बिलासपुर करंट हादसे पर हाईकोर्ट सख्त, बिजली विभाग से मांगा विस्तृत जवाब

बिलासपुर,(छ.ग.)

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तीन लोगों की मौत के मामले में स्वतः संज्ञान, हाईकोर्ट ने सुरक्षा व्यवस्था, इलेक्ट्रिक फेंसिंग और रोकथाम नीति पर मांगा शपथपत्र।

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में करंट लगने से पूर्व सरपंच और उनके दो बेटों की मौत के मामले ने अब न्यायपालिका का भी ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस गंभीर घटना पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए मीडिया रिपोर्ट को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के मैनेजिंग डायरेक्टर और राज्य के ऊर्जा विभाग के सचिव को शपथपत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह स्पष्ट करने को कहा है कि राज्य में बिजली व्यवस्था की निगरानी, रखरखाव और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्थाएं लागू हैं तथा भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य के कई हिस्सों में खेतों, फार्महाउसों और निजी परिसरों के आसपास बिजली प्रवाहित फेंसिंग लगाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। कई लोग अपनी फसल, पशुओं या संपत्ति की सुरक्षा के लिए अवैध रूप से बिजली युक्त तारों का उपयोग करते हैं, लेकिन इसकी चपेट में आने से अनजान लोगों की जान चली जाती है। अदालत ने माना कि यह केवल व्यक्तिगत लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। इसलिए इस तरह की घटनाओं की रोकथाम के लिए प्रभावी व्यवस्था होना आवश्यक है।

अदालत ने यह भी कहा कि वर्तमान में ऐसे मामलों में संबंधित लोगों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज कर दिए जाते हैं, लेकिन केवल एफआईआर दर्ज कर देना पर्याप्त समाधान नहीं माना जा सकता। यदि लगातार एक जैसी घटनाएं दोहराई जा रही हैं, तो इसका अर्थ है कि रोकथाम के लिए बनाई गई व्यवस्थाएं पर्याप्त प्रभावी नहीं हैं। अदालत ने सरकार और बिजली विभाग से पूछा है कि क्या ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई स्पष्ट नीति, दिशा-निर्देश या स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू है। यदि नहीं, तो इसे तैयार करने और लागू करने की समय-सीमा भी बताई जाए। हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस मामले में CSPDCL के मैनेजिंग डायरेक्टर को भी औपचारिक रूप से पक्षकार बनाया जाए। साथ ही ऊर्जा विभाग के सचिव और बिजली कंपनी से विस्तृत शपथपत्र मांगा गया है। अदालत ने यह भी जानना चाहा है कि बिजली ढांचे का निरीक्षण कितनी नियमितता से किया जाता है, जर्जर तारों और खुले विद्युत स्रोतों की पहचान और मरम्मत की क्या व्यवस्था है तथा लापरवाही पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही कैसे तय की जाती है। मामले की अगली सुनवाई 23 जुलाई को निर्धारित की गई है।

जिस घटना के आधार पर अदालत ने स्वतः संज्ञान लिया, वह बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक के भाड़म गांव की है। यहां करंट लगने से पूर्व सरपंच और उनके दो बेटों की दर्दनाक मौत हो गई थी। घटना के बाद पूरे क्षेत्र में शोक और चिंता का माहौल बन गया था। मीडिया में प्रकाशित खबरों के आधार पर हाईकोर्ट ने मामले को जनहित से जुड़ा मानते हुए स्वतः सुनवाई शुरू की। अदालत का मानना है कि इस तरह की घटनाएं केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पूरे समाज की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं। पिछले दो महीनों में बिलासपुर जिले में करंट लगने की अलग-अलग घटनाओं में आठ लोगों की जान जा चुकी है। इनमें कई मामले खेतों के आसपास लगे बिजली प्रवाहित तारों या जर्जर विद्युत लाइनों से जुड़े बताए गए हैं। लगातार हो रही इन घटनाओं ने बिजली सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई स्थानों पर पुराने और ढीले बिजली तार लंबे समय से मरम्मत का इंतजार कर रहे हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है।

अदालत ने अपने अवलोकन में यह भी कहा कि इलेक्ट्रिक फेंसिंग का खतरा केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। कई बार घरेलू पशु और वन्यजीव भी इसकी चपेट में आकर अपनी जान गंवा देते हैं। इसलिए यह विषय मानव सुरक्षा के साथ-साथ पशु संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि आवश्यकता पड़ी तो इस संबंध में व्यापक दिशा-निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को प्रभावी रूप से रोका जा सके। पूरे मामले पर राज्य सरकार और बिजली विभाग की ओर से विस्तृत जवाब का इंतजार है। अदालत के निर्देशों के बाद अब यह स्पष्ट होगा कि बिजली सुरक्षा को लेकर वर्तमान व्यवस्था कितनी प्रभावी है और भविष्य में किन सुधारात्मक कदमों की योजना बनाई जा रही है।

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07 Jul 2026 By Vaishnavi.J

बिलासपुर करंट हादसे पर हाईकोर्ट सख्त, बिजली विभाग से मांगा विस्तृत जवाब

बिलासपुर,(छ.ग.)

