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‘वंदे मातरम्’ के अपमान पर हो सकती है 3 साल की जेल, संसद में नया संशोधन बिल
Digital Desk
राष्ट्रीय सम्मान कानून में बदलाव की तैयारी, राष्ट्रगान की तरह राष्ट्रीय गीत को भी कानूनी संरक्षण देने का प्रस्ताव; जानबूझकर गायन रोकने या बाधा डालने पर सजा का प्रावधान
संसद के मानसून सत्र में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर एक महत्वपूर्ण विधायी बदलाव चर्चा में है। केंद्र सरकार राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े मौजूदा कानून में संशोधन के जरिए ‘वंदे मातरम्’ को स्पष्ट कानूनी संरक्षण देने की तैयारी में है। प्रस्तावित व्यवस्था में राष्ट्रीय गीत का जानबूझकर अपमान करना या उसके गायन में बाधा डालना दंडनीय अपराध बनाया जाएगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इससे संबंधित संशोधन विधेयक संसद में पेश करने वाले हैं। इसके बाद संसद के दोनों सदनों में इसके प्रावधानों पर चर्चा होगी।
इस प्रस्ताव का नाम Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 है। इसका मकसद 1971 से लागू राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में बदलाव करना है। मौजूदा कानून में राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान के अपमान से जुड़े मामलों के लिए कानूनी प्रावधान हैं। अब सरकार इसी कानूनी ढांचे में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को भी शामिल करना चाहती है। विधेयक संसद से पारित होने और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही नए प्रावधान प्रभावी होंगे।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी केवल ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाने को अपने आप अपराध मान लेने जैसी बात नहीं है। प्रस्तावित प्रावधान मुख्य रूप से जानबूझकर अपमान करने, गायन को रोकने या उसके दौरान व्यवधान पैदा करने जैसी गतिविधियों से जुड़ा है। यानी कानून के दायरे और उसकी वास्तविक व्याख्या को समझना जरूरी होगा। विधेयक का अंतिम पाठ और संसद में पारित होने वाला स्वरूप ही तय करेगा कि किन परिस्थितियों में कार्रवाई की जा सकेगी।
प्रस्तावित संशोधन में ‘वंदे मातरम्’ के गायन को जानबूझकर रोकने या उसमें बाधा पहुंचाने वाले व्यक्ति के खिलाफ सजा का प्रावधान रखने की बात सामने आई है। ऐसी स्थिति में अधिकतम तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। यह दंड व्यवस्था मौजूदा राष्ट्रीय सम्मान कानून में राष्ट्रगान से जुड़े उल्लंघनों के लिए मौजूद कानूनी ढांचे के समान रखने की तैयारी है।
Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 पहले से देश में लागू है। यह कानून भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों और संवैधानिक सम्मान से जुड़े कुछ मामलों को कानूनी सुरक्षा देता है। राष्ट्रीय ध्वज और संविधान के अपमान से जुड़े कृत्यों के लिए इसमें दंड का प्रावधान है। राष्ट्रगान के गायन को जानबूझकर रोकना या ऐसे आयोजन में व्यवधान पैदा करना भी कानून के तहत दंडनीय है। अब इसी व्यवस्था का विस्तार राष्ट्रीय गीत तक करने का प्रस्ताव है।
सरकार का उद्देश्य ‘वंदे मातरम्’ को भी राष्ट्रीय सम्मान कानून के भीतर स्पष्ट वैधानिक सुरक्षा देना है। अभी राष्ट्रीय गीत का ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व स्थापित है, लेकिन उसके अपमान या गायन में बाधा के लिए राष्ट्रगान जैसी स्पष्ट दंडात्मक व्यवस्था अलग से नहीं थी। संशोधन के बाद इस अंतर को खत्म करने की कोशिश की जाएगी। इसी वजह से प्रस्तावित कानून को राष्ट्रीय गीत की कानूनी स्थिति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यहां राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत के बीच अंतर भी समझना जरूरी है। ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है। दोनों का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय पहचान में महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन इनकी संवैधानिक और कानूनी स्थिति पूरी तरह एक जैसी नहीं रही है। नया संशोधन मुख्य रूप से कानूनी संरक्षण के स्तर पर ‘वंदे मातरम्’ को मजबूत स्थिति देने की दिशा में उठाया गया कदम है।
