बिलासपुर में मौत का कारण बदलकर मुआवजा लेने का खेल, 17 गिरफ्तार

बिलासपुर (छ.ग.)

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सामान्य मौतों को सर्पदंश बताकर सरकारी सहायता निकालने का आरोप, पुलिस जांच में अस्पताल से तहसील तक नेटवर्क की आशंका; 431 मामलों में 17.24 करोड़ रुपए के भुगतान की जांच

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में सर्पदंश से मौत के नाम पर सरकारी मुआवजा हासिल करने के कथित फर्जीवाड़े की जांच लगातार बड़ी होती जा रही है। पुलिस अब तक इस मामले में डॉक्टर, पुलिसकर्मी, राजस्व विभाग से जुड़े कर्मचारियों और अन्य लोगों समेत 17 आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है। जांच में आशंका जताई गई है कि सामान्य या दूसरे कारणों से हुई मौत को कागजों में सांप काटने से हुई मौत बताकर मुआवजा प्रकरण तैयार किए गए। सरकार की ओर से सर्पदंश से मृत्यु पर मिलने वाली चार लाख रुपए की सहायता राशि कथित तौर पर इसी तरीके से निकाली गई।

पुलिस की जांच में एक संगठित नेटवर्क की भूमिका सामने आने का दावा किया गया है, जिसे जांच में ‘एडवोकेट डायमंड गैंग’ के नाम से जोड़ा जा रहा है। आरोप है कि इस नेटवर्क की पहुंच अस्पताल से लेकर पुलिस और तहसील कार्यालय तक थी। किसी व्यक्ति की अस्पताल में मौत होने की जानकारी मिलने के बाद गिरोह से जुड़े लोग सक्रिय हो जाते थे। इसके बाद मृतक के परिवार से संपर्क कर सरकारी मुआवजे की जानकारी दी जाती और कथित तौर पर पूरे मामले को सर्पदंश का रूप देने की प्रक्रिया शुरू होती थी।

पुलिस के अनुसार, इस नेटवर्क का कथित सरगना अधिवक्ता हीरा खांडेकर बताया गया है। जांच एजेंसियां उसके साथ जुड़े अन्य लोगों की भूमिका भी खंगाल रही हैं। आरोप है कि अस्पताल से मौत की सूचना मिलने से लेकर मुआवजे की राशि बैंक खाते में पहुंचने तक अलग-अलग स्तर पर लोगों की जिम्मेदारी तय थी। पुलिस, स्वास्थ्य और राजस्व विभाग से जुड़े कुछ कर्मचारियों की भूमिका इसी कड़ी में जांच के दायरे में आई है।

मामले का दायरा इसलिए बड़ा माना जा रहा है क्योंकि बिलासपुर जिले में 431 सर्पदंश मृत्यु प्रकरणों में कुल 17 करोड़ 24 लाख रुपए की मुआवजा राशि दिए जाने का आंकड़ा सामने आया है। जांच एजेंसियां अब इन मामलों के दस्तावेजों की दोबारा जांच कर रही हैं। यह देखा जा रहा है कि वास्तव में कितनी मौतें सांप काटने से हुई थीं और किन मामलों में दस्तावेजों के साथ कथित छेड़छाड़ की गई। सभी 431 मामलों को स्वतः फर्जी मानने के बजाय केस-दर-केस सत्यापन किया जा रहा है।

शासन के नियमों के तहत सर्पदंश से किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर पात्र परिवार को चार लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है। पुलिस को शक है कि इसी सरकारी योजना को निशाना बनाकर फर्जी प्रकरण तैयार किए गए। सामान्य बीमारी, हार्ट अटैक, जहर खाने या दूसरे कारणों से हुई कुछ मौतों को दस्तावेजों में सर्पदंश से जोड़ने का आरोप है। इसके लिए पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से लेकर पटवारी प्रतिवेदन तक में कथित गड़बड़ी की बात जांच में सामने आई है।

पुलिस की जांच में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी अस्पताल से मौत की सूचना बाहर पहुंचने की बताई जा रही है। आरोप है कि सिम्स में किसी व्यक्ति की मौत होने के बाद वहां मौजूद कुछ पुलिस या सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े लोगों के जरिए जानकारी नेटवर्क तक पहुंचती थी। सूचना मिलते ही गिरोह के सदस्य मृतक के परिवार की जानकारी जुटाते और उनसे संपर्क करते थे। परिवार को बताया जाता था कि सर्पदंश का मामला दर्ज होने पर सरकार से चार लाख रुपए तक की सहायता मिल सकती है।

