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गंगा जल संधि पर बांग्लादेश का दबाव, नए समझौते में मांगी गारंटी
Sandeep Patel
भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि दिसंबर में खत्म होगी। बांग्लादेश नए समझौते में सूखे मौसम के न्यूनतम जल प्रवाह की गारंटी चाहता है।
भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि दिसंबर में समाप्त होने वाली है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच गंगा के सूखे मौसम के जल बंटवारे का पुराना मुद्दा फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।
बांग्लादेश नए समझौते में ऐसी “गारंटी क्लॉज” चाहता है, जिससे नदी का जलस्तर कम होने पर भी उसके हिस्से में न्यूनतम मात्रा में गंगा का पानी पहुंचना सुनिश्चित हो सके।
बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी एनी ने मंगलवार को ढाका में आयोजित एक सेमिनार में यह मांग उठाई। कार्यक्रम का विषय गंगा जल संधि के पुनर्नवीनीकरण से जुड़े मुद्दे था।
न्यूनतम जल प्रवाह की मांग
ढाका चाहता है कि नए समझौते में सूखे मौसम के दौरान पानी की उपलब्धता को लेकर स्पष्ट और भरोसेमंद व्यवस्था हो।
एनी ने 1977 के गंगा जल समझौते में मौजूद एक गारंटी व्यवस्था को नए समझौते में शामिल करने की मांग की। 1996 की मौजूदा संधि में ऐसी व्यवस्था शामिल नहीं है।
बांग्लादेश जल बंटवारे से जुड़ी सूचनाओं तक पहुंच के लिए राइट-टू-इन्फॉर्मेशन व्यवस्था की मांग भी कर रहा है।
ढाका का तर्क है कि नदी के जलस्तर और प्रवाह की मौजूदा परिस्थितियां दशकों पहले की तुलना में बदल गई हैं।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
बांग्लादेश लंबे समय से कहता रहा है कि गंगा के सूखे मौसम के प्रवाह में कमी और अनिश्चितता उसके लिए गंभीर चिंता का विषय है।
कम बारिश और बदलते मौसम के कारण शुष्क महीनों में नदी का प्रवाह और अधिक अनिश्चित हो सकता है। जलवायु परिवर्तन ने इस चुनौती को और जटिल बनाया है।
बांग्लादेश के लिए सवाल केवल पानी की मात्रा का नहीं, बल्कि पूरे सूखे मौसम में उसकी नियमित उपलब्धता का भी है। कृषि, नदी परिवहन और स्थानीय जल संसाधनों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
फरक्का फिर केंद्र में
पश्चिम बंगाल स्थित फरक्का बैराज भारत-बांग्लादेश जल विवाद का सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक रहा है।
भारत फरक्का से गंगा के पानी का एक हिस्सा हुगली नदी प्रणाली की ओर मोड़ता है। बांग्लादेश का लंबे समय से आरोप है कि सूखे मौसम में इससे सीमा के नीचे नदी में उपलब्ध पानी प्रभावित होता है।
ढाका में आयोजित सेमिनार में एनी ने फरक्का और नदी तंत्र से जुड़े अन्य ढांचों को लेकर भी गंभीर आपत्तियां जताईं।
फरक्का को लेकर दोनों देशों की अलग-अलग व्याख्याएं भविष्य की वार्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
भारत का पक्ष अलग
भारत ने फरक्का को बांध बताए जाने की धारणा को खारिज किया है। नई दिल्ली के अनुसार, यह एक डायवर्जन बैराज है, जिसका उद्देश्य गंगा के पानी का एक हिस्सा फरक्का नहर की ओर भेजना है।
भारत का कहना है कि करीब 40,000 क्यूसेक पानी फरक्का नहर में भेजा जाता है और शेष प्रवाह बांग्लादेश की ओर आगे बढ़ता है।
