन्य कार्य अत्यंत संवेदनशील होते हैं। इन कार्यों के लिए उचित प्रशिक्षण और चिकित्सकीय योग्यता आवश्यक होती है। यदि इन प्रक्रियाओं में किसी प्रकार की चूक होती है तो मरीज के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि अस्पतालों में जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण किया जाता है।
वीडियो वायरल होने के बाद स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही अस्पताल में डॉक्टरों की नियमित उपस्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम ने सरकारी अस्पतालों में संसाधनों, मानवबल और जवाबदेही की स्थिति पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए सरकारी अस्पताल ही इलाज का प्रमुख माध्यम होते हैं। ऐसे में यदि वहां भी आवश्यक चिकित्सा सेवाएं समय पर उपलब्ध नहीं हों तो मरीजों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। वायरल वीडियो की जांच और तथ्यों की पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से मामले की समीक्षा किए जाने की बात कही जा रही है।
-----------------
हमारे आधिकारिक प्लेटफॉर्म्स से जुड़ें –
🔴 व्हाट्सएप चैनल: https://whatsapp.com/channel/0029VbATlF0KQuJB6tvUrN3V
🔴 फेसबुक: Dainik Jagran MP/CG Official
🟣 इंस्टाग्राम: @dainikjagranmp.cg
🔴 यूट्यूब: Dainik Jagran MPCG Digital
📲 सोशल मीडिया पर जुड़ें और बने जागरूक पाठक।
👉 आज ही जुड़िए
मऊगंज सिविल अस्पताल की बदहाल व्यवस्था उजागर, डॉक्टर गायब, कर्मचारी करते मिले इलाज
मऊगंज,(म.प्र.)
मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले के सिविल अस्पताल से सामने आई तस्वीरों ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें डॉक्टरों की अनुपस्थिति के बीच आउटसोर्स कर्मचारियों और निजी सहायकों द्वारा मरीजों का इलाज किए जाने के आरोप सामने आए हैं। वीडियो सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है और पूरे मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
बताया जा रहा है कि अस्पताल में इन दिनों मरीजों की संख्या लगातार बढ़ी हुई है। सुबह से लेकर दोपहर तक ओपीडी और वार्डों में मरीजों की लंबी कतारें लगी रहती हैं। लेकिन इसी बीच कई डॉक्टरों के ड्यूटी पर मौजूद नहीं रहने की शिकायतें भी सामने आई हैं। मरीजों और उनके परिजनों का आरोप है कि इलाज के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है, जबकि कई बार डॉक्टर अस्पताल में उपलब्ध ही नहीं होते। ऐसे हालात में अस्पताल की व्यवस्था अन्य कर्मचारियों के भरोसे चलती दिखाई देती है।
वायरल वीडियो में कुछ ऐसे दृश्य दिखाई दे रहे हैं, जिन्होंने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। वीडियो में कथित तौर पर डॉक्टर के निजी सहायक मरीजों को देखते हुए नजर आ रहे हैं। वहीं मल्टी स्किल्ड ग्रुप-डी के आउटसोर्स कर्मचारी मरीजों को दवाइयां देते और इंजेक्शन लगाते दिखाई दे रहे हैं। यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि चिकित्सा से जुड़े ऐसे कार्य केवल प्रशिक्षित और अधिकृत स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा किए जाने चाहिए।
अस्पताल की स्थिति को लेकर एक और चिंताजनक पहलू सामने आया है। वार्डों में मरीजों की संख्या क्षमता से अधिक होने के कारण कई बेड पर दो-दो मरीजों को भर्ती किए जाने की बात कही जा रही है। भीषण गर्मी के बीच मरीजों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पाने की शिकायत भी सामने आई है। कुछ परिजनों का कहना है कि स्ट्रेचर और अन्य बुनियादी संसाधनों की कमी के कारण उन्हें मरीजों को खुद उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना पड़ता है।
वीडियो में एक बुजुर्ग मरीज को कुर्सी पर बैठाकर इंजेक्शन लगाया जाता दिखाई देता है। आरोप है कि इंजेक्शन लगाने वाला व्यक्ति प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ का सदस्य नहीं था। वीडियो में कई बार सुई लगाने की कोशिश होती दिखती है, जिससे मरीज को असुविधा होती नजर आती है। इस दृश्य ने सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं और तेज कर दी हैं। कई लोगों ने इसे मरीजों की सुरक्षा के साथ गंभीर लापरवाही बताया है।
मरीजों के परिजनों का कहना है कि अस्पताल में पहले भी डॉक्टरों और स्टाफ की कमी की शिकायतें सामने आती रही हैं। उनका आरोप है कि समय पर विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं होने से मरीजों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई लोगों का कहना है कि यदि प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह निभा रहा होता, तो गैर-चिकित्सकीय कर्मचारियों को इस तरह की भूमिका निभाने की जरूरत नहीं पड़ती। मरीजों को दवा देना, इंजेक्शन लगाना और उपचार से जुड़े अन्य कार्य अत्यंत संवेदनशील होते हैं। इन कार्यों के लिए उचित प्रशिक्षण और चिकित्सकीय योग्यता आवश्यक होती है। यदि इन प्रक्रियाओं में किसी प्रकार की चूक होती है तो मरीज के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि अस्पतालों में जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण किया जाता है।
वीडियो वायरल होने के बाद स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही अस्पताल में डॉक्टरों की नियमित उपस्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम ने सरकारी अस्पतालों में संसाधनों, मानवबल और जवाबदेही की स्थिति पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए सरकारी अस्पताल ही इलाज का प्रमुख माध्यम होते हैं। ऐसे में यदि वहां भी आवश्यक चिकित्सा सेवाएं समय पर उपलब्ध नहीं हों तो मरीजों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। वायरल वीडियो की जांच और तथ्यों की पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से मामले की समीक्षा किए जाने की बात कही जा रही है।
