ईरानी हमलों में करीब 100 अमेरिकी सैनिक घायल, पेंटागन ने देरी से दी जानकारी

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अमेरिका ने सैनिकों की सुरक्षा का हवाला देकर आंकड़े देर से सार्वजनिक करने की बात कही; दोनों देशों के बीच हमले जारी, ईरान के कई शहरों और सैन्य ठिकानों को बनाया गया निशाना

अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव के बीच अमेरिकी सैनिकों को हुए नुकसान को लेकर नई जानकारी सामने आई है। पेंटागन ने स्वीकार किया है कि 7 जुलाई के बाद ईरान की ओर से किए गए जवाबी हमलों में करीब 100 अमेरिकी सैन्यकर्मी घायल हुए। अमेरिकी रक्षा विभाग के मुताबिक इनमें ज्यादातर सैनिकों को हल्की चोटें आईं और बड़ी संख्या में जवान इलाज के बाद वापस ड्यूटी पर लौट चुके हैं। यह जानकारी ऐसे समय सामने आई है जब अमेरिका लगातार ईरान के भीतर सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर हमले कर रहा है, जबकि तेहरान ने भी खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी वाले देशों और ठिकानों को निशाना बनाना जारी रखा है।

पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने सैनिकों के घायल होने से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करते हुए बताया कि ये मामले 7 जुलाई के बाद हुए ईरानी हमलों से जुड़े हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक घायल सैनिकों में बड़ी संख्या ऐसे जवानों की थी जिन्हें सिर पर हल्की चोट या ब्लास्ट के प्रभाव से जुड़ी समस्याएं हुईं। पेंटागन का कहना है कि लगभग 96 प्रतिशत प्रभावित सैनिक ठीक होने के बाद अपनी ड्यूटी पर लौट चुके हैं।

सैनिकों के घायल होने की जानकारी पहले सार्वजनिक नहीं किए जाने को लेकर भी सवाल उठे। अमेरिकी मीडिया में रिपोर्ट सामने आने के बाद रक्षा विभाग से पूछा गया कि युद्ध में घायल सैनिकों का पूरा आंकड़ा पहले क्यों नहीं बताया गया। इस पर पेंटागन की ओर से कहा गया कि जानकारी जारी करने में देरी जानबूझकर की गई थी, लेकिन इसके पीछे सैनिकों और सैन्य अभियानों की सुरक्षा को कारण बताया गया।

अमेरिकी पक्ष के मुताबिक संघर्ष के दौरान किसी सैन्य ठिकाने पर हुए नुकसान, वहां मौजूद जवानों की संख्या या घायलों की स्थिति तत्काल सार्वजनिक करने से ऑपरेशनल जानकारी विरोधी पक्ष तक पहुंच सकती है। इसी वजह से आंकड़े जारी करने के समय को लेकर सावधानी बरती गई।

हालांकि इस स्पष्टीकरण के बाद भी अमेरिका में युद्ध से जुड़े नुकसान की पारदर्शिता को लेकर बहस तेज हो सकती है। किसी सैन्य संघर्ष के दौरान मृत और घायल सैनिकों की वास्तविक संख्या राजनीतिक और रणनीतिक दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है। शुरुआती जानकारी और बाद में सामने आने वाले आंकड़ों में अंतर होने पर सरकार से सवाल पूछे जाते रहे हैं।

ईरान के साथ मौजूदा संघर्ष में भी शुरुआत में अमेरिकी सैन्य नुकसान की तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं थी। अब करीब 100 सैनिकों के घायल होने की बात सामने आने से यह स्पष्ट हुआ है कि ईरानी जवाबी हमलों का असर अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों और वहां तैनात जवानों पर पड़ा है।

अमेरिका और ईरान के बीच हमले पिछले कई दिनों से लगातार तेज हुए हैं। अमेरिकी सेना ईरान के सैन्य कमांड सेंटर, एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं के साथ तटीय निगरानी और दूसरे रणनीतिक ढांचे को निशाना बनाने की बात कहती रही है।

दूसरी ओर ईरान ने जवाबी कार्रवाई में उन खाड़ी देशों में मौजूद सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया है जहां अमेरिकी सेना की मौजूदगी है। बहरीन, कुवैत और जॉर्डन में अमेरिकी हितों या सैन्य ठिकानों को लेकर हमलों की खबरें सामने आई हैं। इससे संघर्ष अब केवल ईरान की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है।

