युवाओं पर पुलिस कार्रवाई से नाराज सोनम वांगचुक, बोले- जारी रहेगा अनशन

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शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं के साथ व्यवहार पर एक्टिविस्ट ने जताई नाराजगी, सोशल मीडिया पर कहा- मौजूदा हालात को देखते हुए उपवास खत्म नहीं करने का लिया फैसला

एक्टिविस्ट और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक ने युवाओं के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई कार्रवाई को लेकर नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें उठा रहे युवाओं के साथ जिस तरह का व्यवहार किया जा रहा है, उसे देखते हुए उन्होंने अपना अनशन जारी रखने का फैसला किया है। उनके इस बयान के बाद आंदोलन और पुलिस कार्रवाई को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

वांगचुक ने अपनी पोस्ट में प्रदर्शनकारी युवाओं के साथ कथित सख्ती का मुद्दा उठाया। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठा रहे लोगों के साथ बल प्रयोग या कठोर व्यवहार उचित नहीं है। इसी घटनाक्रम को उन्होंने अपने उपवास को आगे जारी रखने के फैसले से जोड़ा है।

हालांकि उन्होंने कितने समय तक अनशन जारी रखने का फैसला किया है, यह उनके पूरे बयान और आंदोलन की आगे की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। उनकी प्रतिक्रिया से इतना स्पष्ट है कि फिलहाल वे अपना विरोध समाप्त करने के पक्ष में नहीं हैं और युवाओं से जुड़े मुद्दे को लेकर अपना आंदोलन जारी रखना चाहते हैं।

सोनम वांगचुक लंबे समय से पर्यावरण, शिक्षा और सामाजिक मुद्दों को लेकर सक्रिय रहे हैं। हाल के आंदोलन में भी उन्होंने शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से अपनी बात रखने पर जोर दिया है। अब युवाओं के प्रदर्शन से जुड़े घटनाक्रम के बाद उनका बयान सामने आने से आंदोलन को नया राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ मिल गया है।

युवाओं के प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर प्रदर्शनकारी पक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं। आंदोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराने के बावजूद उन्हें आगे बढ़ने से रोका गया और कई प्रदर्शनकारियों के साथ सख्ती की गई। इन आरोपों को लेकर अलग-अलग पक्षों की ओर से प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

वांगचुक ने इसी कथित कार्रवाई को अपने फैसले की बड़ी वजह बताया है। उन्होंने संकेत दिया कि जब तक प्रदर्शनकारियों के साथ इस तरह के व्यवहार की स्थिति बनी रहती है, तब तक उनका विरोध भी जारी रहेगा। उनका अनशन अब केवल पहले से उठाई जा रही मांगों तक सीमित न रहकर प्रदर्शन के अधिकार और आंदोलनकारियों के साथ व्यवहार के सवाल से भी जुड़ता दिखाई दे रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लेकर उठ रहा है। संविधान नागरिकों को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होकर विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है। हालांकि सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और निर्धारित प्रतिबंधों के आधार पर प्रशासन कुछ सीमाएं भी लागू कर सकता है।

ऐसे मामलों में अक्सर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच निर्धारित प्रदर्शन स्थल, मार्च के मार्ग और सुरक्षा प्रतिबंधों को लेकर विवाद की स्थिति बनती है। प्रशासन कानून-व्यवस्था का हवाला देता है, जबकि आंदोलनकारी अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल उठाते हैं। मौजूदा घटनाक्रम में भी यही बहस प्रमुखता से सामने आ रही है।

प्रदर्शनकारी युवाओं की ओर से उठाई जा रही मांगों ने भी आंदोलन को व्यापक चर्चा में ला दिया है। युवा शिक्षा, परीक्षाओं और उनसे जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर अपनी आवाज उठा रहे हैं। प्रदर्शन के दौरान उनकी कोशिश अपनी मांगों को सरकार और संबंधित संस्थाओं तक पहुंचाने की रही है।

