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जंगलों के 10 किमी दायरे में आरा मिलों पर रोक बरकरार, हाईकोर्ट ने 19 याचिकाएं खारिज कीं
छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अधिसूचना को सही ठहराया, कहा- पर्यावरण और वन संरक्षण से कोई समझौता नहीं होगा।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जंगलों और संरक्षित वन क्षेत्रों के आसपास पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने अधिसूचित जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों से 10 किलोमीटर के दायरे में आरा मिलों के संचालन पर लगी रोक को बरकरार रखा है। इस मामले में दायर 19 अलग-अलग याचिकाओं को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की 25 सितंबर 2025 की अधिसूचना को पूरी तरह वैध माना। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट कहा कि राज्य में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना सबसे जरूरी है और ऐसी परिस्थितियां नहीं बनने दी जा सकतीं, जिनसे भविष्य में बड़े शहरों जैसी गंभीर प्रदूषण की समस्या पैदा हो। अदालत की टिप्पणी रही कि प्रदेश को ऐसी स्थिति से बचाना जरूरी है जहां पर्यावरण को अपूरणीय नुकसान पहुंचे।
यह मामला उस अधिसूचना से जुड़ा है, जिसे राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ काष्ठ चिरान (विनियमन) अधिनियम, 1984 की धारा 5(1) के तहत जारी किया था। अधिसूचना के अनुसार अधिसूचित जंगलों और संरक्षित वन क्षेत्रों से हवाई दूरी के आधार पर 10 किलोमीटर तक के क्षेत्र को तीन वर्षों के लिए प्रतिबंधित घोषित किया गया। इसके बाद वन विभाग ने इस दायरे में संचालित आरा मिलों के संचालन और उनके लाइसेंस के नवीनीकरण पर रोक लगाने के आदेश जारी किए थे। इस फैसले से प्रभावित कई आरा मिल संचालकों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याचिकाकर्ताओं में शाही ट्रेडर्स, अग्रवाल सॉ मिल, पटेल सॉ मिल सहित कई लकड़ी उद्योग संचालक शामिल थे। उनका कहना था कि उनकी आरा मिलें वर्ष 1996 से पहले से वैध लाइसेंस के साथ संचालित हो रही हैं और वे सभी आवश्यक नियमों का पालन करते आए हैं। उन्होंने अदालत के सामने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुल्पद मामले का हवाला भी दिया। उनका तर्क था कि पुराने और वैध लाइसेंसधारी प्रतिष्ठानों को अचानक इस प्रकार बंद करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस फैसले से उनके व्यवसाय, कर्मचारियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि जंगलों के आसपास लकड़ी आधारित गतिविधियों पर नियंत्रण पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक है। सरकार ने अदालत को बताया कि वन क्षेत्रों के आसपास सुरक्षा दायरा तय करने का उद्देश्य केवल उद्योगों को सीमित करना नहीं बल्कि अवैध कटाई, जंगलों पर बढ़ते दबाव और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि औद्योगिक क्षेत्रों और नगर निगम या नगर पालिका की सीमाओं के भीतर आने वाले कुछ क्षेत्रों को इस प्रतिबंध से पहले ही छूट दी जा चुकी है, जिससे यह साबित होता है कि निर्णय संतुलित सोच के साथ लिया गया है।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राज्य सरकार के फैसले को उचित और तार्किक माना। अदालत ने कहा कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं हैं, बल्कि जलवायु संतुलन, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि वन क्षेत्रों के आसपास अनियंत्रित औद्योगिक गतिविधियों की अनुमति दी जाती है तो उसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ेगा। इसलिए सरकार द्वारा तय किया गया 10 किलोमीटर का बफर जोन पर्यावरण संरक्षण की दिशा में आवश्यक कदम माना जा सकता है।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि सरकार वैज्ञानिक तथ्यों और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए कोई नीति बनाती है तो उसमें न्यायालय तब तक हस्तक्षेप नहीं करेगा, जब तक वह कानून के विपरीत न हो। अदालत ने माना कि इस मामले में सरकार का फैसला सार्वजनिक हित और पर्यावरण सुरक्षा दोनों के अनुरूप है। इसलिए इसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
इस फैसले के बाद अब अधिसूचित जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों से 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाली आरा मिलों के संचालन और उनके लाइसेंस के नवीनीकरण पर रोक जारी रहेगी। जिन मिलों का संचालन इस प्रतिबंधित क्षेत्र में आता है, उन्हें वर्तमान नियमों का पालन करना होगा। वन विभाग भी इस संबंध में आगे की कार्रवाई जारी रख सकेगा। माना जा रहा है कि इस फैसले का असर प्रदेश के कई जिलों में संचालित लकड़ी उद्योगों पर पड़ सकता है, जहां बड़ी संख्या में आरा मिलें वन क्षेत्रों के आसपास स्थित हैं।