‘वंदे मातरम्’ का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा है। इसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था और बाद में यह उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना। ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ एक प्रभावशाली उद्घोष बन गया था। स्वतंत्रता सेनानियों और आंदोलनकारियों के बीच इसका व्यापक इस्तेमाल हुआ। इसी ऐतिहासिक भूमिका के कारण इसे भारत की राष्ट्रीय चेतना से जुड़े प्रमुख प्रतीकों में गिना जाता है।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में ‘वंदे मातरम्’ के महत्व को लेकर स्थिति स्पष्ट की गई थी। ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया, जबकि ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक महत्व और स्वतंत्रता संग्राम में उसकी भूमिका को सम्मान दिया गया। इसके पहले दो पद सामान्य तौर पर राष्ट्रीय गीत के रूप में गाए जाते रहे हैं। समय-समय पर इसके गायन और प्रोटोकॉल को लेकर राजनीतिक तथा सामाजिक बहस भी होती रही है।
प्रस्तावित संशोधन के बाद सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि ‘वंदे मातरम्’ से जुड़े कुछ जानबूझकर किए गए अपमानजनक कृत्यों पर स्पष्ट दंडात्मक कार्रवाई का रास्ता बनेगा। अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर इसके गायन को रोकता है या व्यवधान पैदा करता है तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई की जा सकेगी। हालांकि हर स्थिति अपने आप अपराध नहीं बनेगी। किसी घटना में इरादा, परिस्थितियां और कानून में तय परिभाषा महत्वपूर्ण होंगी।
इस बिल को लेकर एक और महत्वपूर्ण पहलू सार्वजनिक और सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के गायन से जुड़ा है। सामने आई रिपोर्टों में राज्य समारोहों और कुछ औपचारिक आयोजनों में राष्ट्रीय गीत के पूर्ण गायन से जुड़े प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया है। अंतिम नियम क्या होंगे और किन आयोजनों पर लागू होंगे, इसकी स्पष्ट तस्वीर विधेयक के अंतिम स्वरूप और उसके तहत बनाए जाने वाले नियमों से सामने आएगी।
केंद्र सरकार इस प्रस्ताव पर पहले ही उच्च स्तर पर विचार कर चुकी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद इसे संसद के मानसून सत्र के विधायी एजेंडे में शामिल किया गया। अब संसद में पेश होने के बाद विधेयक के प्रत्येक प्रावधान पर चर्चा का रास्ता खुलेगा। सरकार को इसे कानून बनाने के लिए संसदीय प्रक्रिया पूरी करनी होगी। दोनों सदनों की मंजूरी और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही संशोधन प्रभावी कानून का रूप ले सकेगा।
इसलिए फिलहाल ‘वंदे मातरम् का अपमान अब अपराध हो गया’ कहना कानूनी रूप से जल्दबाजी होगी। सही स्थिति यह है कि सरकार इसे स्पष्ट रूप से दंडनीय बनाने के लिए मौजूदा कानून में संशोधन ला रही है। संसद से मंजूरी मिलने तक यह प्रस्तावित व्यवस्था है। विधेयक में चर्चा के दौरान संशोधन भी संभव हैं और अंतिम कानून का स्वरूप पेश किए गए प्रारूप से कुछ अलग हो सकता है।
सजा को लेकर सामने आया प्रावधान इस विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। जानबूझकर ‘वंदे मातरम्’ के गायन को रोकने या उसमें बाधा डालने पर अधिकतम तीन वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों की व्यवस्था प्रस्तावित है। यह सजा राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े मौजूदा कानून की दंड व्यवस्था के अनुरूप रखने की तैयारी है। किसी व्यक्ति पर कार्रवाई किस आधार पर होगी, यह कानून के शब्दों और संबंधित घटना के तथ्यों पर निर्भर करेगा।
मौजूदा National Honour Act में राष्ट्रगान के गायन को जानबूझकर रोकने या गायन के लिए एकत्र लोगों के बीच व्यवधान पैदा करने पर दंड का प्रावधान है। प्रस्तावित संशोधन इसी कानूनी सुरक्षा को राष्ट्रीय गीत तक विस्तारित करने की दिशा में है। इसका मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत की संवैधानिक पहचान एक हो जाएगी, बल्कि दोनों को अपमान और व्यवधान के मामलों में समान प्रकार की वैधानिक सुरक्षा देने की कोशिश है।
