BCCI के पूर्व अध्यक्ष आईएस बिंद्रा का निधन, भारतीय क्रिकेट के शक्ति-संतुलन को बदलने वाले युग का अंत

स्पोर्ट्स डेस्क

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1993 से 1996 तक BCCI अध्यक्ष रहे बिंद्रा ने एशिया को क्रिकेट का वैश्विक केंद्र बनाने में निभाई निर्णायक भूमिका

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के पूर्व अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह बिंद्रा का रविवार को नई दिल्ली में निधन हो गया। वे 84 वर्ष के थे। उनके निधन के साथ भारतीय क्रिकेट प्रशासन के उस दौर का अंत हो गया, जिसने खेल के वैश्विक ढांचे में भारत और एशिया की भूमिका को निर्णायक रूप से मजबूत किया। बिंद्रा को एक ऐसे रणनीतिक प्रशासक के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर क्रिकेट की शक्ति संरचना को इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया से हटाकर एशिया की ओर मोड़ने में अहम भूमिका निभाई।

आईएस बिंद्रा 1993 से 1996 तक BCCI के अध्यक्ष रहे। हालांकि, उनका सबसे लंबा और प्रभावशाली कार्यकाल पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन (PCA) में रहा, जहां उन्होंने 1978 से 2014 तक लगातार 36 वर्षों तक नेतृत्व किया। इसी दौरान मोहाली का आधुनिक क्रिकेट स्टेडियम अस्तित्व में आया, जिसे बाद में उनके सम्मान में ‘आई.एस. बिंद्रा स्टेडियम’ नाम दिया गया। यह मैदान 2011 विश्व कप के भारत-पाकिस्तान सेमीफाइनल सहित कई ऐतिहासिक मुकाबलों का साक्षी रहा।

भारतीय क्रिकेट के इतिहास में 1987 विश्व कप एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। उस समय तक सभी विश्व कप इंग्लैंड में आयोजित होते थे। बिंद्रा ने एनकेपी साल्वे और जगमोहन डालमिया के साथ मिलकर यह व्यवस्था बदली। उनके प्रयासों से पहली बार विश्व कप इंग्लैंड से बाहर भारत और पाकिस्तान में आयोजित हुआ। यह केवल आयोजन नहीं था, बल्कि क्रिकेट की वैश्विक राजनीति में एशिया के उदय की शुरुआत थी।

बिंद्रा को क्रिकेट कूटनीति का दक्ष खिलाड़ी भी माना जाता है। 1980 के दशक में भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव और सुरक्षा चिंताओं के बीच उन्होंने संवाद के रास्ते तलाशे। प्रशासनिक हलकों के अनुसार, उस दौर में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को उपमहाद्वीप में बनाए रखने के लिए उन्होंने राजनीतिक स्तर पर भी संवाद को प्रोत्साहित किया, जिससे क्रिकेट गतिविधियां बाधित न हों।

ICC के स्तर पर भी उनका प्रभाव बना रहा। बाद के वर्षों में वे शरद पवार के कार्यकाल के दौरान अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद में प्रिंसिपल एडवाइजर रहे। उनके विचारों और अनुभवों का उपयोग वैश्विक क्रिकेट नीति निर्धारण में किया गया। हालांकि, उनका करियर विवादों से अछूता नहीं रहा। आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग प्रकरण और कुछ अंतरराष्ट्रीय नियुक्तियों को लेकर उन्हें आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा।

क्रिकेट प्रसारण के क्षेत्र में भी बिंद्रा का योगदान उल्लेखनीय रहा। 1990 के दशक में दूरदर्शन के एकाधिकार को चुनौती देने की पहल ने भारत में निजी और अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर्स के लिए रास्ता खोला, जिससे क्रिकेट का व्यावसायिक विस्तार तेज हुआ।

2014 में सक्रिय क्रिकेट प्रशासन से संन्यास लेने के बाद वे सार्वजनिक जीवन से काफी हद तक दूर हो गए थे। उनके निधन पर क्रिकेट जगत से जुड़े कई प्रशासकों और पूर्व खिलाड़ियों ने शोक व्यक्त किया है। आईएस बिंद्रा को ऐसे प्रशासक के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को केवल खेल नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की नींव रखी।