सोमवार और मंगलवार के बीच हालात और तनावपूर्ण हो गए। ईरानी हमलों के बाद अमेरिका ने दक्षिणी और पश्चिमी ईरान में फिर हवाई हमले किए। ईरानी सरकारी और स्थानीय मीडिया ने कई इलाकों में विस्फोटों और हमलों की जानकारी दी।

दक्षिणी ईरान का इलाका इस सैन्य अभियान में खास तौर पर महत्वपूर्ण बना हुआ है। यहां देश के प्रमुख बंदरगाह, नौसैनिक ठिकाने, ऊर्जा प्रतिष्ठान और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े रणनीतिक केंद्र मौजूद हैं। अमेरिका पिछले कई दिनों से इस क्षेत्र में अलग-अलग सैन्य क्षमताओं को निशाना बना रहा है।

ईरानी मीडिया रिपोर्टों में अबदानान, बंदर अब्बास, बंदर लेंगेह, बुशेहर, चाबहार, केश्म द्वीप, सीरिक, शीराज और कोनारक समेत कई जगहों पर हमले या विस्फोट होने की बात कही गई। हालांकि अलग-अलग स्थानों पर वास्तविक लक्ष्य और नुकसान की पूरी स्वतंत्र पुष्टि अभी हर मामले में स्पष्ट नहीं है।

शीराज के आसपास विस्फोटों की आवाज सुनाई देने की रिपोर्ट सामने आई। दक्षिणी तट पर कोनारक और चाबहार भी हमलों की चपेट में आने वाले क्षेत्रों में बताए गए। पश्चिम में अबदानान के बाहर भी एक स्थान पर हमला होने की जानकारी सामने आई है।

बंदर अब्बास मौजूदा संघर्ष में सबसे महत्वपूर्ण इलाकों में शामिल है। यह ईरान का बड़ा बंदरगाह होने के साथ नौसेना और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की गतिविधियों के लिहाज से रणनीतिक क्षेत्र है। होर्मुज जलडमरूमध्य के पास होने के कारण यहां किसी भी सैन्य कार्रवाई का असर क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा पर पड़ सकता है।

केश्म द्वीप और सीरिक भी दक्षिणी ईरान के ऐसे इलाके हैं जो खाड़ी और होर्मुज के आसपास स्थित हैं। पिछले दौर के अमेरिकी हमलों में भी इस क्षेत्र में सैन्य और तटीय क्षमताओं को निशाना बनाए जाने की जानकारी सामने आई थी।

चाबहार और कोनारक ईरान के दक्षिण-पूर्वी समुद्री क्षेत्र में आते हैं। यहां बंदरगाह और सैन्य गतिविधियों के कारण रणनीतिक महत्व काफी ज्यादा है। मौजूदा संघर्ष के दौरान दक्षिणी तट के अलग-अलग हिस्सों में हमले होने से पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई है।

ईरान ने अमेरिकी कार्रवाई का जवाब केवल अपने क्षेत्र से सीधे हमलों तक सीमित नहीं रखा है। तेहरान समर्थित सैन्य नेटवर्क और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों की गतिविधियों के कारण संघर्ष का दायरा लगातार फैलता दिखाई दे रहा है।

ईरान की ओर से खाड़ी क्षेत्र में उन देशों को निशाना बनाया गया है जहां अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठान मौजूद हैं। कुवैत, बहरीन और जॉर्डन में मिसाइल तथा ड्रोन हमलों की खबरें सामने आई हैं। कई स्थानों पर एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय किए गए और आने वाले ड्रोन या मिसाइलों को रोकने की कोशिश की गई।

कुवैत में ऊर्जा और पानी से जुड़े बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने की खबरों ने चिंता और बढ़ा दी है। वहां बिजली उत्पादन और पानी को खारा मुक्त करने वाले प्रतिष्ठानों पर हमलों के बाद आग लगने की जानकारी सामने आई। इसके बाद मरम्मत और आपूर्ति बहाल करने का काम शुरू किया गया।

