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अमेरिका-ईरान के बढ़ते टकराव पर ASEAN ने जताई चिंता, हमले रोककर बातचीत की अपील
अंतराष्ट्रीय न्यूज
मार्को रुबियो की मौजूदगी में विदेश मंत्रियों ने पश्चिम एशिया के हालात पर की चर्चा; होर्मुज में सुरक्षित समुद्री आवाजाही बहाल करने पर जोर
अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा तेज हुई सैन्य कार्रवाई को लेकर दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन ASEAN ने गंभीर चिंता जताई है। संगठन के विदेश मंत्रियों ने कहा है कि पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते हमले शांति की कोशिशों को कमजोर कर रहे हैं और अगर हालात इसी तरह बिगड़ते रहे तो बातचीत के जरिए समाधान निकालना और मुश्किल हो सकता है। ASEAN विदेश मंत्रियों की बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मौजूदगी के बीच यह मुद्दा प्रमुखता से उठा। सदस्य देशों ने सभी संबंधित पक्षों से अधिकतम संयम बरतने, ऐसी सैन्य कार्रवाई से बचने और कूटनीतिक रास्ते पर लौटने की अपील की है जिससे संघर्ष और बड़े क्षेत्र में फैल सकता है। बैठक में होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति को लेकर भी चिंता सामने आई, क्योंकि यहां समुद्री यातायात प्रभावित होने से तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति पर सीधा असर पड़ने का खतरा है।
ASEAN की ओर से जारी संयुक्त बयान में पश्चिम एशिया के तेजी से बदलते सुरक्षा हालात का जिक्र किया गया। संगठन ने खास तौर पर अमेरिका और ईरान के बीच फिर बढ़ी सैन्य दुश्मनी को चिंता का विषय बताया। सदस्य देशों का मानना है कि लगातार जवाबी हमलों से पहले से चल रही मध्यस्थता की कोशिशें प्रभावित हो सकती हैं। ASEAN ने किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय दोनों ओर से संयम की जरूरत बताई है। बयान में कहा गया कि सभी संबंधित पक्षों को ऐसे कदम उठाने से बचना चाहिए जिनसे मौजूदा तनाव और ज्यादा बढ़े। संगठन ने बातचीत और कूटनीति को विवाद सुलझाने का मुख्य रास्ता बताते हुए क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखने की अपील की।
विदेश मंत्रियों ने पश्चिम एशिया में अलग-अलग मोर्चों पर चल रही सैन्य कार्रवाई को पूरी तरह और तत्काल रोकने की जरूरत भी बताई। ASEAN का रुख है कि हिंसा जितनी लंबी चलेगी, किसी राजनीतिक समझौते तक पहुंचना उतना ही कठिन होता जाएगा।यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच लगातार सैन्य हमलों की खबरें आ रही हैं। अमेरिकी सेना ईरान के भीतर सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर कार्रवाई कर रही है, जबकि तेहरान ने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी से जुड़े लक्ष्यों पर जवाबी हमले किए हैं।
हालिया लड़ाई में अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने और घायल होने की खबरों के बाद वॉशिंगटन की सैन्य कार्रवाई और तेज हुई है। अमेरिका ने ईरानी सैन्य क्षमताओं को निशाना बनाने की बात कही है। दूसरी ओर ईरान ने अपने हमलों को अमेरिकी कार्रवाई का जवाब बताया है। इस लगातार सैन्य टकराव ने पूरे खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। जॉर्डन और बहरीन समेत उन देशों में खतरा ज्यादा माना जा रहा है जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने या सैनिक मौजूद हैं।
ASEAN के लिए सबसे बड़ी चिंताओं में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति है। फारस की खाड़ी और अरब सागर को जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर समुद्र के जरिए भेजे जाने वाले तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है।
