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बारिश में स्क्रीन से बनाएं दूरी, ‘स्लो हॉबीज’ बन रही डिजिटल डिटॉक्स का नया तरीका
लाइफ स्टाइल
घंटों मोबाइल स्क्रॉल करने की जगह किताबें, पेंटिंग, बुनाई और बोर्ड गेम जैसी पुरानी आदतों की ओर लौट रहे लोग; मानसून में घर के भीतर बिताए समय को बनाया जा सकता है स्क्रीन-फ्री
बारिश का मौसम आते ही लोगों की दिनचर्या काफी बदल जाती है। तेज बारिश हो तो बाहर निकलना मुश्किल, वीकेंड की योजनाएं रद्द और कई बार घंटों घर में ही रहना पड़ता है। ऐसे समय में सबसे आसान विकल्प मोबाइल फोन बन जाता है। थोड़ी देर सोशल मीडिया देखा, फिर एक रील से दूसरी रील और देखते-देखते घंटा निकल गया। OTT, शॉर्ट वीडियो, न्यूज अपडेट और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन के बीच खाली समय भी स्क्रीन टाइम में बदल जाता है। इसी आदत से दूरी बनाने के लिए इन दिनों Digital Detoxing with Slow Hobbies का विचार चर्चा में है। इसका सीधा मतलब है—कुछ समय के लिए मोबाइल, लैपटॉप और दूसरी स्क्रीन से जानबूझकर दूरी बनाना और उसकी जगह ऐसी गतिविधियां करना जिन्हें धीरे, धैर्य और ध्यान के साथ किया जाता है। बारिश के दिनों में किताब पढ़ना, वाटरकलर पेंटिंग करना, बुनाई सीखना, डायरी लिखना, पजल बनाना या परिवार के साथ कोई बोर्ड गेम खेलना इसी सोच का हिस्सा है।
डिजिटल डिटॉक्स का मतलब यह नहीं कि फोन बंद करके कई दिनों के लिए दुनिया से संपर्क तोड़ लिया जाए। रोजमर्रा की जिंदगी में मोबाइल जरूरी है। ऑफिस के मैसेज, बैंकिंग, टिकट, पढ़ाई और परिवार से संपर्क तक बहुत कुछ इसी पर निर्भर है। परेशानी तब शुरू होती है जब जरूरत के अलावा बचा हुआ लगभग हर खाली मिनट भी स्क्रीन के सामने गुजरने लगे। सुबह आंख खुलते ही फोन देखना, खाने के दौरान वीडियो चलाना और सोने से पहले बिना किसी खास मकसद के सोशल मीडिया स्क्रॉल करते रहना आम आदत बन चुकी है। ‘स्लो हॉबीज’ इसी लगातार डिजिटल उत्तेजना के बीच थोड़ी धीमी जगह बनाने की कोशिश हैं। इनमें तुरंत कोई नोटिफिकेशन, लाइक या नया वीडियो नहीं मिलता। काम धीरे आगे बढ़ता है। एक किताब के 20 पन्ने पढ़ने पड़ते हैं, पेंटिंग बनने में समय लगता है, बुनाई में एक-एक फंदा जोड़ना पड़ता है और शतरंज या दूसरे बोर्ड गेम में अगली चाल सोचनी होती है। यही धीमापन इन गतिविधियों की खासियत है।
मानसून इसके लिए स्वाभाविक मौका देता है। बाहर लगातार पानी बरस रहा हो, सड़कें गीली हों और घर से निकलने का मन न करे तो सामान्य तौर पर हाथ सबसे पहले फोन की तरफ जाता है। इसकी जगह एक तय स्क्रीन-फ्री समय रखा जा सकता है। जरूरी नहीं कि शुरुआत कई घंटों से हो। रोज 30 मिनट या एक घंटे के लिए फोन को दूसरे कमरे में रखकर कोई ऑफलाइन गतिविधि करना भी शुरुआत हो सकती है। किताब पढ़ना सबसे आसान विकल्पों में है। यहां खास बात लंबे लेख, उपन्यास, कहानी संग्रह या नॉन-फिक्शन जैसी ‘लॉन्ग-फॉर्म रीडिंग’ की है। मोबाइल पर छोटी पोस्ट और लगातार बदलते वीडियो देखने की आदत के उलट किताब एक ही विषय पर लंबे समय तक ध्यान बनाए रखने को कहती है। बारिश की आवाज के बीच चाय और किताब वाला दृश्य भले थोड़ा फिल्मी लगे, लेकिन स्क्रीन से दूरी बनाने के लिए इसमें किसी खास तैयारी की जरूरत भी नहीं पड़ती।
