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FCRA संशोधन विधेयक, 2026: राष्ट्रीय हित और पारदर्शिता के बीच संतुलन
आकाश द्विवेदी (वरिष्ठ पत्रकार)नई दिल्ली
हर संप्रभु लोकतंत्र के सामने एक समान संस्थागत चुनौती होती है विदेशी वित्तपोषण को किस प्रकार विनियमित किया जाए ताकि नागरिक समाज के वैध और जनहितकारी कार्यों पर अनावश्यक प्रतिबंध न लगे। इसका समाधान न तो विदेशी धन के अनियंत्रित प्रवाह में है और न ही अत्यधिक नियंत्रण में, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करने में है जो पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा करते हुए वास्तविक सामाजिक और परोपकारी कार्यों को आगे बढ़ने का अवसर दे। प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 इसी संतुलन को स्थापित करने का प्रयास करता है।
इस विधेयक को लेकर सार्वजनिक विमर्श अक्सर राज्य और नागरिक समाज के बीच टकराव के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन यह दृष्टिकोण मूल प्रश्न से ध्यान हटा देता है। वास्तविक मुद्दा यह नहीं है कि विदेशी परोपकारी सहायता को प्रोत्साहित किया जाए या नहीं। भारत ने शिक्षा, स्वास्थ्य, मानवीय सहायता और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में विदेशी सहयोग का हमेशा स्वागत किया है। असली प्रश्न यह है कि भारत में आने वाला प्रत्येक विदेशी अंशदान पूरी तरह पारदर्शी, कानून के प्रति जवाबदेह और देश के संवैधानिक ढांचे के अनुरूप होना चाहिए या नहीं। प्रस्तावित संशोधन इसी सिद्धांत को सुदृढ़ करने की दिशा में कदम है।
मौजूदा व्यवस्था को और मज़बूत बनाने की दिशा में
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) का उद्देश्य कभी भी विदेशी सहायता पर प्रतिबंध लगाना नहीं रहा। इसका मूल उद्देश्य विदेशी अंशदान के प्राप्ति और उपयोग को विनियमित करना है, ताकि बाहरी वित्तीय संसाधन भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सार्वजनिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव न डाल सकें।
इस तरह के नियमन की आवश्यकता विदेशी धनराशि के बढ़ते पैमाने से भी स्पष्ट होती है। वर्ष 2019 से 2022 के बीच 13,500 से अधिक संगठनों को विदेशी स्रोतों से ₹55,741 करोड़ से अधिक का अंशदान प्राप्त हुआ। इनमें से अधिकांश संगठन स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत, अनुसंधान और सामुदायिक कल्याण जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। प्रस्तावित विधेयक उनके योगदान पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाता।
हालांकि, विदेशी वित्तपोषण की विशाल मात्रा यह भी सुनिश्चित करती है कि प्रभावी नियामक व्यवस्था आवश्यक है। विधेयक के समर्थकों का तर्क है कि पारदर्शिता और जवाबदेही अंततः उन्हीं संगठनों के हित में है जो ईमानदारी से कार्य कर रहे हैं, क्योंकि इससे कुछ अपवादस्वरूप मामलों के कारण पूरे स्वैच्छिक क्षेत्र की विश्वसनीयता प्रभावित नहीं होती।
लंबे समय से मौजूद कानूनी खामियों को बंद करने का प्रयास
प्रस्तावित संशोधन का एक प्रमुख उद्देश्य उन कमियों को दूर करना है जो वर्षों के अनुभव और क्रियान्वयन के दौरान सामने आई हैं।
विधेयक के अनुसार, यदि किसी संगठन का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, वह स्वयं उसे वापस कर देता है अथवा उसकी अवधि समाप्त हो जाती है, तो विदेशी अंशदान से निर्मित परिसंपत्तियों को एक नामित प्राधिकरण की अस्थायी अभिरक्षा में रखा जाएगा। पहले ऐसी परिसंपत्तियाँ लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया के दौरान प्रभावी निगरानी से बाहर बनी रहती थीं। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि विदेशी धन से निर्मित संपत्तियाँ न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक सुरक्षित और नियामकीय निगरानी में रहें।
