सस्ते कपड़ों की असली कीमत कौन चुकाए? Fast Fashion ब्रांड्स पर ‘वेस्ट टैक्स’ लगाने की बढ़ी बहस

Priyanka Mathur

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कुछ बार पहनकर फेंके जाने वाले कपड़ों से बढ़ रहा टेक्सटाइल कचरा; सवाल- सफाई और रिसाइक्लिंग का खर्च ग्राहक उठाए, सरकार या कपड़े बनाने वाली कंपनियां?

कम कीमत, हर हफ्ते बदलते डिजाइन और मोबाइल ऐप पर लगातार मिलने वाले डिस्काउंट ने कपड़े खरीदने का तरीका तेजी से बदल दिया है। पहले लोग किसी कपड़े को लंबे समय तक इस्तेमाल करने के हिसाब से खरीदते थे, लेकिन अब फैशन का एक बड़ा बाजार ऐसे कपड़ों पर टिक गया है जो कुछ महीनों या कई बार कुछ ही बार पहनने के बाद अलमारी से बाहर हो जाते हैं। इसे अल्ट्रा-फास्ट फैशन कहा जाता है। सस्ते कपड़ों की बढ़ती बिक्री के साथ अब उनका कचरा भी बड़ी पर्यावरणीय समस्या बन रहा है। इसी वजह से सवाल उठ रहा है कि इन कपड़ों को आखिर में ठिकाने लगाने और पर्यावरण की सफाई का खर्च कौन उठाए।

फास्ट फैशन का बिजनेस मॉडल तेजी से नए ट्रेंड बाजार में उतारने पर आधारित है। सोशल मीडिया पर किसी सेलिब्रिटी या इन्फ्लुएंसर का कोई डिजाइन वायरल हुआ तो कुछ ही समय में उससे मिलते-जुलते कपड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिक्री के लिए उपलब्ध हो जाते हैं। कीमत कम होने के कारण ग्राहक जरूरत से ज्यादा खरीदारी भी कर लेते हैं। ट्रेंड बदलते ही वही कपड़े पुराने लगने लगते हैं। कई कपड़े खराब होने से पहले ही इस्तेमाल से बाहर हो जाते हैं और यहीं से Fast Fashion Waste की समस्या शुरू होती है।

पुराने कपड़ों का हर हिस्सा आसानी से रिसाइकिल नहीं किया जा सकता। आज बाजार में मिलने वाले बहुत से कपड़े कॉटन, पॉलिएस्टर, नायलॉन और दूसरे सिंथेटिक फाइबर के मिश्रण से बनाए जाते हैं। इनमें बटन, जिप, इलास्टिक, प्रिंट और अलग-अलग तरह के धागे भी इस्तेमाल होते हैं। ऐसे कपड़ों को रिसाइक्लिंग के दौरान अलग करना मुश्किल और महंगा पड़ता है। नतीजा यह होता है कि बड़ी मात्रा में पुराने कपड़े लैंडफिल तक पहुंच जाते हैं या उन्हें जलाकर नष्ट किया जाता है, जिससे पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

यहीं से फैशन कंपनियों की जिम्मेदारी को लेकर बहस तेज होती है। अभी आम तौर पर कोई कंपनी कपड़ा बनाती है, उसे बेचती है और ग्राहक तक पहुंचने के बाद उसकी जिम्मेदारी लगभग खत्म हो जाती है। ग्राहक जब उस कपड़े को फेंकता है तो उसे संभालने का खर्च स्थानीय कचरा प्रबंधन व्यवस्था पर आता है। यानी सफाई, कलेक्शन और लैंडफिल का खर्च आखिरकार सरकार, नगर निकाय या टैक्स देने वाले लोगों को उठाना पड़ता है। पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञ पूछ रहे हैं कि जिस कंपनी ने उत्पाद बेचकर मुनाफा कमाया, क्या उसे उसके कचरे की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त रहना चाहिए?

