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मध्य प्रदेश विधानसभा में UCC बिल पास, अब राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार
मध्य प्रदेश
शादी, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों के लिए समान व्यवस्था का प्रस्ताव; सीएम मोहन यादव ने बताया ऐतिहासिक कदम, विपक्ष ने उठाए सवाल
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में मंगलवार को बड़ा कदम उठाया गया। विधानसभा के मानसून सत्र के दूसरे दिन UCC बिल 2026 को सदन ने ध्वनिमत से पारित कर दिया। सरकार इसे नागरिक अधिकारों में समानता की दिशा में बड़ा बदलाव बता रही है, जबकि विपक्ष ने विधेयक के कई प्रावधानों और इसे लाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। विधानसभा से मंजूरी मिलने के बाद अब विधेयक को आगे संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा। जरूरी मंजूरी मिलने के बाद ही इसे राज्य में कानून के रूप में लागू किया जा सकेगा।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विधानसभा में विधेयक पारित होने को मध्य प्रदेश के लिए महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला बताया। सरकार का कहना है कि UCC का उद्देश्य अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत नागरिक मामलों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था तैयार करना है। इसके दायरे में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति से जुड़े अधिकार और गोद लेने जैसे विषय शामिल किए गए हैं। सरकार का तर्क है कि धर्म या समुदाय के आधार पर नागरिक अधिकारों में अलग-अलग व्यवस्था के बजाय समान नियम होने चाहिए। इसी आधार पर विधेयक को सामाजिक और कानूनी समानता से जोड़कर पेश किया गया है।
UCC बिल को विधानसभा में पारित किए जाने से पहले इस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बहस भी हुई। कांग्रेस विधायकों ने कई प्रावधानों को लेकर आपत्ति जताई और विधेयक पर ज्यादा विस्तार से विचार करने की मांग की। विपक्ष का कहना था कि इतने व्यापक असर वाले कानून पर सभी संबंधित पक्षों की चिंताओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। दूसरी तरफ सरकार ने कहा कि विधेयक तैयार करने से पहले जरूरी प्रक्रिया और विचार-विमर्श किया गया है। सदन में विरोध और राजनीतिक बहस के बीच आखिरकार इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।
UCC का सबसे बड़ा असर विवाह से जुड़े नियमों पर पड़ने की बात कही जा रही है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था में एक समय में एक ही वैध विवाह का सिद्धांत लागू होगा। पहले से वैध विवाह मौजूद रहते हुए दूसरा विवाह करने पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान रखा गया है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सदन में इस मुद्दे को समान नागरिक अधिकारों से जोड़ते हुए कहा कि विवाह से जुड़े नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। सरकार इसे महिलाओं के अधिकारों और वैवाहिक सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण प्रावधान बता रही है।
बहुविवाह को लेकर विधेयक में सख्त व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। सरकार का कहना है कि कानून लागू होने के बाद निर्धारित नियमों का उल्लंघन कर एक से अधिक विवाह करना अपराध की श्रेणी में आ सकता है। इसके लिए सजा और कानूनी कार्रवाई के प्रावधान रखे गए हैं। सरकार का तर्क है कि इससे विवाह संबंधों में कानूनी स्पष्टता आएगी और महिलाओं को अधिक सुरक्षा मिलेगी। हालांकि इन प्रावधानों के व्यावहारिक असर और अलग-अलग समुदायों की परंपराओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर राजनीतिक बहस भी जारी है।
विधेयक में महिलाओं के संपत्ति और उत्तराधिकार अधिकारों को भी महत्वपूर्ण जगह दी गई है। सरकार के मुताबिक इसका उद्देश्य महिला और पुरुष के बीच उत्तराधिकार से जुड़े अधिकारों में समानता सुनिश्चित करना है। अभी अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण विरासत और संपत्ति के बंटवारे की व्यवस्था में अंतर देखने को मिलता है। UCC लागू होने पर इन मामलों में एक समान कानूनी ढांचा तैयार करने की कोशिश होगी। सरकार इसे महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा और लैंगिक समानता से जोड़कर देख रही है।