खाड़ी देशों के लिए पानी के ऐसे संयंत्र बेहद महत्वपूर्ण हैं। क्षेत्र में प्राकृतिक मीठे पानी के सीमित स्रोत होने के कारण समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने वाले प्लांट बड़ी आबादी की जरूरत पूरी करते हैं। ऐसे प्रतिष्ठानों पर हमला होने से सैन्य संघर्ष का असर सीधे नागरिक सुविधाओं तक पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।

बहरीन में भी अमेरिकी हितों से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया गया। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने कुछ हमलों की जिम्मेदारी लेते हुए इन्हें अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का जवाब बताया।

जॉर्डन में भी ड्रोन हमलों की सूचना सामने आई, जहां एयर डिफेंस सिस्टम ने कुछ हवाई खतरों को रोकने का प्रयास किया। अमेरिका की क्षेत्रीय सैन्य मौजूदगी के कारण इन देशों में पहले से सुरक्षा बढ़ाई गई है।

लगातार हमलों ने पूरे पश्चिम एशिया में संघर्ष के फैलने की आशंका बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच सीधा टकराव जितना लंबा खिंच रहा है, उतना ही पड़ोसी देशों के इसकी चपेट में आने का खतरा बढ़ रहा है।

सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बनी हुई है। दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। यहां सैन्य गतिविधियां बढ़ने और जहाजों पर हमलों की घटनाओं से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ सकता है।

होर्मुज क्षेत्र में तेल टैंकरों से जुड़ी घटनाएं भी सामने आई हैं। जहाजों में आग और विस्फोट की खबरों के बाद समुद्री सुरक्षा को लेकर अलर्ट बढ़ाया गया है। कुछ जहाजों ने अपने मार्ग बदलने की कोशिश की है, जबकि शिपिंग कंपनियां स्थिति पर लगातार नजर रख रही हैं।

समुद्री मार्ग बाधित होने की आशंका से कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। अगर होर्मुज से लंबे समय तक जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। एशिया और यूरोप के कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति इससे प्रभावित हो सकती है।

अमेरिकी सेना की कार्रवाई का घोषित उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना बताया गया है। पिछले हमलों में कमांड सेंटर, एयर डिफेंस साइट्स, मिसाइल और ड्रोन सुविधाओं के साथ तटीय निगरानी व्यवस्था को निशाना बनाए जाने की बात अमेरिकी पक्ष ने कही है।

दूसरी ओर ईरान का कहना है कि वह अमेरिकी हमलों का जवाब दे रहा है और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी से जुड़े ठिकाने उसके निशाने पर रहेंगे। दोनों पक्षों के बयानों से फिलहाल तत्काल तनाव कम होने के संकेत कमजोर दिखाई दे रहे हैं।

अमेरिकी सैनिकों के घायल होने का नया आंकड़ा इसी व्यापक संघर्ष के बीच सामने आया है। करीब 100 सैन्यकर्मियों के प्रभावित होने की जानकारी बताती है कि ईरान के जवाबी हमले केवल प्रतीकात्मक नहीं रहे और अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों को भी उनका असर झेलना पड़ा।

सिर पर हल्की चोट या ब्लास्ट से होने वाली ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजरी सैन्य हमलों में अक्सर तुरंत स्पष्ट नहीं होती। विस्फोट के दबाव से सैनिकों में सिरदर्द, चक्कर, भ्रम या दूसरी समस्याएं बाद में सामने आ सकती हैं। इसी वजह से शुरुआती संख्या और बाद के मेडिकल आकलन में अंतर हो सकता है।

पेंटागन के मुताबिक अधिकांश घायल जवान वापस ड्यूटी पर लौट चुके हैं। 96 प्रतिशत सैनिकों का काम पर लौटना इस बात का संकेत है कि ज्यादातर चोटें गंभीर श्रेणी की नहीं थीं। बाकी सैनिकों की स्थिति या इलाज को लेकर विस्तृत जानकारी सीमित रखी गई है।

इस बीच अमेरिकी हमले लगातार जारी रहने से ईरान के दक्षिणी हिस्से में दबाव बढ़ा है। बंदरगाहों और सैन्य ढांचे के आसपास रहने वाले लोगों के लिए भी हालात मुश्किल हुए हैं। बिजली, पानी, परिवहन और आर्थिक गतिविधियों पर असर की खबरें सामने आ रही हैं।