इसी सवाल के जवाब में Extended Producer Responsibility यानी EPR का मॉडल चर्चा में है। इसका सीधा मतलब है कि किसी उत्पाद को बनाने वाली कंपनी की जिम्मेदारी उसकी बिक्री के साथ खत्म न हो। उत्पाद इस्तेमाल के बाद जब कचरा बन जाए, तब उसे इकट्ठा करने, दोबारा इस्तेमाल करने या रिसाइकिल करने की व्यवस्था में भी निर्माता की हिस्सेदारी हो। इलेक्ट्रॉनिक सामान, बैटरी और प्लास्टिक जैसे क्षेत्रों में इस तरह के मॉडल अलग-अलग रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। अब फैशन उद्योग को भी इसी दायरे में लाने की मांग उठ रही है।

एक प्रस्ताव यह है कि फैशन ब्रांड्स से बाजार में उतारे गए प्रत्येक कपड़े के आधार पर पर्यावरण शुल्क लिया जाए। जो कंपनी जितनी ज्यादा मात्रा में कपड़े बेचेगी, उसकी जिम्मेदारी भी उसी अनुपात में बढ़ेगी। इस रकम से पुराने कपड़ों के लिए कलेक्शन सेंटर, सॉर्टिंग यूनिट और टेक्सटाइल रिसाइक्लिंग सिस्टम तैयार किए जा सकते हैं। इससे कचरे के निपटान का पूरा बोझ सरकार पर नहीं रहेगा। कंपनियों को भी अपने उत्पाद के पूरे जीवन चक्र की लागत का कुछ हिस्सा उठाना पड़ेगा।

हालांकि सभी कपड़ों पर एक जैसा टैक्स लगाने का विचार भी सवालों के घेरे में है। एक मजबूत और लंबे समय तक चलने वाली जैकेट की तुलना ऐसे सस्ते टॉप से नहीं की जा सकती जो कुछ धुलाई के बाद खराब हो जाए। इसी वजह से पर्यावरण विशेषज्ञ ‘इको-मॉड्यूलेटेड फीस’ जैसे मॉडल की बात करते हैं। इसमें ज्यादा टिकाऊ, मरम्मत योग्य और आसानी से रिसाइकिल होने वाले कपड़ों पर कम शुल्क लगाया जा सकता है। वहीं जल्दी खराब होने वाले और मुश्किल से रिसाइकिल होने वाले उत्पादों पर ज्यादा शुल्क रखने का विकल्प हो सकता है।

ऐसी व्यवस्था लागू होने पर कंपनियों के लिए कपड़े की गुणवत्ता केवल ग्राहक संतुष्टि का सवाल नहीं रहेगी। खराब गुणवत्ता वाला उत्पाद जितनी जल्दी कचरा बनेगा, कंपनी पर उतना अधिक आर्थिक बोझ पड़ सकता है। इससे ब्रांड्स को डिजाइन के समय ही यह सोचना पड़ेगा कि उनका बनाया कपड़ा कितने समय तक चलेगा और इस्तेमाल खत्म होने के बाद उसका क्या होगा। अभी तक फैशन उद्योग में बिक्री और नए कलेक्शन की रफ्तार पर ज्यादा जोर रहता है। टैक्स व्यवस्था इस गणित को बदल सकती है।

लेकिन उद्योग की तरफ से एक बड़ा सवाल कीमतों को लेकर उठता है। अगर कंपनियों पर अतिरिक्त पर्यावरण शुल्क लगाया गया तो वे इस लागत को ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं। इसका मतलब है कि कपड़ों की कीमत बढ़ सकती है। खासकर कम कीमत वाले कपड़े खरीदने वाले परिवारों पर इसका ज्यादा असर पड़ने की आशंका है। आलोचकों का कहना है कि पर्यावरण बचाने के नाम पर ऐसा सिस्टम नहीं बनना चाहिए जिसमें कंपनियां टैक्स का पूरा खर्च कीमत बढ़ाकर ग्राहक से ही वसूल लें।

इसका एक रास्ता शुल्क को केवल कीमत से नहीं बल्कि कपड़े के पर्यावरणीय प्रभाव से जोड़ना हो सकता है। उदाहरण के लिए, ज्यादा टिकाऊ और आसानी से रिसाइकिल होने वाले कपड़े को कम शुल्क मिले। ऐसे कपड़े जिनमें जटिल मिश्रित फाइबर हैं और जिन्हें दोबारा इस्तेमाल करना मुश्किल है, उन पर अधिक शुल्क लगाया जाए। इससे बेहतर डिजाइन बनाने वाली कंपनियों को आर्थिक फायदा मिलेगा। वहीं बहुत कम गुणवत्ता के कपड़े बड़ी मात्रा में बाजार में उतारने वाले ब्रांड्स की लागत बढ़ सकती है।