गोद लेने से जुड़े नियमों में भी समान व्यवस्था का प्रस्ताव है। अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों में गोद लेने के अधिकार और प्रक्रिया को लेकर अंतर रहा है। सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था में नागरिकों को समान कानूनी आधार देने की कोशिश की गई है। इससे गोद लेने की प्रक्रिया को स्पष्ट और एकरूप बनाने का दावा किया जा रहा है। हालांकि वास्तविक नियम और प्रक्रिया कानून लागू होने के बाद अधिसूचित नियमों तथा संबंधित कानूनी प्रावधानों से और स्पष्ट होगी।
UCC बिल में लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े प्रावधान भी चर्चा में हैं। सरकार ने ऐसे संबंधों के दुरुपयोग को रोकने के लिए कानूनी व्यवस्था की बात कही है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के अनुसार निर्धारित कानूनी उम्र का उल्लंघन, गलत जानकारी देकर संबंध बनाना या विवाहेतर संबंध को लिव-इन व्यवस्था के नाम पर इस्तेमाल करने जैसी स्थितियों के लिए दंडात्मक प्रावधान रखे गए हैं। कुछ उल्लंघनों में सजा का प्रावधान पांच साल तक होने की बात सामने आई है। इन प्रावधानों को लेकर विपक्ष और कानूनी जानकारों के बीच आगे भी बहस होने की संभावना है।
सरकार का कहना है कि लिव-इन संबंधों को लेकर नियम बनाने का उद्देश्य खास तौर पर महिलाओं और बच्चों के कानूनी अधिकार सुरक्षित करना है। ऐसे रिश्तों से पैदा होने वाले विवादों में भरण-पोषण, पहचान और दूसरे अधिकारों को लेकर कई बार कानूनी मुश्किलें सामने आती हैं। प्रस्तावित कानून इन मामलों में स्पष्ट व्यवस्था देने का प्रयास करता है। हालांकि निजी जीवन में राज्य के हस्तक्षेप की सीमा क्या होनी चाहिए, यह सवाल भी इस बहस के साथ जुड़ा हुआ है। कानून लागू होने के बाद इसके नियम इस व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर तय करेंगे।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने विधानसभा में UCC को धर्म से ऊपर नागरिक समानता का विषय बताया। उन्होंने कहा कि राज्य में नागरिक अधिकारों और जिम्मेदारियों के लिए समान व्यवस्था होनी चाहिए। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए अलग व्यक्तिगत कानूनों की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए समान नागरिक कानून का समर्थन किया। उन्होंने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे सामाजिक और कानूनी सुधारों की दिशा में एक कदम बताया। सरकार का दावा है कि इससे संविधान में निहित समानता की भावना मजबूत होगी।
विपक्ष ने सरकार के इन दावों को लेकर सवाल उठाए। कांग्रेस की ओर से विधेयक के सामाजिक प्रभाव और अलग-अलग समुदायों की परंपराओं से जुड़े मुद्दे उठाए गए। विपक्ष का तर्क रहा कि व्यक्तिगत कानून सीधे लोगों के पारिवारिक और सामाजिक जीवन से जुड़े होते हैं, इसलिए बदलाव से पहले व्यापक स्तर पर चर्चा जरूरी है। सदन में इस मुद्दे को लेकर तीखी राजनीतिक बहस भी देखने को मिली। सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर समान नागरिक अधिकारों के मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से देखने का आरोप लगाया।
मध्य प्रदेश सरकार ने विधानसभा में विधेयक लाने से पहले इसे कैबिनेट से मंजूरी दी थी। भोपाल के पास जगदीशपुर में हुई विशेष कैबिनेट बैठक में UCC बिल के मसौदे को मंजूर किया गया था। इसके बाद मानसून सत्र में इसे सदन के सामने रखा गया। सरकार की ओर से पहले ही संकेत दिए गए थे कि इस सत्र में UCC प्रमुख विधायी एजेंडे में रहेगा। बिल पेश होने के साथ ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव शुरू हो गया था।
विधेयक के दायरे को लेकर आदिवासी समुदायों का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहा है। कैबिनेट से मंजूरी के समय सामने आई जानकारी के अनुसार अनुसूचित जनजातियों को प्रस्तावित कानून के दायरे से बाहर रखने की व्यवस्था की गई है। मध्य प्रदेश में बड़ी आदिवासी आबादी रहती है और कई समुदायों में विवाह, उत्तराधिकार तथा पारिवारिक मामलों से जुड़ी पारंपरिक प्रथाएं मौजूद हैं। इसी कारण UCC की तैयारी के दौरान आदिवासी अधिकार और संवैधानिक संरक्षण का सवाल लगातार चर्चा में रहा।