संघर्ष के कारण यहां व्यापारिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। सुरक्षा जोखिम बढ़ने के बाद कई शिपिंग कंपनियां हालात पर नजर बनाए हुए हैं। किसी भी जहाज पर हमला या लंबे समय तक यातायात बाधित होने की स्थिति में वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है।
ASEAN ने होर्मुज में सुरक्षित, निर्बाध और लगातार समुद्री यातायात बहाल करने की मांग की है। संगठन ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों से गुजरने वाले जहाजों को किसी एकतरफा या भेदभावपूर्ण प्रतिबंध का सामना नहीं करना चाहिए। विदेश मंत्रियों ने 1982 के संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून समझौते यानी UNCLOS का भी उल्लेख किया। संगठन के मुताबिक समुद्री सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप सुनिश्चित की जानी चाहिए।
जहाजों के साथ उन पर काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया। सैन्य संघर्ष के बीच वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाए जाने या उनके रास्ते में रुकावट आने से बड़ी संख्या में नागरिकों की जान खतरे में पड़ सकती है। होर्मुज की स्थिति ASEAN देशों के लिए आर्थिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। दक्षिण-पूर्व एशिया की कई अर्थव्यवस्थाएं पश्चिम एशिया से आने वाले तेल और गैस पर निर्भर हैं। इस रास्ते से आपूर्ति में लंबी रुकावट आने पर ईंधन महंगा हो सकता है।
तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। इससे परिवहन, विमानन, उद्योग और खाद्य पदार्थों की लागत भी बढ़ सकती है। ऐसे में पश्चिम एशिया का सैन्य संकट दक्षिण-पूर्व एशिया में महंगाई बढ़ाने का कारण बन सकता है। इसी वजह से ASEAN की प्रतिक्रिया केवल राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है। सदस्य देश इस संघर्ष को अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए भी जोखिम के रूप में देख रहे हैं।
बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मौजूदगी ने इस चर्चा को और महत्वपूर्ण बना दिया। अमेरिका इस संघर्ष का सीधा पक्ष है और ASEAN देशों ने ऐसे समय संयम की अपील की है जब वॉशिंगटन ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखे हुए है।
रुबियो की ASEAN बैठक में मौजूदगी अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के संबंधों के लिहाज से भी अहम है। इंडो-पैसिफिक में चीन के बढ़ते प्रभाव, दक्षिण चीन सागर विवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा के बीच अमेरिका ASEAN देशों के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत करने की कोशिश करता रहा है। अब अमेरिका-ईरान संघर्ष ने एजेंडे में पश्चिम एशिया की सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति का मुद्दा भी जोड़ दिया है।
ASEAN सदस्य देशों ने साफ संकेत दिया है कि पश्चिम एशिया में लंबे समय तक युद्ध चलना उनके हित में नहीं है। ऊर्जा आयात, समुद्री व्यापार और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ने वाला असर दक्षिण-पूर्व एशिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है। संघर्ष का एक दूसरा पहलू कूटनीतिक प्रयासों से जुड़ा है। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत की कोशिशें फिर शुरू हो सकती हैं।
कुछ रिपोर्टों में ईरान तक लगभग 10 दिन के संभावित संघर्षविराम का प्रस्ताव पहुंचने की बात कही गई है। बताया जा रहा है कि इसका उद्देश्य सीमित अवधि के लिए सैन्य कार्रवाई रोकना और व्यापक शांति समझौते की दिशा में बातचीत को फिर शुरू करना हो सकता है।
हालांकि इस संभावित प्रस्ताव को लेकर अमेरिका और ईरान की ओर से सभी विवरणों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों पक्ष किन शर्तों पर सैन्य कार्रवाई रोकने को तैयार हो सकते हैं। ASEAN ने भी अपने बयान में किसी खास संघर्षविराम प्रस्ताव का समर्थन करने के बजाय व्यापक तौर पर कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया है।
