ऑफिस में हमेशा ‘हाँ’ कहना क्यों पड़ सकता है भारी? जानिए इसके मानसिक, प्रोफेशनल और पर्सनल नुकसान

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वर्कप्लेस साइकोलॉजी स्टडीज के अनुसार, जरूरत से ज्यादा सहमति दिखाने वाले कर्मचारियों में बर्नआउट, करियर ठहराव और मानसिक तनाव का खतरा तेजी से बढ़ रहा है

ऑफिस में मेहनती, सहयोगी और भरोसेमंद दिखना हर प्रोफेशनल की चाहत होती है। इसी चाह में कई लोग हर काम के लिए बिना सोचे-समझे “हाँ” कह देते हैं। बॉस का अतिरिक्त टास्क हो, सहकर्मी की जिम्मेदारी हो या वीकेंड पर भी काम करने की मांग—हर बार हामी भर देना शुरू में तो तारीफ दिला सकता है, लेकिन लंबे समय में यही आदत करियर और मानसिक सेहत दोनों के लिए नुकसानदेह साबित होती है।

काम का बोझ बढ़ता है, पहचान नहीं

वर्कप्लेस साइकोलॉजी के अनुसार, जो लोग हर काम के लिए तुरंत “हाँ” कहते हैं, उन पर धीरे-धीरे ज्यादा जिम्मेदारियां डाल दी जाती हैं। समस्या यह है कि अतिरिक्त काम अक्सर उनकी मूल भूमिका से जुड़ा नहीं होता। नतीजा यह कि मेहनत तो बढ़ती है, लेकिन प्रमोशन या पहचान उसी अनुपात में नहीं मिलती। मैनेजमेंट इसे आपकी ‘उपलब्धता’ समझता है, न कि आपकी क्षमता।

बर्नआउट का खतरा

लगातार ओवरवर्क करने से मानसिक और शारीरिक थकान बढ़ती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि हर समय दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश करने वाले कर्मचारी बर्नआउट का जल्दी शिकार होते हैं। इसका असर नींद, एकाग्रता और मूड पर पड़ता है। कई बार लोग समझ ही नहीं पाते कि तनाव की जड़ उनकी “ना न कह पाने” की आदत है।

प्रोफेशनल सीमाएं धुंधली हो जाती हैं

ऑफिस में सीमाएं तय करना उतना ही जरूरी है जितना काम करना। जब आप हर बार हाँ कहते हैं, तो लोग यह मान लेते हैं कि आपका समय हमेशा उपलब्ध है। धीरे-धीरे वर्क-लाइफ बैलेंस बिगड़ने लगता है। ऑफिस का काम घर तक आने लगता है और निजी जिंदगी पीछे छूट जाती है।

आत्मसम्मान और आत्मविश्वास पर असर

मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, लगातार दूसरों को खुश रखने की कोशिश आत्मसम्मान को कमजोर करती है। व्यक्ति अपनी जरूरतों और प्राथमिकताओं को नजरअंदाज करने लगता है। समय के साथ यह आदत आत्मविश्वास को भी प्रभावित करती है, क्योंकि आप अपने फैसलों पर नहीं, दूसरों की मांगों पर जीने लगते हैं।

टीम में गलत छवि बनती है

अक्सर यह माना जाता है कि हर काम के लिए तैयार रहने वाला कर्मचारी “टीम प्लेयर” होता है, लेकिन हकीकत इससे अलग है। कई बार सहकर्मी ऐसे व्यक्ति को गंभीरता से नहीं लेते और मुश्किल काम उसी पर डालते रहते हैं। इससे प्रोफेशनल इमेज एक जिम्मेदार लीडर की बजाय ‘हमेशा उपलब्ध सहायक’ की बन जाती है।

‘ना’ कहना भी एक स्किल है

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि प्रोफेशनल ग्रोथ के लिए सही समय पर “ना” कहना सीखना जरूरी है। इसका मतलब काम से बचना नहीं, बल्कि अपनी क्षमता और प्राथमिकताओं को समझते हुए निर्णय लेना है। शालीन और स्पष्ट तरीके से मना करना आपकी प्रोफेशनल मैच्योरिटी दिखाता है।

संतुलन ही सफलता की कुंजी

ऑफिस में हर बार “हाँ” कहना आपको थोड़े समय के लिए पसंदीदा बना सकता है, लेकिन लंबे समय में यह आदत थकान, असंतोष और ठहराव का कारण बनती है। सही संतुलन वही है जहां आप जिम्मेदार भी हों और अपनी सीमाओं को लेकर स्पष्ट भी। आखिरकार, एक सफल करियर सिर्फ ज्यादा काम करने से नहीं, बल्कि समझदारी से काम चुनने से बनता है।