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www.dainikjagranmpcg.com
26 Jan 2026 By Nitin Trivedi

BCCI के पूर्व अध्यक्ष आईएस बिंद्रा का निधन, भारतीय क्रिकेट के शक्ति-संतुलन को बदलने वाले युग का अंत

स्पोर्ट्स डेस्क

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के पूर्व अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह बिंद्रा का रविवार को नई दिल्ली में निधन हो गया। वे 84 वर्ष के थे। उनके निधन के साथ भारतीय क्रिकेट प्रशासन के उस दौर का अंत हो गया, जिसने खेल के वैश्विक ढांचे में भारत और एशिया की भूमिका को निर्णायक रूप से मजबूत किया। बिंद्रा को एक ऐसे रणनीतिक प्रशासक के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर क्रिकेट की शक्ति संरचना को इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया से हटाकर एशिया की ओर मोड़ने में अहम भूमिका निभाई।

आईएस बिंद्रा 1993 से 1996 तक BCCI के अध्यक्ष रहे। हालांकि, उनका सबसे लंबा और प्रभावशाली कार्यकाल पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन (PCA) में रहा, जहां उन्होंने 1978 से 2014 तक लगातार 36 वर्षों तक नेतृत्व किया। इसी दौरान मोहाली का आधुनिक क्रिकेट स्टेडियम अस्तित्व में आया, जिसे बाद में उनके सम्मान में ‘आई.एस. बिंद्रा स्टेडियम’ नाम दिया गया। यह मैदान 2011 विश्व कप के भारत-पाकिस्तान सेमीफाइनल सहित कई ऐतिहासिक मुकाबलों का साक्षी रहा।

भारतीय क्रिकेट के इतिहास में 1987 विश्व कप एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। उस समय तक सभी विश्व कप इंग्लैंड में आयोजित होते थे। बिंद्रा ने एनकेपी साल्वे और जगमोहन डालमिया के साथ मिलकर यह व्यवस्था बदली। उनके प्रयासों से पहली बार विश्व कप इंग्लैंड से बाहर भारत और पाकिस्तान में आयोजित हुआ। यह केवल आयोजन नहीं था, बल्कि क्रिकेट की वैश्विक राजनीति में एशिया के उदय की शुरुआत थी।

बिंद्रा को क्रिकेट कूटनीति का दक्ष खिलाड़ी भी माना जाता है। 1980 के दशक में भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव और सुरक्षा चिंताओं के बीच उन्होंने संवाद के रास्ते तलाशे। प्रशासनिक हलकों के अनुसार, उस दौर में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को उपमहाद्वीप में बनाए रखने के लिए उन्होंने राजनीतिक स्तर पर भी संवाद को प्रोत्साहित किया, जिससे क्रिकेट गतिविधियां बाधित न हों।

ICC के स्तर पर भी उनका प्रभाव बना रहा। बाद के वर्षों में वे शरद पवार के कार्यकाल के दौरान अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद में प्रिंसिपल एडवाइजर रहे। उनके विचारों और अनुभवों का उपयोग वैश्विक क्रिकेट नीति निर्धारण में किया गया। हालांकि, उनका करियर विवादों से अछूता नहीं रहा। आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग प्रकरण और कुछ अंतरराष्ट्रीय नियुक्तियों को लेकर उन्हें आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा।

क्रिकेट प्रसारण के क्षेत्र में भी बिंद्रा का योगदान उल्लेखनीय रहा। 1990 के दशक में दूरदर्शन के एकाधिकार को चुनौती देने की पहल ने भारत में निजी और अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर्स के लिए रास्ता खोला, जिससे क्रिकेट का व्यावसायिक विस्तार तेज हुआ।

2014 में सक्रिय क्रिकेट प्रशासन से संन्यास लेने के बाद वे सार्वजनिक जीवन से काफी हद तक दूर हो गए थे। उनके निधन पर क्रिकेट जगत से जुड़े कई प्रशासकों और पूर्व खिलाड़ियों ने शोक व्यक्त किया है। आईएस बिंद्रा को ऐसे प्रशासक के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को केवल खेल नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की नींव रखी।

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