इसके बाद परिजनों को कथित तौर पर इस व्यवस्था में शामिल करने की कोशिश होती थी। पुलिस जांच के मुताबिक कुछ मामलों में परिवारों को मुआवजे का हिस्सा देने का भरोसा देकर मौत का कारण सर्पदंश बताने के लिए तैयार किया गया। आरोप यह भी है कि कुछ परिवारों को पूरी प्रक्रिया की जानकारी ही नहीं थी। दस्तावेज तैयार होने और मुआवजा स्वीकृत होने के बाद राशि उनके बैंक खाते में आई, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा दूसरे लोगों ने निकाल लिया।

जांच में तहसील स्तर पर कथित सेटिंग की बात भी सामने आई है। पुलिस के अनुसार दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी गोविंद विश्वकर्मा की भूमिका इस प्रक्रिया में जांच के घेरे में है। आरोप है कि वह करीब एक से डेढ़ लाख रुपए लेकर मुआवजा प्रकरण को तहसील स्तर पर आगे बढ़ाने और जरूरी प्रक्रिया में मदद करने का काम करता था। पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि यह रकम किन लोगों तक पहुंचती थी और किस स्तर पर फाइल को मंजूरी दिलाई जाती थी।

किसी सर्पदंश मृत्यु प्रकरण में मुआवजा लेने के लिए केवल एक दस्तावेज पर्याप्त नहीं होता। मौत से जुड़े रिकॉर्ड, पुलिस की कार्रवाई, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, राजस्व स्तर का सत्यापन और दूसरे दस्तावेजों की जरूरत होती है। इसी कारण जांच एजेंसियों को शक है कि अगर बड़े पैमाने पर फर्जी प्रकरण तैयार हुए हैं तो इसमें अलग-अलग विभागों के लोगों की भूमिका हो सकती है। पुलिस इसी कथित चेन को जोड़ने की कोशिश कर रही है।

कुछ मामलों में शव पर सर्पदंश जैसे निशान दिखाने के लिए कथित छेड़छाड़ किए जाने का आरोप भी जांच में सामने आया है। इसके बाद संबंधित थाने में मर्ग से जुड़ी प्रक्रिया पूरी कराई जाती थी। पुलिस अभी ऐसे आरोपों की अलग-अलग मामलों में पुष्टि कर रही है। जांच अधिकारियों के सामने चुनौती यह पता लगाने की है कि दस्तावेज किस स्तर पर बदले गए और किस अधिकारी या कर्मचारी को वास्तविक मौत के कारण की जानकारी थी।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में शामिल है। किसी व्यक्ति की मौत का चिकित्सकीय कारण तय करने में पीएम रिपोर्ट की बड़ी भूमिका होती है। पुलिस का आरोप है कि कुछ मामलों में रिपोर्ट के साथ छेड़छाड़ की गई या फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए। डॉक्टरों के नाम और हस्ताक्षर के इस्तेमाल की भी जांच की जा रही है। इसी आधार पर स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कुछ लोगों की भूमिका पुलिस जांच में आई है।

डॉ. प्रियंका सोनी को एक मामले में गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। वहीं डॉ. एसएन बोले के नाम से जारी बताई गई कुछ पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी जांच के घेरे में हैं। पुलिस उनके संबंध में जांच कर रही है और उनके घर पर दबिश दिए जाने की जानकारी भी सामने आई है। सिम्स प्रशासन के अनुसार छुट्टी समाप्त होने के बाद भी उनके ड्यूटी पर वापस नहीं आने की बात विभाग की ओर से बताई गई है।

सिम्स के डीन डॉ. रमणेश मूर्ति के मुताबिक डॉ. बोले ने तीन दिन की छुट्टी ली थी। निर्धारित छुट्टी पूरी होने के बाद उन्हें सोमवार को ड्यूटी पर लौटना था, लेकिन उनके उपस्थित नहीं होने की सूचना विभागाध्यक्ष की ओर से दी गई। पुलिस अब दस्तावेजों और संबंधित रिपोर्टों के आधार पर उनकी भूमिका की जांच कर रही है। जांच पूरी होने से पहले आरोपों को अंतिम रूप से साबित मानना उचित नहीं होगा।