संगठन का कहना है कि लगातार हमले मध्यस्थता की संभावनाओं को कमजोर कर रहे हैं। अगर एक तरफ बातचीत की कोशिश हो और दूसरी तरफ बड़े सैन्य हमले जारी रहें तो दोनों पक्षों के बीच भरोसा कायम करना मुश्किल हो जाता है। अमेरिका और ईरान के बीच विवाद केवल मौजूदा हमलों तक सीमित नहीं है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम, अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध, क्षेत्र में सैन्य मौजूदगी और मिसाइल क्षमता लंबे समय से दोनों देशों के बीच तनाव के मुख्य कारण रहे हैं।
इन मुद्दों पर पहले भी कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन स्थायी समझौता नहीं हो पाया। मौजूदा सैन्य टकराव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। अमेरिका की ओर से कहा जाता रहा है कि ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं से क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरा है। वहीं तेहरान अमेरिकी प्रतिबंधों और पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को अपने खिलाफ दबाव की नीति बताता रहा है।
इस बीच सैन्य कार्रवाई का असर दूसरे देशों पर भी पड़ रहा है। अमेरिकी सैन्य ठिकाने पश्चिम एशिया के कई देशों में मौजूद हैं। ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई बढ़ने पर इन देशों के संघर्ष में खिंचने का खतरा रहता है। ASEAN की अपील में इसी क्षेत्रीय विस्तार की आशंका दिखाई देती है। संगठन चाहता है कि दोनों पक्ष ऐसी कार्रवाई न करें जिससे नए देश सीधे सैन्य संघर्ष में शामिल हो जाएं।
खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों और सैन्य प्रतिष्ठानों की बड़ी मौजूदगी है। ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे के कारण कई ठिकानों पर एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय किए गए हैं। हालिया संघर्ष में अमेरिकी सैनिकों की मौत ने स्थिति और संवेदनशील बना दी। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी सैन्यकर्मियों के मारे जाने के बाद वॉशिंगटन ने ईरानी लक्ष्यों के खिलाफ हमलों की तीव्रता बढ़ाई।
इसके जवाब में ईरान की ओर से भी क्षेत्र में अमेरिकी हितों को निशाना बनाने की कोशिश की गई। यही जवाबी कार्रवाई का सिलसिला ASEAN के लिए सबसे बड़ी चिंता है। अगर हर हमले का जवाब पहले से बड़े हमले से दिया जाता रहा तो संघर्ष को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। इसी कारण संगठन ने ‘उच्चतम स्तर के संयम’ की बात कही है।
होर्मुज में समुद्री यातायात सामान्य करना ASEAN के बयान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह जलडमरूमध्य इतना संकरा है कि किसी भी सैन्य घटना से जहाजों की आवाजाही तेजी से प्रभावित हो सकती है। तेल टैंकर, LNG जहाज और दूसरे मालवाहक पोत रोज इस रास्ते से गुजरते हैं। सुरक्षा जोखिम बढ़ने पर जहाजों का बीमा महंगा हो जाता है और कंपनियां वैकल्पिक व्यवस्था तलाशने लगती हैं।
इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा कीमतों पर पड़ सकता है। दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के लिए यह चिंता खास तौर पर बड़ी है क्योंकि कई देश तेजी से बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर हैं। ASEAN ने किसी भी ऐसी एकतरफा कार्रवाई का विरोध किया है जिससे अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों का इस्तेमाल करने वाले जहाजों को रोका जाए या उनके साथ भेदभाव किया जाए।
संगठन ने समुद्री कानून के तहत सभी देशों के अधिकार और जिम्मेदारियों का सम्मान करने की बात कही है। यह रुख ASEAN की व्यापक समुद्री नीति से भी जुड़ा है। दक्षिण चीन सागर में भी संगठन लंबे समय से नौवहन की स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय कानून का मुद्दा उठाता रहा है।होर्मुज संकट ने अब इसी सिद्धांत को पश्चिम एशिया के संदर्भ में महत्वपूर्ण बना दिया है।
