स्काउट गाइड जंबूरी विवाद पर हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार से मांगा जवाब

छत्तीसगढ़

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सांसद बृजमोहन अग्रवाल की याचिका पर सुनवाई, पूछा– पदेन अध्यक्ष को हटाने का आधार क्या

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भारत स्काउट्स एवं गाइड्स से जुड़े जंबूरी आयोजन के अध्यक्ष पद को लेकर उठे विवाद पर राज्य सरकार से सीधा सवाल किया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि सांसद बृजमोहन अग्रवाल को किस प्रक्रिया और किस कानूनी आधार पर अध्यक्ष पद से हटाया गया। इस मामले में राज्य शासन को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं। अगली सुनवाई 12 फरवरी को निर्धारित की गई है।

यह मामला उस समय सामने आया जब स्कूल शिक्षा विभाग ने 13 दिसंबर 2025 को आदेश जारी कर वर्तमान स्कूल शिक्षा मंत्री को भारत स्काउट्स एवं गाइड्स छत्तीसगढ़ का राज्य अध्यक्ष मनोनीत कर दिया। इस फैसले के बाद पूर्व शिक्षा मंत्री और वर्तमान सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने इसे चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिका में कहा गया है कि जब वे शिक्षा मंत्री थे, तब नियमानुसार उन्हें संगठन का पदेन अध्यक्ष बनाया गया था और वे लगातार इस जिम्मेदारी का निर्वहन करते आ रहे थे। इसके बावजूद बिना किसी औपचारिक सूचना, नोटिस या सुनवाई के उन्हें पद से अलग कर दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

सांसद अग्रवाल की ओर से सीनियर अधिवक्ता किशोर भादुड़ी ने अदालत में तर्क रखा कि न तो कोई वैधानिक प्रस्ताव पारित किया गया और न ही अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया का पालन किया गया। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि अध्यक्ष पद से हटाने की प्रक्रिया चल रही थी, जबकि याचिकाकर्ता ने 5 जनवरी को विधिवत रूप से जंबूरी से संबंधित बैठक भी ली थी।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एनके व्यास की एकल पीठ में हुई। प्रारंभिक सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य शासन से पूछा कि जब अध्यक्ष पद पदेन है, तो उसे हटाने का अधिकार किस नियम या अधिनियम के तहत प्रयोग किया गया। अदालत ने इसे गंभीर प्रशासनिक प्रश्न मानते हुए राज्य सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है।

यह विवाद केवल एक पद को लेकर नहीं, बल्कि स्काउट्स एवं गाइड्स जैसे सामाजिक और शैक्षणिक संगठन की स्वायत्तता और प्रशासनिक पारदर्शिता से भी जुड़ा माना जा रहा है। कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि पदेन पद से हटाने की प्रक्रिया नियमों के अनुरूप नहीं पाई जाती है, तो यह आदेश न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं पाएगा।

राज्य सरकार की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि शिक्षा विभाग के आदेश को प्रशासनिक निर्णय बताया जा रहा है। अब सभी की निगाहें 12 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां राज्य सरकार को अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा।

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