एक अन्य गंभीर पहलू डॉक्टरों के कथित फर्जी हस्ताक्षरों से जुड़ा है। जांच में डॉ. आरके मरकाम समेत कुछ चिकित्सकों के नाम से फर्जी हस्ताक्षर इस्तेमाल किए जाने की आशंका सामने आई है। रतनपुर थाना क्षेत्र से जुड़े एक मामले में हार्ट अटैक से हुई मौत को दस्तावेजों में सर्पदंश से जोड़कर मुआवजा लेने का आरोप है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि संबंधित रिपोर्ट वास्तव में किसने तैयार की और हस्ताक्षर किस स्तर पर लगाए गए।

फर्जी या संदिग्ध पोस्टमॉर्टम दस्तावेज तैयार होने के बाद अगली कड़ी राजस्व रिकॉर्ड की बताई जा रही है। पुलिस जांच के मुताबिक कथित तौर पर पटवारी प्रतिवेदन और दूसरे जरूरी कागजात तैयार कर मुआवजा प्रकरण तहसील में जमा किए जाते थे। यहां फाइल आगे बढ़ाने के लिए कार्यालय की आंतरिक व्यवस्था और लॉगिन आईडी के इस्तेमाल की जांच की जा रही है। तहसील कार्यालय के तीन कर्मचारियों की गिरफ्तारी के बाद यह हिस्सा और महत्वपूर्ण हो गया है।

जांच में यह भी आरोप सामने आया है कि तहसील और एसडीएम कार्यालय में पदस्थ रीडरों की आईडी के जरिए कुछ प्रकरण आगे बढ़ाए गए। दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी गोविंद विश्वकर्मा पर संबंधित कर्मचारियों के संपर्क में रहकर फाइलों को आगे बढ़वाने में भूमिका निभाने का आरोप है। पुलिस डिजिटल रिकॉर्ड, फाइल मूवमेंट और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच कर रही है। किस आईडी से कौन सा प्रकरण कब आगे बढ़ा, यह भी जांच का हिस्सा हो सकता है।

मुआवजा स्वीकृत होने के बाद सरकारी राशि मृतक के पात्र परिजन के बैंक खाते में पहुंचती थी। पुलिस का आरोप है कि यहीं से कथित नेटवर्क का अगला चरण शुरू होता था। परिवार को तय हिस्सा देकर बाकी रकम निकलवा ली जाती थी। कुछ मामलों में परिजनों ने पुलिस को बताया कि उन्हें मुआवजा मिलने की जानकारी तक नहीं थी। ऐसे मामलों में बैंक खाते और लेन-देन की जांच से महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की उम्मीद है।

कोनी थाना क्षेत्र से जुड़े तीन मामलों ने जांच को और गंभीर बनाया है। पुलिस के अनुसार इन प्रकरणों में पेश किए गए पोस्टमॉर्टम रिकॉर्ड, मर्ग से जुड़े दस्तावेज और पटवारी प्रतिवेदन में गड़बड़ी पाई गई। दो मृतकों के परिवारों को कथित तौर पर यह जानकारी तक नहीं थी कि उनके नाम पर सर्पदंश मृत्यु का मुआवजा स्वीकृत हुआ है। पुलिस अब यह पता लगा रही है कि खाते में पहुंची रकम किसने निकाली और किसके पास गई।

मामले में पुलिस अब तक 14 से अधिक ठिकानों पर दबिश दे चुकी है। जांच के दायरे में तत्कालीन सिम्स चौकी प्रभारी गुलाब सिंह सोनवानी, अन्य पुलिसकर्मी, होमगार्ड से जुड़े जवान, डॉक्टर, अधिवक्ता और राजस्व कार्यालय से जुड़े लोगों के नाम सामने आए हैं। इनमें से किसकी भूमिका कितनी है, इसे पुलिस अलग-अलग एफआईआर और उपलब्ध सबूतों के आधार पर तय कर रही है। गिरफ्तारियों का सिलसिला भी इसी जांच के साथ आगे बढ़ा है।

