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रीवा में वकील से पुलिस की मारपीट का VIDEO वायरल, सड़क पर घसीटकर थाने ले जाने के आरोप
रीवा,(म.प्र.)
आदिवासी परिवार की जमीन पर कार्रवाई के दौरान हुआ विवाद, अधिवक्ता ने पुलिस पर कपड़े फाड़ने और जान से मारने की आशंका जताई, प्रशासन ने जांच के दिए संकेत
रीवा में पुलिस और एक अधिवक्ता के बीच हुए विवाद का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। दो दिन पहले हुई घटना का वीडियो सामने आने के बाद पूरे मामले को लेकर सवाल उठने लगे हैं। वीडियो में कुछ पुलिसकर्मी अधिवक्ता नीरज वर्मा को कॉलर पकड़कर सड़क पर घसीटते और धक्का-मुक्की करते दिखाई दे रहे हैं। इस दौरान आसपास लोगों की भीड़ भी मौजूद थी। वीडियो वायरल होने के बाद अधिवक्ता संगठनों और स्थानीय लोगों के बीच चर्चा तेज हो गई है।
घटना समान थाना क्षेत्र की बताई जा रही है, जहां प्रशासनिक टीम एक आदिवासी परिवार की जमीन पर कार्रवाई करने पहुंची थी। बताया जा रहा है कि प्रशासन संबंधित जमीन पर बने मकान को हटाने की कार्रवाई कर रहा था। इसी दौरान अधिवक्ता नीरज वर्मा मौके पर पहुंचे और उन्होंने कार्रवाई का विरोध करते हुए जमीन से जुड़े दस्तावेज अधिकारियों को दिखाने की कोशिश की। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मौके पर काफी देर तक बहस होती रही और फिर हालात अचानक बिगड़ गए।
वायरल वीडियो में दिखाई दे रहा है कि अधिवक्ता कुछ दस्तावेज हाथ में लेकर पुलिसकर्मियों से बात कर रहे हैं। इसी बीच पुलिसकर्मी उन्हें पकड़कर आगे बढ़ाते हैं। कुछ पुलिसकर्मी उनकी कॉलर पकड़कर सड़क पर ले जाते दिखाई देते हैं। वीडियो में धक्का-मुक्की की स्थिति भी नजर आ रही है। घटना के दौरान अधिवक्ता के कपड़े फटने की बात भी सामने आई है। अधिवक्ता का आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उनकी वकालती यूनिफॉर्म और काला कोट तक फाड़ दिया।
अधिवक्ता नीरज वर्मा का कहना है कि जिस जमीन पर कार्रवाई की जा रही थी, वह आदिवासी पट्टे की भूमि है। उनके अनुसार श्यामलाल कोल, बृजलाल कोल, बबलू कोल और अर्जुन कोल के नाम पर यह जमीन कई दशक पहले से दर्ज है। उन्होंने दावा किया कि संबंधित मामले में अपील लंबित थी और न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुए बिना मकान गिराने की कार्रवाई की जा रही थी। इसी वजह से वह दस्तावेज लेकर मौके पर पहुंचे थे ताकि प्रशासन को स्थिति से अवगत कराया जा सके।
नीरज वर्मा ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने कार्रवाई पर सवाल उठाए तो पुलिसकर्मियों ने गाली-गलौज शुरू कर दी। उन्होंने कहा कि उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया मानो वह कोई गंभीर अपराधी हों। अधिवक्ता का कहना है कि उन्हें जबरन पकड़कर थाने ले जाया गया और कई घंटों तक वहीं बैठाए रखा गया। उनका आरोप है कि उस समय उन्हें अपनी जान का भी खतरा महसूस हो रहा था। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
दूसरी ओर पुलिस ने इन आरोपों को खारिज किया है। समान थाना प्रभारी विजय सिंह का कहना है कि प्रशासनिक टीम विधिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर रही थी। उनके अनुसार अधिवक्ता लगातार शासकीय कार्य में बाधा उत्पन्न कर रहे थे और अधिकारियों के काम में हस्तक्षेप कर रहे थे। पुलिस का कहना है कि उन्हें कई बार समझाने का प्रयास किया गया, लेकिन जब स्थिति सामान्य नहीं हुई तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्हें मौके से हटाकर थाने ले जाया गया।
मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू तब सामने आया जब कार्रवाई के आधार को लेकर सवाल उठे। बताया गया कि जब अधिकारियों से मकान हटाने के लिए कथित कोर्ट आदेश की प्रति मांगी गई तो मौके पर उसे प्रस्तुत नहीं किया जा सका। इससे कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। प्रशासन का कहना है कि संबंधित रिकॉर्ड की जांच की जा रही है और पूरे घटनाक्रम की समीक्षा होगी।
एसडीएम अनुराग तिवारी ने कहा है कि मामले की नए सिरे से जांच कराई जाएगी। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि उपलब्ध दस्तावेजों और प्रशासनिक प्रक्रिया की समीक्षा की जाएगी। अधिकारियों के अनुसार यदि कहीं प्रक्रिया संबंधी त्रुटि पाई जाती है तो आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। वहीं स्थानीय स्तर पर भी लोग पूरे घटनाक्रम को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
वीडियो सामने आने के बाद यह मामला केवल पुलिस और अधिवक्ता के बीच विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। अब इसमें प्रशासनिक कार्रवाई, आदिवासी परिवार की जमीन, बेदखली प्रक्रिया और सरकारी अधिकारों के इस्तेमाल जैसे कई मुद्दे जुड़ गए हैं। दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर कायम हैं। एक ओर अधिवक्ता खुद के साथ अन्याय होने की बात कह रहे हैं तो दूसरी ओर पुलिस अपनी कार्रवाई को नियमों के अनुरूप बता रही है। अब सबकी नजर प्रशासन की प्रस्तावित जांच पर टिकी हुई है। जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और वायरल वीडियो की परिस्थितियों को किस तरह देखा जाता है, यह आने वाले दिनों में साफ हो सकेगा।
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रीवा में वकील से पुलिस की मारपीट का VIDEO वायरल, सड़क पर घसीटकर थाने ले जाने के आरोप
रीवा,(म.प्र.)
रीवा में पुलिस और एक अधिवक्ता के बीच हुए विवाद का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। दो दिन पहले हुई घटना का वीडियो सामने आने के बाद पूरे मामले को लेकर सवाल उठने लगे हैं। वीडियो में कुछ पुलिसकर्मी अधिवक्ता नीरज वर्मा को कॉलर पकड़कर सड़क पर घसीटते और धक्का-मुक्की करते दिखाई दे रहे हैं। इस दौरान आसपास लोगों की भीड़ भी मौजूद थी। वीडियो वायरल होने के बाद अधिवक्ता संगठनों और स्थानीय लोगों के बीच चर्चा तेज हो गई है।
घटना समान थाना क्षेत्र की बताई जा रही है, जहां प्रशासनिक टीम एक आदिवासी परिवार की जमीन पर कार्रवाई करने पहुंची थी। बताया जा रहा है कि प्रशासन संबंधित जमीन पर बने मकान को हटाने की कार्रवाई कर रहा था। इसी दौरान अधिवक्ता नीरज वर्मा मौके पर पहुंचे और उन्होंने कार्रवाई का विरोध करते हुए जमीन से जुड़े दस्तावेज अधिकारियों को दिखाने की कोशिश की। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मौके पर काफी देर तक बहस होती रही और फिर हालात अचानक बिगड़ गए।
वायरल वीडियो में दिखाई दे रहा है कि अधिवक्ता कुछ दस्तावेज हाथ में लेकर पुलिसकर्मियों से बात कर रहे हैं। इसी बीच पुलिसकर्मी उन्हें पकड़कर आगे बढ़ाते हैं। कुछ पुलिसकर्मी उनकी कॉलर पकड़कर सड़क पर ले जाते दिखाई देते हैं। वीडियो में धक्का-मुक्की की स्थिति भी नजर आ रही है। घटना के दौरान अधिवक्ता के कपड़े फटने की बात भी सामने आई है। अधिवक्ता का आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उनकी वकालती यूनिफॉर्म और काला कोट तक फाड़ दिया।