ASEAN विदेश मंत्रियों की बैठक में अमेरिका-ईरान टकराव के अलावा दक्षिण चीन सागर, म्यांमार संकट और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई दूसरे मुद्दे भी एजेंडे में हैं। इसके बावजूद पश्चिम एशिया की स्थिति ने बैठक में खास जगह बनाई है। मार्को रुबियो की मौजूदगी के कारण सदस्य देशों के पास अपनी चिंताएं सीधे अमेरिकी पक्ष के सामने रखने का मौका भी है।
ASEAN के कई सदस्य अमेरिका के महत्वपूर्ण व्यापारिक और सुरक्षा साझेदार हैं। वहीं उनके चीन और पश्चिम एशिया के देशों के साथ भी बड़े आर्थिक संबंध हैं। इस कारण संगठन आमतौर पर बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाने की कोशिश करता है। अमेरिका-ईरान संघर्ष पर जारी बयान में भी यही संतुलन दिखाई देता है। किसी एक देश को जिम्मेदार ठहराने के बजाय सभी पक्षों से सैन्य कार्रवाई रोकने को कहा गया है।
संगठन ने क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन को प्राथमिकता देने की बात कही। इस बीच संभावित संघर्षविराम को लेकर चल रही चर्चाओं पर भी नजर बनी हुई है। अगर 10 दिन के अस्थायी युद्धविराम जैसा कोई प्रस्ताव औपचारिक रूप से आगे बढ़ता है तो यह बातचीत दोबारा शुरू करने का रास्ता खोल सकता है।
लेकिन किसी समझौते से पहले दोनों पक्षों को हमले रोकने और न्यूनतम भरोसा बहाल करने की जरूरत होगी। फिलहाल ऐसा स्पष्ट संकेत नहीं है कि अमेरिका और ईरान स्थायी रूप से सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमत हो गए हैं। जमीन पर हालात अभी भी तनावपूर्ण हैं। अमेरिकी सैन्य अभियान जारी है और ईरान की जवाबी कार्रवाई का खतरा बना हुआ है।
खाड़ी क्षेत्र के दूसरे देश भी अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर रहे हैं। मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे के कारण सैन्य ठिकानों, हवाई अड्डों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर सतर्कता बढ़ाई गई है। समुद्री क्षेत्र में भी जहाजों को सुरक्षा चेतावनियां जारी की जा रही हैं। होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों के लिए जोखिम का स्तर बढ़ा हुआ है।
ASEAN देशों की चिंता यह है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक जारी रही तो ऊर्जा बाजार में अस्थिरता स्थायी रूप ले सकती है।एशियाई देशों के लिए पश्चिम एशिया से ऊर्जा आपूर्ति बेहद महत्वपूर्ण है। तेल और गैस के बड़े आयातक देशों की मांग होर्मुज के सुरक्षित खुले रहने पर काफी हद तक निर्भर करती है।
इसलिए ASEAN ने तत्काल सुरक्षित और निर्बाध समुद्री यातायात बहाल करने की मांग रखी है। संगठन ने जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुद्री समझौतों का पालन करने को कहा है। उसका कहना है कि सैन्य संघर्ष के बावजूद वाणिज्यिक समुद्री यातायात को सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
अमेरिका और ईरान के बीच फिलहाल सैन्य दबाव और कूटनीतिक संकेत दोनों साथ-साथ दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ हमले हो रहे हैं, दूसरी तरफ अप्रत्यक्ष बातचीत और संभावित संघर्षविराम की रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं। ASEAN ने इसी बीच अपना रुख साफ करते हुए तत्काल हिंसा रोकने और बातचीत पर लौटने की मांग की है। विदेश मंत्रियों ने चेताया है कि हर नया हमला शांति समझौते की संभावना को और कमजोर कर सकता है।
मार्को रुबियो की मौजूदगी वाली बैठक में यह संदेश सीधे अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के सामने भी आया है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक कोशिशें आगे बढ़ती हैं या सैन्य कार्रवाई और तेज होती है, इस पर ASEAN देशों की नजर रहेगी, खासकर होर्मुज में जहाजों की आवाजाही और ऊर्जा आपूर्ति की स्थिति पर।
