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खनिज सुरक्षा से आर्थिक सुरक्षा तक: 2026 का MMDR संशोधन क्यों महत्वपूर्ण है
छत्तीसगढ
भारत की आर्थिक कहानी में खनिजों की भूमिका अक्सर आंकड़ों और खदानों तक सीमित दिखाई देती है।लेकिन बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में खनिज अब केवल औद्योगिक कच्चा माल नहीं हैं।
स्टील, रक्षाउपकरण, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, नवीकरणीय ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और आधुनिक तकनीकों की पूरी श्रृंखलाइनके भरोसे खड़ी है। ऐसे में किसी देश के पास खनिज संसाधन होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है किवह उन्हें समय पर, प्रतिस्पर्धी लागत पर और स्थिर नीतिगत माहौल में विकसित भी कर सके।
इसी व्यापक संदर्भ में Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 को देखा जाना चाहिए। 12 अगस्त 2026 को लोकसभा और उसके अगले दिन राज्यसभा से पारित यहसंशोधन केवल खनन क्षेत्र से जुड़े करों का मामला नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा सवाल है भारत अपने खनिजसंसाधनों का इस्तेमाल किस तरह इस प्रकार करे कि उद्योग को निश्चितता मिले, राज्यों के अधिकार सुरक्षितरहें और देश की दीर्घकालिक खनिज सुरक्षा मजबूत हो।
तीन दशक पुराना विवाद
खनिज कराधान का विवाद नया नहीं है। इसकी जड़ें करीब 35 वर्ष पुराने कानूनी विवादों में हैं। मुख्य प्रश्न यहरहा कि 1957 के MMDR Act के तहत केंद्र को खनिज विकास को विनियमित करने की शक्ति और राज्योंको खनिज अधिकारों पर कर लगाने की संवैधानिक शक्ति के बीच सीमा कहां तय होती है।
समस्या यह थी कि कानून में इन दोनों शक्तियों के बीच संबंध पर्याप्त स्पष्ट नहीं था। नतीजा यह हुआ किअलग-अलग राज्यों में अलग व्याख्याएं सामने आईं और मामला बार-बार अदालतों तक पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग फैसलों ने भी इस बहस को कई चरणों से गुजारा। 1989 के India Cements Ltd. v. State of Tamil Nadu मामले में सात जजों की पीठ ने रॉयल्टी को टैक्स की प्रकृति से जोड़ा था।बाद में 2004 में पांच जजों की पीठ ने इस दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए रॉयल्टी को टैक्स के बजायसंविदात्मक भुगतान माना और राज्यों के खनिज वाली जमीन पर कर लगाने के अधिकार को अलग आधार परदेखा।

फिर आया 2024 का महत्वपूर्ण Mineral Area Development Authority v. SAIL फैसला। सुप्रीम कोर्ट नेस्पष्ट किया कि रॉयल्टी टैक्स नहीं है और राज्यों की खनिज अधिकारों तथा खनिज वाली जमीन पर कर लगानेकी संवैधानिक शक्ति को मान्यता दी। इसी फैसले ने वर्षों पुराने विवाद को एक नए कानूनी संदर्भ में ला खड़ाकिया।
असली बदलाव कहां है?
2026 का संशोधन इसी पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण हो जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य रॉयल्टी या ऑक्शन प्रीमियमकी मौजूदा व्यवस्था को बदलना नहीं, बल्कि राज्यों द्वारा लगाए जा सकने वाले अतिरिक्त टैक्स, सेस औरशुल्क को लेकर एक स्पष्ट ढांचा तैयार करना है।
व्यवहार में यह खनन कंपनियों के लिए बड़ा मुद्दा है। किसी कंपनी के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं किआज उसे कितना टैक्स देना है। वह यह भी जानना चाहती है कि पांच या दस साल बाद, जब करोड़ों या अरबोंरुपये का निवेश हो चुका होगा, तब अचानक कोई नया शुल्क या पिछली अवधि का बड़ा दावा सामने तो नहींआएगा।
खनन परियोजनाएं लंबी अवधि के निवेश की मांग करती हैं। इसलिए नीति में स्थिरता और लागत कीपूर्वानुमेयता निवेश के फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यदि अलग अलग राज्यों में समान खनिज पर अलग-अलग अतिरिक्त शुल्क और कर लगाए जाते हैं, तोउत्पादन लागत में बड़ा अंतर पैदा हो सकता है। इसका असर अंततः स्टील, ऊर्जा, निर्माण और उन तमाम उद्योगोंपर पड़ता है जो खनिजों पर निर्भर हैं।

पुराने बकाये का सवाल
2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्यों को पुराने खनिज संबंधी कर बकाये की मांग करने का रास्तामिला था। इससे 2004-05 और उसके बाद की पुरानी देनदारियों को लेकर खनन कंपनियों पर भारी वित्तीयबोझ पड़ने की आशंका पैदा हुई।