सोनम वांगचुक की प्रतिक्रिया के बाद युवाओं के आंदोलन को लेकर सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो सकती है। वांगचुक की सार्वजनिक पहचान पर्यावरण और सामाजिक आंदोलनों से जुड़ी रही है। ऐसे में उनके समर्थन और अनशन जारी रखने के फैसले से प्रदर्शनकारियों की मांगों को अतिरिक्त सार्वजनिक ध्यान मिलने की संभावना है।

वांगचुक अपने आंदोलनों में अनशन को विरोध के अहिंसक माध्यम के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। उनका कहना रहा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में बातचीत और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के जरिए समस्याओं का समाधान तलाशा जाना चाहिए। इस बार भी उन्होंने युवाओं के साथ कथित व्यवहार के विरोध में उपवास जारी रखने की बात कही है।

अनशन लंबे समय तक चलने की स्थिति में प्रशासन और आंदोलनकारियों दोनों के लिए परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं। एक ओर आंदोलनकारी अपनी मांगों पर सरकार से प्रतिक्रिया चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर लंबे उपवास के दौरान स्वास्थ्य संबंधी पहलू भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं को लेकर अब यह भी देखा जा रहा है कि प्रशासन की ओर से क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आती है। प्रदर्शनकारियों के आरोप और पुलिस का पक्ष दोनों इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। किसी कार्रवाई की परिस्थितियां और उसके पीछे प्रशासनिक कारण आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद अधिक स्पष्ट हो सकते हैं।

युवाओं के साथ कथित सख्ती को लेकर वांगचुक के बयान ने पुलिस कार्रवाई के तरीके पर भी सवाल खड़े किए हैं। प्रदर्शनकारी पक्ष का कहना है कि अगर आंदोलन शांतिपूर्ण है तो पुलिस को बातचीत और संवाद के जरिए स्थिति संभालनी चाहिए। वहीं सुरक्षा एजेंसियां आमतौर पर प्रतिबंधित क्षेत्रों में भीड़ के प्रवेश और कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए कार्रवाई करती हैं।

राजधानी दिल्ली में बड़े प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा व्यवस्था पहले से संवेदनशील रहती है। संसद सत्र या अन्य महत्वपूर्ण सरकारी गतिविधियों के दौरान संसद भवन और आसपास के क्षेत्रों में अतिरिक्त प्रतिबंध लागू किए जाते हैं। ऐसे में प्रदर्शनकारियों के मार्च या निर्धारित क्षेत्र से आगे बढ़ने की कोशिश पर पुलिस उन्हें रोक सकती है।

इसी दौरान टकराव की स्थिति बनने पर पुलिस कार्रवाई अक्सर राजनीतिक विवाद का कारण बन जाती है। विपक्षी दल, सामाजिक संगठन और मानवाधिकार से जुड़े समूह कार्रवाई के अनुपात पर सवाल उठा सकते हैं, जबकि पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने को अपनी जिम्मेदारी बताती है।

सोनम वांगचुक के बयान का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्होंने अपना फैसला सीधे युवाओं के साथ हुए कथित व्यवहार से जोड़ा है। इससे संकेत मिलता है कि आंदोलन के दौरान प्रशासन की आगे की कार्रवाई उनके अनशन की अवधि और रणनीति पर भी असर डाल सकती है।

आंदोलन में शामिल युवाओं की मांगों पर सरकार या संबंधित विभाग की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। अगर दोनों पक्षों के बीच बातचीत शुरू होती है तो प्रदर्शन की दिशा बदल सकती है। वहीं गतिरोध जारी रहने पर धरना, प्रदर्शन और अनशन आगे बढ़ने की संभावना बनी रह सकती है।

वांगचुक की सोशल मीडिया पोस्ट के बाद उनके समर्थकों और आंदोलन से जुड़े लोगों की प्रतिक्रिया भी सामने आ सकती है। सोशल मीडिया ऐसे आंदोलनों में सूचनाएं साझा करने और समर्थन जुटाने का प्रमुख माध्यम बन चुका है। प्रदर्शन स्थल की गतिविधियों से लेकर पुलिस कार्रवाई तक के वीडियो और तस्वीरें तेजी से प्रसारित होते हैं।

