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रेपो रेट में कटौती: घरेलू विकास को मजबूती देने की दिशा में आरबीआई का सुनियोजित कदम
Jagran Desk
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो दर को 50 आधार अंकों की कटौती करते हुए 6% से घटाकर 5.5% कर दिया है। यह फैसला वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक गति को बनाए रखने और घरेलू मांग को मजबूती देने की दिशा में एक रणनीतिक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
आरबीआई की यह घोषणा देश की मजबूत आर्थिक नींव में विश्वास को दर्शाने के साथ-साथ उपभोग और निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए एक स्पष्ट संकेत देती है। इससे न केवल व्यापार जगत को राहत मिलेगी बल्कि आम उपभोक्ताओं के लिए कर्ज लेना भी सस्ता होगा, जिससे आवास, वाहन और व्यवसायिक ऋणों की मांग में इजाफा होने की उम्मीद है।
नीति से वित्तीय स्थिरता और भरोसे को बढ़ावा
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि रेपो रेट में यह कटौती विकास दर को गति देने के साथ-साथ प्रणाली में तरलता बढ़ाने का भी कार्य करेगी। इससे बैंकों के लिए फंडिंग लागत घटेगी और वे अधिक आक्रामक रूप से ऋण देने की स्थिति में आ सकेंगे।
एक अग्रणी वित्तीय संस्था के प्रवक्ता ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा, "यह निर्णय मौद्रिक स्थिरता और समावेशी विकास की दिशा में आरबीआई की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इससे न केवल उधारकर्ताओं का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि निवेशकों के लिए भी बाजार में एक सकारात्मक संकेत जाएगा।"
संतुलित दृष्टिकोण, लचीली रणनीति
मौजूदा वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच आरबीआई की यह नीति भारत को एक लचीले और संतुलित आर्थिक मार्ग पर आगे बढ़ाने का संकेत देती है। यह घरेलू मांग को पुनर्जीवित करने, एमएसएमई और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देने तथा बुनियादी ढांचे में निवेश के नए अवसर पैदा करने में सहायक साबित हो सकती है।
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रेपो रेट में कटौती: घरेलू विकास को मजबूती देने की दिशा में आरबीआई का सुनियोजित कदम
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आरबीआई की यह घोषणा देश की मजबूत आर्थिक नींव में विश्वास को दर्शाने के साथ-साथ उपभोग और निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए एक स्पष्ट संकेत देती है। इससे न केवल व्यापार जगत को राहत मिलेगी बल्कि आम उपभोक्ताओं के लिए कर्ज लेना भी सस्ता होगा, जिससे आवास, वाहन और व्यवसायिक ऋणों की मांग में इजाफा होने की उम्मीद है।
नीति से वित्तीय स्थिरता और भरोसे को बढ़ावा
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि रेपो रेट में यह कटौती विकास दर को गति देने के साथ-साथ प्रणाली में तरलता बढ़ाने का भी कार्य करेगी। इससे बैंकों के लिए फंडिंग लागत घटेगी और वे अधिक आक्रामक रूप से ऋण देने की स्थिति में आ सकेंगे।
एक अग्रणी वित्तीय संस्था के प्रवक्ता ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा, "यह निर्णय मौद्रिक स्थिरता और समावेशी विकास की दिशा में आरबीआई की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इससे न केवल उधारकर्ताओं का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि निवेशकों के लिए भी बाजार में एक सकारात्मक संकेत जाएगा।"
संतुलित दृष्टिकोण, लचीली रणनीति
मौजूदा वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच आरबीआई की यह नीति भारत को एक लचीले और संतुलित आर्थिक मार्ग पर आगे बढ़ाने का संकेत देती है। यह घरेलू मांग को पुनर्जीवित करने, एमएसएमई और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देने तथा बुनियादी ढांचे में निवेश के नए अवसर पैदा करने में सहायक साबित हो सकती है।