2026 के संशोधन में ऐसे कुछ पुराने, लगाए गए लेकिन वसूल न किए गए बकायों को समाप्त करने काप्रावधान किया गया है। हालांकि, जो राशि पहले ही जमा या वसूल की जा चुकी है, उसके रिफंड का प्रावधाननहीं है।
यह प्रावधान उद्योग के लिए केवल राहत का विषय नहीं है। इसका एक बड़ा उद्देश्य यह भी है कि कई दशकपुराने कर विवाद लगातार नई अनिश्चितता पैदा न करते रहें।
राज्यों के अधिकार बनाम राष्ट्रीय हित
यहीं इस कानून का सबसे संवेदनशील पहलू सामने आता है। राज्यों के पास खनिज संसाधनों से जुड़े करलगाने की संवैधानिक शक्ति है और खनन राजस्व राज्यों के लिए महत्वपूर्ण आय का स्रोत है। इसलिए यहस्वाभाविक है कि राज्य अपनी वित्तीय स्वायत्तता को लेकर सतर्क रहें।
दूसरी ओर, केंद्र का तर्क है कि जब खनिज विकास का व्यापक नियमन संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है, तोखनिज विकास के हित में राज्यों के अतिरिक्त कराधान पर सीमाएं तय करने की शक्ति भी संसद के पास होनीचाहिए।
इसलिए इसे केवल केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व का विवाद मानना पूरी तस्वीर नहीं होगी। असल चुनौतीदोनों संवैधानिक शक्तियों के बीच ऐसा संतुलन बनाने की है जिसमें राज्यों का वैध राजस्व बना रहे और देश केखनिज क्षेत्र में निवेश तथा उत्पादन अनिश्चित कर बोझ से प्रभावित न हो।
महत्वपूर्ण यह भी है कि संशोधन रॉयल्टी और ऑक्शन प्रीमियम से राज्यों की मौजूदा आय को समाप्त नहींकरता। बदलाव मुख्य रूप से अतिरिक्त करों, सेस और शुल्क को लेकर स्पष्टता पर केंद्रित है।
खनिज नीति का बदलता चरित्र
पिछले एक दशक में भारत की खनन नीति में भी व्यापक बदलाव हुए हैं। पारदर्शी नीलामी, खनिज खोज मेंतेजी और महत्वपूर्ण खनिजों के विकास पर जोर बढ़ा है। 2023 और 2025 के MMDR सुधारों ने महत्वपूर्णऔर रणनीतिक खनिजों की खोज तथा उत्पादन के अवसरों को विस्तार दिया।
कोकिंग कोल को महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों की श्रेणी में रखना भी इसी बदलती सोच का संकेत है।स्टील उद्योग के लिए कोकिंग कोल की अहमियत देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि खनिज नीति अब केवलसरकार के लिए राजस्व जुटाने का साधन नहीं रह गई है। इसका संबंध औद्योगिक उत्पादन, रणनीतिकआत्मनिर्भरता और सप्लाई चेन सुरक्षा से भी जुड़ चुका है।
इसी क्रम में कोयला ब्लॉकों के लिए परफॉर्मेंस बैंक गारंटी के विकल्प के रूप में Insurance Surety Bonds और नए ऑक्शन प्रावधान जैसे कदम भी खनन परियोजनाओं को वित्तीय रूप से अधिक व्यवहारिक बनाने औरउन्हें जल्दी उत्पादन में लाने की कोशिश का हिस्सा हैं।
आगे की चुनौती
भारत की बढ़ती औद्योगिक जरूरतों के साथ लिथियम, कोबाल्ट, निकल और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे खनिजोंकी मांग बढ़ना तय है। इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर बैटरी स्टोरेज और नवीकरणीय ऊर्जा तक, भविष्य कीअर्थव्यवस्था इन संसाधनों पर अधिक निर्भर होगी।
यहीं खनिज सुरक्षा सीधे आर्थिक सुरक्षा में बदल जाती है। यदि देश में संसाधन मौजूद होने के बावजूद खोज, मंजूरी, कर व्यवस्था या निवेश की अनिश्चितता के कारण उनका उत्पादन प्रतिस्पर्धी नहीं रह पाता, तो भारत कोउन खनिजों का भी आयात करना पड़ सकता है जिन्हें वह स्वयं निकाल सकता है।
2026 का MMDR संशोधन इसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है। इसका अंतिम मूल्यांकन इस बात से होगा किक्या यह वास्तव में निवेश की अनिश्चितता घटाता है, खनिज उत्पादन को गति देता है और केंद्र तथा राज्यों केबीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद को अधिक स्पष्ट कानूनी ढांचे में बदल पाता है।
आखिरकार, खनिज नीति अब केवल खदानों की नीति नहीं रह गई है। यह भारत के स्टील, रक्षा, ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, तकनीक और औद्योगिक भविष्य की नीति बन चुकी है। आत्मनिर्भर भारत से विकसितभारत 2047 तक की यात्रा में जिस तरह सड़क, बिजली और डिजिटल नेटवर्क जरूरी हैं, उसी तरह एकभरोसेमंद और प्रतिस्पर्धी खनिज आपूर्ति श्रृंखला भी जरूरी होगी।
इसलिए 2026 का संशोधन अपने मूल में सिर्फ टैक्स व्यवस्था बदलने का प्रयास नहीं है। यह उस बड़े सवालका जवाब खोजने की कोशिश है कि भारत अपने प्राकृतिक संसाधनों को आर्थिक ताकत और रणनीतिकसुरक्षा में कितनी प्रभावी ढंग से बदल सकता है।
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