नई दिल्ली यह भी कहती रही है कि जल प्रवाह से संबंधित आंकड़े संयुक्त नदी आयोग (Joint Rivers Commission) के माध्यम से बांग्लादेश के साथ साझा किए जाते हैं।
इसलिए नए समझौते पर बातचीत में जल प्रवाह, आंकड़ों की पारदर्शिता और फरक्का की भूमिका प्रमुख मुद्दे बने रहेंगे।
औपचारिक वार्ता अभी बाकी
मौजूदा जानकारी के अनुसार, संधि की समाप्ति की तारीख नजदीक होने के बावजूद भारत और बांग्लादेश के बीच इसके नवीनीकरण को लेकर औपचारिक वार्ता अभी शुरू नहीं हुई है।
बांग्लादेश इस मुद्दे को उच्च राजनीतिक स्तर पर उठाने की तैयारी कर रहा है। जल संसाधन मंत्री ने उम्मीद जताई है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान अगले महीने संयुक्त राष्ट्र में इस विषय को उठा सकते हैं।
हालांकि, किसी नए समझौते के लिए दोनों देशों को जल उपलब्धता, घरेलू जरूरतों और भविष्य के नदी प्रवाह से जुड़े अपने हितों में संतुलन बनाना होगा।
नई संधि की राह कठिन
गंगा जल बंटवारा भारत-बांग्लादेश संबंधों में लंबे समय से संवेदनशील विषय रहा है। दिसंबर की समयसीमा दोनों देशों पर मौजूदा व्यवस्था के भविष्य को लेकर स्पष्टता बनाने का दबाव बढ़ा रही है।
बांग्लादेश की न्यूनतम जल प्रवाह की कानूनी गारंटी की मांग संभावित बातचीत के सबसे कठिन मुद्दों में शामिल हो सकती है। भारत को भी अपने क्षेत्र की जल जरूरतों और downstream commitments के बीच संतुलन बनाना होगा।
आने वाले महीनों में होने वाली कूटनीतिक बातचीत इसलिए अहम होगी। भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों देश सूखे मौसम के जल प्रवाह, फरक्का और बदलती जलवायु परिस्थितियों पर किस तरह सहमति बनाते हैं।
गंगा जल संधि पर बांग्लादेश का दबाव, नए समझौते में मांगी गारंटी
Sandeep Patel
भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि दिसंबर में समाप्त होने वाली है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच गंगा के सूखे मौसम के जल बंटवारे का पुराना मुद्दा फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।
बांग्लादेश नए समझौते में ऐसी “गारंटी क्लॉज” चाहता है, जिससे नदी का जलस्तर कम होने पर भी उसके हिस्से में न्यूनतम मात्रा में गंगा का पानी पहुंचना सुनिश्चित हो सके।
बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी एनी ने मंगलवार को ढाका में आयोजित एक सेमिनार में यह मांग उठाई। कार्यक्रम का विषय गंगा जल संधि के पुनर्नवीनीकरण से जुड़े मुद्दे था।
न्यूनतम जल प्रवाह की मांग
ढाका चाहता है कि नए समझौते में सूखे मौसम के दौरान पानी की उपलब्धता को लेकर स्पष्ट और भरोसेमंद व्यवस्था हो।
एनी ने 1977 के गंगा जल समझौते में मौजूद एक गारंटी व्यवस्था को नए समझौते में शामिल करने की मांग की। 1996 की मौजूदा संधि में ऐसी व्यवस्था शामिल नहीं है।
बांग्लादेश जल बंटवारे से जुड़ी सूचनाओं तक पहुंच के लिए राइट-टू-इन्फॉर्मेशन व्यवस्था की मांग भी कर रहा है।
ढाका का तर्क है कि नदी के जलस्तर और प्रवाह की मौजूदा परिस्थितियां दशकों पहले की तुलना में बदल गई हैं।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
बांग्लादेश लंबे समय से कहता रहा है कि गंगा के सूखे मौसम के प्रवाह में कमी और अनिश्चितता उसके लिए गंभीर चिंता का विषय है।