टेक्सटाइल कचरे की समस्या का समाधान केवल रिसाइक्लिंग से भी संभव नहीं माना जा रहा। पुराने कपड़े को नए कपड़े में बदलना तकनीकी रूप से काफी मुश्किल है। खासकर मिश्रित फाइबर वाले कपड़ों में अलग-अलग सामग्री को अलग करना महंगा पड़ता है। कई मामलों में पुराने कपड़ों से कम गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाए जाते हैं, जिसे वास्तविक ‘क्लोज्ड लूप रिसाइक्लिंग’ नहीं माना जाता। इसलिए विशेषज्ञों का जोर कपड़ों की उम्र बढ़ाने और कम मात्रा में बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाने पर भी है।

कंपनियों के लिए ‘टेक-बैक सिस्टम’ भी एक विकल्प हो सकता है। इसमें ग्राहक पुराने कपड़े संबंधित ब्रांड के स्टोर या कलेक्शन पॉइंट पर वापस जमा कर सके। कंपनी उन कपड़ों को उनकी स्थिति के अनुसार दोबारा बेच सकती है, मरम्मत करा सकती है, दान कर सकती है या रिसाइक्लिंग के लिए भेज सकती है। बदले में ग्राहक को डिस्काउंट या क्रेडिट दिया जा सकता है। हालांकि ऐसी योजनाओं में पारदर्शिता जरूरी होगी ताकि वापस लिए गए कपड़े केवल दूसरे देशों में भेजकर समस्या को आगे न बढ़ाया जाए।

पुराने कपड़ों के निर्यात को लेकर भी लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। विकसित देशों से इस्तेमाल किए गए कपड़ों की बड़ी खेप दूसरे बाजारों में सेकेंड हैंड बिक्री के लिए भेजी जाती है। इनमें अच्छी स्थिति वाले कपड़े दोबारा इस्तेमाल हो जाते हैं, लेकिन खराब गुणवत्ता वाला हिस्सा स्थानीय स्तर पर कचरा बन सकता है। इससे एक देश में पैदा हुआ फैशन वेस्ट दूसरे देश की समस्या बन जाता है। आलोचकों का कहना है कि इसे रिसाइक्लिंग बताकर कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं।

भारत में यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश दुनिया के बड़े टेक्सटाइल उत्पादकों और उपभोक्ता बाजारों में शामिल है। ऑनलाइन शॉपिंग, सोशल मीडिया और कम कीमत वाले फैशन ब्रांड्स के विस्तार के साथ युवाओं में कपड़े खरीदने की रफ्तार बदली है। दूसरी तरफ भारत में पुराने कपड़ों के दोबारा इस्तेमाल की मजबूत परंपरा भी रही है। परिवार में कपड़े आगे देना, उनसे घरेलू सामान बनाना या सेकेंड हैंड बाजार तक पहुंचाना सामान्य रहा है। लेकिन कम गुणवत्ता वाले सिंथेटिक कपड़ों की बढ़ती मात्रा इस पुराने सिस्टम के लिए नई चुनौती बन सकती है।

अगर भारत में भविष्य में फैशन सेक्टर के लिए मजबूत EPR व्यवस्था लागू होती है तो बड़े ब्रांड्स को पुराने कपड़ों की जिम्मेदारी उठानी पड़ सकती है। इसके लिए शहरों में टेक्सटाइल कलेक्शन पॉइंट बनाने होंगे। कपड़ों को सामान्य गीले-सूखे कचरे से अलग रखने की व्यवस्था भी जरूरी होगी। इसके बाद उनकी गुणवत्ता और फाइबर के हिसाब से छंटाई करनी होगी। इस पूरी व्यवस्था के लिए बड़े निवेश की जरूरत होगी और सवाल यही है कि इसका खर्च सरकार उठाए या कपड़े बाजार में उतारने वाली कंपनियां।

ब्रांड्स पर टैक्स लगाने के साथ छोटे कारोबारियों की स्थिति भी देखनी होगी। किसी स्थानीय दर्जी या छोटे कपड़ा निर्माता को उसी नियम में रखना व्यावहारिक नहीं होगा जिसमें करोड़ों कपड़े बेचने वाली ग्लोबल कंपनी आती है। इसलिए उत्पादन और बिक्री की मात्रा के आधार पर अलग-अलग जिम्मेदारी तय की जा सकती है। ज्यादा कपड़े बाजार में उतारने वाले बड़े ब्रांड्स को ज्यादा योगदान देना पड़े, जबकि छोटे कारोबारियों के लिए सरल नियम बनाए जा सकते हैं।