मध्य प्रदेश में UCC लागू करने की तैयारी पिछले कुछ समय से चल रही थी। सरकार की ओर से अलग-अलग स्तर पर सुझाव और प्रतिक्रियाएं लेने की प्रक्रिया भी की गई। मुख्यमंत्री मोहन यादव कई मौकों पर सार्वजनिक रूप से समान नागरिक संहिता लागू करने के पक्ष में बयान दे चुके थे। उनका कहना रहा है कि धर्म के आधार पर नागरिक अधिकारों में अंतर नहीं होना चाहिए। विधानसभा से विधेयक पास होने के बाद अब यह प्रक्रिया अगले संवैधानिक चरण में पहुंच गई है।
यूनिफॉर्म सिविल कोड का मूल विचार नागरिकों के व्यक्तिगत मामलों के लिए एक समान कानून तैयार करना है। भारत में फिलहाल विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और कुछ दूसरे पारिवारिक मामलों में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। UCC इसी व्यवस्था में बदलाव की बात करता है। इसका उद्देश्य इन विषयों के लिए धर्म से अलग एक समान नागरिक कानूनी ढांचा बनाना है। संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में भी समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रयास का उल्लेख किया गया है।
हालांकि UCC लंबे समय से देश में राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय रहा है। समर्थकों का कहना है कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय एक समान व्यवस्था होने से महिलाओं को बराबरी के अधिकार मिलेंगे और कानूनी जटिलता कम होगी। विरोध करने वाले पक्षों का तर्क है कि भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए। धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, यही इस बहस का सबसे संवेदनशील हिस्सा रहा है।
मध्य प्रदेश सरकार ने विधेयक को खास तौर पर महिला सशक्तिकरण से जोड़कर पेश किया है। सरकार का कहना है कि विवाह, तलाक और उत्तराधिकार में समान नियम होने से महिलाओं को कानूनी सुरक्षा मिलेगी। बहुविवाह पर रोक और विरासत में समान अधिकार जैसे प्रावधान इसी दिशा में बताए जा रहे हैं। सरकार ने तीन तलाक और हलाला जैसी प्रथाओं का भी उल्लेख करते हुए कहा है कि समान नागरिक कानून लागू होने पर विवाह और तलाक की प्रक्रिया एक समान कानूनी ढांचे से संचालित होगी।
विधेयक के कानून बनने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। विधानसभा से पास होने के बाद इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाना है। राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद राज्य सरकार कानून लागू करने की तारीख तय कर सकती है और इसके विस्तृत नियम अधिसूचित किए जाएंगे। इन्हीं नियमों से विवाह पंजीकरण, लिव-इन संबंधों से जुड़ी प्रक्रियाओं, उत्तराधिकार और दूसरे मामलों के व्यावहारिक प्रावधान ज्यादा स्पष्ट होंगे। इसलिए विधानसभा से बिल पास होना महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन इसका वास्तविक क्रियान्वयन अगली प्रक्रिया पूरी होने के बाद शुरू होगा।
UCC लागू होने पर पहले से मौजूद विवाह और दूसरे नागरिक मामलों पर कानून का क्या प्रभाव पड़ेगा, इस पर भी विस्तृत नियम महत्वपूर्ण होंगे। नए और पुराने मामलों के बीच कानूनी व्यवस्था कैसे लागू होगी, पंजीकरण की प्रक्रिया क्या होगी और उल्लंघन के मामलों में कार्रवाई किस स्तर पर होगी, इन सवालों के जवाब नियमावली में सामने आएंगे। सरकार को इसके लिए प्रशासनिक व्यवस्था भी तैयार करनी होगी। संबंधित विभागों और स्थानीय स्तर के अधिकारियों की जिम्मेदारियां भी तय की जाएंगी।
विधानसभा में UCC बिल पारित होने के साथ मध्य प्रदेश की राजनीति में भी यह बड़ा मुद्दा बन गया है। भाजपा इसे समानता, महिला अधिकार और सामाजिक सुधार की दिशा में ऐतिहासिक फैसला बता रही है। कांग्रेस ने कानून के कई पहलुओं और इसे पारित करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। आने वाले दिनों में राष्ट्रपति की मंजूरी और नियमों के निर्माण के दौरान भी राजनीतिक बहस जारी रहने की संभावना है। फिलहाल विधानसभा की मंजूरी के बाद राज्य सरकार की नजर अगली संवैधानिक प्रक्रिया पर है।
