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क्या मोबाइल फोन कपल्स के बीच सबसे बड़ा तीसरा व्यक्ति बन गया है? रिश्तों में बढ़ती दूरी पर सवाल
Vaishnavi Joshi
एक ही कमरे में साथ रहने के बावजूद स्क्रीन में खोए रहते हैं लोग, क्या स्मार्टफोन रिश्तों की गर्माहट कम कर रहा है?
आज के दौर में मोबाइल फोन जिंदगी का जरूरी हिस्सा बन चुका है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक ज्यादातर लोगों का समय किसी न किसी स्क्रीन के साथ गुजरता है। फोन ने जहां लोगों के काम आसान किए हैं, वहीं रिश्तों पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है। खासकर कपल्स के बीच अब एक नई तरह की समस्या सामने आ रही है, जहां एक ही घर में रहने वाले लोग भी एक-दूसरे से ज्यादा समय मोबाइल स्क्रीन के साथ बिताने लगे हैं। कई रिश्तों में अब शिकायत यह नहीं होती कि पार्टनर समय नहीं देता, बल्कि यह होती है कि पार्टनर साथ होकर भी मौजूद नहीं रहता। बातचीत के बीच बार-बार फोन देखना, खाने की टेबल पर मोबाइल चलाना या सोने से पहले घंटों सोशल मीडिया पर लगे रहना धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी पैदा कर सकता है। किसी भी रिश्ते की मजबूती बातचीत, ध्यान और भावनात्मक जुड़ाव पर निर्भर करती है। जब मोबाइल लगातार ध्यान खींचता रहता है तो पार्टनर के साथ बिताया जाने वाला समय कम होने लगता है। यह छोटी-छोटी आदतें आगे चलकर बड़े मतभेद का कारण बन सकती हैं। पहले कपल्स अपने खाली समय में एक-दूसरे से बातें करते थे, दिनभर की बातें साझा करते थे और साथ में समय बिताते थे। लेकिन अब कई बार दोनों लोग एक ही जगह बैठे होते हैं और अपनी-अपनी स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। बाहर से देखने पर सब सामान्य लगता है, लेकिन अंदर ही अंदर रिश्ते में भावनात्मक दूरी बढ़ सकती है।
मोबाइल फोन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह धीरे-धीरे आदत में बदल जाता है। शुरुआत में कुछ मिनट के लिए फोन देखना सामान्य लगता है, लेकिन कब यह घंटों में बदल जाता है, इसका पता नहीं चलता। सोशल मीडिया, वीडियो स्ट्रीमिंग और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन इंसान का ध्यान बार-बार अपनी ओर खींचते हैं। कई कपल्स में यह भी देखा गया है कि फोन को लेकर शक और असुरक्षा की भावना बढ़ने लगी है। पार्टनर ज्यादा समय मोबाइल पर बिताता है तो दूसरा व्यक्ति खुद को नजरअंदाज महसूस कर सकता है। कभी-कभी फोन की प्राइवेसी को लेकर भी रिश्तों में तनाव पैदा हो जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मोबाइल फोन रिश्तों का दुश्मन है। सही इस्तेमाल किया जाए तो यही तकनीक रिश्तों को मजबूत भी कर सकती है। दूर रहने वाले कपल्स वीडियो कॉल और मैसेज के जरिए जुड़े रह सकते हैं। समस्या मोबाइल नहीं, बल्कि उसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल है। रिश्तों में संतुलन बनाए रखने के लिए कई विशेषज्ञ "नो फोन टाइम" की सलाह देते हैं। जैसे खाना खाते समय फोन दूर रखना, सोने से पहले कुछ समय सिर्फ बातचीत के लिए निकालना और हफ्ते में एक दिन बिना ज्यादा स्क्रीन टाइम के साथ बिताना रिश्ते को बेहतर बना सकता है। कपल्स के लिए जरूरी है कि वे एक-दूसरे की मौजूदगी को महत्व दें। कई बार पार्टनर को महंगे गिफ्ट या बड़े सरप्राइज से ज्यादा जरूरत होती है कि सामने वाला उसकी बात ध्यान से सुने। रिश्ते छोटे-छोटे पलों से मजबूत होते हैं और इन पलों की जगह अगर हमेशा मोबाइल ले ले तो दूरी बढ़ना स्वाभाविक है।
आज मोबाइल हमारी जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन रिश्तों में उसकी जगह तय करना जरूरी है। तकनीक का इस्तेमाल सुविधा के लिए होना चाहिए, रिश्तों के बीच दीवार बनाने के लिए नहीं। एक-दूसरे के साथ बिताया गया समय ही किसी भी रिश्ते की असली ताकत होता है। बदलते समय में सवाल यह नहीं है कि मोबाइल रखना चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या हम मोबाइल को इतना समय दे रहे हैं कि अपने करीबी रिश्तों के लिए समय कम पड़ जाए। अगर जवाब हां है, तो शायद रिश्तों को बचाने के लिए स्क्रीन से थोड़ा दूरी बनाना जरूरी हो गया है।