इसी प्रकार, विधेयक तथाकथित “लैप्स एंड रिटेन” (Lapse and Retain) व्यवस्था को भी समाप्त करता है, जिसके तहत केवल पंजीकरण समाप्त हो जाने पर भी संगठन विदेशी धन से खरीदी गई संपत्तियों पर अनिश्चितकाल तक नियंत्रण बनाए रख सकते थे। अब समाप्त पंजीकरण को भी रद्द पंजीकरण के समान माना जाएगा, जिससे प्रवर्तन व्यवस्था अधिक सुसंगत और प्रभावी बनेगी।
इसके अतिरिक्त, विधेयक प्रमुख पदाधिकारियों को विदेशी अंशदान के विधिसम्मत उपयोग के लिए व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह बनाता है। समर्थकों का मानना है कि वित्तीय पारदर्शिता तभी सार्थक हो सकती है जब उत्तरदायित्व स्पष्ट रूप से निर्धारित हो।
राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में विदेशी वित्तपोषण
इस संशोधन की आवश्यकता केवल वित्तीय अनुपालन तक सीमित नहीं है।
वर्षों के दौरान विभिन्न जांच एजेंसियों ने आरोप लगाए हैं कि कुछ संगठनों ने विदेशी धन का उपयोग अपने घोषित उद्देश्यों से हटकर गतिविधियों में किया। आधिकारिक जांचों में ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया है, जहाँ विदेशी अंशदान का उपयोग रणनीतिक अवसंरचना परियोजनाओं का विरोध करने, गैर कानूनी गतिविधियों को वित्तपोषित करने, कमजोर वर्गों को लक्षित संगठित धार्मिक परिवर्तन अभियानों को समर्थन देने या कट्टरपंथी नेटवर्क से जुड़े तंत्रों को सहायता पहुँचाने के लिए किए जाने के आरोप सामने आए।
विधेयक के समर्थकों का कहना है कि भले ही ऐसे मामले पूरे स्वैच्छिक क्षेत्र का बहुत छोटा हिस्सा हों, लेकिन उनका प्रभाव केवल वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं रहता। साइबर प्रभाव अभियानों, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क और सूचना युद्ध के इस दौर में वित्तीय पारदर्शिता राष्ट्रीय सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है।
हालिया जांचों से मिले सबक
कड़े नियमन की आवश्यकता को कई चर्चित मामलों ने भी रेखांकित किया है।
ग्रीनपीस इंडिया का FCRA पंजीकरण कथित अनुपालन उल्लंघनों और भारत के आर्थिक हितों के प्रतिकूल मानी गई गतिविधियों के आधार पर रद्द किया गया। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया पर आरोप लगा कि उसने कॉर्पोरेट ढांचे के माध्यम से विदेशी धन को भारत में लाकर FCRA प्रावधानों को दरकिनार किया। इसी प्रकार, लॉयर्स कलेक्टिव भी अधिनियम के कथित उल्लंघनों से जुड़े मामलों में जांच के दायरे में आया।
इन सभी संगठनों ने अपने-अपने कानूनी पक्ष प्रस्तुत किए हैं और कई मामले अब भी न्यायिक विचाराधीन हैं। फिर भी, संशोधन के समर्थकों का मानना है कि ये घटनाएँ सीमा पार वित्तीय संरचनाओं की बढ़ती जटिलता को दर्शाती हैं और अधिक सुदृढ़ अनुपालन व्यवस्था की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
सुरक्षा एजेंसियों ने प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया है, जहाँ आरोप लगाया गया कि धार्मिक और परोपकारी उद्देश्यों के लिए एकत्रित धन का उपयोग कट्टरपंथ और सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों के लिए किया गया। इसी प्रकार, राजीव गांधी फाउंडेशन भी विदेशी दान और चीन से जुड़े संस्थानों के साथ कथित संबंधों के कारण आधिकारिक जांच के दायरे में आया।
समर्थकों का तर्क है कि राजनीतिक विचारधारा, संस्थागत प्रतिष्ठा या वैचारिक झुकाव चाहे जो भी हो, विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले प्रत्येक संगठन पर समान कानूनी मानक लागू होने चाहिए।
वैश्विक लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप
भारत का यह दृष्टिकोण कोई अपवाद नहीं है।
संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कई यूरोपीय लोकतंत्र राष्ट्रीय सुरक्षा तथा सार्वजनिक नीति से जुड़े मामलों में विदेशी वित्तपोषण, विदेशी प्रभाव और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर कड़े कानूनी ढांचे अपनाए हुए हैं। समर्थकों का कहना है कि FCRA को और मज़बूत करने का भारत का प्रयास भी इसी वैश्विक लोकतांत्रिक सिद्धांत के अनुरूप है कि कोई भी संप्रभु राष्ट्र विदेशी वित्तीय प्रभाव को बिना निगरानी के स्वीकार नहीं करता।