अब तक 17 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है। इनमें कथित मुख्य आरोपी अधिवक्ता, उसके सहयोगियों के साथ बैंकिंग, चिकित्सा, पुलिस और तहसील व्यवस्था से जुड़े कुछ लोग शामिल बताए गए हैं। पुलिस ने अलग-अलग प्रकरण दर्ज किए हैं, ताकि हर संदिग्ध मुआवजा केस के दस्तावेज और रकम के लेन-देन की अलग जांच हो सके। अन्य संदिग्ध मामलों की फाइलें भी खंगाली जा रही हैं।

इस मामले में पहली बड़ी गड़बड़ी 2025 में बिल्हा थाना क्षेत्र के एक केस से सामने आने की बात कही गई है। उस मामले में जहर खाने से हुई मौत को कथित तौर पर सर्पदंश बताकर फर्जी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तैयार करने का आरोप लगा था। जांच के दौरान डॉ. प्रियंका सोनी, मृतक के परिवार से जुड़े व्यक्ति और एक अधिवक्ता की गिरफ्तारी हुई थी। इसी केस की जांच आगे बढ़ी तो दूसरे संदिग्ध मामलों की जानकारी मिलने लगी।

इसके बाद पुराने सर्पदंश मुआवजा प्रकरणों को खंगालना शुरू किया गया। बिलासपुर में सर्पदंश से मौत के नाम पर जारी मुआवजा राशि के आंकड़े ने जांच एजेंसियों का ध्यान खींचा। तुलना में जशपुर जिले में पिछले तीन साल के दौरान 96 सर्पदंश मौतों का आंकड़ा सामने रखा गया, जबकि बिलासपुर में 431 मामलों में मुआवजा भुगतान हुआ था। इसी अंतर को लेकर विधानसभा में भी सवाल उठे और मामला राजनीतिक रूप से चर्चा में आया।

विधानसभा में मुद्दा उठने के बाद राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने उच्च स्तरीय जांच और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई की बात कही थी। इसके बाद पुलिस और प्रशासनिक स्तर पर पुराने रिकॉर्ड की जांच तेज हुई। अब हर प्रकरण में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, पुलिस दस्तावेज, राजस्व रिकॉर्ड और बैंक भुगतान का मिलान किया जा रहा है। जांच का दायरा केवल मुआवजा लेने वाले परिवारों तक सीमित नहीं रखा गया है।

तहसील कार्यालय के कर्मचारियों की गिरफ्तारी को लेकर अब कर्मचारी संगठनों ने भी सवाल उठाए हैं। लिपिक वर्गीय कर्मचारी संघ ने पुलिस की कार्रवाई के तरीके पर आपत्ति जताई है। संघ के प्रदेश अध्यक्ष रोहित तिवारी का कहना है कि सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी से पहले निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए था। संगठन का आरोप है कि पूछताछ के लिए बुलाए गए कुछ कर्मचारियों को बाद में गिरफ्तार कर लिया गया।

कर्मचारी संगठन ने यह सवाल भी उठाया है कि मुआवजा प्रकरण में अंतिम निर्णय का अधिकार केवल निचले स्तर के कर्मचारियों के पास नहीं होता। उनका कहना है कि कर्मचारी फाइल तैयार कर आगे पेश करते हैं, जबकि स्वीकृति की जिम्मेदारी उच्च स्तर के राजस्व अधिकारियों की होती है। इसी आधार पर संगठन ने मांग की है कि जांच केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित न रहे और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े हर स्तर की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो।

अधिकारी-कर्मचारी फेडरेशन के पदाधिकारी बड़ी संख्या में कलेक्ट्रेट पहुंचे और कलेक्टर तथा पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपा। उन्होंने गिरफ्तारी की प्रक्रिया और कर्मचारियों को अदालत में पेश किए जाने के तरीके पर आपत्ति दर्ज कराई। संगठन का कहना है कि अगर किसी कर्मचारी के खिलाफ ठोस सबूत हैं तो कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन जांच समान रूप से सभी जिम्मेदार स्तरों तक पहुंचनी चाहिए।

पुलिस का कहना है कि जांच में जिस भी व्यक्ति की भूमिका सामने आएगी, उसके खिलाफ सबूतों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी। एसएसपी की ओर से भी कथित सिंडिकेट से जुड़े सभी लोगों की भूमिका की जांच करने की बात कही गई है। पुराने मुआवजा प्रकरणों की फाइलें, पोस्टमॉर्टम रिकॉर्ड, बैंक खातों में पहुंचे भुगतान और राजस्व कार्यालय के दस्तावेज अब जांच के प्रमुख आधार बने हुए हैं।

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21 Jul 2026 By Priyanka

बिलासपुर में मौत का कारण बदलकर मुआवजा लेने का खेल, 17 गिरफ्तार

बिलासपुर (छ.ग.)