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अमेरिका-ईरान के बढ़ते टकराव पर ASEAN ने जताई चिंता, हमले रोककर बातचीत की अपील
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अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा तेज हुई सैन्य कार्रवाई को लेकर दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन ASEAN ने गंभीर चिंता जताई है। संगठन के विदेश मंत्रियों ने कहा है कि पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते हमले शांति की कोशिशों को कमजोर कर रहे हैं और अगर हालात इसी तरह बिगड़ते रहे तो बातचीत के जरिए समाधान निकालना और मुश्किल हो सकता है। ASEAN विदेश मंत्रियों की बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मौजूदगी के बीच यह मुद्दा प्रमुखता से उठा। सदस्य देशों ने सभी संबंधित पक्षों से अधिकतम संयम बरतने, ऐसी सैन्य कार्रवाई से बचने और कूटनीतिक रास्ते पर लौटने की अपील की है जिससे संघर्ष और बड़े क्षेत्र में फैल सकता है। बैठक में होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति को लेकर भी चिंता सामने आई, क्योंकि यहां समुद्री यातायात प्रभावित होने से तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति पर सीधा असर पड़ने का खतरा है।
ASEAN की ओर से जारी संयुक्त बयान में पश्चिम एशिया के तेजी से बदलते सुरक्षा हालात का जिक्र किया गया। संगठन ने खास तौर पर अमेरिका और ईरान के बीच फिर बढ़ी सैन्य दुश्मनी को चिंता का विषय बताया। सदस्य देशों का मानना है कि लगातार जवाबी हमलों से पहले से चल रही मध्यस्थता की कोशिशें प्रभावित हो सकती हैं। ASEAN ने किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय दोनों ओर से संयम की जरूरत बताई है। बयान में कहा गया कि सभी संबंधित पक्षों को ऐसे कदम उठाने से बचना चाहिए जिनसे मौजूदा तनाव और ज्यादा बढ़े। संगठन ने बातचीत और कूटनीति को विवाद सुलझाने का मुख्य रास्ता बताते हुए क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखने की अपील की।
विदेश मंत्रियों ने पश्चिम एशिया में अलग-अलग मोर्चों पर चल रही सैन्य कार्रवाई को पूरी तरह और तत्काल रोकने की जरूरत भी बताई। ASEAN का रुख है कि हिंसा जितनी लंबी चलेगी, किसी राजनीतिक समझौते तक पहुंचना उतना ही कठिन होता जाएगा।यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच लगातार सैन्य हमलों की खबरें आ रही हैं। अमेरिकी सेना ईरान के भीतर सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर कार्रवाई कर रही है, जबकि तेहरान ने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी से जुड़े लक्ष्यों पर जवाबी हमले किए हैं।
हालिया लड़ाई में अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने और घायल होने की खबरों के बाद वॉशिंगटन की सैन्य कार्रवाई और तेज हुई है। अमेरिका ने ईरानी सैन्य क्षमताओं को निशाना बनाने की बात कही है। दूसरी ओर ईरान ने अपने हमलों को अमेरिकी कार्रवाई का जवाब बताया है। इस लगातार सैन्य टकराव ने पूरे खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। जॉर्डन और बहरीन समेत उन देशों में खतरा ज्यादा माना जा रहा है जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने या सैनिक मौजूद हैं।
ASEAN के लिए सबसे बड़ी चिंताओं में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति है। फारस की खाड़ी और अरब सागर को जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर समुद्र के जरिए भेजे जाने वाले तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है।
संघर्ष के कारण यहां व्यापारिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। सुरक्षा जोखिम बढ़ने के बाद कई शिपिंग कंपनियां हालात पर नजर बनाए हुए हैं। किसी भी जहाज पर हमला या लंबे समय तक यातायात बाधित होने की स्थिति में वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है।
