एक दीप से जलते हैं अनगिनत दीप : गुरु से विश्वगुरु भारत तक

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भारत की आत्मा को यदि किसी एक शब्द में अभिव्यक्त करना हो, तो वह शब्द है—ज्ञान। और ज्ञान की इस अखंड परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने वाला सबसे पवित्र माध्यम रहा है—गुरु। भारत ने गुरु को कभी केवल पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं माना; वह जीवन का पथप्रदर्शक है, संस्कारों का संवाहक है, जिज्ञासा का जागरणकर्ता है और भविष्य का शिल्पकार है। इसीलिए हमारी परंपरा में गुरु के लिए कहा गया— “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।”

आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने के संकल्प के साथ अपनी प्राचीन ज्ञान-परंपरा को आधुनिक विज्ञान, तकनीक और नवाचार से जोड़ते हुए पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर है, तब सबसे अधिक आवश्यकता उस शक्ति को पहचानने की है, जो इस परिवर्तन की वास्तविक आधारशिला है—हमारा शिक्षक।

वर्ष 2020 में भारत के शिक्षा मंत्री के रूप में पेरिस स्थित यूनेस्को मुख्यालय में भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। उस यात्रा के दौरान मेरे मन में एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था कि फिनलैण्ड जैसा देश शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर विश्व के अग्रणी देशों में कैसे बना रहता है। मैंने अपने सहयोगियों से आग्रह किया कि मेरी भेंट फिनलैण्ड की शिक्षा मंत्री से कराई जाए। बातचीत में मैंने उनसे यही प्रश्न पूछा।

उनका उत्तर अत्यंत सहज था, किंतु उसके भीतर एक संपूर्ण शिक्षा-दर्शन छिपा था। उन्होंने कहा कि उनके देश में समाज के सर्वश्रेष्ठ और सबसे प्रतिभाशाली लोगों को शिक्षक बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। शिक्षक का पद वहाँ अत्यंत प्रतिष्ठित माना जाता है और शिक्षक बनना आसान नहीं है।

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उस क्षण मुझे लगा कि शिक्षा की सफलता का रहस्य केवल विशाल भवनों, अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं या तकनीकी संसाधनों में नहीं छिपा है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति उस शिक्षक में होती है, जो कक्षा में खड़ा होकर किसी बालक की आँखों में छिपे सपने को पहचान लेता है।

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इसके बाद ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और नॉर्वे के शिक्षा मंत्रियों से भी संवाद का अवसर मिला। अलग-अलग देशों की अपनी परिस्थितियाँ, संस्कृतियाँ और शिक्षा-व्यवस्थाएँ थीं, लेकिन एक बात समान रूप से दिखाई दी—जिन देशों ने शिक्षा को अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया, उन्होंने शिक्षक को भी उसी अनुपात में सम्मान, स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा प्रदान की।

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तब यह और स्पष्ट हुआ कि यदि भारत को अपनी शिक्षा-व्यवस्था में व्यापक और स्थायी परिवर्तन लाना है, तो परिवर्तन का प्रारंभ शिक्षक से ही होना चाहिए। शिक्षक को सम्मान देना होगा, उसे निरंतर सीखने और स्वयं को विकसित करने के अवसर देने होंगे, उसके प्रशिक्षण को उत्कृष्ट बनाना होगा और समाज में अध्यापन को गौरवपूर्ण दायित्व के रूप में प्रतिष्ठित करना होगा।

मेरे लिए शिक्षा का यह विश्वास किसी पद पर रहते हुए पैदा नहीं हुआ। इसकी पहली अनुभूति मेरे बचपन की उन कठिन पगडंडियों पर हुई, जहाँ हिमालय की दुर्गम घाटियों से होकर मुझे लगभग आठ किलोमीटर पैदल विद्यालय जाना पड़ता था। वह यात्रा केवल घर से विद्यालय तक की यात्रा नहीं थी; वह मेरे जीवन की पहली पाठशाला थी।

कभी धूप, कभी वर्षा, कभी ठंड और कभी कठिन पहाड़ी रास्ते—लेकिन विद्यालय पहुँचने की आकांक्षा हर कठिनाई से बड़ी थी। उन्हीं पगडंडियों ने मुझे सिखाया कि परिस्थितियाँ मनुष्य की गति को धीमा कर सकती हैं, उसके संकल्प को नहीं। वहीं मैंने जाना कि शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं है; वह व्यक्ति को अपने जीवन की दिशा चुनने का सामर्थ्य देती है।

बाद में जब स्वयं अध्यापन का अवसर मिला और शिशु मंदिर के प्रधानाचार्य के रूप में कार्य करने का दायित्व मिला, तब शिक्षक की भूमिका को और निकट से समझने का अवसर मिला। सामने बैठे बच्चे केवल विद्यार्थी नहीं होते। उनमें भविष्य के वैज्ञानिक, चिकित्सक, साहित्यकार, शिक्षक, प्रशासक, उद्यमी, सैनिक और राष्ट्रनिर्माता छिपे होते हैं। शिक्षक का स्पर्श उनके व्यक्तित्व को आकार देता है।