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मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में मंगलवार को बड़ा कदम उठाया गया। विधानसभा के मानसून सत्र के दूसरे दिन UCC बिल 2026 को सदन ने ध्वनिमत से पारित कर दिया। सरकार इसे नागरिक अधिकारों में समानता की दिशा में बड़ा बदलाव बता रही है, जबकि विपक्ष ने विधेयक के कई प्रावधानों और इसे लाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। विधानसभा से मंजूरी मिलने के बाद अब विधेयक को आगे संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा। जरूरी मंजूरी मिलने के बाद ही इसे राज्य में कानून के रूप में लागू किया जा सकेगा।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विधानसभा में विधेयक पारित होने को मध्य प्रदेश के लिए महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला बताया। सरकार का कहना है कि UCC का उद्देश्य अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत नागरिक मामलों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था तैयार करना है। इसके दायरे में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति से जुड़े अधिकार और गोद लेने जैसे विषय शामिल किए गए हैं। सरकार का तर्क है कि धर्म या समुदाय के आधार पर नागरिक अधिकारों में अलग-अलग व्यवस्था के बजाय समान नियम होने चाहिए। इसी आधार पर विधेयक को सामाजिक और कानूनी समानता से जोड़कर पेश किया गया है।
UCC बिल को विधानसभा में पारित किए जाने से पहले इस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बहस भी हुई। कांग्रेस विधायकों ने कई प्रावधानों को लेकर आपत्ति जताई और विधेयक पर ज्यादा विस्तार से विचार करने की मांग की। विपक्ष का कहना था कि इतने व्यापक असर वाले कानून पर सभी संबंधित पक्षों की चिंताओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। दूसरी तरफ सरकार ने कहा कि विधेयक तैयार करने से पहले जरूरी प्रक्रिया और विचार-विमर्श किया गया है। सदन में विरोध और राजनीतिक बहस के बीच आखिरकार इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।
UCC का सबसे बड़ा असर विवाह से जुड़े नियमों पर पड़ने की बात कही जा रही है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था में एक समय में एक ही वैध विवाह का सिद्धांत लागू होगा। पहले से वैध विवाह मौजूद रहते हुए दूसरा विवाह करने पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान रखा गया है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सदन में इस मुद्दे को समान नागरिक अधिकारों से जोड़ते हुए कहा कि विवाह से जुड़े नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। सरकार इसे महिलाओं के अधिकारों और वैवाहिक सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण प्रावधान बता रही है।
बहुविवाह को लेकर विधेयक में सख्त व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। सरकार का कहना है कि कानून लागू होने के बाद निर्धारित नियमों का उल्लंघन कर एक से अधिक विवाह करना अपराध की श्रेणी में आ सकता है। इसके लिए सजा और कानूनी कार्रवाई के प्रावधान रखे गए हैं। सरकार का तर्क है कि इससे विवाह संबंधों में कानूनी स्पष्टता आएगी और महिलाओं को अधिक सुरक्षा मिलेगी। हालांकि इन प्रावधानों के व्यावहारिक असर और अलग-अलग समुदायों की परंपराओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर राजनीतिक बहस भी जारी है।
विधेयक में महिलाओं के संपत्ति और उत्तराधिकार अधिकारों को भी महत्वपूर्ण जगह दी गई है। सरकार के मुताबिक इसका उद्देश्य महिला और पुरुष के बीच उत्तराधिकार से जुड़े अधिकारों में समानता सुनिश्चित करना है। अभी अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण विरासत और संपत्ति के बंटवारे की व्यवस्था में अंतर देखने को मिलता है। UCC लागू होने पर इन मामलों में एक समान कानूनी ढांचा तैयार करने की कोशिश होगी। सरकार इसे महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा और लैंगिक समानता से जोड़कर देख रही है।