ईरान के दक्षिणी इलाके पहले से देश की ऊर्जा और समुद्री अर्थव्यवस्था के केंद्र हैं। बंदर अब्बास, बुशेहर और चाबहार जैसे शहरों का महत्व केवल सैन्य नहीं बल्कि आर्थिक भी है। यहां बड़े बंदरगाह और ऊर्जा से जुड़े प्रतिष्ठान होने के कारण लंबे समय तक संघर्ष जारी रहने पर व्यापार प्रभावित हो सकता है।

बुशेहर का महत्व ईरान के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के कारण भी है। इसी वजह से इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य गतिविधि पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष नजर रहती है। हालांकि मौजूदा हमलों में किन विशिष्ट ठिकानों को निशाना बनाया गया और वास्तविक नुकसान कितना हुआ, इसकी पूरी जानकारी अलग-अलग स्रोतों से अभी जुटाई जा रही है।

चाबहार भारत के लिए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बंदरगाह क्षेत्र रहा है। इस इलाके में सैन्य तनाव बढ़ने से क्षेत्रीय व्यापार और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को लेकर भी चिंता पैदा हो सकती है।

अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य कार्रवाई के समानांतर कूटनीतिक कोशिशें भी जारी बताई जा रही हैं। पाकिस्तान समेत कुछ देश बातचीत दोबारा शुरू कराने की कोशिश कर रहे हैं। संघर्षविराम के संभावित प्रस्तावों पर भी चर्चा की खबरें हैं, लेकिन जमीन पर हमलों का सिलसिला फिलहाल थमा नहीं है।

ईरान की ओर से अमेरिकी सैन्य ठिकानों और क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे पर हमले जारी हैं, जबकि अमेरिका लगातार ईरान के भीतर नए लक्ष्य चुन रहा है। दोनों पक्ष एक-दूसरे की सैन्य क्षमता और रणनीतिक ढांचे को नुकसान पहुंचाने का दावा कर रहे हैं।

युद्ध का असर अब सैनिकों की संख्या और सैन्य ठिकानों से आगे नागरिक सुविधाओं, समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। खाड़ी देशों में बिजली और पानी से जुड़े प्रतिष्ठानों पर खतरा तथा होर्मुज में जहाजों की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंताओं में शामिल है।

अमेरिका की ओर से सैनिकों के घायल होने की जानकारी देर से सार्वजनिक किए जाने ने एक अलग सवाल भी खड़ा किया है। युद्ध में वास्तविक सैन्य नुकसान की जानकारी कितनी जल्दी सार्वजनिक की जानी चाहिए, इसे लेकर अमेरिकी मीडिया और प्रशासन के बीच बहस आगे बढ़ सकती है।

पेंटागन ने अपने बचाव में सुरक्षा और ऑपरेशनल कारणों का हवाला दिया है। उसका कहना है कि किसी हमले के तुरंत बाद सैनिकों की स्थिति बताने से विरोधी पक्ष को हमले की प्रभावशीलता का अंदाजा मिल सकता है। इसी वजह से कुछ जानकारी रोकना सैन्य रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

दूसरी ओर सार्वजनिक जवाबदेही के लिहाज से सैनिकों की मौत और घायल होने के आंकड़े महत्वपूर्ण होते हैं। युद्ध में भेजे गए सैनिकों की वास्तविक स्थिति की जानकारी उनके परिवारों और देश की जनता के लिए भी संवेदनशील मुद्दा रहती है। अब करीब 100 घायल सैनिकों का आंकड़ा सामने आने के बाद अमेरिकी सैन्य नुकसान की तस्वीर पहले की तुलना में कुछ स्पष्ट हुई है। इसके बावजूद मौजूदा संघर्ष जारी रहने के कारण यह संख्या आगे बदल सकती है।

मंगलवार को भी ईरान के अलग-अलग क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की खबरें आती रहीं। शीराज, कोनारक, चाबहार और दूसरे इलाकों में हमलों की सूचना के बीच ईरान ने भी खाड़ी क्षेत्र में जवाबी कार्रवाई जारी रखने की बात कही है। अमेरिकी विदेश विभाग ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को देखते हुए अमेरिकी नागरिकों के लिए सुरक्षा चेतावनी भी जारी की है। क्षेत्र में मौजूद सैन्य ठिकानों, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और समुद्री मार्गों को लेकर सतर्कता बढ़ाई गई है।