ASEAN ने होर्मुज में सुरक्षित, निर्बाध और लगातार समुद्री यातायात बहाल करने की मांग की है। संगठन ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों से गुजरने वाले जहाजों को किसी एकतरफा या भेदभावपूर्ण प्रतिबंध का सामना नहीं करना चाहिए। विदेश मंत्रियों ने 1982 के संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून समझौते यानी UNCLOS का भी उल्लेख किया। संगठन के मुताबिक समुद्री सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप सुनिश्चित की जानी चाहिए।
जहाजों के साथ उन पर काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया। सैन्य संघर्ष के बीच वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाए जाने या उनके रास्ते में रुकावट आने से बड़ी संख्या में नागरिकों की जान खतरे में पड़ सकती है। होर्मुज की स्थिति ASEAN देशों के लिए आर्थिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। दक्षिण-पूर्व एशिया की कई अर्थव्यवस्थाएं पश्चिम एशिया से आने वाले तेल और गैस पर निर्भर हैं। इस रास्ते से आपूर्ति में लंबी रुकावट आने पर ईंधन महंगा हो सकता है।
तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। इससे परिवहन, विमानन, उद्योग और खाद्य पदार्थों की लागत भी बढ़ सकती है। ऐसे में पश्चिम एशिया का सैन्य संकट दक्षिण-पूर्व एशिया में महंगाई बढ़ाने का कारण बन सकता है। इसी वजह से ASEAN की प्रतिक्रिया केवल राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है। सदस्य देश इस संघर्ष को अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए भी जोखिम के रूप में देख रहे हैं।
बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मौजूदगी ने इस चर्चा को और महत्वपूर्ण बना दिया। अमेरिका इस संघर्ष का सीधा पक्ष है और ASEAN देशों ने ऐसे समय संयम की अपील की है जब वॉशिंगटन ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखे हुए है।
रुबियो की ASEAN बैठक में मौजूदगी अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के संबंधों के लिहाज से भी अहम है। इंडो-पैसिफिक में चीन के बढ़ते प्रभाव, दक्षिण चीन सागर विवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा के बीच अमेरिका ASEAN देशों के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत करने की कोशिश करता रहा है। अब अमेरिका-ईरान संघर्ष ने एजेंडे में पश्चिम एशिया की सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति का मुद्दा भी जोड़ दिया है।
ASEAN सदस्य देशों ने साफ संकेत दिया है कि पश्चिम एशिया में लंबे समय तक युद्ध चलना उनके हित में नहीं है। ऊर्जा आयात, समुद्री व्यापार और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ने वाला असर दक्षिण-पूर्व एशिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है। संघर्ष का एक दूसरा पहलू कूटनीतिक प्रयासों से जुड़ा है। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत की कोशिशें फिर शुरू हो सकती हैं।
कुछ रिपोर्टों में ईरान तक लगभग 10 दिन के संभावित संघर्षविराम का प्रस्ताव पहुंचने की बात कही गई है। बताया जा रहा है कि इसका उद्देश्य सीमित अवधि के लिए सैन्य कार्रवाई रोकना और व्यापक शांति समझौते की दिशा में बातचीत को फिर शुरू करना हो सकता है।
हालांकि इस संभावित प्रस्ताव को लेकर अमेरिका और ईरान की ओर से सभी विवरणों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों पक्ष किन शर्तों पर सैन्य कार्रवाई रोकने को तैयार हो सकते हैं। ASEAN ने भी अपने बयान में किसी खास संघर्षविराम प्रस्ताव का समर्थन करने के बजाय व्यापक तौर पर कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया है।