हालांकि सोशल मीडिया पर सामने आने वाले वीडियो कई बार पूरे घटनाक्रम का सीमित हिस्सा दिखाते हैं। इसलिए किसी भी कार्रवाई को लेकर निष्कर्ष निकालने से पहले आधिकारिक जानकारी, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और घटनाक्रम का पूरा संदर्भ महत्वपूर्ण होता है।

युवाओं के आंदोलन में शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल भी प्रमुखता से उठाए जा रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, पेपर लीक जैसे मामलों में जवाबदेही और छात्रों के हितों की सुरक्षा लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय रही है। इन मुद्दों को लेकर अलग-अलग छात्र और युवा संगठन समय-समय पर प्रदर्शन करते रहे हैं।

ऐसे आंदोलनों में बड़ी संख्या में युवाओं की भागीदारी होने पर प्रशासन के सामने भीड़ प्रबंधन बड़ी चुनौती बन जाता है। पुलिस को एक तरफ प्रदर्शन के अधिकार को सुनिश्चित करना होता है, वहीं दूसरी तरफ यातायात, सुरक्षा और संवेदनशील सरकारी क्षेत्रों की व्यवस्था भी संभालनी पड़ती है।

सोनम वांगचुक ने अपने बयान के जरिए यह संकेत दिया है कि वे प्रदर्शनकारियों के साथ कथित सख्ती के मुद्दे को नजरअंदाज नहीं करेंगे। उनका अनशन जारी रखने का फैसला आंदोलन पर प्रशासन की प्रतिक्रिया और युवाओं की मांगों से जुड़े घटनाक्रम के बीच आया है।

आने वाले दिनों में वांगचुक के अनशन की स्थिति, प्रदर्शनकारी युवाओं की रणनीति और प्रशासन के रुख पर नजर रहेगी। यदि आंदोलनकारी अपनी मांगों के साथ प्रदर्शन जारी रखते हैं तो पुलिस व्यवस्था भी बनी रह सकती है। वहीं बातचीत की पहल होने पर दोनों पक्षों के बीच गतिरोध कम करने की कोशिश की जा सकती है।

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21 Jul 2026 By Priyanka

युवाओं पर पुलिस कार्रवाई से नाराज सोनम वांगचुक, बोले- जारी रहेगा अनशन

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एक्टिविस्ट और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक ने युवाओं के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई कार्रवाई को लेकर नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें उठा रहे युवाओं के साथ जिस तरह का व्यवहार किया जा रहा है, उसे देखते हुए उन्होंने अपना अनशन जारी रखने का फैसला किया है। उनके इस बयान के बाद आंदोलन और पुलिस कार्रवाई को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

वांगचुक ने अपनी पोस्ट में प्रदर्शनकारी युवाओं के साथ कथित सख्ती का मुद्दा उठाया। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठा रहे लोगों के साथ बल प्रयोग या कठोर व्यवहार उचित नहीं है। इसी घटनाक्रम को उन्होंने अपने उपवास को आगे जारी रखने के फैसले से जोड़ा है।

हालांकि उन्होंने कितने समय तक अनशन जारी रखने का फैसला किया है, यह उनके पूरे बयान और आंदोलन की आगे की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। उनकी प्रतिक्रिया से इतना स्पष्ट है कि फिलहाल वे अपना विरोध समाप्त करने के पक्ष में नहीं हैं और युवाओं से जुड़े मुद्दे को लेकर अपना आंदोलन जारी रखना चाहते हैं।

सोनम वांगचुक लंबे समय से पर्यावरण, शिक्षा और सामाजिक मुद्दों को लेकर सक्रिय रहे हैं। हाल के आंदोलन में भी उन्होंने शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से अपनी बात रखने पर जोर दिया है। अब युवाओं के प्रदर्शन से जुड़े घटनाक्रम के बाद उनका बयान सामने आने से आंदोलन को नया राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ मिल गया है।