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जंगलों के 10 किमी दायरे में आरा मिलों पर रोक बरकरार, हाईकोर्ट ने 19 याचिकाएं खारिज कीं
छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जंगलों और संरक्षित वन क्षेत्रों के आसपास पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने अधिसूचित जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों से 10 किलोमीटर के दायरे में आरा मिलों के संचालन पर लगी रोक को बरकरार रखा है। इस मामले में दायर 19 अलग-अलग याचिकाओं को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की 25 सितंबर 2025 की अधिसूचना को पूरी तरह वैध माना। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट कहा कि राज्य में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना सबसे जरूरी है और ऐसी परिस्थितियां नहीं बनने दी जा सकतीं, जिनसे भविष्य में बड़े शहरों जैसी गंभीर प्रदूषण की समस्या पैदा हो। अदालत की टिप्पणी रही कि प्रदेश को ऐसी स्थिति से बचाना जरूरी है जहां पर्यावरण को अपूरणीय नुकसान पहुंचे।
यह मामला उस अधिसूचना से जुड़ा है, जिसे राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ काष्ठ चिरान (विनियमन) अधिनियम, 1984 की धारा 5(1) के तहत जारी किया था। अधिसूचना के अनुसार अधिसूचित जंगलों और संरक्षित वन क्षेत्रों से हवाई दूरी के आधार पर 10 किलोमीटर तक के क्षेत्र को तीन वर्षों के लिए प्रतिबंधित घोषित किया गया। इसके बाद वन विभाग ने इस दायरे में संचालित आरा मिलों के संचालन और उनके लाइसेंस के नवीनीकरण पर रोक लगाने के आदेश जारी किए थे। इस फैसले से प्रभावित कई आरा मिल संचालकों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याचिकाकर्ताओं में शाही ट्रेडर्स, अग्रवाल सॉ मिल, पटेल सॉ मिल सहित कई लकड़ी उद्योग संचालक शामिल थे। उनका कहना था कि उनकी आरा मिलें वर्ष 1996 से पहले से वैध लाइसेंस के साथ संचालित हो रही हैं और वे सभी आवश्यक नियमों का पालन करते आए हैं। उन्होंने अदालत के सामने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुल्पद मामले का हवाला भी दिया। उनका तर्क था कि पुराने और वैध लाइसेंसधारी प्रतिष्ठानों को अचानक इस प्रकार बंद करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस फैसले से उनके व्यवसाय, कर्मचारियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि जंगलों के आसपास लकड़ी आधारित गतिविधियों पर नियंत्रण पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक है। सरकार ने अदालत को बताया कि वन क्षेत्रों के आसपास सुरक्षा दायरा तय करने का उद्देश्य केवल उद्योगों को सीमित करना नहीं बल्कि अवैध कटाई, जंगलों पर बढ़ते दबाव और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि औद्योगिक क्षेत्रों और नगर निगम या नगर पालिका की सीमाओं के भीतर आने वाले कुछ क्षेत्रों को इस प्रतिबंध से पहले ही छूट दी जा चुकी है, जिससे यह साबित होता है कि निर्णय संतुलित सोच के साथ लिया गया है।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राज्य सरकार के फैसले को उचित और तार्किक माना। अदालत ने कहा कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं हैं, बल्कि जलवायु संतुलन, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि वन क्षेत्रों के आसपास अनियंत्रित औद्योगिक गतिविधियों की अनुमति दी जाती है तो उसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ेगा। इसलिए सरकार द्वारा तय किया गया 10 किलोमीटर का बफर जोन पर्यावरण संरक्षण की दिशा में आवश्यक कदम माना जा सकता है।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि सरकार वैज्ञानिक तथ्यों और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए कोई नीति बनाती है तो उसमें न्यायालय तब तक हस्तक्षेप नहीं करेगा, जब तक वह कानून के विपरीत न हो। अदालत ने माना कि इस मामले में सरकार का फैसला सार्वजनिक हित और पर्यावरण सुरक्षा दोनों के अनुरूप है। इसलिए इसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
इस फैसले के बाद अब अधिसूचित जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों से 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाली आरा मिलों के संचालन और उनके लाइसेंस के नवीनीकरण पर रोक जारी रहेगी। जिन मिलों का संचालन इस प्रतिबंधित क्षेत्र में आता है, उन्हें वर्तमान नियमों का पालन करना होगा। वन विभाग भी इस संबंध में आगे की कार्रवाई जारी रख सकेगा। माना जा रहा है कि इस फैसले का असर प्रदेश के कई जिलों में संचालित लकड़ी उद्योगों पर पड़ सकता है, जहां बड़ी संख्या में आरा मिलें वन क्षेत्रों के आसपास स्थित हैं।
