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स्मार्ट डिवाइस खरीदने के बाद मरम्मत का अधिकार किसका? ‘Right to Repair’ पर तेज हुई बहस
Priyanka Mathur
कंपनियों के अधिकृत सर्विस सेंटर और सॉफ्टवेयर लॉक के मुकाबले स्वतंत्र रिपेयर की मांग; सवाल- फोन, लैपटॉप और स्मार्ट उपकरण खरीदने के बाद ग्राहक को कितना नियंत्रण मिले?
मोबाइल फोन की स्क्रीन टूट जाए, लैपटॉप की बैटरी खराब हो जाए या स्मार्ट टीवी का कोई छोटा पार्ट काम करना बंद कर दे तो ग्राहक के सामने अक्सर दो रास्ते होते हैं। पहला, कंपनी के अधिकृत सर्विस सेंटर पर जाकर मरम्मत कराना और दूसरा, किसी स्थानीय तकनीशियन की मदद लेना। लेकिन स्मार्ट इलेक्ट्रॉनिक्स में सॉफ्टवेयर, डिजिटल लॉक और खास उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ने के साथ दूसरा रास्ता कई मामलों में मुश्किल होता जा रहा है। यहीं से ‘Right to Repair’ यानी मरम्मत के अधिकार की बहस खड़ी होती है। इसका मूल सवाल सीधा है—जिस व्यक्ति ने कोई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस खरीदा और उसकी पूरी कीमत चुकाई, क्या उसे उस डिवाइस को अपनी पसंद के तकनीशियन से खुलवाने, खराब पार्ट बदलवाने या खुद मरम्मत करने का कानूनी अधिकार होना चाहिए? या फिर साइबर सुरक्षा, बौद्धिक संपदा और उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए निर्माता कंपनी को यह तय करने का अधिकार मिलना चाहिए कि डिवाइस की मरम्मत कौन और किस तरह कर सकता है।
यह मुद्दा अब केवल मोबाइल और लैपटॉप तक सीमित नहीं रहा। स्मार्टवॉच, टीवी, घरेलू उपकरण, कार, कृषि मशीनरी और इंटरनेट से जुड़े दूसरे उत्पाद भी इसके दायरे में आ चुके हैं। भारत में भी उपभोक्ता मामलों से जुड़ी व्यवस्था में Right to Repair को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठाए गए हैं और सरकारी पोर्टल के जरिए कंपनियों से रिपेयर मैनुअल, स्पेयर पार्ट्स तथा सर्विस से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है।
Right to Repair का समर्थन करने वालों की सबसे बड़ी दलील मालिकाना हक से जुड़ी है। उनका कहना है कि जब ग्राहक किसी उत्पाद की पूरी कीमत चुका चुका है तो उसे यह तय करने की आजादी होनी चाहिए कि खराब होने पर वह उसे कहां ठीक कराएगा। उदाहरण के तौर पर किसी स्मार्टफोन की बैटरी खराब होने पर यदि कंपनी केवल अपने अधिकृत केंद्र पर बैटरी बदलने की अनुमति देती है और स्थानीय तकनीशियन के पास जरूरी सॉफ्टवेयर या डायग्नोस्टिक सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो ग्राहक की पसंद सीमित हो जाती है। कई बार अधिकृत सर्विस सेंटर दूर होता है, मरम्मत महंगी पड़ती है या छोटे पार्ट की खराबी पर पूरा मॉड्यूल बदलने की सलाह दी जाती है। स्वतंत्र रिपेयर व्यवसाय से जुड़े लोगों का तर्क है कि कंपनियां यदि स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी मैनुअल और डायग्नोस्टिक टूल उचित शर्तों पर उपलब्ध कराएं तो ग्राहक के पास अधिक विकल्प होंगे। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से मरम्मत की कीमत भी कम हो सकती है।
छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में यह मुद्दा ज्यादा अहम हो जाता है, जहां हर ब्रांड का अधिकृत सर्विस नेटवर्क आसानी से उपलब्ध नहीं होता। वहां स्थानीय रिपेयर दुकानों पर निर्भरता पहले से अधिक है। मरम्मत आसान होने का एक दूसरा पहलू इलेक्ट्रॉनिक कचरे से जुड़ा है। किसी डिवाइस की बैटरी या छोटा कंपोनेंट खराब होने पर यदि उसे बदलना मुश्किल या आर्थिक रूप से अव्यावहारिक हो जाए तो ग्राहक नया उत्पाद खरीद सकता है। इससे इस्तेमाल योग्य उपकरण जल्दी कचरे में पहुंच जाते हैं। Right to Repair के समर्थकों का कहना है कि आसानी से रिपेयर होने वाले उत्पाद ज्यादा समय तक इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जिससे ई-वेस्ट कम करने में मदद मिल सकती है।