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में करंट लगने से पूर्व सरपंच और उनके दो बेटों की मौत के मामले ने अब न्यायपालिका का भी ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस गंभीर घटना पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए मीडिया रिपोर्ट को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के मैनेजिंग डायरेक्टर और राज्य के ऊर्जा विभाग के सचिव को शपथपत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह स्पष्ट करने को कहा है कि राज्य में बिजली व्यवस्था की निगरानी, रखरखाव और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्थाएं लागू हैं तथा भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य के कई हिस्सों में खेतों, फार्महाउसों और निजी परिसरों के आसपास बिजली प्रवाहित फेंसिंग लगाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। कई लोग अपनी फसल, पशुओं या संपत्ति की सुरक्षा के लिए अवैध रूप से बिजली युक्त तारों का उपयोग करते हैं, लेकिन इसकी चपेट में आने से अनजान लोगों की जान चली जाती है। अदालत ने माना कि यह केवल व्यक्तिगत लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। इसलिए इस तरह की घटनाओं की रोकथाम के लिए प्रभावी व्यवस्था होना आवश्यक है।

अदालत ने यह भी कहा कि वर्तमान में ऐसे मामलों में संबंधित लोगों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज कर दिए जाते हैं, लेकिन केवल एफआईआर दर्ज कर देना पर्याप्त समाधान नहीं माना जा सकता। यदि लगातार एक जैसी घटनाएं दोहराई जा रही हैं, तो इसका अर्थ है कि रोकथाम के लिए बनाई गई व्यवस्थाएं पर्याप्त प्रभावी नहीं हैं। अदालत ने सरकार और बिजली विभाग से पूछा है कि क्या ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई स्पष्ट नीति, दिशा-निर्देश या स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू है। यदि नहीं, तो इसे तैयार करने और लागू करने की समय-सीमा भी बताई जाए। हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस मामले में CSPDCL के मैनेजिंग डायरेक्टर को भी औपचारिक रूप से पक्षकार बनाया जाए। साथ ही ऊर्जा विभाग के सचिव और बिजली कंपनी से विस्तृत शपथपत्र मांगा गया है। अदालत ने यह भी जानना चाहा है कि बिजली ढांचे का निरीक्षण कितनी नियमितता से किया जाता है, जर्जर तारों और खुले विद्युत स्रोतों की पहचान और मरम्मत की क्या व्यवस्था है तथा लापरवाही पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही कैसे तय की जाती है। मामले की अगली सुनवाई 23 जुलाई को निर्धारित की गई है।

जिस घटना के आधार पर अदालत ने स्वतः संज्ञान लिया, वह बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक के भाड़म गांव की है। यहां करंट लगने से पूर्व सरपंच और उनके दो बेटों की दर्दनाक मौत हो गई थी। घटना के बाद पूरे क्षेत्र में शोक और चिंता का माहौल बन गया था। मीडिया में प्रकाशित खबरों के आधार पर हाईकोर्ट ने मामले को जनहित से जुड़ा मानते हुए स्वतः सुनवाई शुरू की। अदालत का मानना है कि इस तरह की घटनाएं केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पूरे समाज की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं। पिछले दो महीनों में बिलासपुर जिले में करंट लगने की अलग-अलग घटनाओं में आठ लोगों की जान जा चुकी है। इनमें कई मामले खेतों के आसपास लगे बिजली प्रवाहित तारों या जर्जर विद्युत लाइनों से जुड़े बताए गए हैं। लगातार हो रही इन घटनाओं ने बिजली सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई स्थानों पर पुराने और ढीले बिजली तार लंबे समय से मरम्मत का इंतजार कर रहे हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है।

अदालत ने अपने अवलोकन में यह भी कहा कि इलेक्ट्रिक फेंसिंग का खतरा केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। कई बार घरेलू पशु और वन्यजीव भी इसकी चपेट में आकर अपनी जान गंवा देते हैं। इसलिए यह विषय मानव सुरक्षा के साथ-साथ पशु संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि आवश्यकता पड़ी तो इस संबंध में व्यापक दिशा-निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को प्रभावी रूप से रोका जा सके। पूरे मामले पर राज्य सरकार और बिजली विभाग की ओर से विस्तृत जवाब का इंतजार है। अदालत के निर्देशों के बाद अब यह स्पष्ट होगा कि बिजली सुरक्षा को लेकर वर्तमान व्यवस्था कितनी प्रभावी है और भविष्य में किन सुधारात्मक कदमों की योजना बनाई जा रही है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/high-court-strict-on-bilaspur-current-accident-demands-detailed-answer/article-58077

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