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बिलासपुर के मुक्तिधाम में इंसानियत शर्मसार: उथली कब्रों से बाहर आ रहे लावारिस शवों के अवशेष, कुत्तों के नोचने से बिखरी हड्डियां
बिलासपुर (छ.ग.)
सरकंडा के जबड़ापारा मुक्तिधाम में लावारिस शवों को पर्याप्त गहराई में नहीं दफनाने से बिगड़े हालात; बारिश में मिट्टी हटते ही खुल रही कब्रें, परिसर में मानव अवशेष मिलने से व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में लावारिस शवों को दफनाने की व्यवस्था की एक बेहद गंभीर तस्वीर सामने आई है। सरकंडा क्षेत्र के जबड़ापारा मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार के बाद भी मृतकों के शव सुरक्षित नहीं रह पा रहे हैं। परिसर के दफन क्षेत्र में कई जगह इंसानी हड्डियां दिखाई दे रही हैं, कहीं मिट्टी हटने से शवों के हिस्से बाहर नजर आ रहे हैं तो कहीं कपड़ों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। बारिश के कारण कब्रों के ऊपर की मिट्टी बहने और आवारा कुत्तों के वहां पहुंचने से स्थिति और खराब हो गई है। पूरे मामले ने लावारिस शवों को सम्मानजनक तरीके से दफनाने और मुक्तिधाम की देखरेख को लेकर प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के मुताबिक, जबड़ापारा मुक्तिधाम में ऐसे शवों को दफनाया जाता है, जिनकी पहचान नहीं हो पाती या जिनका अंतिम संस्कार करने के लिए कोई परिजन सामने नहीं आता। पुलिस की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन शवों को यहां लाया जाता है। बताया जा रहा है कि हर महीने औसतन 10 से 12 लावारिस शव इस मुक्तिधाम में दफन किए जाते हैं। लगातार शव आने के बावजूद दफन क्षेत्र की सुरक्षा और नियमित निगरानी के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने की बात सामने आई है।
सबसे गंभीर सवाल शवों को दफनाने की गहराई को लेकर है। आरोप है कि कई शवों को पर्याप्त गहरा गड्ढा खोदने के बजाय करीब दो फीट या इससे भी कम गहराई में मिट्टी के नीचे दबा दिया जाता है। सामान्य मौसम में कब्र के ऊपर मौजूद मिट्टी शव को ढककर रखती है, लेकिन बारिश शुरू होते ही ऊपरी मिट्टी बहने लगती है। जैसे-जैसे मिट्टी की परत कम होती है, अंदर दबे शव और हड्डियां सतह के करीब आ जाती हैं। इसके बाद आवारा जानवरों के लिए कब्रों को खोदना आसान हो जाता है।
बारिश के मौसम में यह समस्या और गंभीर हो गई है। लगातार पानी गिरने के कारण कई कब्रों की मिट्टी कमजोर पड़ रही है। कुछ जगहों पर ऊपरी हिस्सा बह जाने के बाद अंदर दफन अवशेष दिखाई देने लगे हैं। आवारा कुत्ते नरम मिट्टी को खोदकर शवों के हिस्सों को बाहर खींच लाते हैं। इससे हड्डियां और दूसरे मानव अवशेष कब्र से दूर तक बिखर जाते हैं। करीब दो हजार वर्गफीट में फैले दफन क्षेत्र में जगह-जगह इस तरह के अवशेष दिखाई देने की बात सामने आई है।
लावारिस शवों को कम गहराई में दफनाने के पीछे पहचान से जुड़ी प्रक्रिया का तर्क भी दिया जाता है। कई बार शव की पहचान तत्काल नहीं हो पाती और बाद में परिवार या रिश्तेदार सामने आते हैं। ऐसे मामलों में जांच या पहचान की प्रक्रिया के लिए शव को दोबारा निकालने की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, इसी व्यवस्था के कारण शवों की सुरक्षा प्रभावित हो रही है। सवाल यह है कि पहचान की संभावना को ध्यान में रखते हुए शवों को इस तरह सुरक्षित क्यों नहीं रखा जा रहा कि बारिश या जानवरों के कारण उनकी स्थिति खराब न हो।
मुक्तिधाम में स्थायी निगरानी की व्यवस्था नहीं होना भी बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, परिसर की नियमित देखरेख के लिए पर्याप्त कर्मचारी मौजूद नहीं रहते। शव को दफनाने के बाद कब्र की स्थिति की नियमित जांच नहीं होने से मिट्टी धंसने या बहने जैसी समस्या समय रहते सामने नहीं आ पाती। जब तक किसी कब्र से शव या हड्डियां बाहर दिखाई देती हैं, तब तक हालात काफी खराब हो चुके होते हैं।