संगठन का कहना है कि लगातार हमले मध्यस्थता की संभावनाओं को कमजोर कर रहे हैं। अगर एक तरफ बातचीत की कोशिश हो और दूसरी तरफ बड़े सैन्य हमले जारी रहें तो दोनों पक्षों के बीच भरोसा कायम करना मुश्किल हो जाता है। अमेरिका और ईरान के बीच विवाद केवल मौजूदा हमलों तक सीमित नहीं है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम, अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध, क्षेत्र में सैन्य मौजूदगी और मिसाइल क्षमता लंबे समय से दोनों देशों के बीच तनाव के मुख्य कारण रहे हैं।
इन मुद्दों पर पहले भी कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन स्थायी समझौता नहीं हो पाया। मौजूदा सैन्य टकराव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। अमेरिका की ओर से कहा जाता रहा है कि ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं से क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरा है। वहीं तेहरान अमेरिकी प्रतिबंधों और पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को अपने खिलाफ दबाव की नीति बताता रहा है।
इस बीच सैन्य कार्रवाई का असर दूसरे देशों पर भी पड़ रहा है। अमेरिकी सैन्य ठिकाने पश्चिम एशिया के कई देशों में मौजूद हैं। ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई बढ़ने पर इन देशों के संघर्ष में खिंचने का खतरा रहता है। ASEAN की अपील में इसी क्षेत्रीय विस्तार की आशंका दिखाई देती है। संगठन चाहता है कि दोनों पक्ष ऐसी कार्रवाई न करें जिससे नए देश सीधे सैन्य संघर्ष में शामिल हो जाएं।
खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों और सैन्य प्रतिष्ठानों की बड़ी मौजूदगी है। ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे के कारण कई ठिकानों पर एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय किए गए हैं। हालिया संघर्ष में अमेरिकी सैनिकों की मौत ने स्थिति और संवेदनशील बना दी। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी सैन्यकर्मियों के मारे जाने के बाद वॉशिंगटन ने ईरानी लक्ष्यों के खिलाफ हमलों की तीव्रता बढ़ाई।
इसके जवाब में ईरान की ओर से भी क्षेत्र में अमेरिकी हितों को निशाना बनाने की कोशिश की गई। यही जवाबी कार्रवाई का सिलसिला ASEAN के लिए सबसे बड़ी चिंता है। अगर हर हमले का जवाब पहले से बड़े हमले से दिया जाता रहा तो संघर्ष को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। इसी कारण संगठन ने ‘उच्चतम स्तर के संयम’ की बात कही है।
होर्मुज में समुद्री यातायात सामान्य करना ASEAN के बयान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह जलडमरूमध्य इतना संकरा है कि किसी भी सैन्य घटना से जहाजों की आवाजाही तेजी से प्रभावित हो सकती है। तेल टैंकर, LNG जहाज और दूसरे मालवाहक पोत रोज इस रास्ते से गुजरते हैं। सुरक्षा जोखिम बढ़ने पर जहाजों का बीमा महंगा हो जाता है और कंपनियां वैकल्पिक व्यवस्था तलाशने लगती हैं।
इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा कीमतों पर पड़ सकता है। दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के लिए यह चिंता खास तौर पर बड़ी है क्योंकि कई देश तेजी से बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर हैं। ASEAN ने किसी भी ऐसी एकतरफा कार्रवाई का विरोध किया है जिससे अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों का इस्तेमाल करने वाले जहाजों को रोका जाए या उनके साथ भेदभाव किया जाए।
संगठन ने समुद्री कानून के तहत सभी देशों के अधिकार और जिम्मेदारियों का सम्मान करने की बात कही है। यह रुख ASEAN की व्यापक समुद्री नीति से भी जुड़ा है। दक्षिण चीन सागर में भी संगठन लंबे समय से नौवहन की स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय कानून का मुद्दा उठाता रहा है।होर्मुज संकट ने अब इसी सिद्धांत को पश्चिम एशिया के संदर्भ में महत्वपूर्ण बना दिया है।