ग्राहकों की भूमिका भी इस बहस से अलग नहीं है। बहुत कम कीमत देखकर जरूरत से ज्यादा कपड़े खरीदना, ट्रेंड बदलते ही उन्हें छोड़ देना और खराब होने पर मरम्मत के बजाय नया उत्पाद लेना भी टेक्सटाइल कचरे को बढ़ाता है। कपड़ों को लंबे समय तक इस्तेमाल करना, सेकेंड हैंड फैशन अपनाना और जरूरत के हिसाब से खरीदारी करना कचरा कम कर सकता है। लेकिन पर्यावरण समूहों का कहना है कि समस्या की पूरी जिम्मेदारी ग्राहक पर डालना भी उचित नहीं है।

फैशन कंपनियां विज्ञापन, सोशल मीडिया और लगातार बदलते कलेक्शन के जरिए ग्राहकों को बार-बार नई खरीदारी के लिए प्रेरित करती हैं। अगर बिजनेस मॉडल का आधार ही कम समय में ज्यादा कपड़े बेचना है तो उससे पैदा होने वाले कचरे की जिम्मेदारी में कंपनियों की हिस्सेदारी भी होनी चाहिए। यही वजह है कि ‘पोल्यूटर पेज’ यानी प्रदूषण फैलाने वाला उसकी कीमत चुकाए, का सिद्धांत फैशन उद्योग के संदर्भ में तेजी से चर्चा में आ रहा है।

एक मजबूत नीति के तहत कंपनियों को हर साल यह बताना पड़ सकता है कि उन्होंने कितने कपड़े बाजार में उतारे और उनमें से कितने वापस एकत्र किए। कितने उत्पाद दोबारा इस्तेमाल हुए, कितने रिसाइकिल किए गए और कितना कचरा लैंडफिल में गया, इसका सार्वजनिक डेटा भी जरूरी हो सकता है। इससे ‘सस्टेनेबल’ और ‘इको-फ्रेंडली’ जैसे दावों की वास्तविकता जांचना आसान होगा। अभी कई कंपनियों पर ग्रीनवॉशिंग यानी पर्यावरण के अनुकूल होने के बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने के आरोप लगते रहे हैं।

फास्ट फैशन वेस्ट की बहस आखिरकार एक सस्ती टी-शर्ट की वास्तविक कीमत तक पहुंचती है। दुकान या ऐप पर दिखाई देने वाली कीमत में कपड़ा, मजदूरी, परिवहन और कंपनी का मुनाफा शामिल होता है, लेकिन उसके कचरा बनने के बाद की लागत दिखाई नहीं देती। उसे इकट्ठा करने, छांटने, रिसाइकिल करने या लैंडफिल में रखने का खर्च कोई और उठाता है। अगर यह लागत भी उत्पाद की वास्तविक कीमत में शामिल की जाए तो बेहद सस्ते और जल्दी फेंके जाने वाले फैशन का पूरा आर्थिक मॉडल बदल सकता है।

सरकारों के सामने चुनौती ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें पर्यावरणीय नुकसान की कीमत तय हो, लेकिन आम ग्राहकों और छोटे कारोबारियों पर अचानक भारी बोझ न पड़े। टिकाऊ कपड़ों को प्रोत्साहन, खराब गुणवत्ता वाले उत्पादों पर ज्यादा शुल्क, ब्रांड्स के लिए टेक-बैक सिस्टम और आधुनिक टेक्सटाइल रिसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर इसके संभावित रास्ते हो सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है—कपड़े बेचने वाली कंपनी की जिम्मेदारी क्या बिक्री के साथ खत्म हो जानी चाहिए, या उसे उस दिन तक जिम्मेदार रहना चाहिए जब उसका बनाया कपड़ा कचरे के ढेर तक पहुंचता है?