जिन लोगों को पढ़ना पसंद नहीं, उनके लिए ड्रॉइंग और वाटरकलर पेंटिंग एक विकल्प हो सकती है। इसके लिए कलाकार होना जरूरी नहीं। सामने की खिड़की, बारिश में भीगा पेड़, चाय का कप या कोई साधारण आकृति भी बनाई जा सकती है। यहां मकसद बेहतरीन पेंटिंग बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करना नहीं, बल्कि कुछ देर हाथ और दिमाग को एक ही काम में लगाना है। डिजिटल डिटॉक्स तभी मायने रखता है जब हॉबी खुद नया कंटेंट बनाने की दौड़ में न बदल जाए। अगर पेंटिंग करते ही अगला विचार उसकी फोटो लेकर इंस्टाग्राम पर डालने का है तो स्क्रीन से बनी दूरी कुछ मिनट में फिर खत्म हो सकती है।
बुनाई, क्रोशिया और हाथ से बनाई जाने वाली चीजों में भी लोगों की दिलचस्पी दोबारा बढ़ी है। कभी इन्हें घर के बड़े-बुजुर्गों की सामान्य दिनचर्या का हिस्सा माना जाता था, लेकिन अब युवा भी इन्हें सीख रहे हैं। शुरुआत मुश्किल लग सकती है। धागा उलझता है, फंदा छूट जाता है और बनी हुई चीज कई बार वैसी नहीं दिखती जैसी वीडियो में दिखाई गई थी। यही इसकी खूबी भी है। हर काम तुरंत परफेक्ट होना जरूरी नहीं। धीरे-धीरे सीखना, गलती खोलना और फिर दोबारा बनाना इस प्रक्रिया का हिस्सा है। स्क्रीन की दुनिया में जहां कुछ सेकंड में नया कंटेंट सामने आ जाता है, वहां किसी एक चीज को घंटों या कई दिनों में तैयार करना बिल्कुल अलग अनुभव देता है।
परिवार के साथ रहने वालों के लिए बोर्ड गेम भी अच्छा स्क्रीन-फ्री विकल्प हो सकता है। शतरंज, कैरम, लूडो, स्क्रैबल, कार्ड गेम या दूसरे रणनीतिक खेल केवल समय बिताने का जरिया नहीं हैं। इनकी सबसे बड़ी बात यह है कि इनमें सामने बैठे व्यक्ति से वास्तविक बातचीत होती है। फोन पर ऑनलाइन गेम खेलते समय भी लोग साथ होते हुए अलग-अलग स्क्रीन में खोए रह सकते हैं, जबकि बोर्ड गेम में सभी का ध्यान एक ही जगह रहता है। चाल को लेकर बहस होती है, कोई नियम भूलता है, कोई हारने पर नाराज भी होता है। यह सब डिजिटल बातचीत से अलग और ज्यादा स्वाभाविक अनुभव है।
एक और आसान स्लो हॉबी है हाथ से लिखना। डायरी लिखना, पुराने दिनों की कोई घटना नोट करना, अगले महीने की योजनाएं कागज पर बनाना या किसी अपने के लिए चिट्ठी लिखना। इसके लिए महंगी डायरी या खास स्टेशनरी जरूरी नहीं। सामान्य कॉपी और पेन काफी हैं। फोन के नोट्स ऐप में तेजी से टाइप करने की तुलना में हाथ से लिखने की गति धीमी होती है। इसी कारण व्यक्ति शब्दों को थोड़ा ज्यादा सोचकर लिखता है। कुछ लोग बारिश के दिनों में ‘रेन जर्नल’ भी बना सकते हैं—आज मौसम कैसा था, क्या पढ़ा, क्या बनाया या दिन में कौन-सी छोटी बात अच्छी लगी। इसे किसी को दिखाना जरूरी नहीं।
जिगसॉ पजल भी ऐसा काम है जिसमें शुरुआत के कुछ मिनटों बाद फोन देखने की इच्छा धीरे-धीरे कम हो सकती है। सैकड़ों छोटे टुकड़ों में सही रंग और आकार तलाशना धैर्य मांगता है। यही बात मॉडल बनाने, मिट्टी से छोटी चीजें तैयार करने, ओरिगामी या पुराने फोटो एल्बम व्यवस्थित करने पर भी लागू होती है। ‘स्लो हॉबी’ की कोई सख्त सूची नहीं है। सामान्य नियम इतना है कि गतिविधि स्क्रीन पर निर्भर न हो, उसे पूरा करने में समय लगे और व्यक्ति को लगातार नए डिजिटल कंटेंट की जरूरत न पड़े।