एक शिक्षक कभी-कभी विद्यार्थी को केवल एक वाक्य कहता है, लेकिन वह वाक्य उसके पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है। कभी एक प्रोत्साहन किसी संकोची बालक के भीतर आत्मविश्वास जगा देता है, तो कभी शिक्षक का विश्वास किसी सामान्य विद्यार्थी में असाधारण बनने की आकांक्षा पैदा कर देता है। यही शिक्षक की अदृश्य शक्ति है।

शिक्षक ज्ञान का संचार करता है, लेकिन उसका सबसे बड़ा कार्य ज्ञान से भी आगे है—वह विवेक का निर्माण करता है। वह बच्चों को केवल यह नहीं बताता कि क्या सोचना है; वह उन्हें यह सिखाता है कि कैसे सोचना है। वह प्रश्न पूछने का साहस देता है, असफलता से सीखना सिखाता है और जीवन की चुनौतियों के सामने खड़े होने का आत्मबल प्रदान करता है।

इसी व्यापक दृष्टि को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी स्थान दिया गया। जब इस नीति को आकार देने का अवसर मिला, तब हमारा स्पष्ट विश्वास था कि भारत को ज्ञान-आधारित, आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनाना है तो शिक्षा को उसकी मूल शक्ति के साथ पुनर्स्थापित करना होगा। और शिक्षा की वह मूल शक्ति शिक्षक है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने शिक्षक शिक्षा को अधिक सुदृढ़ और व्यापक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की। बहुविषयक उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षक शिक्षा के एकीकरण, वर्ष 2030 तक चार वर्षीय समेकित बी.एड. को न्यूनतम योग्यता की दिशा में ले जाने तथा राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक (NPST) जैसी पहलें इसी सोच की अभिव्यक्ति हैं।

हमारा उद्देश्य केवल डिग्रीधारी शिक्षक तैयार करना नहीं है। हमारा उद्देश्य ऐसे शिक्षक तैयार करना है, जो भारतीय ज्ञान-परंपरा की गहराई को समझें, आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी की गति से परिचित हों, विद्यार्थियों की बदलती मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं को समझें और उनमें सृजनात्मकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवेदनशीलता तथा राष्ट्रबोध का विकास कर सकें।

भारत की शिक्षा-दृष्टि सदैव मनुष्य को केंद्र में रखती रही है। हमारे यहाँ शिक्षा का अर्थ केवल सूचना प्राप्त करना नहीं, बल्कि “सा विद्या या विमुक्तये”—अर्थात वह विद्या जो मनुष्य को अज्ञान, भय और सीमाओं से मुक्त करे। इसलिए हमारे लिए शिक्षक का दायित्व भी अत्यंत व्यापक है।

भारत में शिक्षक दिवस महान दार्शनिक, शिक्षाविद् और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती पर मनाया जाता है। उनका जीवन स्वयं इस बात का प्रमाण है कि अध्यापन केवल एक पेशा नहीं, बल्कि राष्ट्र और मानवता की सेवा का माध्यम है। सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुँचने के बाद भी उन्होंने अपने शिक्षक-स्वरूप को सर्वोच्च माना।

भारत रत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भी शिक्षक की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते थे। उनके लिए विद्यार्थियों के मन में स्वप्न जगाना और उन्हें उन स्वप्नों को साकार करने का सामर्थ्य देना शिक्षा का मूल उद्देश्य था। उनके जीवन का सबसे बड़ा संदेश यही था कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके युवा मनों में छिपी होती है और उन मनों को दिशा देने का दायित्व शिक्षक का है।

संत कबीर ने गुरु की महिमा को जिस आत्मीयता से व्यक्त किया, वह भारतीय मानस की गहराई को दर्शाती है—

“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।
 बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”

गुरु हमें केवल संसार का ज्ञान नहीं देते; वे हमें स्वयं को जानने की दृष्टि देते हैं। वे अंधकार में प्रकाश की दिशा बताते हैं। वे हमारी क्षमताओं को पहचानकर उन्हें सार्थकता प्रदान करते हैं।

इसीलिए शिक्षक को राष्ट्र का माली कहना केवल एक सुंदर उपमा नहीं है। जैसे माली किसी पौधे को अपनी इच्छानुसार खींचकर बड़ा नहीं करता, बल्कि उसकी प्रकृति को समझकर उसे उचित मिट्टी, जल, प्रकाश और संरक्षण देता है, उसी प्रकार एक श्रेष्ठ शिक्षक विद्यार्थी की मौलिक प्रतिभा को पहचानता है और उसे विकसित होने का अवसर देता है।