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21 Jul 2026 By Priyanka

सस्ते कपड़ों की असली कीमत कौन चुकाए? Fast Fashion ब्रांड्स पर ‘वेस्ट टैक्स’ लगाने की बढ़ी बहस

Priyanka Mathur

कम कीमत, हर हफ्ते बदलते डिजाइन और मोबाइल ऐप पर लगातार मिलने वाले डिस्काउंट ने कपड़े खरीदने का तरीका तेजी से बदल दिया है। पहले लोग किसी कपड़े को लंबे समय तक इस्तेमाल करने के हिसाब से खरीदते थे, लेकिन अब फैशन का एक बड़ा बाजार ऐसे कपड़ों पर टिक गया है जो कुछ महीनों या कई बार कुछ ही बार पहनने के बाद अलमारी से बाहर हो जाते हैं। इसे अल्ट्रा-फास्ट फैशन कहा जाता है। सस्ते कपड़ों की बढ़ती बिक्री के साथ अब उनका कचरा भी बड़ी पर्यावरणीय समस्या बन रहा है। इसी वजह से सवाल उठ रहा है कि इन कपड़ों को आखिर में ठिकाने लगाने और पर्यावरण की सफाई का खर्च कौन उठाए।

फास्ट फैशन का बिजनेस मॉडल तेजी से नए ट्रेंड बाजार में उतारने पर आधारित है। सोशल मीडिया पर किसी सेलिब्रिटी या इन्फ्लुएंसर का कोई डिजाइन वायरल हुआ तो कुछ ही समय में उससे मिलते-जुलते कपड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिक्री के लिए उपलब्ध हो जाते हैं। कीमत कम होने के कारण ग्राहक जरूरत से ज्यादा खरीदारी भी कर लेते हैं। ट्रेंड बदलते ही वही कपड़े पुराने लगने लगते हैं। कई कपड़े खराब होने से पहले ही इस्तेमाल से बाहर हो जाते हैं और यहीं से Fast Fashion Waste की समस्या शुरू होती है।

पुराने कपड़ों का हर हिस्सा आसानी से रिसाइकिल नहीं किया जा सकता। आज बाजार में मिलने वाले बहुत से कपड़े कॉटन, पॉलिएस्टर, नायलॉन और दूसरे सिंथेटिक फाइबर के मिश्रण से बनाए जाते हैं। इनमें बटन, जिप, इलास्टिक, प्रिंट और अलग-अलग तरह के धागे भी इस्तेमाल होते हैं। ऐसे कपड़ों को रिसाइक्लिंग के दौरान अलग करना मुश्किल और महंगा पड़ता है। नतीजा यह होता है कि बड़ी मात्रा में पुराने कपड़े लैंडफिल तक पहुंच जाते हैं या उन्हें जलाकर नष्ट किया जाता है, जिससे पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

यहीं से फैशन कंपनियों की जिम्मेदारी को लेकर बहस तेज होती है। अभी आम तौर पर कोई कंपनी कपड़ा बनाती है, उसे बेचती है और ग्राहक तक पहुंचने के बाद उसकी जिम्मेदारी लगभग खत्म हो जाती है। ग्राहक जब उस कपड़े को फेंकता है तो उसे संभालने का खर्च स्थानीय कचरा प्रबंधन व्यवस्था पर आता है। यानी सफाई, कलेक्शन और लैंडफिल का खर्च आखिरकार सरकार, नगर निकाय या टैक्स देने वाले लोगों को उठाना पड़ता है। पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञ पूछ रहे हैं कि जिस कंपनी ने उत्पाद बेचकर मुनाफा कमाया, क्या उसे उसके कचरे की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त रहना चाहिए?

इसी सवाल के जवाब में Extended Producer Responsibility यानी EPR का मॉडल चर्चा में है। इसका सीधा मतलब है कि किसी उत्पाद को बनाने वाली कंपनी की जिम्मेदारी उसकी बिक्री के साथ खत्म न हो। उत्पाद इस्तेमाल के बाद जब कचरा बन जाए, तब उसे इकट्ठा करने, दोबारा इस्तेमाल करने या रिसाइकिल करने की व्यवस्था में भी निर्माता की हिस्सेदारी हो। इलेक्ट्रॉनिक सामान, बैटरी और प्लास्टिक जैसे क्षेत्रों में इस तरह के मॉडल अलग-अलग रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। अब फैशन उद्योग को भी इसी दायरे में लाने की मांग उठ रही है।

एक प्रस्ताव यह है कि फैशन ब्रांड्स से बाजार में उतारे गए प्रत्येक कपड़े के आधार पर पर्यावरण शुल्क लिया जाए। जो कंपनी जितनी ज्यादा मात्रा में कपड़े बेचेगी, उसकी जिम्मेदारी भी उसी अनुपात में बढ़ेगी। इस रकम से पुराने कपड़ों के लिए कलेक्शन सेंटर, सॉर्टिंग यूनिट और टेक्सटाइल रिसाइक्लिंग सिस्टम तैयार किए जा सकते हैं। इससे कचरे के निपटान का पूरा बोझ सरकार पर नहीं रहेगा। कंपनियों को भी अपने उत्पाद के पूरे जीवन चक्र की लागत का कुछ हिस्सा उठाना पड़ेगा।