इस कानून को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में भी देखा जाएगा। संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है और उस पर कानून के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। दूसरी तरफ संविधान के अनुच्छेद 51A में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख है, जिसमें संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान के सम्मान की बात शामिल है। नया संशोधन राष्ट्रीय सम्मान से जुड़ी इसी व्यापक कानूनी बहस को आगे बढ़ा सकता है।
राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले भी महत्वपूर्ण रहे हैं। अदालतों ने अलग-अलग मामलों में सम्मान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच अंतर स्पष्ट किया है। केवल किसी गतिविधि में भाग न लेने और जानबूझकर अपमान या व्यवधान पैदा करने के बीच कानूनी फर्क हो सकता है। इसलिए प्रस्तावित कानून लागू होने की स्थिति में भी उसके शब्द, व्याख्या और अदालतों द्वारा तय संवैधानिक सीमाएं महत्वपूर्ण रहेंगी।
इस विधेयक पर संसद में राजनीतिक बहस होने की संभावना भी है। सरकार इसे राष्ट्रीय गीत को उचित कानूनी सम्मान देने वाला कदम बता सकती है, जबकि विपक्ष कानून के दायरे, अपराध की परिभाषा और उसके इस्तेमाल से जुड़े सवाल उठा सकता है। किसी भी दंडात्मक कानून में यह स्पष्ट होना जरूरी होता है कि कौन सा व्यवहार अपराध माना जाएगा और कार्रवाई के लिए किन तत्वों का साबित होना जरूरी होगा।
मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हुआ है और अगस्त तक चलने का कार्यक्रम है। सरकार ने इस सत्र के लिए कई विधेयकों को अपने विधायी एजेंडे में रखा है। राष्ट्रीय सम्मान कानून में संशोधन भी इन्हीं महत्वपूर्ण प्रस्तावों में शामिल है। विधेयक संसद में आने के बाद उसके मूल पाठ, धाराओं में प्रस्तावित बदलाव और दंडात्मक प्रावधानों की पूरी जानकारी औपचारिक रूप से सामने आएगी।
अगर संसद प्रस्तावित संशोधन को मंजूरी देती है तो 1971 के कानून का दायरा बढ़ जाएगा। इसके बाद राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान के साथ राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ से जुड़े जानबूझकर अपमान या गायन में व्यवधान के मामलों के लिए भी स्पष्ट वैधानिक प्रावधान उपलब्ध होगा। किस तरह के कृत्य को ‘अपमान’ माना जाएगा, जांच किस आधार पर होगी और कानून का व्यावहारिक इस्तेमाल कैसे किया जाएगा, इन पहलुओं पर विधेयक की संसदीय चर्चा के दौरान खास नजर रहेगी।
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संसद के मानसून सत्र में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर एक महत्वपूर्ण विधायी बदलाव चर्चा में है। केंद्र सरकार राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े मौजूदा कानून में संशोधन के जरिए ‘वंदे मातरम्’ को स्पष्ट कानूनी संरक्षण देने की तैयारी में है। प्रस्तावित व्यवस्था में राष्ट्रीय गीत का जानबूझकर अपमान करना या उसके गायन में बाधा डालना दंडनीय अपराध बनाया जाएगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इससे संबंधित संशोधन विधेयक संसद में पेश करने वाले हैं। इसके बाद संसद के दोनों सदनों में इसके प्रावधानों पर चर्चा होगी।
इस प्रस्ताव का नाम Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 है। इसका मकसद 1971 से लागू राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में बदलाव करना है। मौजूदा कानून में राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान के अपमान से जुड़े मामलों के लिए कानूनी प्रावधान हैं। अब सरकार इसी कानूनी ढांचे में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को भी शामिल करना चाहती है। विधेयक संसद से पारित होने और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही नए प्रावधान प्रभावी होंगे।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी केवल ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाने को अपने आप अपराध मान लेने जैसी बात नहीं है। प्रस्तावित प्रावधान मुख्य रूप से जानबूझकर अपमान करने, गायन को रोकने या उसके दौरान व्यवधान पैदा करने जैसी गतिविधियों से जुड़ा है। यानी कानून के दायरे और उसकी वास्तविक व्याख्या को समझना जरूरी होगा। विधेयक का अंतिम पाठ और संसद में पारित होने वाला स्वरूप ही तय करेगा कि किन परिस्थितियों में कार्रवाई की जा सकेगी।