मुक्तिधाम के प्रवेश और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। परिसर में आवारा जानवरों को रोकने के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने के कारण कुत्ते आसानी से दफन क्षेत्र तक पहुंच जाते हैं। बारिश से नरम हुई मिट्टी उनके लिए कब्र खोदना आसान बना देती है। एक बार कब्र की ऊपरी परत हटने के बाद जानवर शवों के हिस्सों को खींचकर दूसरी जगह ले जाते हैं। इससे मृतकों की गरिमा के साथ-साथ पूरे परिसर की स्वच्छता भी प्रभावित हो रही है।
मुक्तिधाम में फैली दुर्गंध आसपास रहने वाले लोगों के लिए भी परेशानी का कारण बन रही है। पहले यह क्षेत्र शहर की घनी आबादी से दूर माना जाता था, लेकिन समय के साथ बिलासपुर का विस्तार हुआ और मुक्तिधाम के आसपास कई बस्तियां तथा आवासीय इलाके विकसित हो गए। अब बड़ी संख्या में परिवार इसके आसपास रहते हैं। खुले में पड़े मानव अवशेष, बारिश का पानी और पर्याप्त सफाई नहीं होने के कारण लोगों में स्वास्थ्य संबंधी खतरे को लेकर भी चिंता बनी हुई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि शहर का विस्तार होने के बावजूद मुक्तिधाम की व्यवस्थाओं में उसी अनुपात में सुधार नहीं किया गया। दफन क्षेत्र की सुरक्षा, नियमित सफाई, कब्रों की निगरानी और आवारा जानवरों को रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था की जरूरत है। खासतौर पर बारिश के मौसम में कब्रों की स्थिति पर नियमित नजर रखने की व्यवस्था नहीं होने से हर साल समस्या गंभीर हो सकती है।
लावारिस शवों के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी कई चरणों से गुजरती है। पुलिस को सड़क हादसों, रेलवे ट्रैक, अस्पतालों, सार्वजनिक स्थानों या दूसरी परिस्थितियों में ऐसे शव मिलते हैं, जिनकी पहचान तत्काल नहीं हो पाती। कानूनी प्रक्रिया और पोस्टमॉर्टम के साथ पहचान की कोशिश की जाती है। तय अवधि और आवश्यक प्रक्रिया के बाद यदि कोई परिजन सामने नहीं आता तो संबंधित शव के अंतिम संस्कार या दफनाने की व्यवस्था की जाती है।
जबड़ापारा मुक्तिधाम में भी इसी प्रक्रिया के तहत नियमित रूप से लावारिस शव पहुंचते हैं। महीने में करीब 10 से 12 शव दफन होने के कारण यहां लगातार नई कब्रें बनती हैं। ऐसे में शव कहां दफन किया गया, उससे संबंधित रिकॉर्ड क्या है और भविष्य में पहचान की स्थिति बनने पर संबंधित कब्र तक कैसे पहुंचा जाएगा, इसके लिए व्यवस्थित रिकॉर्ड और स्पष्ट मार्किंग जरूरी होती है। यदि कब्रों की मिट्टी बहती रही और जानवर मानव अवशेषों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक खींचते रहे तो बाद में पहचान और जांच की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
मामले ने नगर निगम और स्थानीय प्रशासन की व्यवस्थाओं को भी सवालों के घेरे में ला दिया है। मुक्तिधाम की नियमित देखरेख, परिसर की सुरक्षा, दफन क्षेत्र की सफाई और कब्रों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी किस स्तर पर निभाई जा रही है, इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं। बारिश में मिट्टी बहने से रोकने के इंतजाम, शवों को सुरक्षित गहराई में दफन करने की व्यवस्था, कब्रों की पहचान के लिए मार्किंग और आवारा जानवरों की एंट्री रोकने जैसे इंतजामों की कमी मौजूदा हालात में साफ दिखाई दे रही है।
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बिलासपुर के मुक्तिधाम में इंसानियत शर्मसार: उथली कब्रों से बाहर आ रहे लावारिस शवों के अवशेष, कुत्तों के नोचने से बिखरी हड्डियां
बिलासपुर (छ.ग.)