दूसरी तरफ इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की अपनी चिंताएं हैं। आज का स्मार्टफोन या लैपटॉप केवल हार्डवेयर नहीं है। उसमें व्यक्तिगत फोटो, बैंकिंग ऐप, पासवर्ड, बायोमेट्रिक जानकारी और दूसरे संवेदनशील डेटा मौजूद हो सकते हैं। स्मार्ट होम डिवाइस इंटरनेट से जुड़े रहते हैं, जबकि आधुनिक कारों में दर्जनों इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल सिस्टम होते हैं। कंपनियों का तर्क है कि हर तकनीकी लॉक हटाकर किसी भी व्यक्ति को सिस्टम के महत्वपूर्ण हिस्सों तक पहुंच देने से सुरक्षा जोखिम पैदा हो सकते हैं। गलत पार्ट लगाने, बैटरी के साथ छेड़छाड़ करने या सुरक्षा संबंधी सॉफ्टवेयर बदलने से डिवाइस खराब होने के साथ आग, डेटा चोरी या साइबर हमले जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।
निर्माता यह भी कहते हैं कि उनके कुछ डायग्नोस्टिक टूल, फर्मवेयर और डिजाइन कारोबारी गोपनीयता तथा बौद्धिक संपदा के दायरे में आते हैं। यदि कानून कंपनियों को हर तकनीकी जानकारी सार्वजनिक करने के लिए मजबूर करे तो नकली पार्ट बनाने वालों या साइबर अपराधियों को भी उसका फायदा मिल सकता है। यही वजह है कि बहस अब ‘मरम्मत का अधिकार होना चाहिए या नहीं’ से आगे बढ़कर इस सवाल पर पहुंच गई है कि यह अधिकार कितना व्यापक होना चाहिए। एक संभावित रास्ता यह माना जाता है कि कंपनियां सामान्य मरम्मत के लिए जरूरी मैनुअल, स्पेयर पार्ट्स, डायग्नोस्टिक टूल और सॉफ्टवेयर एक्सेस स्वतंत्र तकनीशियनों को उचित शर्तों पर दें, लेकिन सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील सिस्टम के लिए अलग नियम बनाए जाएं। इसी तरह ग्राहक द्वारा किसी डिवाइस को खुलवाने भर से पूरी वारंटी खत्म करने के बजाय नुकसान की जिम्मेदारी उस हिस्से तक सीमित रखने की मांग भी की जाती रही है, जो अनधिकृत मरम्मत के कारण वास्तव में प्रभावित हुआ हो।
भारत के संदर्भ में यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में इलेक्ट्रॉनिक्स का बाजार तेजी से बढ़ा है और साथ ही स्थानीय रिपेयर इकोसिस्टम भी बहुत बड़ा है। लाखों छोटे तकनीशियन मोबाइल, कंप्यूटर और घरेलू उपकरण ठीक करने का काम करते हैं। इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती नए उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले खास पार्ट, सॉफ्टवेयर पेयरिंग और तकनीकी जानकारी तक पहुंच की हो सकती है। कई आधुनिक उपकरणों में नया पार्ट लगाने के बाद भी उसे सॉफ्टवेयर के जरिए डिवाइस के साथ जोड़ना पड़ता है। ऐसे में केवल स्क्रूड्राइवर और इलेक्ट्रॉनिक्स की जानकारी पर्याप्त नहीं रह जाती। भविष्य की Right to Repair व्यवस्था में इसी डिजिटल नियंत्रण का सवाल सबसे कठिन रहने वाला है।
उपभोक्ता को मरम्मत की वास्तविक स्वतंत्रता तभी मिलेगी जब उसके पास जरूरी पार्ट और तकनीकी जानकारी तक व्यवहारिक पहुंच हो, जबकि कंपनियां चाहेंगी कि इससे उनके सुरक्षा मानक और बौद्धिक संपदा प्रभावित न हों। सरकारों और नियामकों के सामने चुनौती दोनों पक्षों के बीच सीमा तय करने की है—ऐसी व्यवस्था जिसमें ग्राहक केवल इसलिए नया उपकरण खरीदने को मजबूर न हो क्योंकि पुराना आसानी से ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन किसी डिवाइस की सुरक्षा प्रणाली खोलने के नाम पर व्यक्तिगत डेटा और डिजिटल सुरक्षा को भी खतरे में न डाला जाए।