प्रस्तावित संशोधन में ‘वंदे मातरम्’ के गायन को जानबूझकर रोकने या उसमें बाधा पहुंचाने वाले व्यक्ति के खिलाफ सजा का प्रावधान रखने की बात सामने आई है। ऐसी स्थिति में अधिकतम तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। यह दंड व्यवस्था मौजूदा राष्ट्रीय सम्मान कानून में राष्ट्रगान से जुड़े उल्लंघनों के लिए मौजूद कानूनी ढांचे के समान रखने की तैयारी है।
Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 पहले से देश में लागू है। यह कानून भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों और संवैधानिक सम्मान से जुड़े कुछ मामलों को कानूनी सुरक्षा देता है। राष्ट्रीय ध्वज और संविधान के अपमान से जुड़े कृत्यों के लिए इसमें दंड का प्रावधान है। राष्ट्रगान के गायन को जानबूझकर रोकना या ऐसे आयोजन में व्यवधान पैदा करना भी कानून के तहत दंडनीय है। अब इसी व्यवस्था का विस्तार राष्ट्रीय गीत तक करने का प्रस्ताव है।
सरकार का उद्देश्य ‘वंदे मातरम्’ को भी राष्ट्रीय सम्मान कानून के भीतर स्पष्ट वैधानिक सुरक्षा देना है। अभी राष्ट्रीय गीत का ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व स्थापित है, लेकिन उसके अपमान या गायन में बाधा के लिए राष्ट्रगान जैसी स्पष्ट दंडात्मक व्यवस्था अलग से नहीं थी। संशोधन के बाद इस अंतर को खत्म करने की कोशिश की जाएगी। इसी वजह से प्रस्तावित कानून को राष्ट्रीय गीत की कानूनी स्थिति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यहां राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत के बीच अंतर भी समझना जरूरी है। ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है। दोनों का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय पहचान में महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन इनकी संवैधानिक और कानूनी स्थिति पूरी तरह एक जैसी नहीं रही है। नया संशोधन मुख्य रूप से कानूनी संरक्षण के स्तर पर ‘वंदे मातरम्’ को मजबूत स्थिति देने की दिशा में उठाया गया कदम है।
‘वंदे मातरम्’ का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा है। इसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था और बाद में यह उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना। ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ एक प्रभावशाली उद्घोष बन गया था। स्वतंत्रता सेनानियों और आंदोलनकारियों के बीच इसका व्यापक इस्तेमाल हुआ। इसी ऐतिहासिक भूमिका के कारण इसे भारत की राष्ट्रीय चेतना से जुड़े प्रमुख प्रतीकों में गिना जाता है।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में ‘वंदे मातरम्’ के महत्व को लेकर स्थिति स्पष्ट की गई थी। ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया, जबकि ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक महत्व और स्वतंत्रता संग्राम में उसकी भूमिका को सम्मान दिया गया। इसके पहले दो पद सामान्य तौर पर राष्ट्रीय गीत के रूप में गाए जाते रहे हैं। समय-समय पर इसके गायन और प्रोटोकॉल को लेकर राजनीतिक तथा सामाजिक बहस भी होती रही है।
प्रस्तावित संशोधन के बाद सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि ‘वंदे मातरम्’ से जुड़े कुछ जानबूझकर किए गए अपमानजनक कृत्यों पर स्पष्ट दंडात्मक कार्रवाई का रास्ता बनेगा। अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर इसके गायन को रोकता है या व्यवधान पैदा करता है तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई की जा सकेगी। हालांकि हर स्थिति अपने आप अपराध नहीं बनेगी। किसी घटना में इरादा, परिस्थितियां और कानून में तय परिभाषा महत्वपूर्ण होंगी।
इस बिल को लेकर एक और महत्वपूर्ण पहलू सार्वजनिक और सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के गायन से जुड़ा है। सामने आई रिपोर्टों में राज्य समारोहों और कुछ औपचारिक आयोजनों में राष्ट्रीय गीत के पूर्ण गायन से जुड़े प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया है। अंतिम नियम क्या होंगे और किन आयोजनों पर लागू होंगे, इसकी स्पष्ट तस्वीर विधेयक के अंतिम स्वरूप और उसके तहत बनाए जाने वाले नियमों से सामने आएगी।