नियमन और नागरिक समाज के बीच संतुलन
यह स्वीकार करना आवश्यक है कि बढ़े हुए अनुपालन संबंधी प्रावधानों को लागू करते समय प्रक्रिया पारदर्शी, संतुलित और अनावश्यक प्रशासनिक जटिलताओं से मुक्त होनी चाहिए।
लेकिन प्रभावी नियमन और सशक्त नागरिक समाज को एक-दूसरे के विरोधी नहीं माना जाना चाहिए। इसके विपरीत, एक मज़बूत अनुपालन व्यवस्था उन संगठनों की विश्वसनीयता को और बढ़ाती है जो वास्तव में जनहित में कार्य कर रहे हैं और उन्हें उन संस्थाओं से अलग पहचान देती है जो विदेशी धन का दुरुपयोग करती हैं।
जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब अवसंरचना, प्रौद्योगिकी, रणनीतिक उद्योगों और सामाजिक नीति से जुड़े निर्णय लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही संचालित होने चाहिए, न कि अपारदर्शी विदेशी वित्तीय प्रभाव के आधार पर।
अंततः, विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 एक ऐसे सिद्धांत को पुनः स्थापित करने का प्रयास है जो हर संप्रभु लोकतंत्र के लिए मूलभूत है विदेशी अंशदान का स्वागत है, लेकिन उसका प्रत्येक रुपया पारदर्शी, कानूनसम्मत और जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। नियामकीय खामियों को दूर कर, संस्थागत निगरानी को सुदृढ़ बनाकर और वित्तीय जवाबदेही को मजबूत करके यह विधेयक यह सुनिश्चित करना चाहता है कि विदेशी सहयोग भारत में विकास और मानवीय उद्देश्यों की पूर्ति करता रहे, साथ ही देश की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की भी प्रभावी रक्षा हो।
अस्वीकरण: यह एक विचार लेख है। इसमें व्यक्त किए गए विचार, राय और निष्कर्ष पूरी तरह लेखक के निजी हैं। इनका दैनिक जागरण एमपी-सीजी डिजिटल की संपादकीय नीति, विचारों या आधिकारिक रुख से कोई संबंध नहीं है। इस लेख में दी गई सामग्री के लिए दैनिक जागरण एमपी-सीजी डिजिटल उत्तरदायी नहीं होगा।
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आकाश द्विवेदी (वरिष्ठ पत्रकार)नई दिल्ली
हर संप्रभु लोकतंत्र के सामने एक समान संस्थागत चुनौती होती है विदेशी वित्तपोषण को किस प्रकार विनियमित किया जाए ताकि नागरिक समाज के वैध और जनहितकारी कार्यों पर अनावश्यक प्रतिबंध न लगे। इसका समाधान न तो विदेशी धन के अनियंत्रित प्रवाह में है और न ही अत्यधिक नियंत्रण में, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करने में है जो पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा करते हुए वास्तविक सामाजिक और परोपकारी कार्यों को आगे बढ़ने का अवसर दे। प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 इसी संतुलन को स्थापित करने का प्रयास करता है।
इस विधेयक को लेकर सार्वजनिक विमर्श अक्सर राज्य और नागरिक समाज के बीच टकराव के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन यह दृष्टिकोण मूल प्रश्न से ध्यान हटा देता है। वास्तविक मुद्दा यह नहीं है कि विदेशी परोपकारी सहायता को प्रोत्साहित किया जाए या नहीं। भारत ने शिक्षा, स्वास्थ्य, मानवीय सहायता और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में विदेशी सहयोग का हमेशा स्वागत किया है। असली प्रश्न यह है कि भारत में आने वाला प्रत्येक विदेशी अंशदान पूरी तरह पारदर्शी, कानून के प्रति जवाबदेह और देश के संवैधानिक ढांचे के अनुरूप होना चाहिए या नहीं। प्रस्तावित संशोधन इसी सिद्धांत को सुदृढ़ करने की दिशा में कदम है।
मौजूदा व्यवस्था को और मज़बूत बनाने की दिशा में
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) का उद्देश्य कभी भी विदेशी सहायता पर प्रतिबंध लगाना नहीं रहा। इसका मूल उद्देश्य विदेशी अंशदान के प्राप्ति और उपयोग को विनियमित करना है, ताकि बाहरी वित्तीय संसाधन भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सार्वजनिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव न डाल सकें।