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Priyanka Mathur
मोबाइल फोन की स्क्रीन टूट जाए, लैपटॉप की बैटरी खराब हो जाए या स्मार्ट टीवी का कोई छोटा पार्ट काम करना बंद कर दे तो ग्राहक के सामने अक्सर दो रास्ते होते हैं। पहला, कंपनी के अधिकृत सर्विस सेंटर पर जाकर मरम्मत कराना और दूसरा, किसी स्थानीय तकनीशियन की मदद लेना। लेकिन स्मार्ट इलेक्ट्रॉनिक्स में सॉफ्टवेयर, डिजिटल लॉक और खास उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ने के साथ दूसरा रास्ता कई मामलों में मुश्किल होता जा रहा है। यहीं से ‘Right to Repair’ यानी मरम्मत के अधिकार की बहस खड़ी होती है। इसका मूल सवाल सीधा है—जिस व्यक्ति ने कोई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस खरीदा और उसकी पूरी कीमत चुकाई, क्या उसे उस डिवाइस को अपनी पसंद के तकनीशियन से खुलवाने, खराब पार्ट बदलवाने या खुद मरम्मत करने का कानूनी अधिकार होना चाहिए? या फिर साइबर सुरक्षा, बौद्धिक संपदा और उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए निर्माता कंपनी को यह तय करने का अधिकार मिलना चाहिए कि डिवाइस की मरम्मत कौन और किस तरह कर सकता है।
यह मुद्दा अब केवल मोबाइल और लैपटॉप तक सीमित नहीं रहा। स्मार्टवॉच, टीवी, घरेलू उपकरण, कार, कृषि मशीनरी और इंटरनेट से जुड़े दूसरे उत्पाद भी इसके दायरे में आ चुके हैं। भारत में भी उपभोक्ता मामलों से जुड़ी व्यवस्था में Right to Repair को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठाए गए हैं और सरकारी पोर्टल के जरिए कंपनियों से रिपेयर मैनुअल, स्पेयर पार्ट्स तथा सर्विस से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है।
Right to Repair का समर्थन करने वालों की सबसे बड़ी दलील मालिकाना हक से जुड़ी है। उनका कहना है कि जब ग्राहक किसी उत्पाद की पूरी कीमत चुका चुका है तो उसे यह तय करने की आजादी होनी चाहिए कि खराब होने पर वह उसे कहां ठीक कराएगा। उदाहरण के तौर पर किसी स्मार्टफोन की बैटरी खराब होने पर यदि कंपनी केवल अपने अधिकृत केंद्र पर बैटरी बदलने की अनुमति देती है और स्थानीय तकनीशियन के पास जरूरी सॉफ्टवेयर या डायग्नोस्टिक सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो ग्राहक की पसंद सीमित हो जाती है। कई बार अधिकृत सर्विस सेंटर दूर होता है, मरम्मत महंगी पड़ती है या छोटे पार्ट की खराबी पर पूरा मॉड्यूल बदलने की सलाह दी जाती है। स्वतंत्र रिपेयर व्यवसाय से जुड़े लोगों का तर्क है कि कंपनियां यदि स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी मैनुअल और डायग्नोस्टिक टूल उचित शर्तों पर उपलब्ध कराएं तो ग्राहक के पास अधिक विकल्प होंगे। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से मरम्मत की कीमत भी कम हो सकती है।
छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में यह मुद्दा ज्यादा अहम हो जाता है, जहां हर ब्रांड का अधिकृत सर्विस नेटवर्क आसानी से उपलब्ध नहीं होता। वहां स्थानीय रिपेयर दुकानों पर निर्भरता पहले से अधिक है। मरम्मत आसान होने का एक दूसरा पहलू इलेक्ट्रॉनिक कचरे से जुड़ा है। किसी डिवाइस की बैटरी या छोटा कंपोनेंट खराब होने पर यदि उसे बदलना मुश्किल या आर्थिक रूप से अव्यावहारिक हो जाए तो ग्राहक नया उत्पाद खरीद सकता है। इससे इस्तेमाल योग्य उपकरण जल्दी कचरे में पहुंच जाते हैं। Right to Repair के समर्थकों का कहना है कि आसानी से रिपेयर होने वाले उत्पाद ज्यादा समय तक इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जिससे ई-वेस्ट कम करने में मदद मिल सकती है।
