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ट्विशा शर्मा केस में सास गिरिबाला सिंह को झटका, हाईकोर्ट ने रद्द की अग्रिम जमानत
भोपाल,(म.प्र.)
जबलपुर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही परीक्षण नहीं किया
ट्विशा शर्मा मौत मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए मृतका की सास और पूर्व न्यायाधीश गिरिबाला सिंह को दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी है। जबलपुर हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए कहा कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और केस डायरी का पर्याप्त परीक्षण किए बिना जल्दबाजी में राहत दे दी थी। कोर्ट ने साफ कहा कि मामले की गंभीरता, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, गवाहों के बयान और जांच की स्थिति को देखते हुए आरोपी पक्ष को अग्रिम जमानत देना उचित नहीं था।
हाईकोर्ट के जस्टिस देव नारायण मिश्रा की एकलपीठ ने यह आदेश सुनाया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अग्रिम जमानत रद्द करने के लिए ठोस और गंभीर कारण होना जरूरी होता है और इस मामले में ऐसे कारण स्पष्ट रूप से मौजूद हैं। कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद कई महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया, जिसके चलते जमानत आदेश कानूनी रूप से कमजोर हो गया।
मामला भोपाल निवासी ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत से जुड़ा है। परिवार की ओर से आरोप लगाए गए थे कि शादी के बाद से ही ट्विशा को दहेज और अन्य मुद्दों को लेकर प्रताड़ित किया जा रहा था। परिवार का दावा है कि पति और सास की ओर से लगातार मानसिक दबाव बनाया जाता था। मामले में यह आरोप भी सामने आया कि ट्विशा पर गर्भपात कराने का दबाव डाला जा रहा था। इन आरोपों के समर्थन में व्हाट्सऐप चैट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जांच एजेंसियों को सौंपे गए हैं।
हाईकोर्ट ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि मृतका के शरीर पर फांसी के अलावा अन्य चोटों के निशान भी पाए गए थे। अदालत ने माना कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार ये चोटें केवल शव को नीचे उतारने के दौरान नहीं आई थीं। कोर्ट ने इसे मामले का महत्वपूर्ण पहलू बताते हुए कहा कि पूरी घटना की गहन और निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी पक्ष इन चोटों के संबंध में संतोषजनक जवाब देने में असफल रहा।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि आरोपी पक्ष ने जांच में पूरा सहयोग नहीं किया। कोर्ट के अनुसार मामले से जुड़े कुछ व्यवहार ऐसे थे, जिनसे जांच प्रभावित होने की आशंका पैदा होती है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मीडिया में बयान देकर मृतका की छवि खराब करने की कोशिश की गई, जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि इस तरह की गतिविधियां जांच को प्रभावित कर सकती हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अब मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI को सौंप दी गई है। ऐसे में जांच एजेंसी को पक्षकार बनाए जाने की आवश्यकता है ताकि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जा सके। अदालत ने माना कि मामले की संवेदनशीलता और आरोपियों की प्रभावशाली पृष्ठभूमि को देखते हुए जांच एजेंसी को स्वतंत्र तरीके से काम करने देना जरूरी है।
कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश पर भी सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने यह मान लिया था कि केवल विवाह के सात साल के भीतर हुई मौत के आधार पर अग्रिम जमानत खारिज नहीं की जा सकती। निचली अदालत ने यह भी माना था कि आरोपी पक्ष ट्विशा के खाते में पैसे भेजता था और व्हाट्सऐप चैट्स में मुख्य शिकायत पति के खिलाफ दिखाई देती है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर जमानत दी गई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों की गहराई से जांच करने पर तस्वीर अलग दिखाई देती है।
मामले में CBI और राज्य सरकार की ओर से भी अदालत में कई महत्वपूर्ण दलीलें पेश की गईं। जांच एजेंसियों ने कहा कि ट्विशा गर्भवती थी और इसी दौरान पति तथा सास ने उसके चरित्र पर संदेह जताना शुरू किया। आरोप है कि उस पर गर्भपात कराने का दबाव बनाया गया, जिसका जिक्र व्हाट्सऐप चैट्स में भी मिलता है। जांच एजेंसियों ने यह भी कहा कि ट्विशा लगातार अपने परिवार को मानसिक प्रताड़ना की जानकारी देती रही थी।
सरकार की ओर से अदालत में यह तर्क भी रखा गया कि आरोपी प्रभावशाली हैं और उन्हें राहत मिलने पर जांच प्रभावित हो सकती है। ऐसे मामलों में हिरासत में पूछताछ जरूरी होती है ताकि पूरे घटनाक्रम की सच्चाई सामने आ सके। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि मामले की जांच अभी प्रारंभिक और महत्वपूर्ण चरण में है, इसलिए आरोपियों को अग्रिम राहत देना उचित नहीं माना जा सकता।
अपने अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने 15 मई 2026 को भोपाल की 10वीं अतिरिक्त सत्र अदालत द्वारा दिया गया अग्रिम जमानत आदेश निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य, मामले की गंभीरता और जांच की वर्तमान स्थिति को देखते हुए आरोपी पक्ष को राहत देना न्यायसंगत नहीं था। इस फैसले के बाद अब मामले की जांच और तेज होने की संभावना है।
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ट्विशा शर्मा केस में सास गिरिबाला सिंह को झटका, हाईकोर्ट ने रद्द की अग्रिम जमानत
भोपाल,(म.प्र.)