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21 Jul 2026 By Priyanka

ईरानी हमलों में करीब 100 अमेरिकी सैनिक घायल, पेंटागन ने देरी से दी जानकारी

अंतराष्ट्रीय न्यूज

अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव के बीच अमेरिकी सैनिकों को हुए नुकसान को लेकर नई जानकारी सामने आई है। पेंटागन ने स्वीकार किया है कि 7 जुलाई के बाद ईरान की ओर से किए गए जवाबी हमलों में करीब 100 अमेरिकी सैन्यकर्मी घायल हुए। अमेरिकी रक्षा विभाग के मुताबिक इनमें ज्यादातर सैनिकों को हल्की चोटें आईं और बड़ी संख्या में जवान इलाज के बाद वापस ड्यूटी पर लौट चुके हैं। यह जानकारी ऐसे समय सामने आई है जब अमेरिका लगातार ईरान के भीतर सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर हमले कर रहा है, जबकि तेहरान ने भी खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी वाले देशों और ठिकानों को निशाना बनाना जारी रखा है।

पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने सैनिकों के घायल होने से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करते हुए बताया कि ये मामले 7 जुलाई के बाद हुए ईरानी हमलों से जुड़े हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक घायल सैनिकों में बड़ी संख्या ऐसे जवानों की थी जिन्हें सिर पर हल्की चोट या ब्लास्ट के प्रभाव से जुड़ी समस्याएं हुईं। पेंटागन का कहना है कि लगभग 96 प्रतिशत प्रभावित सैनिक ठीक होने के बाद अपनी ड्यूटी पर लौट चुके हैं।

सैनिकों के घायल होने की जानकारी पहले सार्वजनिक नहीं किए जाने को लेकर भी सवाल उठे। अमेरिकी मीडिया में रिपोर्ट सामने आने के बाद रक्षा विभाग से पूछा गया कि युद्ध में घायल सैनिकों का पूरा आंकड़ा पहले क्यों नहीं बताया गया। इस पर पेंटागन की ओर से कहा गया कि जानकारी जारी करने में देरी जानबूझकर की गई थी, लेकिन इसके पीछे सैनिकों और सैन्य अभियानों की सुरक्षा को कारण बताया गया।

अमेरिकी पक्ष के मुताबिक संघर्ष के दौरान किसी सैन्य ठिकाने पर हुए नुकसान, वहां मौजूद जवानों की संख्या या घायलों की स्थिति तत्काल सार्वजनिक करने से ऑपरेशनल जानकारी विरोधी पक्ष तक पहुंच सकती है। इसी वजह से आंकड़े जारी करने के समय को लेकर सावधानी बरती गई।

हालांकि इस स्पष्टीकरण के बाद भी अमेरिका में युद्ध से जुड़े नुकसान की पारदर्शिता को लेकर बहस तेज हो सकती है। किसी सैन्य संघर्ष के दौरान मृत और घायल सैनिकों की वास्तविक संख्या राजनीतिक और रणनीतिक दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है। शुरुआती जानकारी और बाद में सामने आने वाले आंकड़ों में अंतर होने पर सरकार से सवाल पूछे जाते रहे हैं।

ईरान के साथ मौजूदा संघर्ष में भी शुरुआत में अमेरिकी सैन्य नुकसान की तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं थी। अब करीब 100 सैनिकों के घायल होने की बात सामने आने से यह स्पष्ट हुआ है कि ईरानी जवाबी हमलों का असर अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों और वहां तैनात जवानों पर पड़ा है।

अमेरिका और ईरान के बीच हमले पिछले कई दिनों से लगातार तेज हुए हैं। अमेरिकी सेना ईरान के सैन्य कमांड सेंटर, एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं के साथ तटीय निगरानी और दूसरे रणनीतिक ढांचे को निशाना बनाने की बात कहती रही है।

दूसरी ओर ईरान ने जवाबी कार्रवाई में उन खाड़ी देशों में मौजूद सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया है जहां अमेरिकी सेना की मौजूदगी है। बहरीन, कुवैत और जॉर्डन में अमेरिकी हितों या सैन्य ठिकानों को लेकर हमलों की खबरें सामने आई हैं। इससे संघर्ष अब केवल ईरान की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है।