ASEAN विदेश मंत्रियों की बैठक में अमेरिका-ईरान टकराव के अलावा दक्षिण चीन सागर, म्यांमार संकट और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई दूसरे मुद्दे भी एजेंडे में हैं। इसके बावजूद पश्चिम एशिया की स्थिति ने बैठक में खास जगह बनाई है। मार्को रुबियो की मौजूदगी के कारण सदस्य देशों के पास अपनी चिंताएं सीधे अमेरिकी पक्ष के सामने रखने का मौका भी है।
ASEAN के कई सदस्य अमेरिका के महत्वपूर्ण व्यापारिक और सुरक्षा साझेदार हैं। वहीं उनके चीन और पश्चिम एशिया के देशों के साथ भी बड़े आर्थिक संबंध हैं। इस कारण संगठन आमतौर पर बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाने की कोशिश करता है। अमेरिका-ईरान संघर्ष पर जारी बयान में भी यही संतुलन दिखाई देता है। किसी एक देश को जिम्मेदार ठहराने के बजाय सभी पक्षों से सैन्य कार्रवाई रोकने को कहा गया है।
संगठन ने क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन को प्राथमिकता देने की बात कही। इस बीच संभावित संघर्षविराम को लेकर चल रही चर्चाओं पर भी नजर बनी हुई है। अगर 10 दिन के अस्थायी युद्धविराम जैसा कोई प्रस्ताव औपचारिक रूप से आगे बढ़ता है तो यह बातचीत दोबारा शुरू करने का रास्ता खोल सकता है।
लेकिन किसी समझौते से पहले दोनों पक्षों को हमले रोकने और न्यूनतम भरोसा बहाल करने की जरूरत होगी। फिलहाल ऐसा स्पष्ट संकेत नहीं है कि अमेरिका और ईरान स्थायी रूप से सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमत हो गए हैं। जमीन पर हालात अभी भी तनावपूर्ण हैं। अमेरिकी सैन्य अभियान जारी है और ईरान की जवाबी कार्रवाई का खतरा बना हुआ है।
खाड़ी क्षेत्र के दूसरे देश भी अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर रहे हैं। मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे के कारण सैन्य ठिकानों, हवाई अड्डों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर सतर्कता बढ़ाई गई है। समुद्री क्षेत्र में भी जहाजों को सुरक्षा चेतावनियां जारी की जा रही हैं। होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों के लिए जोखिम का स्तर बढ़ा हुआ है।
ASEAN देशों की चिंता यह है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक जारी रही तो ऊर्जा बाजार में अस्थिरता स्थायी रूप ले सकती है।एशियाई देशों के लिए पश्चिम एशिया से ऊर्जा आपूर्ति बेहद महत्वपूर्ण है। तेल और गैस के बड़े आयातक देशों की मांग होर्मुज के सुरक्षित खुले रहने पर काफी हद तक निर्भर करती है।
इसलिए ASEAN ने तत्काल सुरक्षित और निर्बाध समुद्री यातायात बहाल करने की मांग रखी है। संगठन ने जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुद्री समझौतों का पालन करने को कहा है। उसका कहना है कि सैन्य संघर्ष के बावजूद वाणिज्यिक समुद्री यातायात को सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
अमेरिका और ईरान के बीच फिलहाल सैन्य दबाव और कूटनीतिक संकेत दोनों साथ-साथ दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ हमले हो रहे हैं, दूसरी तरफ अप्रत्यक्ष बातचीत और संभावित संघर्षविराम की रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं। ASEAN ने इसी बीच अपना रुख साफ करते हुए तत्काल हिंसा रोकने और बातचीत पर लौटने की मांग की है। विदेश मंत्रियों ने चेताया है कि हर नया हमला शांति समझौते की संभावना को और कमजोर कर सकता है।
मार्को रुबियो की मौजूदगी वाली बैठक में यह संदेश सीधे अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के सामने भी आया है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक कोशिशें आगे बढ़ती हैं या सैन्य कार्रवाई और तेज होती है, इस पर ASEAN देशों की नजर रहेगी, खासकर होर्मुज में जहाजों की आवाजाही और ऊर्जा आपूर्ति की स्थिति पर।
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