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क्या मोबाइल फोन कपल्स के बीच सबसे बड़ा तीसरा व्यक्ति बन गया है? रिश्तों में बढ़ती दूरी पर सवाल
Vaishnavi Joshi
आज के दौर में मोबाइल फोन जिंदगी का जरूरी हिस्सा बन चुका है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक ज्यादातर लोगों का समय किसी न किसी स्क्रीन के साथ गुजरता है। फोन ने जहां लोगों के काम आसान किए हैं, वहीं रिश्तों पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है। खासकर कपल्स के बीच अब एक नई तरह की समस्या सामने आ रही है, जहां एक ही घर में रहने वाले लोग भी एक-दूसरे से ज्यादा समय मोबाइल स्क्रीन के साथ बिताने लगे हैं। कई रिश्तों में अब शिकायत यह नहीं होती कि पार्टनर समय नहीं देता, बल्कि यह होती है कि पार्टनर साथ होकर भी मौजूद नहीं रहता। बातचीत के बीच बार-बार फोन देखना, खाने की टेबल पर मोबाइल चलाना या सोने से पहले घंटों सोशल मीडिया पर लगे रहना धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी पैदा कर सकता है। किसी भी रिश्ते की मजबूती बातचीत, ध्यान और भावनात्मक जुड़ाव पर निर्भर करती है। जब मोबाइल लगातार ध्यान खींचता रहता है तो पार्टनर के साथ बिताया जाने वाला समय कम होने लगता है। यह छोटी-छोटी आदतें आगे चलकर बड़े मतभेद का कारण बन सकती हैं। पहले कपल्स अपने खाली समय में एक-दूसरे से बातें करते थे, दिनभर की बातें साझा करते थे और साथ में समय बिताते थे। लेकिन अब कई बार दोनों लोग एक ही जगह बैठे होते हैं और अपनी-अपनी स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। बाहर से देखने पर सब सामान्य लगता है, लेकिन अंदर ही अंदर रिश्ते में भावनात्मक दूरी बढ़ सकती है।
मोबाइल फोन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह धीरे-धीरे आदत में बदल जाता है। शुरुआत में कुछ मिनट के लिए फोन देखना सामान्य लगता है, लेकिन कब यह घंटों में बदल जाता है, इसका पता नहीं चलता। सोशल मीडिया, वीडियो स्ट्रीमिंग और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन इंसान का ध्यान बार-बार अपनी ओर खींचते हैं। कई कपल्स में यह भी देखा गया है कि फोन को लेकर शक और असुरक्षा की भावना बढ़ने लगी है। पार्टनर ज्यादा समय मोबाइल पर बिताता है तो दूसरा व्यक्ति खुद को नजरअंदाज महसूस कर सकता है। कभी-कभी फोन की प्राइवेसी को लेकर भी रिश्तों में तनाव पैदा हो जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मोबाइल फोन रिश्तों का दुश्मन है। सही इस्तेमाल किया जाए तो यही तकनीक रिश्तों को मजबूत भी कर सकती है। दूर रहने वाले कपल्स वीडियो कॉल और मैसेज के जरिए जुड़े रह सकते हैं। समस्या मोबाइल नहीं, बल्कि उसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल है। रिश्तों में संतुलन बनाए रखने के लिए कई विशेषज्ञ "नो फोन टाइम" की सलाह देते हैं। जैसे खाना खाते समय फोन दूर रखना, सोने से पहले कुछ समय सिर्फ बातचीत के लिए निकालना और हफ्ते में एक दिन बिना ज्यादा स्क्रीन टाइम के साथ बिताना रिश्ते को बेहतर बना सकता है। कपल्स के लिए जरूरी है कि वे एक-दूसरे की मौजूदगी को महत्व दें। कई बार पार्टनर को महंगे गिफ्ट या बड़े सरप्राइज से ज्यादा जरूरत होती है कि सामने वाला उसकी बात ध्यान से सुने। रिश्ते छोटे-छोटे पलों से मजबूत होते हैं और इन पलों की जगह अगर हमेशा मोबाइल ले ले तो दूरी बढ़ना स्वाभाविक है।
आज मोबाइल हमारी जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन रिश्तों में उसकी जगह तय करना जरूरी है। तकनीक का इस्तेमाल सुविधा के लिए होना चाहिए, रिश्तों के बीच दीवार बनाने के लिए नहीं। एक-दूसरे के साथ बिताया गया समय ही किसी भी रिश्ते की असली ताकत होता है। बदलते समय में सवाल यह नहीं है कि मोबाइल रखना चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या हम मोबाइल को इतना समय दे रहे हैं कि अपने करीबी रिश्तों के लिए समय कम पड़ जाए। अगर जवाब हां है, तो शायद रिश्तों को बचाने के लिए स्क्रीन से थोड़ा दूरी बनाना जरूरी हो गया है।