ट्विशा शर्मा मौत मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए मृतका की सास और पूर्व न्यायाधीश गिरिबाला सिंह को दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी है। जबलपुर हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए कहा कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और केस डायरी का पर्याप्त परीक्षण किए बिना जल्दबाजी में राहत दे दी थी। कोर्ट ने साफ कहा कि मामले की गंभीरता, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, गवाहों के बयान और जांच की स्थिति को देखते हुए आरोपी पक्ष को अग्रिम जमानत देना उचित नहीं था।
हाईकोर्ट के जस्टिस देव नारायण मिश्रा की एकलपीठ ने यह आदेश सुनाया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अग्रिम जमानत रद्द करने के लिए ठोस और गंभीर कारण होना जरूरी होता है और इस मामले में ऐसे कारण स्पष्ट रूप से मौजूद हैं। कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद कई महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया, जिसके चलते जमानत आदेश कानूनी रूप से कमजोर हो गया।
मामला भोपाल निवासी ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत से जुड़ा है। परिवार की ओर से आरोप लगाए गए थे कि शादी के बाद से ही ट्विशा को दहेज और अन्य मुद्दों को लेकर प्रताड़ित किया जा रहा था। परिवार का दावा है कि पति और सास की ओर से लगातार मानसिक दबाव बनाया जाता था। मामले में यह आरोप भी सामने आया कि ट्विशा पर गर्भपात कराने का दबाव डाला जा रहा था। इन आरोपों के समर्थन में व्हाट्सऐप चैट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जांच एजेंसियों को सौंपे गए हैं।
हाईकोर्ट ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि मृतका के शरीर पर फांसी के अलावा अन्य चोटों के निशान भी पाए गए थे। अदालत ने माना कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार ये चोटें केवल शव को नीचे उतारने के दौरान नहीं आई थीं। कोर्ट ने इसे मामले का महत्वपूर्ण पहलू बताते हुए कहा कि पूरी घटना की गहन और निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी पक्ष इन चोटों के संबंध में संतोषजनक जवाब देने में असफल रहा।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि आरोपी पक्ष ने जांच में पूरा सहयोग नहीं किया। कोर्ट के अनुसार मामले से जुड़े कुछ व्यवहार ऐसे थे, जिनसे जांच प्रभावित होने की आशंका पैदा होती है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मीडिया में बयान देकर मृतका की छवि खराब करने की कोशिश की गई, जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि इस तरह की गतिविधियां जांच को प्रभावित कर सकती हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अब मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI को सौंप दी गई है। ऐसे में जांच एजेंसी को पक्षकार बनाए जाने की आवश्यकता है ताकि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जा सके। अदालत ने माना कि मामले की संवेदनशीलता और आरोपियों की प्रभावशाली पृष्ठभूमि को देखते हुए जांच एजेंसी को स्वतंत्र तरीके से काम करने देना जरूरी है।
कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश पर भी सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने यह मान लिया था कि केवल विवाह के सात साल के भीतर हुई मौत के आधार पर अग्रिम जमानत खारिज नहीं की जा सकती। निचली अदालत ने यह भी माना था कि आरोपी पक्ष ट्विशा के खाते में पैसे भेजता था और व्हाट्सऐप चैट्स में मुख्य शिकायत पति के खिलाफ दिखाई देती है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर जमानत दी गई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों की गहराई से जांच करने पर तस्वीर अलग दिखाई देती है।
मामले में CBI और राज्य सरकार की ओर से भी अदालत में कई महत्वपूर्ण दलीलें पेश की गईं। जांच एजेंसियों ने कहा कि ट्विशा गर्भवती थी और इसी दौरान पति तथा सास ने उसके चरित्र पर संदेह जताना शुरू किया। आरोप है कि उस पर गर्भपात कराने का दबाव बनाया गया, जिसका जिक्र व्हाट्सऐप चैट्स में भी मिलता है। जांच एजेंसियों ने यह भी कहा कि ट्विशा लगातार अपने परिवार को मानसिक प्रताड़ना की जानकारी देती रही थी।
सरकार की ओर से अदालत में यह तर्क भी रखा गया कि आरोपी प्रभावशाली हैं और उन्हें राहत मिलने पर जांच प्रभावित हो सकती है। ऐसे मामलों में हिरासत में पूछताछ जरूरी होती है ताकि पूरे घटनाक्रम की सच्चाई सामने आ सके। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि मामले की जांच अभी प्रारंभिक और महत्वपूर्ण चरण में है, इसलिए आरोपियों को अग्रिम राहत देना उचित नहीं माना जा सकता।
अपने अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने 15 मई 2026 को भोपाल की 10वीं अतिरिक्त सत्र अदालत द्वारा दिया गया अग्रिम जमानत आदेश निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य, मामले की गंभीरता और जांच की वर्तमान स्थिति को देखते हुए आरोपी पक्ष को राहत देना न्यायसंगत नहीं था। इस फैसले के बाद अब मामले की जांच और तेज होने की संभावना है।