कम बारिश और बदलते मौसम के कारण शुष्क महीनों में नदी का प्रवाह और अधिक अनिश्चित हो सकता है। जलवायु परिवर्तन ने इस चुनौती को और जटिल बनाया है।
बांग्लादेश के लिए सवाल केवल पानी की मात्रा का नहीं, बल्कि पूरे सूखे मौसम में उसकी नियमित उपलब्धता का भी है। कृषि, नदी परिवहन और स्थानीय जल संसाधनों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
फरक्का फिर केंद्र में
पश्चिम बंगाल स्थित फरक्का बैराज भारत-बांग्लादेश जल विवाद का सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक रहा है।
भारत फरक्का से गंगा के पानी का एक हिस्सा हुगली नदी प्रणाली की ओर मोड़ता है। बांग्लादेश का लंबे समय से आरोप है कि सूखे मौसम में इससे सीमा के नीचे नदी में उपलब्ध पानी प्रभावित होता है।
ढाका में आयोजित सेमिनार में एनी ने फरक्का और नदी तंत्र से जुड़े अन्य ढांचों को लेकर भी गंभीर आपत्तियां जताईं।
फरक्का को लेकर दोनों देशों की अलग-अलग व्याख्याएं भविष्य की वार्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
भारत का पक्ष अलग
भारत ने फरक्का को बांध बताए जाने की धारणा को खारिज किया है। नई दिल्ली के अनुसार, यह एक डायवर्जन बैराज है, जिसका उद्देश्य गंगा के पानी का एक हिस्सा फरक्का नहर की ओर भेजना है।
भारत का कहना है कि करीब 40,000 क्यूसेक पानी फरक्का नहर में भेजा जाता है और शेष प्रवाह बांग्लादेश की ओर आगे बढ़ता है।
नई दिल्ली यह भी कहती रही है कि जल प्रवाह से संबंधित आंकड़े संयुक्त नदी आयोग (Joint Rivers Commission) के माध्यम से बांग्लादेश के साथ साझा किए जाते हैं।
इसलिए नए समझौते पर बातचीत में जल प्रवाह, आंकड़ों की पारदर्शिता और फरक्का की भूमिका प्रमुख मुद्दे बने रहेंगे।
औपचारिक वार्ता अभी बाकी
मौजूदा जानकारी के अनुसार, संधि की समाप्ति की तारीख नजदीक होने के बावजूद भारत और बांग्लादेश के बीच इसके नवीनीकरण को लेकर औपचारिक वार्ता अभी शुरू नहीं हुई है।
बांग्लादेश इस मुद्दे को उच्च राजनीतिक स्तर पर उठाने की तैयारी कर रहा है। जल संसाधन मंत्री ने उम्मीद जताई है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान अगले महीने संयुक्त राष्ट्र में इस विषय को उठा सकते हैं।
हालांकि, किसी नए समझौते के लिए दोनों देशों को जल उपलब्धता, घरेलू जरूरतों और भविष्य के नदी प्रवाह से जुड़े अपने हितों में संतुलन बनाना होगा।
नई संधि की राह कठिन
गंगा जल बंटवारा भारत-बांग्लादेश संबंधों में लंबे समय से संवेदनशील विषय रहा है। दिसंबर की समयसीमा दोनों देशों पर मौजूदा व्यवस्था के भविष्य को लेकर स्पष्टता बनाने का दबाव बढ़ा रही है।
बांग्लादेश की न्यूनतम जल प्रवाह की कानूनी गारंटी की मांग संभावित बातचीत के सबसे कठिन मुद्दों में शामिल हो सकती है। भारत को भी अपने क्षेत्र की जल जरूरतों और downstream commitments के बीच संतुलन बनाना होगा।
आने वाले महीनों में होने वाली कूटनीतिक बातचीत इसलिए अहम होगी। भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों देश सूखे मौसम के जल प्रवाह, फरक्का और बदलती जलवायु परिस्थितियों पर किस तरह सहमति बनाते हैं।
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