हालांकि डिजिटल डिटॉक्स की कोशिश में एक सामान्य गलती होती है। लोग इसे भी लक्ष्य और प्रदर्शन में बदल देते हैं। कितनी किताबें पढ़ीं, कितनी पेंटिंग बनाई या कितने दिन सोशल मीडिया नहीं खोला—अगर पूरा ध्यान रिकॉर्ड बनाने पर चला जाए तो आराम की गतिविधि भी नया दबाव बन सकती है। स्लो हॉबी का विचार उत्पादकता बढ़ाने की प्रतियोगिता नहीं है। जरूरी नहीं कि हर घंटे का कोई ‘आउटपुट’ निकले। आधी किताब पढ़कर छोड़ देना, खराब पेंटिंग बनाना या बोर्ड गेम बीच में खत्म कर देना भी ठीक है।
फोन से दूरी बनाने का व्यावहारिक तरीका भी बहुत जटिल नहीं होना चाहिए। बारिश वाली शाम में एक घंटा तय किया जा सकता है जब फोन साइलेंट पर रहे और पहुंच से थोड़ा दूर रखा जाए। परिवार के साथ हैं तो सभी लोग एक साथ ऐसा कर सकते हैं। शुरुआत में बार-बार फोन देखने का मन होना सामान्य है। किसी नोटिफिकेशन की आवाज न आने पर भी ऐसा लग सकता है कि शायद कोई मैसेज आया होगा। यही वह आदत है जिसे धीरे-धीरे बदलने की कोशिश की जाती है।
सबसे मुश्किल हिस्सा अक्सर हॉबी चुनना नहीं बल्कि बोरियत को स्वीकार करना होता है। मोबाइल ने खाली समय को लगभग खत्म कर दिया है। बस का इंतजार हो, लिफ्ट में दो मिनट हों या बारिश के कारण बाहर नहीं जा पा रहे हों—फोन तुरंत उस खाली जगह को भर देता है। स्लो हॉबी उस खाली समय को तुरंत भरने के बजाय थोड़ा रुकना सिखाती है। कई बार पांच-दस मिनट कुछ न करने के बाद ही किताब उठाने, कुछ लिखने या बनाने का मन होता है।
मानसून में इसे एक छोटी घरेलू आदत की तरह अपनाया जा सकता है। एक कोने में कुछ किताबें, स्केचबुक, रंग, ताश या बोर्ड गेम रख दिए जाएं ताकि फोन के अलावा दूसरा विकल्प सामने दिखाई दे। बच्चों वाले घरों में यह तरीका ज्यादा उपयोगी हो सकता है, क्योंकि केवल बच्चों को स्क्रीन छोड़ने के लिए कहना और खुद मोबाइल देखते रहना अक्सर काम नहीं करता। अगर परिवार के लोग साथ बैठकर कोई गेम खेलें, ड्रॉइंग करें या कहानी पढ़ें तो स्क्रीन-फ्री समय ज्यादा स्वाभाविक बन सकता है।
स्लो हॉबी महंगी भी नहीं होनी चाहिए। पुरानी अधूरी किताब दोबारा पढ़ी जा सकती है। अखबार की क्रॉसवर्ड या सुडोकू हल की जा सकती है। घर में पड़े ताश के पत्ते निकाले जा सकते हैं। पेंसिल से स्केच बनाया जा सकता है, पुरानी तस्वीरों का एल्बम व्यवस्थित किया जा सकता है या कोई पारंपरिक खेल सीखा जा सकता है। असली बदलाव गतिविधि में कम और ध्यान देने के तरीके में ज्यादा है।
बारिश के दौरान घर में फंसे रहने को कई लोग बोरियत मानते हैं, लेकिन यही समय लगातार चल रही डिजिटल दिनचर्या से कुछ देर बाहर निकलने का बहाना भी बन सकता है। बाहर बारिश चलती रहे और अंदर हर खाली मिनट रील, न्यूज फीड या वीडियो में न बीते। कुछ समय किताब के पन्नों, रंगों, धागों, कागज या बोर्ड गेम के साथ भी गुजर सकता है। फोन वहीं रहेगा, नोटिफिकेशन भी बाद में देखे जा सकते हैं। फर्क बस इतना है कि दिन के कुछ मिनट स्क्रीन तय नहीं करेगी कि अगला ध्यान किस तरफ जाना है।