इस तरह के नियमन की आवश्यकता विदेशी धनराशि के बढ़ते पैमाने से भी स्पष्ट होती है। वर्ष 2019 से 2022 के बीच 13,500 से अधिक संगठनों को विदेशी स्रोतों से ₹55,741 करोड़ से अधिक का अंशदान प्राप्त हुआ। इनमें से अधिकांश संगठन स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत, अनुसंधान और सामुदायिक कल्याण जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। प्रस्तावित विधेयक उनके योगदान पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाता।
हालांकि, विदेशी वित्तपोषण की विशाल मात्रा यह भी सुनिश्चित करती है कि प्रभावी नियामक व्यवस्था आवश्यक है। विधेयक के समर्थकों का तर्क है कि पारदर्शिता और जवाबदेही अंततः उन्हीं संगठनों के हित में है जो ईमानदारी से कार्य कर रहे हैं, क्योंकि इससे कुछ अपवादस्वरूप मामलों के कारण पूरे स्वैच्छिक क्षेत्र की विश्वसनीयता प्रभावित नहीं होती।
लंबे समय से मौजूद कानूनी खामियों को बंद करने का प्रयास
प्रस्तावित संशोधन का एक प्रमुख उद्देश्य उन कमियों को दूर करना है जो वर्षों के अनुभव और क्रियान्वयन के दौरान सामने आई हैं।
विधेयक के अनुसार, यदि किसी संगठन का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, वह स्वयं उसे वापस कर देता है अथवा उसकी अवधि समाप्त हो जाती है, तो विदेशी अंशदान से निर्मित परिसंपत्तियों को एक नामित प्राधिकरण की अस्थायी अभिरक्षा में रखा जाएगा। पहले ऐसी परिसंपत्तियाँ लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया के दौरान प्रभावी निगरानी से बाहर बनी रहती थीं। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि विदेशी धन से निर्मित संपत्तियाँ न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक सुरक्षित और नियामकीय निगरानी में रहें।
इसी प्रकार, विधेयक तथाकथित “लैप्स एंड रिटेन” (Lapse and Retain) व्यवस्था को भी समाप्त करता है, जिसके तहत केवल पंजीकरण समाप्त हो जाने पर भी संगठन विदेशी धन से खरीदी गई संपत्तियों पर अनिश्चितकाल तक नियंत्रण बनाए रख सकते थे। अब समाप्त पंजीकरण को भी रद्द पंजीकरण के समान माना जाएगा, जिससे प्रवर्तन व्यवस्था अधिक सुसंगत और प्रभावी बनेगी।
इसके अतिरिक्त, विधेयक प्रमुख पदाधिकारियों को विदेशी अंशदान के विधिसम्मत उपयोग के लिए व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह बनाता है। समर्थकों का मानना है कि वित्तीय पारदर्शिता तभी सार्थक हो सकती है जब उत्तरदायित्व स्पष्ट रूप से निर्धारित हो।
राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में विदेशी वित्तपोषण
इस संशोधन की आवश्यकता केवल वित्तीय अनुपालन तक सीमित नहीं है।
वर्षों के दौरान विभिन्न जांच एजेंसियों ने आरोप लगाए हैं कि कुछ संगठनों ने विदेशी धन का उपयोग अपने घोषित उद्देश्यों से हटकर गतिविधियों में किया। आधिकारिक जांचों में ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया है, जहाँ विदेशी अंशदान का उपयोग रणनीतिक अवसंरचना परियोजनाओं का विरोध करने, गैर कानूनी गतिविधियों को वित्तपोषित करने, कमजोर वर्गों को लक्षित संगठित धार्मिक परिवर्तन अभियानों को समर्थन देने या कट्टरपंथी नेटवर्क से जुड़े तंत्रों को सहायता पहुँचाने के लिए किए जाने के आरोप सामने आए।
विधेयक के समर्थकों का कहना है कि भले ही ऐसे मामले पूरे स्वैच्छिक क्षेत्र का बहुत छोटा हिस्सा हों, लेकिन उनका प्रभाव केवल वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं रहता। साइबर प्रभाव अभियानों, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क और सूचना युद्ध के इस दौर में वित्तीय पारदर्शिता राष्ट्रीय सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है।
हालिया जांचों से मिले सबक
कड़े नियमन की आवश्यकता को कई चर्चित मामलों ने भी रेखांकित किया है।