आज दुनिया तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल प्रौद्योगिकी, स्वचालन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा शिक्षा की परिभाषा को बदल रहे हैं। ऐसे समय में शिक्षक की भूमिका कम नहीं हुई है, बल्कि पहले से अधिक महत्वपूर्ण हुई है। मशीन सूचना दे सकती है, लेकिन संवेदना नहीं दे सकती। तकनीक उत्तर दे सकती है, लेकिन जीवन का अर्थ नहीं समझा सकती। कृत्रिम बुद्धिमत्ता विश्लेषण कर सकती है, लेकिन किसी बच्चे की आँखों में छिपे मौन प्रश्न को शिक्षक ही पढ़ सकता है।

भारत को ऐसा शिक्षा-तंत्र बनाना होगा जहाँ आधुनिकता और परंपरा का सुंदर समन्वय हो; जहाँ विज्ञान के साथ संस्कार हों, तकनीक के साथ मानवीयता हो, कौशल के साथ चरित्र हो और ज्ञान के साथ विवेक हो। इस संतुलित शिक्षा-व्यवस्था के निर्माण में शिक्षक की भूमिका सबसे केंद्रीय होगी।

विश्व के जिन देशों ने प्रगति की ऊँचाइयाँ प्राप्त की हैं, उनके अनुभव से भी यही स्पष्ट होता है कि विद्यालयों की गुणवत्ता अंततः शिक्षकों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। अब भारत के सामने अवसर है कि वह अपनी प्राचीन गुरु-परंपरा और आधुनिक शिक्षा-विज्ञान का ऐसा समन्वय करे, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए नई दिशा निर्धारित करे।

विश्वगुरु भारत की परिकल्पना केवल अतीत के गौरव को स्मरण करने से साकार नहीं होगी। इसके लिए हमें ऐसा वर्तमान गढ़ना होगा, जिसकी नींव ज्ञान पर हो, जिसकी दीवारें कौशल से निर्मित हों और जिसकी आत्मा संस्कारों से प्रकाशित हो।

और इस निर्माण का पहला शिल्पकार शिक्षक ही होगा।

अपने सार्वजनिक जीवन में, चाहे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया हो या भारत के शिक्षा मंत्री के रूप में, मैंने शिक्षा को सदैव राष्ट्र की आत्मा माना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मेरे लिए केवल एक नीतिगत दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की ज्ञान-परंपरा को आधुनिक आवश्यकताओं के साथ जोड़ने का एक व्यापक राष्ट्रीय संकल्प है।

आज आवश्यकता है कि हम शिक्षक को केवल सम्मानित करने की बात न करें, बल्कि उसके सम्मान को व्यवहार में उतारें। समाज के श्रेष्ठतम मस्तिष्क अध्यापन की ओर आकर्षित हों, शिक्षक निरंतर सीखते रहें, शोध और नवाचार से जुड़े रहें और उन्हें अपने विद्यार्थियों के भविष्य को आकार देने के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता तथा संसाधन प्राप्त हों।

क्योंकि किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसके भवन नहीं, उसकी मशीनें नहीं, बल्कि उसकी जाग्रत और संस्कारित पीढ़ियाँ होती हैं। और जाग्रत पीढ़ियों का निर्माण जाग्रत शिक्षकों से ही होता है।

एक शिक्षक एक दीपक है। वह स्वयं प्रकाश देता है और उसके प्रकाश से अनगिनत दीप प्रज्वलित होते हैं। उन दीपों से घर रोशन होते हैं, घरों से समाज और समाज से राष्ट्र। यही प्रकाश एक दिन पूरे विश्व को आलोकित कर सकता है।

इसलिए भारत के विश्वगुरु बनने की यात्रा का आरंभ किसी दूर क्षितिज से नहीं, बल्कि हमारी कक्षाओं से होगा; किसी विशाल भवन से नहीं, बल्कि शिक्षक के भीतर जलती उस छोटी-सी ज्योति से होगा, जो किसी बालक के अंतर्मन में ज्ञान, चरित्र और स्वप्न का प्रकाश भरती है।

गुरु की यही ज्योति भारत के भविष्य का प्रकाश है।
 और इसी प्रकाश से विश्वगुरु भारत का नया प्रभात जन्म लेगा।

इस शिक्षक दिवस पर मैं अपने जीवन के उन सभी गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने मेरे जीवन को दिशा दी, मुझे कठिनाइयों के बीच आगे बढ़ना सिखाया और शिक्षा के प्रति मेरी आस्था को दृढ़ किया। देश के प्रत्येक शिक्षक को मेरा सादर नमन—आप केवल विद्यार्थियों का भविष्य नहीं गढ़ रहे, आप भारत के भविष्य का निर्माण कर रहे हैं।

गुरु की ज्योति प्रज्वलित रहे,
 ज्ञान की गंगा प्रवाहित रहे,
 और भारत विश्व के ज्ञान-आकाश में पुनः
 अपने प्रखर प्रकाश से आलोकित होता रहे।

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