केंद्र सरकार इस प्रस्ताव पर पहले ही उच्च स्तर पर विचार कर चुकी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद इसे संसद के मानसून सत्र के विधायी एजेंडे में शामिल किया गया। अब संसद में पेश होने के बाद विधेयक के प्रत्येक प्रावधान पर चर्चा का रास्ता खुलेगा। सरकार को इसे कानून बनाने के लिए संसदीय प्रक्रिया पूरी करनी होगी। दोनों सदनों की मंजूरी और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही संशोधन प्रभावी कानून का रूप ले सकेगा।
इसलिए फिलहाल ‘वंदे मातरम् का अपमान अब अपराध हो गया’ कहना कानूनी रूप से जल्दबाजी होगी। सही स्थिति यह है कि सरकार इसे स्पष्ट रूप से दंडनीय बनाने के लिए मौजूदा कानून में संशोधन ला रही है। संसद से मंजूरी मिलने तक यह प्रस्तावित व्यवस्था है। विधेयक में चर्चा के दौरान संशोधन भी संभव हैं और अंतिम कानून का स्वरूप पेश किए गए प्रारूप से कुछ अलग हो सकता है।
सजा को लेकर सामने आया प्रावधान इस विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। जानबूझकर ‘वंदे मातरम्’ के गायन को रोकने या उसमें बाधा डालने पर अधिकतम तीन वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों की व्यवस्था प्रस्तावित है। यह सजा राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े मौजूदा कानून की दंड व्यवस्था के अनुरूप रखने की तैयारी है। किसी व्यक्ति पर कार्रवाई किस आधार पर होगी, यह कानून के शब्दों और संबंधित घटना के तथ्यों पर निर्भर करेगा।
मौजूदा National Honour Act में राष्ट्रगान के गायन को जानबूझकर रोकने या गायन के लिए एकत्र लोगों के बीच व्यवधान पैदा करने पर दंड का प्रावधान है। प्रस्तावित संशोधन इसी कानूनी सुरक्षा को राष्ट्रीय गीत तक विस्तारित करने की दिशा में है। इसका मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत की संवैधानिक पहचान एक हो जाएगी, बल्कि दोनों को अपमान और व्यवधान के मामलों में समान प्रकार की वैधानिक सुरक्षा देने की कोशिश है।
इस कानून को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में भी देखा जाएगा। संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है और उस पर कानून के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। दूसरी तरफ संविधान के अनुच्छेद 51A में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख है, जिसमें संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान के सम्मान की बात शामिल है। नया संशोधन राष्ट्रीय सम्मान से जुड़ी इसी व्यापक कानूनी बहस को आगे बढ़ा सकता है।
राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले भी महत्वपूर्ण रहे हैं। अदालतों ने अलग-अलग मामलों में सम्मान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच अंतर स्पष्ट किया है। केवल किसी गतिविधि में भाग न लेने और जानबूझकर अपमान या व्यवधान पैदा करने के बीच कानूनी फर्क हो सकता है। इसलिए प्रस्तावित कानून लागू होने की स्थिति में भी उसके शब्द, व्याख्या और अदालतों द्वारा तय संवैधानिक सीमाएं महत्वपूर्ण रहेंगी।
इस विधेयक पर संसद में राजनीतिक बहस होने की संभावना भी है। सरकार इसे राष्ट्रीय गीत को उचित कानूनी सम्मान देने वाला कदम बता सकती है, जबकि विपक्ष कानून के दायरे, अपराध की परिभाषा और उसके इस्तेमाल से जुड़े सवाल उठा सकता है। किसी भी दंडात्मक कानून में यह स्पष्ट होना जरूरी होता है कि कौन सा व्यवहार अपराध माना जाएगा और कार्रवाई के लिए किन तत्वों का साबित होना जरूरी होगा।
मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हुआ है और अगस्त तक चलने का कार्यक्रम है। सरकार ने इस सत्र के लिए कई विधेयकों को अपने विधायी एजेंडे में रखा है। राष्ट्रीय सम्मान कानून में संशोधन भी इन्हीं महत्वपूर्ण प्रस्तावों में शामिल है। विधेयक संसद में आने के बाद उसके मूल पाठ, धाराओं में प्रस्तावित बदलाव और दंडात्मक प्रावधानों की पूरी जानकारी औपचारिक रूप से सामने आएगी।
अगर संसद प्रस्तावित संशोधन को मंजूरी देती है तो 1971 के कानून का दायरा बढ़ जाएगा। इसके बाद राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान के साथ राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ से जुड़े जानबूझकर अपमान या गायन में व्यवधान के मामलों के लिए भी स्पष्ट वैधानिक प्रावधान उपलब्ध होगा। किस तरह के कृत्य को ‘अपमान’ माना जाएगा, जांच किस आधार पर होगी और कानून का व्यावहारिक इस्तेमाल कैसे किया जाएगा, इन पहलुओं पर विधेयक की संसदीय चर्चा के दौरान खास नजर रहेगी।
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