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बारिश का मौसम आते ही लोगों की दिनचर्या काफी बदल जाती है। तेज बारिश हो तो बाहर निकलना मुश्किल, वीकेंड की योजनाएं रद्द और कई बार घंटों घर में ही रहना पड़ता है। ऐसे समय में सबसे आसान विकल्प मोबाइल फोन बन जाता है। थोड़ी देर सोशल मीडिया देखा, फिर एक रील से दूसरी रील और देखते-देखते घंटा निकल गया। OTT, शॉर्ट वीडियो, न्यूज अपडेट और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन के बीच खाली समय भी स्क्रीन टाइम में बदल जाता है। इसी आदत से दूरी बनाने के लिए इन दिनों Digital Detoxing with Slow Hobbies का विचार चर्चा में है। इसका सीधा मतलब है—कुछ समय के लिए मोबाइल, लैपटॉप और दूसरी स्क्रीन से जानबूझकर दूरी बनाना और उसकी जगह ऐसी गतिविधियां करना जिन्हें धीरे, धैर्य और ध्यान के साथ किया जाता है। बारिश के दिनों में किताब पढ़ना, वाटरकलर पेंटिंग करना, बुनाई सीखना, डायरी लिखना, पजल बनाना या परिवार के साथ कोई बोर्ड गेम खेलना इसी सोच का हिस्सा है।
डिजिटल डिटॉक्स का मतलब यह नहीं कि फोन बंद करके कई दिनों के लिए दुनिया से संपर्क तोड़ लिया जाए। रोजमर्रा की जिंदगी में मोबाइल जरूरी है। ऑफिस के मैसेज, बैंकिंग, टिकट, पढ़ाई और परिवार से संपर्क तक बहुत कुछ इसी पर निर्भर है। परेशानी तब शुरू होती है जब जरूरत के अलावा बचा हुआ लगभग हर खाली मिनट भी स्क्रीन के सामने गुजरने लगे। सुबह आंख खुलते ही फोन देखना, खाने के दौरान वीडियो चलाना और सोने से पहले बिना किसी खास मकसद के सोशल मीडिया स्क्रॉल करते रहना आम आदत बन चुकी है। ‘स्लो हॉबीज’ इसी लगातार डिजिटल उत्तेजना के बीच थोड़ी धीमी जगह बनाने की कोशिश हैं। इनमें तुरंत कोई नोटिफिकेशन, लाइक या नया वीडियो नहीं मिलता। काम धीरे आगे बढ़ता है। एक किताब के 20 पन्ने पढ़ने पड़ते हैं, पेंटिंग बनने में समय लगता है, बुनाई में एक-एक फंदा जोड़ना पड़ता है और शतरंज या दूसरे बोर्ड गेम में अगली चाल सोचनी होती है। यही धीमापन इन गतिविधियों की खासियत है।
मानसून इसके लिए स्वाभाविक मौका देता है। बाहर लगातार पानी बरस रहा हो, सड़कें गीली हों और घर से निकलने का मन न करे तो सामान्य तौर पर हाथ सबसे पहले फोन की तरफ जाता है। इसकी जगह एक तय स्क्रीन-फ्री समय रखा जा सकता है। जरूरी नहीं कि शुरुआत कई घंटों से हो। रोज 30 मिनट या एक घंटे के लिए फोन को दूसरे कमरे में रखकर कोई ऑफलाइन गतिविधि करना भी शुरुआत हो सकती है। किताब पढ़ना सबसे आसान विकल्पों में है। यहां खास बात लंबे लेख, उपन्यास, कहानी संग्रह या नॉन-फिक्शन जैसी ‘लॉन्ग-फॉर्म रीडिंग’ की है। मोबाइल पर छोटी पोस्ट और लगातार बदलते वीडियो देखने की आदत के उलट किताब एक ही विषय पर लंबे समय तक ध्यान बनाए रखने को कहती है। बारिश की आवाज के बीच चाय और किताब वाला दृश्य भले थोड़ा फिल्मी लगे, लेकिन स्क्रीन से दूरी बनाने के लिए इसमें किसी खास तैयारी की जरूरत भी नहीं पड़ती।