युवाओं के प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर प्रदर्शनकारी पक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं। आंदोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराने के बावजूद उन्हें आगे बढ़ने से रोका गया और कई प्रदर्शनकारियों के साथ सख्ती की गई। इन आरोपों को लेकर अलग-अलग पक्षों की ओर से प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

वांगचुक ने इसी कथित कार्रवाई को अपने फैसले की बड़ी वजह बताया है। उन्होंने संकेत दिया कि जब तक प्रदर्शनकारियों के साथ इस तरह के व्यवहार की स्थिति बनी रहती है, तब तक उनका विरोध भी जारी रहेगा। उनका अनशन अब केवल पहले से उठाई जा रही मांगों तक सीमित न रहकर प्रदर्शन के अधिकार और आंदोलनकारियों के साथ व्यवहार के सवाल से भी जुड़ता दिखाई दे रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लेकर उठ रहा है। संविधान नागरिकों को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होकर विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है। हालांकि सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और निर्धारित प्रतिबंधों के आधार पर प्रशासन कुछ सीमाएं भी लागू कर सकता है।

ऐसे मामलों में अक्सर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच निर्धारित प्रदर्शन स्थल, मार्च के मार्ग और सुरक्षा प्रतिबंधों को लेकर विवाद की स्थिति बनती है। प्रशासन कानून-व्यवस्था का हवाला देता है, जबकि आंदोलनकारी अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल उठाते हैं। मौजूदा घटनाक्रम में भी यही बहस प्रमुखता से सामने आ रही है।

प्रदर्शनकारी युवाओं की ओर से उठाई जा रही मांगों ने भी आंदोलन को व्यापक चर्चा में ला दिया है। युवा शिक्षा, परीक्षाओं और उनसे जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर अपनी आवाज उठा रहे हैं। प्रदर्शन के दौरान उनकी कोशिश अपनी मांगों को सरकार और संबंधित संस्थाओं तक पहुंचाने की रही है।

सोनम वांगचुक की प्रतिक्रिया के बाद युवाओं के आंदोलन को लेकर सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो सकती है। वांगचुक की सार्वजनिक पहचान पर्यावरण और सामाजिक आंदोलनों से जुड़ी रही है। ऐसे में उनके समर्थन और अनशन जारी रखने के फैसले से प्रदर्शनकारियों की मांगों को अतिरिक्त सार्वजनिक ध्यान मिलने की संभावना है।

वांगचुक अपने आंदोलनों में अनशन को विरोध के अहिंसक माध्यम के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। उनका कहना रहा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में बातचीत और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के जरिए समस्याओं का समाधान तलाशा जाना चाहिए। इस बार भी उन्होंने युवाओं के साथ कथित व्यवहार के विरोध में उपवास जारी रखने की बात कही है।

अनशन लंबे समय तक चलने की स्थिति में प्रशासन और आंदोलनकारियों दोनों के लिए परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं। एक ओर आंदोलनकारी अपनी मांगों पर सरकार से प्रतिक्रिया चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर लंबे उपवास के दौरान स्वास्थ्य संबंधी पहलू भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं को लेकर अब यह भी देखा जा रहा है कि प्रशासन की ओर से क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आती है। प्रदर्शनकारियों के आरोप और पुलिस का पक्ष दोनों इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। किसी कार्रवाई की परिस्थितियां और उसके पीछे प्रशासनिक कारण आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद अधिक स्पष्ट हो सकते हैं।

युवाओं के साथ कथित सख्ती को लेकर वांगचुक के बयान ने पुलिस कार्रवाई के तरीके पर भी सवाल खड़े किए हैं। प्रदर्शनकारी पक्ष का कहना है कि अगर आंदोलन शांतिपूर्ण है तो पुलिस को बातचीत और संवाद के जरिए स्थिति संभालनी चाहिए। वहीं सुरक्षा एजेंसियां आमतौर पर प्रतिबंधित क्षेत्रों में भीड़ के प्रवेश और कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए कार्रवाई करती हैं।