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में सर्पदंश से मौत के नाम पर सरकारी मुआवजा हासिल करने के कथित फर्जीवाड़े की जांच लगातार बड़ी होती जा रही है। पुलिस अब तक इस मामले में डॉक्टर, पुलिसकर्मी, राजस्व विभाग से जुड़े कर्मचारियों और अन्य लोगों समेत 17 आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है। जांच में आशंका जताई गई है कि सामान्य या दूसरे कारणों से हुई मौत को कागजों में सांप काटने से हुई मौत बताकर मुआवजा प्रकरण तैयार किए गए। सरकार की ओर से सर्पदंश से मृत्यु पर मिलने वाली चार लाख रुपए की सहायता राशि कथित तौर पर इसी तरीके से निकाली गई।

पुलिस की जांच में एक संगठित नेटवर्क की भूमिका सामने आने का दावा किया गया है, जिसे जांच में ‘एडवोकेट डायमंड गैंग’ के नाम से जोड़ा जा रहा है। आरोप है कि इस नेटवर्क की पहुंच अस्पताल से लेकर पुलिस और तहसील कार्यालय तक थी। किसी व्यक्ति की अस्पताल में मौत होने की जानकारी मिलने के बाद गिरोह से जुड़े लोग सक्रिय हो जाते थे। इसके बाद मृतक के परिवार से संपर्क कर सरकारी मुआवजे की जानकारी दी जाती और कथित तौर पर पूरे मामले को सर्पदंश का रूप देने की प्रक्रिया शुरू होती थी।

पुलिस के अनुसार, इस नेटवर्क का कथित सरगना अधिवक्ता हीरा खांडेकर बताया गया है। जांच एजेंसियां उसके साथ जुड़े अन्य लोगों की भूमिका भी खंगाल रही हैं। आरोप है कि अस्पताल से मौत की सूचना मिलने से लेकर मुआवजे की राशि बैंक खाते में पहुंचने तक अलग-अलग स्तर पर लोगों की जिम्मेदारी तय थी। पुलिस, स्वास्थ्य और राजस्व विभाग से जुड़े कुछ कर्मचारियों की भूमिका इसी कड़ी में जांच के दायरे में आई है।

मामले का दायरा इसलिए बड़ा माना जा रहा है क्योंकि बिलासपुर जिले में 431 सर्पदंश मृत्यु प्रकरणों में कुल 17 करोड़ 24 लाख रुपए की मुआवजा राशि दिए जाने का आंकड़ा सामने आया है। जांच एजेंसियां अब इन मामलों के दस्तावेजों की दोबारा जांच कर रही हैं। यह देखा जा रहा है कि वास्तव में कितनी मौतें सांप काटने से हुई थीं और किन मामलों में दस्तावेजों के साथ कथित छेड़छाड़ की गई। सभी 431 मामलों को स्वतः फर्जी मानने के बजाय केस-दर-केस सत्यापन किया जा रहा है।

शासन के नियमों के तहत सर्पदंश से किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर पात्र परिवार को चार लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है। पुलिस को शक है कि इसी सरकारी योजना को निशाना बनाकर फर्जी प्रकरण तैयार किए गए। सामान्य बीमारी, हार्ट अटैक, जहर खाने या दूसरे कारणों से हुई कुछ मौतों को दस्तावेजों में सर्पदंश से जोड़ने का आरोप है। इसके लिए पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से लेकर पटवारी प्रतिवेदन तक में कथित गड़बड़ी की बात जांच में सामने आई है।

पुलिस की जांच में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी अस्पताल से मौत की सूचना बाहर पहुंचने की बताई जा रही है। आरोप है कि सिम्स में किसी व्यक्ति की मौत होने के बाद वहां मौजूद कुछ पुलिस या सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े लोगों के जरिए जानकारी नेटवर्क तक पहुंचती थी। सूचना मिलते ही गिरोह के सदस्य मृतक के परिवार की जानकारी जुटाते और उनसे संपर्क करते थे। परिवार को बताया जाता था कि सर्पदंश का मामला दर्ज होने पर सरकार से चार लाख रुपए तक की सहायता मिल सकती है।