जिन लोगों को पढ़ना पसंद नहीं, उनके लिए ड्रॉइंग और वाटरकलर पेंटिंग एक विकल्प हो सकती है। इसके लिए कलाकार होना जरूरी नहीं। सामने की खिड़की, बारिश में भीगा पेड़, चाय का कप या कोई साधारण आकृति भी बनाई जा सकती है। यहां मकसद बेहतरीन पेंटिंग बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करना नहीं, बल्कि कुछ देर हाथ और दिमाग को एक ही काम में लगाना है। डिजिटल डिटॉक्स तभी मायने रखता है जब हॉबी खुद नया कंटेंट बनाने की दौड़ में न बदल जाए। अगर पेंटिंग करते ही अगला विचार उसकी फोटो लेकर इंस्टाग्राम पर डालने का है तो स्क्रीन से बनी दूरी कुछ मिनट में फिर खत्म हो सकती है।
बुनाई, क्रोशिया और हाथ से बनाई जाने वाली चीजों में भी लोगों की दिलचस्पी दोबारा बढ़ी है। कभी इन्हें घर के बड़े-बुजुर्गों की सामान्य दिनचर्या का हिस्सा माना जाता था, लेकिन अब युवा भी इन्हें सीख रहे हैं। शुरुआत मुश्किल लग सकती है। धागा उलझता है, फंदा छूट जाता है और बनी हुई चीज कई बार वैसी नहीं दिखती जैसी वीडियो में दिखाई गई थी। यही इसकी खूबी भी है। हर काम तुरंत परफेक्ट होना जरूरी नहीं। धीरे-धीरे सीखना, गलती खोलना और फिर दोबारा बनाना इस प्रक्रिया का हिस्सा है। स्क्रीन की दुनिया में जहां कुछ सेकंड में नया कंटेंट सामने आ जाता है, वहां किसी एक चीज को घंटों या कई दिनों में तैयार करना बिल्कुल अलग अनुभव देता है।
परिवार के साथ रहने वालों के लिए बोर्ड गेम भी अच्छा स्क्रीन-फ्री विकल्प हो सकता है। शतरंज, कैरम, लूडो, स्क्रैबल, कार्ड गेम या दूसरे रणनीतिक खेल केवल समय बिताने का जरिया नहीं हैं। इनकी सबसे बड़ी बात यह है कि इनमें सामने बैठे व्यक्ति से वास्तविक बातचीत होती है। फोन पर ऑनलाइन गेम खेलते समय भी लोग साथ होते हुए अलग-अलग स्क्रीन में खोए रह सकते हैं, जबकि बोर्ड गेम में सभी का ध्यान एक ही जगह रहता है। चाल को लेकर बहस होती है, कोई नियम भूलता है, कोई हारने पर नाराज भी होता है। यह सब डिजिटल बातचीत से अलग और ज्यादा स्वाभाविक अनुभव है।
एक और आसान स्लो हॉबी है हाथ से लिखना। डायरी लिखना, पुराने दिनों की कोई घटना नोट करना, अगले महीने की योजनाएं कागज पर बनाना या किसी अपने के लिए चिट्ठी लिखना। इसके लिए महंगी डायरी या खास स्टेशनरी जरूरी नहीं। सामान्य कॉपी और पेन काफी हैं। फोन के नोट्स ऐप में तेजी से टाइप करने की तुलना में हाथ से लिखने की गति धीमी होती है। इसी कारण व्यक्ति शब्दों को थोड़ा ज्यादा सोचकर लिखता है। कुछ लोग बारिश के दिनों में ‘रेन जर्नल’ भी बना सकते हैं—आज मौसम कैसा था, क्या पढ़ा, क्या बनाया या दिन में कौन-सी छोटी बात अच्छी लगी। इसे किसी को दिखाना जरूरी नहीं।
जिगसॉ पजल भी ऐसा काम है जिसमें शुरुआत के कुछ मिनटों बाद फोन देखने की इच्छा धीरे-धीरे कम हो सकती है। सैकड़ों छोटे टुकड़ों में सही रंग और आकार तलाशना धैर्य मांगता है। यही बात मॉडल बनाने, मिट्टी से छोटी चीजें तैयार करने, ओरिगामी या पुराने फोटो एल्बम व्यवस्थित करने पर भी लागू होती है। ‘स्लो हॉबी’ की कोई सख्त सूची नहीं है। सामान्य नियम इतना है कि गतिविधि स्क्रीन पर निर्भर न हो, उसे पूरा करने में समय लगे और व्यक्ति को लगातार नए डिजिटल कंटेंट की जरूरत न पड़े।