दूसरी तरफ इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की अपनी चिंताएं हैं। आज का स्मार्टफोन या लैपटॉप केवल हार्डवेयर नहीं है। उसमें व्यक्तिगत फोटो, बैंकिंग ऐप, पासवर्ड, बायोमेट्रिक जानकारी और दूसरे संवेदनशील डेटा मौजूद हो सकते हैं। स्मार्ट होम डिवाइस इंटरनेट से जुड़े रहते हैं, जबकि आधुनिक कारों में दर्जनों इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल सिस्टम होते हैं। कंपनियों का तर्क है कि हर तकनीकी लॉक हटाकर किसी भी व्यक्ति को सिस्टम के महत्वपूर्ण हिस्सों तक पहुंच देने से सुरक्षा जोखिम पैदा हो सकते हैं। गलत पार्ट लगाने, बैटरी के साथ छेड़छाड़ करने या सुरक्षा संबंधी सॉफ्टवेयर बदलने से डिवाइस खराब होने के साथ आग, डेटा चोरी या साइबर हमले जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।
निर्माता यह भी कहते हैं कि उनके कुछ डायग्नोस्टिक टूल, फर्मवेयर और डिजाइन कारोबारी गोपनीयता तथा बौद्धिक संपदा के दायरे में आते हैं। यदि कानून कंपनियों को हर तकनीकी जानकारी सार्वजनिक करने के लिए मजबूर करे तो नकली पार्ट बनाने वालों या साइबर अपराधियों को भी उसका फायदा मिल सकता है। यही वजह है कि बहस अब ‘मरम्मत का अधिकार होना चाहिए या नहीं’ से आगे बढ़कर इस सवाल पर पहुंच गई है कि यह अधिकार कितना व्यापक होना चाहिए। एक संभावित रास्ता यह माना जाता है कि कंपनियां सामान्य मरम्मत के लिए जरूरी मैनुअल, स्पेयर पार्ट्स, डायग्नोस्टिक टूल और सॉफ्टवेयर एक्सेस स्वतंत्र तकनीशियनों को उचित शर्तों पर दें, लेकिन सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील सिस्टम के लिए अलग नियम बनाए जाएं। इसी तरह ग्राहक द्वारा किसी डिवाइस को खुलवाने भर से पूरी वारंटी खत्म करने के बजाय नुकसान की जिम्मेदारी उस हिस्से तक सीमित रखने की मांग भी की जाती रही है, जो अनधिकृत मरम्मत के कारण वास्तव में प्रभावित हुआ हो।
भारत के संदर्भ में यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में इलेक्ट्रॉनिक्स का बाजार तेजी से बढ़ा है और साथ ही स्थानीय रिपेयर इकोसिस्टम भी बहुत बड़ा है। लाखों छोटे तकनीशियन मोबाइल, कंप्यूटर और घरेलू उपकरण ठीक करने का काम करते हैं। इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती नए उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले खास पार्ट, सॉफ्टवेयर पेयरिंग और तकनीकी जानकारी तक पहुंच की हो सकती है। कई आधुनिक उपकरणों में नया पार्ट लगाने के बाद भी उसे सॉफ्टवेयर के जरिए डिवाइस के साथ जोड़ना पड़ता है। ऐसे में केवल स्क्रूड्राइवर और इलेक्ट्रॉनिक्स की जानकारी पर्याप्त नहीं रह जाती। भविष्य की Right to Repair व्यवस्था में इसी डिजिटल नियंत्रण का सवाल सबसे कठिन रहने वाला है।
उपभोक्ता को मरम्मत की वास्तविक स्वतंत्रता तभी मिलेगी जब उसके पास जरूरी पार्ट और तकनीकी जानकारी तक व्यवहारिक पहुंच हो, जबकि कंपनियां चाहेंगी कि इससे उनके सुरक्षा मानक और बौद्धिक संपदा प्रभावित न हों। सरकारों और नियामकों के सामने चुनौती दोनों पक्षों के बीच सीमा तय करने की है—ऐसी व्यवस्था जिसमें ग्राहक केवल इसलिए नया उपकरण खरीदने को मजबूर न हो क्योंकि पुराना आसानी से ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन किसी डिवाइस की सुरक्षा प्रणाली खोलने के नाम पर व्यक्तिगत डेटा और डिजिटल सुरक्षा को भी खतरे में न डाला जाए।