हालांकि सभी कपड़ों पर एक जैसा टैक्स लगाने का विचार भी सवालों के घेरे में है। एक मजबूत और लंबे समय तक चलने वाली जैकेट की तुलना ऐसे सस्ते टॉप से नहीं की जा सकती जो कुछ धुलाई के बाद खराब हो जाए। इसी वजह से पर्यावरण विशेषज्ञ ‘इको-मॉड्यूलेटेड फीस’ जैसे मॉडल की बात करते हैं। इसमें ज्यादा टिकाऊ, मरम्मत योग्य और आसानी से रिसाइकिल होने वाले कपड़ों पर कम शुल्क लगाया जा सकता है। वहीं जल्दी खराब होने वाले और मुश्किल से रिसाइकिल होने वाले उत्पादों पर ज्यादा शुल्क रखने का विकल्प हो सकता है।

ऐसी व्यवस्था लागू होने पर कंपनियों के लिए कपड़े की गुणवत्ता केवल ग्राहक संतुष्टि का सवाल नहीं रहेगी। खराब गुणवत्ता वाला उत्पाद जितनी जल्दी कचरा बनेगा, कंपनी पर उतना अधिक आर्थिक बोझ पड़ सकता है। इससे ब्रांड्स को डिजाइन के समय ही यह सोचना पड़ेगा कि उनका बनाया कपड़ा कितने समय तक चलेगा और इस्तेमाल खत्म होने के बाद उसका क्या होगा। अभी तक फैशन उद्योग में बिक्री और नए कलेक्शन की रफ्तार पर ज्यादा जोर रहता है। टैक्स व्यवस्था इस गणित को बदल सकती है।

लेकिन उद्योग की तरफ से एक बड़ा सवाल कीमतों को लेकर उठता है। अगर कंपनियों पर अतिरिक्त पर्यावरण शुल्क लगाया गया तो वे इस लागत को ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं। इसका मतलब है कि कपड़ों की कीमत बढ़ सकती है। खासकर कम कीमत वाले कपड़े खरीदने वाले परिवारों पर इसका ज्यादा असर पड़ने की आशंका है। आलोचकों का कहना है कि पर्यावरण बचाने के नाम पर ऐसा सिस्टम नहीं बनना चाहिए जिसमें कंपनियां टैक्स का पूरा खर्च कीमत बढ़ाकर ग्राहक से ही वसूल लें।

इसका एक रास्ता शुल्क को केवल कीमत से नहीं बल्कि कपड़े के पर्यावरणीय प्रभाव से जोड़ना हो सकता है। उदाहरण के लिए, ज्यादा टिकाऊ और आसानी से रिसाइकिल होने वाले कपड़े को कम शुल्क मिले। ऐसे कपड़े जिनमें जटिल मिश्रित फाइबर हैं और जिन्हें दोबारा इस्तेमाल करना मुश्किल है, उन पर अधिक शुल्क लगाया जाए। इससे बेहतर डिजाइन बनाने वाली कंपनियों को आर्थिक फायदा मिलेगा। वहीं बहुत कम गुणवत्ता के कपड़े बड़ी मात्रा में बाजार में उतारने वाले ब्रांड्स की लागत बढ़ सकती है।

टेक्सटाइल कचरे की समस्या का समाधान केवल रिसाइक्लिंग से भी संभव नहीं माना जा रहा। पुराने कपड़े को नए कपड़े में बदलना तकनीकी रूप से काफी मुश्किल है। खासकर मिश्रित फाइबर वाले कपड़ों में अलग-अलग सामग्री को अलग करना महंगा पड़ता है। कई मामलों में पुराने कपड़ों से कम गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाए जाते हैं, जिसे वास्तविक ‘क्लोज्ड लूप रिसाइक्लिंग’ नहीं माना जाता। इसलिए विशेषज्ञों का जोर कपड़ों की उम्र बढ़ाने और कम मात्रा में बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाने पर भी है।