सोमवार और मंगलवार के बीच हालात और तनावपूर्ण हो गए। ईरानी हमलों के बाद अमेरिका ने दक्षिणी और पश्चिमी ईरान में फिर हवाई हमले किए। ईरानी सरकारी और स्थानीय मीडिया ने कई इलाकों में विस्फोटों और हमलों की जानकारी दी।

दक्षिणी ईरान का इलाका इस सैन्य अभियान में खास तौर पर महत्वपूर्ण बना हुआ है। यहां देश के प्रमुख बंदरगाह, नौसैनिक ठिकाने, ऊर्जा प्रतिष्ठान और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े रणनीतिक केंद्र मौजूद हैं। अमेरिका पिछले कई दिनों से इस क्षेत्र में अलग-अलग सैन्य क्षमताओं को निशाना बना रहा है।

ईरानी मीडिया रिपोर्टों में अबदानान, बंदर अब्बास, बंदर लेंगेह, बुशेहर, चाबहार, केश्म द्वीप, सीरिक, शीराज और कोनारक समेत कई जगहों पर हमले या विस्फोट होने की बात कही गई। हालांकि अलग-अलग स्थानों पर वास्तविक लक्ष्य और नुकसान की पूरी स्वतंत्र पुष्टि अभी हर मामले में स्पष्ट नहीं है।

शीराज के आसपास विस्फोटों की आवाज सुनाई देने की रिपोर्ट सामने आई। दक्षिणी तट पर कोनारक और चाबहार भी हमलों की चपेट में आने वाले क्षेत्रों में बताए गए। पश्चिम में अबदानान के बाहर भी एक स्थान पर हमला होने की जानकारी सामने आई है।

बंदर अब्बास मौजूदा संघर्ष में सबसे महत्वपूर्ण इलाकों में शामिल है। यह ईरान का बड़ा बंदरगाह होने के साथ नौसेना और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की गतिविधियों के लिहाज से रणनीतिक क्षेत्र है। होर्मुज जलडमरूमध्य के पास होने के कारण यहां किसी भी सैन्य कार्रवाई का असर क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा पर पड़ सकता है।

केश्म द्वीप और सीरिक भी दक्षिणी ईरान के ऐसे इलाके हैं जो खाड़ी और होर्मुज के आसपास स्थित हैं। पिछले दौर के अमेरिकी हमलों में भी इस क्षेत्र में सैन्य और तटीय क्षमताओं को निशाना बनाए जाने की जानकारी सामने आई थी।

चाबहार और कोनारक ईरान के दक्षिण-पूर्वी समुद्री क्षेत्र में आते हैं। यहां बंदरगाह और सैन्य गतिविधियों के कारण रणनीतिक महत्व काफी ज्यादा है। मौजूदा संघर्ष के दौरान दक्षिणी तट के अलग-अलग हिस्सों में हमले होने से पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई है।

ईरान ने अमेरिकी कार्रवाई का जवाब केवल अपने क्षेत्र से सीधे हमलों तक सीमित नहीं रखा है। तेहरान समर्थित सैन्य नेटवर्क और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों की गतिविधियों के कारण संघर्ष का दायरा लगातार फैलता दिखाई दे रहा है।

ईरान की ओर से खाड़ी क्षेत्र में उन देशों को निशाना बनाया गया है जहां अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठान मौजूद हैं। कुवैत, बहरीन और जॉर्डन में मिसाइल तथा ड्रोन हमलों की खबरें सामने आई हैं। कई स्थानों पर एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय किए गए और आने वाले ड्रोन या मिसाइलों को रोकने की कोशिश की गई।

कुवैत में ऊर्जा और पानी से जुड़े बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने की खबरों ने चिंता और बढ़ा दी है। वहां बिजली उत्पादन और पानी को खारा मुक्त करने वाले प्रतिष्ठानों पर हमलों के बाद आग लगने की जानकारी सामने आई। इसके बाद मरम्मत और आपूर्ति बहाल करने का काम शुरू किया गया।

खाड़ी देशों के लिए पानी के ऐसे संयंत्र बेहद महत्वपूर्ण हैं। क्षेत्र में प्राकृतिक मीठे पानी के सीमित स्रोत होने के कारण समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने वाले प्लांट बड़ी आबादी की जरूरत पूरी करते हैं। ऐसे प्रतिष्ठानों पर हमला होने से सैन्य संघर्ष का असर सीधे नागरिक सुविधाओं तक पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।