अधिवक्ता नीरज वर्मा का कहना है कि जिस जमीन पर कार्रवाई की जा रही थी, वह आदिवासी पट्टे की भूमि है। उनके अनुसार श्यामलाल कोल, बृजलाल कोल, बबलू कोल और अर्जुन कोल के नाम पर यह जमीन कई दशक पहले से दर्ज है। उन्होंने दावा किया कि संबंधित मामले में अपील लंबित थी और न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुए बिना मकान गिराने की कार्रवाई की जा रही थी। इसी वजह से वह दस्तावेज लेकर मौके पर पहुंचे थे ताकि प्रशासन को स्थिति से अवगत कराया जा सके।
नीरज वर्मा ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने कार्रवाई पर सवाल उठाए तो पुलिसकर्मियों ने गाली-गलौज शुरू कर दी। उन्होंने कहा कि उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया मानो वह कोई गंभीर अपराधी हों। अधिवक्ता का कहना है कि उन्हें जबरन पकड़कर थाने ले जाया गया और कई घंटों तक वहीं बैठाए रखा गया। उनका आरोप है कि उस समय उन्हें अपनी जान का भी खतरा महसूस हो रहा था। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
दूसरी ओर पुलिस ने इन आरोपों को खारिज किया है। समान थाना प्रभारी विजय सिंह का कहना है कि प्रशासनिक टीम विधिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर रही थी। उनके अनुसार अधिवक्ता लगातार शासकीय कार्य में बाधा उत्पन्न कर रहे थे और अधिकारियों के काम में हस्तक्षेप कर रहे थे। पुलिस का कहना है कि उन्हें कई बार समझाने का प्रयास किया गया, लेकिन जब स्थिति सामान्य नहीं हुई तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्हें मौके से हटाकर थाने ले जाया गया।
मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू तब सामने आया जब कार्रवाई के आधार को लेकर सवाल उठे। बताया गया कि जब अधिकारियों से मकान हटाने के लिए कथित कोर्ट आदेश की प्रति मांगी गई तो मौके पर उसे प्रस्तुत नहीं किया जा सका। इससे कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। प्रशासन का कहना है कि संबंधित रिकॉर्ड की जांच की जा रही है और पूरे घटनाक्रम की समीक्षा होगी।
एसडीएम अनुराग तिवारी ने कहा है कि मामले की नए सिरे से जांच कराई जाएगी। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि उपलब्ध दस्तावेजों और प्रशासनिक प्रक्रिया की समीक्षा की जाएगी। अधिकारियों के अनुसार यदि कहीं प्रक्रिया संबंधी त्रुटि पाई जाती है तो आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। वहीं स्थानीय स्तर पर भी लोग पूरे घटनाक्रम को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
वीडियो सामने आने के बाद यह मामला केवल पुलिस और अधिवक्ता के बीच विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। अब इसमें प्रशासनिक कार्रवाई, आदिवासी परिवार की जमीन, बेदखली प्रक्रिया और सरकारी अधिकारों के इस्तेमाल जैसे कई मुद्दे जुड़ गए हैं। दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर कायम हैं। एक ओर अधिवक्ता खुद के साथ अन्याय होने की बात कह रहे हैं तो दूसरी ओर पुलिस अपनी कार्रवाई को नियमों के अनुरूप बता रही है। अब सबकी नजर प्रशासन की प्रस्तावित जांच पर टिकी हुई है। जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और वायरल वीडियो की परिस्थितियों को किस तरह देखा जाता है, यह आने वाले दिनों में साफ हो सकेगा।