इसके बाद परिजनों को कथित तौर पर इस व्यवस्था में शामिल करने की कोशिश होती थी। पुलिस जांच के मुताबिक कुछ मामलों में परिवारों को मुआवजे का हिस्सा देने का भरोसा देकर मौत का कारण सर्पदंश बताने के लिए तैयार किया गया। आरोप यह भी है कि कुछ परिवारों को पूरी प्रक्रिया की जानकारी ही नहीं थी। दस्तावेज तैयार होने और मुआवजा स्वीकृत होने के बाद राशि उनके बैंक खाते में आई, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा दूसरे लोगों ने निकाल लिया।

जांच में तहसील स्तर पर कथित सेटिंग की बात भी सामने आई है। पुलिस के अनुसार दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी गोविंद विश्वकर्मा की भूमिका इस प्रक्रिया में जांच के घेरे में है। आरोप है कि वह करीब एक से डेढ़ लाख रुपए लेकर मुआवजा प्रकरण को तहसील स्तर पर आगे बढ़ाने और जरूरी प्रक्रिया में मदद करने का काम करता था। पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि यह रकम किन लोगों तक पहुंचती थी और किस स्तर पर फाइल को मंजूरी दिलाई जाती थी।

किसी सर्पदंश मृत्यु प्रकरण में मुआवजा लेने के लिए केवल एक दस्तावेज पर्याप्त नहीं होता। मौत से जुड़े रिकॉर्ड, पुलिस की कार्रवाई, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, राजस्व स्तर का सत्यापन और दूसरे दस्तावेजों की जरूरत होती है। इसी कारण जांच एजेंसियों को शक है कि अगर बड़े पैमाने पर फर्जी प्रकरण तैयार हुए हैं तो इसमें अलग-अलग विभागों के लोगों की भूमिका हो सकती है। पुलिस इसी कथित चेन को जोड़ने की कोशिश कर रही है।

कुछ मामलों में शव पर सर्पदंश जैसे निशान दिखाने के लिए कथित छेड़छाड़ किए जाने का आरोप भी जांच में सामने आया है। इसके बाद संबंधित थाने में मर्ग से जुड़ी प्रक्रिया पूरी कराई जाती थी। पुलिस अभी ऐसे आरोपों की अलग-अलग मामलों में पुष्टि कर रही है। जांच अधिकारियों के सामने चुनौती यह पता लगाने की है कि दस्तावेज किस स्तर पर बदले गए और किस अधिकारी या कर्मचारी को वास्तविक मौत के कारण की जानकारी थी।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में शामिल है। किसी व्यक्ति की मौत का चिकित्सकीय कारण तय करने में पीएम रिपोर्ट की बड़ी भूमिका होती है। पुलिस का आरोप है कि कुछ मामलों में रिपोर्ट के साथ छेड़छाड़ की गई या फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए। डॉक्टरों के नाम और हस्ताक्षर के इस्तेमाल की भी जांच की जा रही है। इसी आधार पर स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कुछ लोगों की भूमिका पुलिस जांच में आई है।

डॉ. प्रियंका सोनी को एक मामले में गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। वहीं डॉ. एसएन बोले के नाम से जारी बताई गई कुछ पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी जांच के घेरे में हैं। पुलिस उनके संबंध में जांच कर रही है और उनके घर पर दबिश दिए जाने की जानकारी भी सामने आई है। सिम्स प्रशासन के अनुसार छुट्टी समाप्त होने के बाद भी उनके ड्यूटी पर वापस नहीं आने की बात विभाग की ओर से बताई गई है।

सिम्स के डीन डॉ. रमणेश मूर्ति के मुताबिक डॉ. बोले ने तीन दिन की छुट्टी ली थी। निर्धारित छुट्टी पूरी होने के बाद उन्हें सोमवार को ड्यूटी पर लौटना था, लेकिन उनके उपस्थित नहीं होने की सूचना विभागाध्यक्ष की ओर से दी गई। पुलिस अब दस्तावेजों और संबंधित रिपोर्टों के आधार पर उनकी भूमिका की जांच कर रही है। जांच पूरी होने से पहले आरोपों को अंतिम रूप से साबित मानना उचित नहीं होगा।