राजधानी दिल्ली में बड़े प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा व्यवस्था पहले से संवेदनशील रहती है। संसद सत्र या अन्य महत्वपूर्ण सरकारी गतिविधियों के दौरान संसद भवन और आसपास के क्षेत्रों में अतिरिक्त प्रतिबंध लागू किए जाते हैं। ऐसे में प्रदर्शनकारियों के मार्च या निर्धारित क्षेत्र से आगे बढ़ने की कोशिश पर पुलिस उन्हें रोक सकती है।

इसी दौरान टकराव की स्थिति बनने पर पुलिस कार्रवाई अक्सर राजनीतिक विवाद का कारण बन जाती है। विपक्षी दल, सामाजिक संगठन और मानवाधिकार से जुड़े समूह कार्रवाई के अनुपात पर सवाल उठा सकते हैं, जबकि पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने को अपनी जिम्मेदारी बताती है।

सोनम वांगचुक के बयान का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्होंने अपना फैसला सीधे युवाओं के साथ हुए कथित व्यवहार से जोड़ा है। इससे संकेत मिलता है कि आंदोलन के दौरान प्रशासन की आगे की कार्रवाई उनके अनशन की अवधि और रणनीति पर भी असर डाल सकती है।

आंदोलन में शामिल युवाओं की मांगों पर सरकार या संबंधित विभाग की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। अगर दोनों पक्षों के बीच बातचीत शुरू होती है तो प्रदर्शन की दिशा बदल सकती है। वहीं गतिरोध जारी रहने पर धरना, प्रदर्शन और अनशन आगे बढ़ने की संभावना बनी रह सकती है।

वांगचुक की सोशल मीडिया पोस्ट के बाद उनके समर्थकों और आंदोलन से जुड़े लोगों की प्रतिक्रिया भी सामने आ सकती है। सोशल मीडिया ऐसे आंदोलनों में सूचनाएं साझा करने और समर्थन जुटाने का प्रमुख माध्यम बन चुका है। प्रदर्शन स्थल की गतिविधियों से लेकर पुलिस कार्रवाई तक के वीडियो और तस्वीरें तेजी से प्रसारित होते हैं।

हालांकि सोशल मीडिया पर सामने आने वाले वीडियो कई बार पूरे घटनाक्रम का सीमित हिस्सा दिखाते हैं। इसलिए किसी भी कार्रवाई को लेकर निष्कर्ष निकालने से पहले आधिकारिक जानकारी, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और घटनाक्रम का पूरा संदर्भ महत्वपूर्ण होता है।

युवाओं के आंदोलन में शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल भी प्रमुखता से उठाए जा रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, पेपर लीक जैसे मामलों में जवाबदेही और छात्रों के हितों की सुरक्षा लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय रही है। इन मुद्दों को लेकर अलग-अलग छात्र और युवा संगठन समय-समय पर प्रदर्शन करते रहे हैं।

ऐसे आंदोलनों में बड़ी संख्या में युवाओं की भागीदारी होने पर प्रशासन के सामने भीड़ प्रबंधन बड़ी चुनौती बन जाता है। पुलिस को एक तरफ प्रदर्शन के अधिकार को सुनिश्चित करना होता है, वहीं दूसरी तरफ यातायात, सुरक्षा और संवेदनशील सरकारी क्षेत्रों की व्यवस्था भी संभालनी पड़ती है।

सोनम वांगचुक ने अपने बयान के जरिए यह संकेत दिया है कि वे प्रदर्शनकारियों के साथ कथित सख्ती के मुद्दे को नजरअंदाज नहीं करेंगे। उनका अनशन जारी रखने का फैसला आंदोलन पर प्रशासन की प्रतिक्रिया और युवाओं की मांगों से जुड़े घटनाक्रम के बीच आया है।

आने वाले दिनों में वांगचुक के अनशन की स्थिति, प्रदर्शनकारी युवाओं की रणनीति और प्रशासन के रुख पर नजर रहेगी। यदि आंदोलनकारी अपनी मांगों के साथ प्रदर्शन जारी रखते हैं तो पुलिस व्यवस्था भी बनी रह सकती है। वहीं बातचीत की पहल होने पर दोनों पक्षों के बीच गतिरोध कम करने की कोशिश की जा सकती है।

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