कंपनियों के लिए ‘टेक-बैक सिस्टम’ भी एक विकल्प हो सकता है। इसमें ग्राहक पुराने कपड़े संबंधित ब्रांड के स्टोर या कलेक्शन पॉइंट पर वापस जमा कर सके। कंपनी उन कपड़ों को उनकी स्थिति के अनुसार दोबारा बेच सकती है, मरम्मत करा सकती है, दान कर सकती है या रिसाइक्लिंग के लिए भेज सकती है। बदले में ग्राहक को डिस्काउंट या क्रेडिट दिया जा सकता है। हालांकि ऐसी योजनाओं में पारदर्शिता जरूरी होगी ताकि वापस लिए गए कपड़े केवल दूसरे देशों में भेजकर समस्या को आगे न बढ़ाया जाए।

पुराने कपड़ों के निर्यात को लेकर भी लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। विकसित देशों से इस्तेमाल किए गए कपड़ों की बड़ी खेप दूसरे बाजारों में सेकेंड हैंड बिक्री के लिए भेजी जाती है। इनमें अच्छी स्थिति वाले कपड़े दोबारा इस्तेमाल हो जाते हैं, लेकिन खराब गुणवत्ता वाला हिस्सा स्थानीय स्तर पर कचरा बन सकता है। इससे एक देश में पैदा हुआ फैशन वेस्ट दूसरे देश की समस्या बन जाता है। आलोचकों का कहना है कि इसे रिसाइक्लिंग बताकर कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं।

भारत में यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश दुनिया के बड़े टेक्सटाइल उत्पादकों और उपभोक्ता बाजारों में शामिल है। ऑनलाइन शॉपिंग, सोशल मीडिया और कम कीमत वाले फैशन ब्रांड्स के विस्तार के साथ युवाओं में कपड़े खरीदने की रफ्तार बदली है। दूसरी तरफ भारत में पुराने कपड़ों के दोबारा इस्तेमाल की मजबूत परंपरा भी रही है। परिवार में कपड़े आगे देना, उनसे घरेलू सामान बनाना या सेकेंड हैंड बाजार तक पहुंचाना सामान्य रहा है। लेकिन कम गुणवत्ता वाले सिंथेटिक कपड़ों की बढ़ती मात्रा इस पुराने सिस्टम के लिए नई चुनौती बन सकती है।

अगर भारत में भविष्य में फैशन सेक्टर के लिए मजबूत EPR व्यवस्था लागू होती है तो बड़े ब्रांड्स को पुराने कपड़ों की जिम्मेदारी उठानी पड़ सकती है। इसके लिए शहरों में टेक्सटाइल कलेक्शन पॉइंट बनाने होंगे। कपड़ों को सामान्य गीले-सूखे कचरे से अलग रखने की व्यवस्था भी जरूरी होगी। इसके बाद उनकी गुणवत्ता और फाइबर के हिसाब से छंटाई करनी होगी। इस पूरी व्यवस्था के लिए बड़े निवेश की जरूरत होगी और सवाल यही है कि इसका खर्च सरकार उठाए या कपड़े बाजार में उतारने वाली कंपनियां।

ब्रांड्स पर टैक्स लगाने के साथ छोटे कारोबारियों की स्थिति भी देखनी होगी। किसी स्थानीय दर्जी या छोटे कपड़ा निर्माता को उसी नियम में रखना व्यावहारिक नहीं होगा जिसमें करोड़ों कपड़े बेचने वाली ग्लोबल कंपनी आती है। इसलिए उत्पादन और बिक्री की मात्रा के आधार पर अलग-अलग जिम्मेदारी तय की जा सकती है। ज्यादा कपड़े बाजार में उतारने वाले बड़े ब्रांड्स को ज्यादा योगदान देना पड़े, जबकि छोटे कारोबारियों के लिए सरल नियम बनाए जा सकते हैं।

ग्राहकों की भूमिका भी इस बहस से अलग नहीं है। बहुत कम कीमत देखकर जरूरत से ज्यादा कपड़े खरीदना, ट्रेंड बदलते ही उन्हें छोड़ देना और खराब होने पर मरम्मत के बजाय नया उत्पाद लेना भी टेक्सटाइल कचरे को बढ़ाता है। कपड़ों को लंबे समय तक इस्तेमाल करना, सेकेंड हैंड फैशन अपनाना और जरूरत के हिसाब से खरीदारी करना कचरा कम कर सकता है। लेकिन पर्यावरण समूहों का कहना है कि समस्या की पूरी जिम्मेदारी ग्राहक पर डालना भी उचित नहीं है।