एक अन्य गंभीर पहलू डॉक्टरों के कथित फर्जी हस्ताक्षरों से जुड़ा है। जांच में डॉ. आरके मरकाम समेत कुछ चिकित्सकों के नाम से फर्जी हस्ताक्षर इस्तेमाल किए जाने की आशंका सामने आई है। रतनपुर थाना क्षेत्र से जुड़े एक मामले में हार्ट अटैक से हुई मौत को दस्तावेजों में सर्पदंश से जोड़कर मुआवजा लेने का आरोप है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि संबंधित रिपोर्ट वास्तव में किसने तैयार की और हस्ताक्षर किस स्तर पर लगाए गए।

फर्जी या संदिग्ध पोस्टमॉर्टम दस्तावेज तैयार होने के बाद अगली कड़ी राजस्व रिकॉर्ड की बताई जा रही है। पुलिस जांच के मुताबिक कथित तौर पर पटवारी प्रतिवेदन और दूसरे जरूरी कागजात तैयार कर मुआवजा प्रकरण तहसील में जमा किए जाते थे। यहां फाइल आगे बढ़ाने के लिए कार्यालय की आंतरिक व्यवस्था और लॉगिन आईडी के इस्तेमाल की जांच की जा रही है। तहसील कार्यालय के तीन कर्मचारियों की गिरफ्तारी के बाद यह हिस्सा और महत्वपूर्ण हो गया है।

जांच में यह भी आरोप सामने आया है कि तहसील और एसडीएम कार्यालय में पदस्थ रीडरों की आईडी के जरिए कुछ प्रकरण आगे बढ़ाए गए। दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी गोविंद विश्वकर्मा पर संबंधित कर्मचारियों के संपर्क में रहकर फाइलों को आगे बढ़वाने में भूमिका निभाने का आरोप है। पुलिस डिजिटल रिकॉर्ड, फाइल मूवमेंट और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच कर रही है। किस आईडी से कौन सा प्रकरण कब आगे बढ़ा, यह भी जांच का हिस्सा हो सकता है।

मुआवजा स्वीकृत होने के बाद सरकारी राशि मृतक के पात्र परिजन के बैंक खाते में पहुंचती थी। पुलिस का आरोप है कि यहीं से कथित नेटवर्क का अगला चरण शुरू होता था। परिवार को तय हिस्सा देकर बाकी रकम निकलवा ली जाती थी। कुछ मामलों में परिजनों ने पुलिस को बताया कि उन्हें मुआवजा मिलने की जानकारी तक नहीं थी। ऐसे मामलों में बैंक खाते और लेन-देन की जांच से महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की उम्मीद है।

कोनी थाना क्षेत्र से जुड़े तीन मामलों ने जांच को और गंभीर बनाया है। पुलिस के अनुसार इन प्रकरणों में पेश किए गए पोस्टमॉर्टम रिकॉर्ड, मर्ग से जुड़े दस्तावेज और पटवारी प्रतिवेदन में गड़बड़ी पाई गई। दो मृतकों के परिवारों को कथित तौर पर यह जानकारी तक नहीं थी कि उनके नाम पर सर्पदंश मृत्यु का मुआवजा स्वीकृत हुआ है। पुलिस अब यह पता लगा रही है कि खाते में पहुंची रकम किसने निकाली और किसके पास गई।

मामले में पुलिस अब तक 14 से अधिक ठिकानों पर दबिश दे चुकी है। जांच के दायरे में तत्कालीन सिम्स चौकी प्रभारी गुलाब सिंह सोनवानी, अन्य पुलिसकर्मी, होमगार्ड से जुड़े जवान, डॉक्टर, अधिवक्ता और राजस्व कार्यालय से जुड़े लोगों के नाम सामने आए हैं। इनमें से किसकी भूमिका कितनी है, इसे पुलिस अलग-अलग एफआईआर और उपलब्ध सबूतों के आधार पर तय कर रही है। गिरफ्तारियों का सिलसिला भी इसी जांच के साथ आगे बढ़ा है।

अब तक 17 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है। इनमें कथित मुख्य आरोपी अधिवक्ता, उसके सहयोगियों के साथ बैंकिंग, चिकित्सा, पुलिस और तहसील व्यवस्था से जुड़े कुछ लोग शामिल बताए गए हैं। पुलिस ने अलग-अलग प्रकरण दर्ज किए हैं, ताकि हर संदिग्ध मुआवजा केस के दस्तावेज और रकम के लेन-देन की अलग जांच हो सके। अन्य संदिग्ध मामलों की फाइलें भी खंगाली जा रही हैं।