बहरीन में भी अमेरिकी हितों से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया गया। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने कुछ हमलों की जिम्मेदारी लेते हुए इन्हें अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का जवाब बताया।

जॉर्डन में भी ड्रोन हमलों की सूचना सामने आई, जहां एयर डिफेंस सिस्टम ने कुछ हवाई खतरों को रोकने का प्रयास किया। अमेरिका की क्षेत्रीय सैन्य मौजूदगी के कारण इन देशों में पहले से सुरक्षा बढ़ाई गई है।

लगातार हमलों ने पूरे पश्चिम एशिया में संघर्ष के फैलने की आशंका बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच सीधा टकराव जितना लंबा खिंच रहा है, उतना ही पड़ोसी देशों के इसकी चपेट में आने का खतरा बढ़ रहा है।

सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बनी हुई है। दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। यहां सैन्य गतिविधियां बढ़ने और जहाजों पर हमलों की घटनाओं से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ सकता है।

होर्मुज क्षेत्र में तेल टैंकरों से जुड़ी घटनाएं भी सामने आई हैं। जहाजों में आग और विस्फोट की खबरों के बाद समुद्री सुरक्षा को लेकर अलर्ट बढ़ाया गया है। कुछ जहाजों ने अपने मार्ग बदलने की कोशिश की है, जबकि शिपिंग कंपनियां स्थिति पर लगातार नजर रख रही हैं।

समुद्री मार्ग बाधित होने की आशंका से कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। अगर होर्मुज से लंबे समय तक जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। एशिया और यूरोप के कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति इससे प्रभावित हो सकती है।

अमेरिकी सेना की कार्रवाई का घोषित उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना बताया गया है। पिछले हमलों में कमांड सेंटर, एयर डिफेंस साइट्स, मिसाइल और ड्रोन सुविधाओं के साथ तटीय निगरानी व्यवस्था को निशाना बनाए जाने की बात अमेरिकी पक्ष ने कही है।

दूसरी ओर ईरान का कहना है कि वह अमेरिकी हमलों का जवाब दे रहा है और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी से जुड़े ठिकाने उसके निशाने पर रहेंगे। दोनों पक्षों के बयानों से फिलहाल तत्काल तनाव कम होने के संकेत कमजोर दिखाई दे रहे हैं।

अमेरिकी सैनिकों के घायल होने का नया आंकड़ा इसी व्यापक संघर्ष के बीच सामने आया है। करीब 100 सैन्यकर्मियों के प्रभावित होने की जानकारी बताती है कि ईरान के जवाबी हमले केवल प्रतीकात्मक नहीं रहे और अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों को भी उनका असर झेलना पड़ा।

सिर पर हल्की चोट या ब्लास्ट से होने वाली ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजरी सैन्य हमलों में अक्सर तुरंत स्पष्ट नहीं होती। विस्फोट के दबाव से सैनिकों में सिरदर्द, चक्कर, भ्रम या दूसरी समस्याएं बाद में सामने आ सकती हैं। इसी वजह से शुरुआती संख्या और बाद के मेडिकल आकलन में अंतर हो सकता है।

पेंटागन के मुताबिक अधिकांश घायल जवान वापस ड्यूटी पर लौट चुके हैं। 96 प्रतिशत सैनिकों का काम पर लौटना इस बात का संकेत है कि ज्यादातर चोटें गंभीर श्रेणी की नहीं थीं। बाकी सैनिकों की स्थिति या इलाज को लेकर विस्तृत जानकारी सीमित रखी गई है।

इस बीच अमेरिकी हमले लगातार जारी रहने से ईरान के दक्षिणी हिस्से में दबाव बढ़ा है। बंदरगाहों और सैन्य ढांचे के आसपास रहने वाले लोगों के लिए भी हालात मुश्किल हुए हैं। बिजली, पानी, परिवहन और आर्थिक गतिविधियों पर असर की खबरें सामने आ रही हैं।