फैशन कंपनियां विज्ञापन, सोशल मीडिया और लगातार बदलते कलेक्शन के जरिए ग्राहकों को बार-बार नई खरीदारी के लिए प्रेरित करती हैं। अगर बिजनेस मॉडल का आधार ही कम समय में ज्यादा कपड़े बेचना है तो उससे पैदा होने वाले कचरे की जिम्मेदारी में कंपनियों की हिस्सेदारी भी होनी चाहिए। यही वजह है कि ‘पोल्यूटर पेज’ यानी प्रदूषण फैलाने वाला उसकी कीमत चुकाए, का सिद्धांत फैशन उद्योग के संदर्भ में तेजी से चर्चा में आ रहा है।

एक मजबूत नीति के तहत कंपनियों को हर साल यह बताना पड़ सकता है कि उन्होंने कितने कपड़े बाजार में उतारे और उनमें से कितने वापस एकत्र किए। कितने उत्पाद दोबारा इस्तेमाल हुए, कितने रिसाइकिल किए गए और कितना कचरा लैंडफिल में गया, इसका सार्वजनिक डेटा भी जरूरी हो सकता है। इससे ‘सस्टेनेबल’ और ‘इको-फ्रेंडली’ जैसे दावों की वास्तविकता जांचना आसान होगा। अभी कई कंपनियों पर ग्रीनवॉशिंग यानी पर्यावरण के अनुकूल होने के बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने के आरोप लगते रहे हैं।

फास्ट फैशन वेस्ट की बहस आखिरकार एक सस्ती टी-शर्ट की वास्तविक कीमत तक पहुंचती है। दुकान या ऐप पर दिखाई देने वाली कीमत में कपड़ा, मजदूरी, परिवहन और कंपनी का मुनाफा शामिल होता है, लेकिन उसके कचरा बनने के बाद की लागत दिखाई नहीं देती। उसे इकट्ठा करने, छांटने, रिसाइकिल करने या लैंडफिल में रखने का खर्च कोई और उठाता है। अगर यह लागत भी उत्पाद की वास्तविक कीमत में शामिल की जाए तो बेहद सस्ते और जल्दी फेंके जाने वाले फैशन का पूरा आर्थिक मॉडल बदल सकता है।

सरकारों के सामने चुनौती ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें पर्यावरणीय नुकसान की कीमत तय हो, लेकिन आम ग्राहकों और छोटे कारोबारियों पर अचानक भारी बोझ न पड़े। टिकाऊ कपड़ों को प्रोत्साहन, खराब गुणवत्ता वाले उत्पादों पर ज्यादा शुल्क, ब्रांड्स के लिए टेक-बैक सिस्टम और आधुनिक टेक्सटाइल रिसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर इसके संभावित रास्ते हो सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है—कपड़े बेचने वाली कंपनी की जिम्मेदारी क्या बिक्री के साथ खत्म हो जानी चाहिए, या उसे उस दिन तक जिम्मेदार रहना चाहिए जब उसका बनाया कपड़ा कचरे के ढेर तक पहुंचता है?

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अडाणी एनर्जी का मुनाफा 124% बढ़ा, पहली तिमाही में ₹1,149 करोड़ पहुंचा अडाणी एनर्जी का मुनाफा 124% बढ़ा, पहली तिमाही में ₹1,149 करोड़ पहुंचा
अप्रैल-जून में कंपनी का रेवेन्यू 42.4% बढ़कर ₹9,711 करोड़; ट्रांसमिशन, स्मार्ट मीटरिंग और एनर्जी सॉल्यूशंस कारोबार में मजबूत बढ़त
शेयर बाजार की सपाट शुरुआत, सेंसेक्स-निफ्टी पर वैश्विक तनाव का असर; कच्चे तेल और बिटकॉइन पर भी नजर
सरकार का बड़ा बयान: E20 पेट्रोल से इंजन पर असर नहीं, LTCG टैक्स में राहत का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं
सर्राफा बाजार में फिर चमका सोना-चांदी, गोल्ड ₹1.42 लाख के करीब; चांदी ₹2.19 लाख प्रति किलो
महंगे कच्चे तेल ने बढ़ाई भारत की चिंता, ब्रेंट $90 के पार; महंगाई से रुपए तक दिख सकता है असर
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