इस मामले में पहली बड़ी गड़बड़ी 2025 में बिल्हा थाना क्षेत्र के एक केस से सामने आने की बात कही गई है। उस मामले में जहर खाने से हुई मौत को कथित तौर पर सर्पदंश बताकर फर्जी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तैयार करने का आरोप लगा था। जांच के दौरान डॉ. प्रियंका सोनी, मृतक के परिवार से जुड़े व्यक्ति और एक अधिवक्ता की गिरफ्तारी हुई थी। इसी केस की जांच आगे बढ़ी तो दूसरे संदिग्ध मामलों की जानकारी मिलने लगी।

इसके बाद पुराने सर्पदंश मुआवजा प्रकरणों को खंगालना शुरू किया गया। बिलासपुर में सर्पदंश से मौत के नाम पर जारी मुआवजा राशि के आंकड़े ने जांच एजेंसियों का ध्यान खींचा। तुलना में जशपुर जिले में पिछले तीन साल के दौरान 96 सर्पदंश मौतों का आंकड़ा सामने रखा गया, जबकि बिलासपुर में 431 मामलों में मुआवजा भुगतान हुआ था। इसी अंतर को लेकर विधानसभा में भी सवाल उठे और मामला राजनीतिक रूप से चर्चा में आया।

विधानसभा में मुद्दा उठने के बाद राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने उच्च स्तरीय जांच और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई की बात कही थी। इसके बाद पुलिस और प्रशासनिक स्तर पर पुराने रिकॉर्ड की जांच तेज हुई। अब हर प्रकरण में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, पुलिस दस्तावेज, राजस्व रिकॉर्ड और बैंक भुगतान का मिलान किया जा रहा है। जांच का दायरा केवल मुआवजा लेने वाले परिवारों तक सीमित नहीं रखा गया है।

तहसील कार्यालय के कर्मचारियों की गिरफ्तारी को लेकर अब कर्मचारी संगठनों ने भी सवाल उठाए हैं। लिपिक वर्गीय कर्मचारी संघ ने पुलिस की कार्रवाई के तरीके पर आपत्ति जताई है। संघ के प्रदेश अध्यक्ष रोहित तिवारी का कहना है कि सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी से पहले निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए था। संगठन का आरोप है कि पूछताछ के लिए बुलाए गए कुछ कर्मचारियों को बाद में गिरफ्तार कर लिया गया।

कर्मचारी संगठन ने यह सवाल भी उठाया है कि मुआवजा प्रकरण में अंतिम निर्णय का अधिकार केवल निचले स्तर के कर्मचारियों के पास नहीं होता। उनका कहना है कि कर्मचारी फाइल तैयार कर आगे पेश करते हैं, जबकि स्वीकृति की जिम्मेदारी उच्च स्तर के राजस्व अधिकारियों की होती है। इसी आधार पर संगठन ने मांग की है कि जांच केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित न रहे और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े हर स्तर की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो।

अधिकारी-कर्मचारी फेडरेशन के पदाधिकारी बड़ी संख्या में कलेक्ट्रेट पहुंचे और कलेक्टर तथा पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपा। उन्होंने गिरफ्तारी की प्रक्रिया और कर्मचारियों को अदालत में पेश किए जाने के तरीके पर आपत्ति दर्ज कराई। संगठन का कहना है कि अगर किसी कर्मचारी के खिलाफ ठोस सबूत हैं तो कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन जांच समान रूप से सभी जिम्मेदार स्तरों तक पहुंचनी चाहिए।

पुलिस का कहना है कि जांच में जिस भी व्यक्ति की भूमिका सामने आएगी, उसके खिलाफ सबूतों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी। एसएसपी की ओर से भी कथित सिंडिकेट से जुड़े सभी लोगों की भूमिका की जांच करने की बात कही गई है। पुराने मुआवजा प्रकरणों की फाइलें, पोस्टमॉर्टम रिकॉर्ड, बैंक खातों में पहुंचे भुगतान और राजस्व कार्यालय के दस्तावेज अब जांच के प्रमुख आधार बने हुए हैं।

https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/17-arrested-for-taking-compensation-by-changing-the-cause-of/article-59374

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