गोद लेने से जुड़े नियमों में भी समान व्यवस्था का प्रस्ताव है। अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों में गोद लेने के अधिकार और प्रक्रिया को लेकर अंतर रहा है। सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था में नागरिकों को समान कानूनी आधार देने की कोशिश की गई है। इससे गोद लेने की प्रक्रिया को स्पष्ट और एकरूप बनाने का दावा किया जा रहा है। हालांकि वास्तविक नियम और प्रक्रिया कानून लागू होने के बाद अधिसूचित नियमों तथा संबंधित कानूनी प्रावधानों से और स्पष्ट होगी।
UCC बिल में लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े प्रावधान भी चर्चा में हैं। सरकार ने ऐसे संबंधों के दुरुपयोग को रोकने के लिए कानूनी व्यवस्था की बात कही है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के अनुसार निर्धारित कानूनी उम्र का उल्लंघन, गलत जानकारी देकर संबंध बनाना या विवाहेतर संबंध को लिव-इन व्यवस्था के नाम पर इस्तेमाल करने जैसी स्थितियों के लिए दंडात्मक प्रावधान रखे गए हैं। कुछ उल्लंघनों में सजा का प्रावधान पांच साल तक होने की बात सामने आई है। इन प्रावधानों को लेकर विपक्ष और कानूनी जानकारों के बीच आगे भी बहस होने की संभावना है।
सरकार का कहना है कि लिव-इन संबंधों को लेकर नियम बनाने का उद्देश्य खास तौर पर महिलाओं और बच्चों के कानूनी अधिकार सुरक्षित करना है। ऐसे रिश्तों से पैदा होने वाले विवादों में भरण-पोषण, पहचान और दूसरे अधिकारों को लेकर कई बार कानूनी मुश्किलें सामने आती हैं। प्रस्तावित कानून इन मामलों में स्पष्ट व्यवस्था देने का प्रयास करता है। हालांकि निजी जीवन में राज्य के हस्तक्षेप की सीमा क्या होनी चाहिए, यह सवाल भी इस बहस के साथ जुड़ा हुआ है। कानून लागू होने के बाद इसके नियम इस व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर तय करेंगे।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने विधानसभा में UCC को धर्म से ऊपर नागरिक समानता का विषय बताया। उन्होंने कहा कि राज्य में नागरिक अधिकारों और जिम्मेदारियों के लिए समान व्यवस्था होनी चाहिए। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए अलग व्यक्तिगत कानूनों की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए समान नागरिक कानून का समर्थन किया। उन्होंने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे सामाजिक और कानूनी सुधारों की दिशा में एक कदम बताया। सरकार का दावा है कि इससे संविधान में निहित समानता की भावना मजबूत होगी।
विपक्ष ने सरकार के इन दावों को लेकर सवाल उठाए। कांग्रेस की ओर से विधेयक के सामाजिक प्रभाव और अलग-अलग समुदायों की परंपराओं से जुड़े मुद्दे उठाए गए। विपक्ष का तर्क रहा कि व्यक्तिगत कानून सीधे लोगों के पारिवारिक और सामाजिक जीवन से जुड़े होते हैं, इसलिए बदलाव से पहले व्यापक स्तर पर चर्चा जरूरी है। सदन में इस मुद्दे को लेकर तीखी राजनीतिक बहस भी देखने को मिली। सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर समान नागरिक अधिकारों के मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से देखने का आरोप लगाया।
मध्य प्रदेश सरकार ने विधानसभा में विधेयक लाने से पहले इसे कैबिनेट से मंजूरी दी थी। भोपाल के पास जगदीशपुर में हुई विशेष कैबिनेट बैठक में UCC बिल के मसौदे को मंजूर किया गया था। इसके बाद मानसून सत्र में इसे सदन के सामने रखा गया। सरकार की ओर से पहले ही संकेत दिए गए थे कि इस सत्र में UCC प्रमुख विधायी एजेंडे में रहेगा। बिल पेश होने के साथ ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव शुरू हो गया था।
विधेयक के दायरे को लेकर आदिवासी समुदायों का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहा है। कैबिनेट से मंजूरी के समय सामने आई जानकारी के अनुसार अनुसूचित जनजातियों को प्रस्तावित कानून के दायरे से बाहर रखने की व्यवस्था की गई है। मध्य प्रदेश में बड़ी आदिवासी आबादी रहती है और कई समुदायों में विवाह, उत्तराधिकार तथा पारिवारिक मामलों से जुड़ी पारंपरिक प्रथाएं मौजूद हैं। इसी कारण UCC की तैयारी के दौरान आदिवासी अधिकार और संवैधानिक संरक्षण का सवाल लगातार चर्चा में रहा।