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www.dainikjagranmpcg.com
29 Jan 2026 By Nitin Trivedi

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लाइफस्टाइल न्यूज

ऑफिस में मेहनती, सहयोगी और भरोसेमंद दिखना हर प्रोफेशनल की चाहत होती है। इसी चाह में कई लोग हर काम के लिए बिना सोचे-समझे “हाँ” कह देते हैं। बॉस का अतिरिक्त टास्क हो, सहकर्मी की जिम्मेदारी हो या वीकेंड पर भी काम करने की मांग—हर बार हामी भर देना शुरू में तो तारीफ दिला सकता है, लेकिन लंबे समय में यही आदत करियर और मानसिक सेहत दोनों के लिए नुकसानदेह साबित होती है।

काम का बोझ बढ़ता है, पहचान नहीं

वर्कप्लेस साइकोलॉजी के अनुसार, जो लोग हर काम के लिए तुरंत “हाँ” कहते हैं, उन पर धीरे-धीरे ज्यादा जिम्मेदारियां डाल दी जाती हैं। समस्या यह है कि अतिरिक्त काम अक्सर उनकी मूल भूमिका से जुड़ा नहीं होता। नतीजा यह कि मेहनत तो बढ़ती है, लेकिन प्रमोशन या पहचान उसी अनुपात में नहीं मिलती। मैनेजमेंट इसे आपकी ‘उपलब्धता’ समझता है, न कि आपकी क्षमता।

बर्नआउट का खतरा

लगातार ओवरवर्क करने से मानसिक और शारीरिक थकान बढ़ती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि हर समय दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश करने वाले कर्मचारी बर्नआउट का जल्दी शिकार होते हैं। इसका असर नींद, एकाग्रता और मूड पर पड़ता है। कई बार लोग समझ ही नहीं पाते कि तनाव की जड़ उनकी “ना न कह पाने” की आदत है।

प्रोफेशनल सीमाएं धुंधली हो जाती हैं

ऑफिस में सीमाएं तय करना उतना ही जरूरी है जितना काम करना। जब आप हर बार हाँ कहते हैं, तो लोग यह मान लेते हैं कि आपका समय हमेशा उपलब्ध है। धीरे-धीरे वर्क-लाइफ बैलेंस बिगड़ने लगता है। ऑफिस का काम घर तक आने लगता है और निजी जिंदगी पीछे छूट जाती है।

आत्मसम्मान और आत्मविश्वास पर असर

मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, लगातार दूसरों को खुश रखने की कोशिश आत्मसम्मान को कमजोर करती है। व्यक्ति अपनी जरूरतों और प्राथमिकताओं को नजरअंदाज करने लगता है। समय के साथ यह आदत आत्मविश्वास को भी प्रभावित करती है, क्योंकि आप अपने फैसलों पर नहीं, दूसरों की मांगों पर जीने लगते हैं।

टीम में गलत छवि बनती है

अक्सर यह माना जाता है कि हर काम के लिए तैयार रहने वाला कर्मचारी “टीम प्लेयर” होता है, लेकिन हकीकत इससे अलग है। कई बार सहकर्मी ऐसे व्यक्ति को गंभीरता से नहीं लेते और मुश्किल काम उसी पर डालते रहते हैं। इससे प्रोफेशनल इमेज एक जिम्मेदार लीडर की बजाय ‘हमेशा उपलब्ध सहायक’ की बन जाती है।

‘ना’ कहना भी एक स्किल है

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि प्रोफेशनल ग्रोथ के लिए सही समय पर “ना” कहना सीखना जरूरी है। इसका मतलब काम से बचना नहीं, बल्कि अपनी क्षमता और प्राथमिकताओं को समझते हुए निर्णय लेना है। शालीन और स्पष्ट तरीके से मना करना आपकी प्रोफेशनल मैच्योरिटी दिखाता है।

संतुलन ही सफलता की कुंजी

ऑफिस में हर बार “हाँ” कहना आपको थोड़े समय के लिए पसंदीदा बना सकता है, लेकिन लंबे समय में यह आदत थकान, असंतोष और ठहराव का कारण बनती है। सही संतुलन वही है जहां आप जिम्मेदार भी हों और अपनी सीमाओं को लेकर स्पष्ट भी। आखिरकार, एक सफल करियर सिर्फ ज्यादा काम करने से नहीं, बल्कि समझदारी से काम चुनने से बनता है।

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