ईरान के दक्षिणी इलाके पहले से देश की ऊर्जा और समुद्री अर्थव्यवस्था के केंद्र हैं। बंदर अब्बास, बुशेहर और चाबहार जैसे शहरों का महत्व केवल सैन्य नहीं बल्कि आर्थिक भी है। यहां बड़े बंदरगाह और ऊर्जा से जुड़े प्रतिष्ठान होने के कारण लंबे समय तक संघर्ष जारी रहने पर व्यापार प्रभावित हो सकता है।

बुशेहर का महत्व ईरान के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के कारण भी है। इसी वजह से इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य गतिविधि पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष नजर रहती है। हालांकि मौजूदा हमलों में किन विशिष्ट ठिकानों को निशाना बनाया गया और वास्तविक नुकसान कितना हुआ, इसकी पूरी जानकारी अलग-अलग स्रोतों से अभी जुटाई जा रही है।

चाबहार भारत के लिए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बंदरगाह क्षेत्र रहा है। इस इलाके में सैन्य तनाव बढ़ने से क्षेत्रीय व्यापार और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को लेकर भी चिंता पैदा हो सकती है।

अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य कार्रवाई के समानांतर कूटनीतिक कोशिशें भी जारी बताई जा रही हैं। पाकिस्तान समेत कुछ देश बातचीत दोबारा शुरू कराने की कोशिश कर रहे हैं। संघर्षविराम के संभावित प्रस्तावों पर भी चर्चा की खबरें हैं, लेकिन जमीन पर हमलों का सिलसिला फिलहाल थमा नहीं है।

ईरान की ओर से अमेरिकी सैन्य ठिकानों और क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे पर हमले जारी हैं, जबकि अमेरिका लगातार ईरान के भीतर नए लक्ष्य चुन रहा है। दोनों पक्ष एक-दूसरे की सैन्य क्षमता और रणनीतिक ढांचे को नुकसान पहुंचाने का दावा कर रहे हैं।

युद्ध का असर अब सैनिकों की संख्या और सैन्य ठिकानों से आगे नागरिक सुविधाओं, समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। खाड़ी देशों में बिजली और पानी से जुड़े प्रतिष्ठानों पर खतरा तथा होर्मुज में जहाजों की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंताओं में शामिल है।

अमेरिका की ओर से सैनिकों के घायल होने की जानकारी देर से सार्वजनिक किए जाने ने एक अलग सवाल भी खड़ा किया है। युद्ध में वास्तविक सैन्य नुकसान की जानकारी कितनी जल्दी सार्वजनिक की जानी चाहिए, इसे लेकर अमेरिकी मीडिया और प्रशासन के बीच बहस आगे बढ़ सकती है।

पेंटागन ने अपने बचाव में सुरक्षा और ऑपरेशनल कारणों का हवाला दिया है। उसका कहना है कि किसी हमले के तुरंत बाद सैनिकों की स्थिति बताने से विरोधी पक्ष को हमले की प्रभावशीलता का अंदाजा मिल सकता है। इसी वजह से कुछ जानकारी रोकना सैन्य रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

दूसरी ओर सार्वजनिक जवाबदेही के लिहाज से सैनिकों की मौत और घायल होने के आंकड़े महत्वपूर्ण होते हैं। युद्ध में भेजे गए सैनिकों की वास्तविक स्थिति की जानकारी उनके परिवारों और देश की जनता के लिए भी संवेदनशील मुद्दा रहती है। अब करीब 100 घायल सैनिकों का आंकड़ा सामने आने के बाद अमेरिकी सैन्य नुकसान की तस्वीर पहले की तुलना में कुछ स्पष्ट हुई है। इसके बावजूद मौजूदा संघर्ष जारी रहने के कारण यह संख्या आगे बदल सकती है।

मंगलवार को भी ईरान के अलग-अलग क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की खबरें आती रहीं। शीराज, कोनारक, चाबहार और दूसरे इलाकों में हमलों की सूचना के बीच ईरान ने भी खाड़ी क्षेत्र में जवाबी कार्रवाई जारी रखने की बात कही है। अमेरिकी विदेश विभाग ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को देखते हुए अमेरिकी नागरिकों के लिए सुरक्षा चेतावनी भी जारी की है। क्षेत्र में मौजूद सैन्य ठिकानों, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और समुद्री मार्गों को लेकर सतर्कता बढ़ाई गई है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/nearly-100-american-soldiers-injured-in-iranian-attacks-pentagon-gave/article-59400

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