मध्य प्रदेश में UCC लागू करने की तैयारी पिछले कुछ समय से चल रही थी। सरकार की ओर से अलग-अलग स्तर पर सुझाव और प्रतिक्रियाएं लेने की प्रक्रिया भी की गई। मुख्यमंत्री मोहन यादव कई मौकों पर सार्वजनिक रूप से समान नागरिक संहिता लागू करने के पक्ष में बयान दे चुके थे। उनका कहना रहा है कि धर्म के आधार पर नागरिक अधिकारों में अंतर नहीं होना चाहिए। विधानसभा से विधेयक पास होने के बाद अब यह प्रक्रिया अगले संवैधानिक चरण में पहुंच गई है।
यूनिफॉर्म सिविल कोड का मूल विचार नागरिकों के व्यक्तिगत मामलों के लिए एक समान कानून तैयार करना है। भारत में फिलहाल विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और कुछ दूसरे पारिवारिक मामलों में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। UCC इसी व्यवस्था में बदलाव की बात करता है। इसका उद्देश्य इन विषयों के लिए धर्म से अलग एक समान नागरिक कानूनी ढांचा बनाना है। संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में भी समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रयास का उल्लेख किया गया है।
हालांकि UCC लंबे समय से देश में राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय रहा है। समर्थकों का कहना है कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय एक समान व्यवस्था होने से महिलाओं को बराबरी के अधिकार मिलेंगे और कानूनी जटिलता कम होगी। विरोध करने वाले पक्षों का तर्क है कि भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए। धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, यही इस बहस का सबसे संवेदनशील हिस्सा रहा है।
मध्य प्रदेश सरकार ने विधेयक को खास तौर पर महिला सशक्तिकरण से जोड़कर पेश किया है। सरकार का कहना है कि विवाह, तलाक और उत्तराधिकार में समान नियम होने से महिलाओं को कानूनी सुरक्षा मिलेगी। बहुविवाह पर रोक और विरासत में समान अधिकार जैसे प्रावधान इसी दिशा में बताए जा रहे हैं। सरकार ने तीन तलाक और हलाला जैसी प्रथाओं का भी उल्लेख करते हुए कहा है कि समान नागरिक कानून लागू होने पर विवाह और तलाक की प्रक्रिया एक समान कानूनी ढांचे से संचालित होगी।
विधेयक के कानून बनने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। विधानसभा से पास होने के बाद इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाना है। राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद राज्य सरकार कानून लागू करने की तारीख तय कर सकती है और इसके विस्तृत नियम अधिसूचित किए जाएंगे। इन्हीं नियमों से विवाह पंजीकरण, लिव-इन संबंधों से जुड़ी प्रक्रियाओं, उत्तराधिकार और दूसरे मामलों के व्यावहारिक प्रावधान ज्यादा स्पष्ट होंगे। इसलिए विधानसभा से बिल पास होना महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन इसका वास्तविक क्रियान्वयन अगली प्रक्रिया पूरी होने के बाद शुरू होगा।
UCC लागू होने पर पहले से मौजूद विवाह और दूसरे नागरिक मामलों पर कानून का क्या प्रभाव पड़ेगा, इस पर भी विस्तृत नियम महत्वपूर्ण होंगे। नए और पुराने मामलों के बीच कानूनी व्यवस्था कैसे लागू होगी, पंजीकरण की प्रक्रिया क्या होगी और उल्लंघन के मामलों में कार्रवाई किस स्तर पर होगी, इन सवालों के जवाब नियमावली में सामने आएंगे। सरकार को इसके लिए प्रशासनिक व्यवस्था भी तैयार करनी होगी। संबंधित विभागों और स्थानीय स्तर के अधिकारियों की जिम्मेदारियां भी तय की जाएंगी।
विधानसभा में UCC बिल पारित होने के साथ मध्य प्रदेश की राजनीति में भी यह बड़ा मुद्दा बन गया है। भाजपा इसे समानता, महिला अधिकार और सामाजिक सुधार की दिशा में ऐतिहासिक फैसला बता रही है। कांग्रेस ने कानून के कई पहलुओं और इसे पारित करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। आने वाले दिनों में राष्ट्रपति की मंजूरी और नियमों के निर्माण के दौरान भी राजनीतिक बहस जारी रहने की संभावना है। फिलहाल विधानसभा की मंजूरी के बाद राज्य सरकार की नजर अगली संवैधानिक प्रक्रिया पर है।
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