ग्रीनपीस इंडिया का FCRA पंजीकरण कथित अनुपालन उल्लंघनों और भारत के आर्थिक हितों के प्रतिकूल मानी गई गतिविधियों के आधार पर रद्द किया गया। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया पर आरोप लगा कि उसने कॉर्पोरेट ढांचे के माध्यम से विदेशी धन को भारत में लाकर FCRA प्रावधानों को दरकिनार किया। इसी प्रकार, लॉयर्स कलेक्टिव भी अधिनियम के कथित उल्लंघनों से जुड़े मामलों में जांच के दायरे में आया।
इन सभी संगठनों ने अपने-अपने कानूनी पक्ष प्रस्तुत किए हैं और कई मामले अब भी न्यायिक विचाराधीन हैं। फिर भी, संशोधन के समर्थकों का मानना है कि ये घटनाएँ सीमा पार वित्तीय संरचनाओं की बढ़ती जटिलता को दर्शाती हैं और अधिक सुदृढ़ अनुपालन व्यवस्था की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
सुरक्षा एजेंसियों ने प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया है, जहाँ आरोप लगाया गया कि धार्मिक और परोपकारी उद्देश्यों के लिए एकत्रित धन का उपयोग कट्टरपंथ और सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों के लिए किया गया। इसी प्रकार, राजीव गांधी फाउंडेशन भी विदेशी दान और चीन से जुड़े संस्थानों के साथ कथित संबंधों के कारण आधिकारिक जांच के दायरे में आया।
समर्थकों का तर्क है कि राजनीतिक विचारधारा, संस्थागत प्रतिष्ठा या वैचारिक झुकाव चाहे जो भी हो, विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले प्रत्येक संगठन पर समान कानूनी मानक लागू होने चाहिए।
वैश्विक लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप
भारत का यह दृष्टिकोण कोई अपवाद नहीं है।
संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कई यूरोपीय लोकतंत्र राष्ट्रीय सुरक्षा तथा सार्वजनिक नीति से जुड़े मामलों में विदेशी वित्तपोषण, विदेशी प्रभाव और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर कड़े कानूनी ढांचे अपनाए हुए हैं। समर्थकों का कहना है कि FCRA को और मज़बूत करने का भारत का प्रयास भी इसी वैश्विक लोकतांत्रिक सिद्धांत के अनुरूप है कि कोई भी संप्रभु राष्ट्र विदेशी वित्तीय प्रभाव को बिना निगरानी के स्वीकार नहीं करता।
नियमन और नागरिक समाज के बीच संतुलन
यह स्वीकार करना आवश्यक है कि बढ़े हुए अनुपालन संबंधी प्रावधानों को लागू करते समय प्रक्रिया पारदर्शी, संतुलित और अनावश्यक प्रशासनिक जटिलताओं से मुक्त होनी चाहिए।
लेकिन प्रभावी नियमन और सशक्त नागरिक समाज को एक-दूसरे के विरोधी नहीं माना जाना चाहिए। इसके विपरीत, एक मज़बूत अनुपालन व्यवस्था उन संगठनों की विश्वसनीयता को और बढ़ाती है जो वास्तव में जनहित में कार्य कर रहे हैं और उन्हें उन संस्थाओं से अलग पहचान देती है जो विदेशी धन का दुरुपयोग करती हैं।
जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब अवसंरचना, प्रौद्योगिकी, रणनीतिक उद्योगों और सामाजिक नीति से जुड़े निर्णय लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही संचालित होने चाहिए, न कि अपारदर्शी विदेशी वित्तीय प्रभाव के आधार पर।
अंततः, विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 एक ऐसे सिद्धांत को पुनः स्थापित करने का प्रयास है जो हर संप्रभु लोकतंत्र के लिए मूलभूत है विदेशी अंशदान का स्वागत है, लेकिन उसका प्रत्येक रुपया पारदर्शी, कानूनसम्मत और जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। नियामकीय खामियों को दूर कर, संस्थागत निगरानी को सुदृढ़ बनाकर और वित्तीय जवाबदेही को मजबूत करके यह विधेयक यह सुनिश्चित करना चाहता है कि विदेशी सहयोग भारत में विकास और मानवीय उद्देश्यों की पूर्ति करता रहे, साथ ही देश की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की भी प्रभावी रक्षा हो।
अस्वीकरण: यह एक विचार लेख है। इसमें व्यक्त किए गए विचार, राय और निष्कर्ष पूरी तरह लेखक के निजी हैं। इनका दैनिक जागरण एमपी-सीजी डिजिटल की संपादकीय नीति, विचारों या आधिकारिक रुख से कोई संबंध नहीं है। इस लेख में दी गई सामग्री के लिए दैनिक जागरण एमपी-सीजी डिजिटल उत्तरदायी नहीं होगा।
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