हालांकि डिजिटल डिटॉक्स की कोशिश में एक सामान्य गलती होती है। लोग इसे भी लक्ष्य और प्रदर्शन में बदल देते हैं। कितनी किताबें पढ़ीं, कितनी पेंटिंग बनाई या कितने दिन सोशल मीडिया नहीं खोला—अगर पूरा ध्यान रिकॉर्ड बनाने पर चला जाए तो आराम की गतिविधि भी नया दबाव बन सकती है। स्लो हॉबी का विचार उत्पादकता बढ़ाने की प्रतियोगिता नहीं है। जरूरी नहीं कि हर घंटे का कोई ‘आउटपुट’ निकले। आधी किताब पढ़कर छोड़ देना, खराब पेंटिंग बनाना या बोर्ड गेम बीच में खत्म कर देना भी ठीक है।
फोन से दूरी बनाने का व्यावहारिक तरीका भी बहुत जटिल नहीं होना चाहिए। बारिश वाली शाम में एक घंटा तय किया जा सकता है जब फोन साइलेंट पर रहे और पहुंच से थोड़ा दूर रखा जाए। परिवार के साथ हैं तो सभी लोग एक साथ ऐसा कर सकते हैं। शुरुआत में बार-बार फोन देखने का मन होना सामान्य है। किसी नोटिफिकेशन की आवाज न आने पर भी ऐसा लग सकता है कि शायद कोई मैसेज आया होगा। यही वह आदत है जिसे धीरे-धीरे बदलने की कोशिश की जाती है।
सबसे मुश्किल हिस्सा अक्सर हॉबी चुनना नहीं बल्कि बोरियत को स्वीकार करना होता है। मोबाइल ने खाली समय को लगभग खत्म कर दिया है। बस का इंतजार हो, लिफ्ट में दो मिनट हों या बारिश के कारण बाहर नहीं जा पा रहे हों—फोन तुरंत उस खाली जगह को भर देता है। स्लो हॉबी उस खाली समय को तुरंत भरने के बजाय थोड़ा रुकना सिखाती है। कई बार पांच-दस मिनट कुछ न करने के बाद ही किताब उठाने, कुछ लिखने या बनाने का मन होता है।
मानसून में इसे एक छोटी घरेलू आदत की तरह अपनाया जा सकता है। एक कोने में कुछ किताबें, स्केचबुक, रंग, ताश या बोर्ड गेम रख दिए जाएं ताकि फोन के अलावा दूसरा विकल्प सामने दिखाई दे। बच्चों वाले घरों में यह तरीका ज्यादा उपयोगी हो सकता है, क्योंकि केवल बच्चों को स्क्रीन छोड़ने के लिए कहना और खुद मोबाइल देखते रहना अक्सर काम नहीं करता। अगर परिवार के लोग साथ बैठकर कोई गेम खेलें, ड्रॉइंग करें या कहानी पढ़ें तो स्क्रीन-फ्री समय ज्यादा स्वाभाविक बन सकता है।
स्लो हॉबी महंगी भी नहीं होनी चाहिए। पुरानी अधूरी किताब दोबारा पढ़ी जा सकती है। अखबार की क्रॉसवर्ड या सुडोकू हल की जा सकती है। घर में पड़े ताश के पत्ते निकाले जा सकते हैं। पेंसिल से स्केच बनाया जा सकता है, पुरानी तस्वीरों का एल्बम व्यवस्थित किया जा सकता है या कोई पारंपरिक खेल सीखा जा सकता है। असली बदलाव गतिविधि में कम और ध्यान देने के तरीके में ज्यादा है।
बारिश के दौरान घर में फंसे रहने को कई लोग बोरियत मानते हैं, लेकिन यही समय लगातार चल रही डिजिटल दिनचर्या से कुछ देर बाहर निकलने का बहाना भी बन सकता है। बाहर बारिश चलती रहे और अंदर हर खाली मिनट रील, न्यूज फीड या वीडियो में न बीते। कुछ समय किताब के पन्नों, रंगों, धागों, कागज या बोर्ड गेम के साथ भी गुजर सकता है। फोन वहीं रहेगा, नोटिफिकेशन भी बाद में देखे जा सकते हैं। फर्क बस इतना है कि दिन के कुछ मिनट स्क्रीन तय नहीं करेगी कि अगला ध्यान किस तरफ जाना है।
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