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में लावारिस शवों को दफनाने की व्यवस्था की एक बेहद गंभीर तस्वीर सामने आई है। सरकंडा क्षेत्र के जबड़ापारा मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार के बाद भी मृतकों के शव सुरक्षित नहीं रह पा रहे हैं। परिसर के दफन क्षेत्र में कई जगह इंसानी हड्डियां दिखाई दे रही हैं, कहीं मिट्टी हटने से शवों के हिस्से बाहर नजर आ रहे हैं तो कहीं कपड़ों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। बारिश के कारण कब्रों के ऊपर की मिट्टी बहने और आवारा कुत्तों के वहां पहुंचने से स्थिति और खराब हो गई है। पूरे मामले ने लावारिस शवों को सम्मानजनक तरीके से दफनाने और मुक्तिधाम की देखरेख को लेकर प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के मुताबिक, जबड़ापारा मुक्तिधाम में ऐसे शवों को दफनाया जाता है, जिनकी पहचान नहीं हो पाती या जिनका अंतिम संस्कार करने के लिए कोई परिजन सामने नहीं आता। पुलिस की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन शवों को यहां लाया जाता है। बताया जा रहा है कि हर महीने औसतन 10 से 12 लावारिस शव इस मुक्तिधाम में दफन किए जाते हैं। लगातार शव आने के बावजूद दफन क्षेत्र की सुरक्षा और नियमित निगरानी के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने की बात सामने आई है।
सबसे गंभीर सवाल शवों को दफनाने की गहराई को लेकर है। आरोप है कि कई शवों को पर्याप्त गहरा गड्ढा खोदने के बजाय करीब दो फीट या इससे भी कम गहराई में मिट्टी के नीचे दबा दिया जाता है। सामान्य मौसम में कब्र के ऊपर मौजूद मिट्टी शव को ढककर रखती है, लेकिन बारिश शुरू होते ही ऊपरी मिट्टी बहने लगती है। जैसे-जैसे मिट्टी की परत कम होती है, अंदर दबे शव और हड्डियां सतह के करीब आ जाती हैं। इसके बाद आवारा जानवरों के लिए कब्रों को खोदना आसान हो जाता है।
बारिश के मौसम में यह समस्या और गंभीर हो गई है। लगातार पानी गिरने के कारण कई कब्रों की मिट्टी कमजोर पड़ रही है। कुछ जगहों पर ऊपरी हिस्सा बह जाने के बाद अंदर दफन अवशेष दिखाई देने लगे हैं। आवारा कुत्ते नरम मिट्टी को खोदकर शवों के हिस्सों को बाहर खींच लाते हैं। इससे हड्डियां और दूसरे मानव अवशेष कब्र से दूर तक बिखर जाते हैं। करीब दो हजार वर्गफीट में फैले दफन क्षेत्र में जगह-जगह इस तरह के अवशेष दिखाई देने की बात सामने आई है।
लावारिस शवों को कम गहराई में दफनाने के पीछे पहचान से जुड़ी प्रक्रिया का तर्क भी दिया जाता है। कई बार शव की पहचान तत्काल नहीं हो पाती और बाद में परिवार या रिश्तेदार सामने आते हैं। ऐसे मामलों में जांच या पहचान की प्रक्रिया के लिए शव को दोबारा निकालने की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, इसी व्यवस्था के कारण शवों की सुरक्षा प्रभावित हो रही है। सवाल यह है कि पहचान की संभावना को ध्यान में रखते हुए शवों को इस तरह सुरक्षित क्यों नहीं रखा जा रहा कि बारिश या जानवरों के कारण उनकी स्थिति खराब न हो।
मुक्तिधाम में स्थायी निगरानी की व्यवस्था नहीं होना भी बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, परिसर की नियमित देखरेख के लिए पर्याप्त कर्मचारी मौजूद नहीं रहते। शव को दफनाने के बाद कब्र की स्थिति की नियमित जांच नहीं होने से मिट्टी धंसने या बहने जैसी समस्या समय रहते सामने नहीं आ पाती। जब तक किसी कब्र से शव या हड्डियां बाहर दिखाई देती हैं, तब तक हालात काफी खराब हो चुके होते हैं।
मुक्तिधाम के प्रवेश और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। परिसर में आवारा जानवरों को रोकने के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने के कारण कुत्ते आसानी से दफन क्षेत्र तक पहुंच जाते हैं। बारिश से नरम हुई मिट्टी उनके लिए कब्र खोदना आसान बना देती है। एक बार कब्र की ऊपरी परत हटने के बाद जानवर शवों के हिस्सों को खींचकर दूसरी जगह ले जाते हैं। इससे मृतकों की गरिमा के साथ-साथ पूरे परिसर की स्वच्छता भी प्रभावित हो रही है।
मुक्तिधाम में फैली दुर्गंध आसपास रहने वाले लोगों के लिए भी परेशानी का कारण बन रही है। पहले यह क्षेत्र शहर की घनी आबादी से दूर माना जाता था, लेकिन समय के साथ बिलासपुर का विस्तार हुआ और मुक्तिधाम के आसपास कई बस्तियां तथा आवासीय इलाके विकसित हो गए। अब बड़ी संख्या में परिवार इसके आसपास रहते हैं। खुले में पड़े मानव अवशेष, बारिश का पानी और पर्याप्त सफाई नहीं होने के कारण लोगों में स्वास्थ्य संबंधी खतरे को लेकर भी चिंता बनी हुई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि शहर का विस्तार होने के बावजूद मुक्तिधाम की व्यवस्थाओं में उसी अनुपात में सुधार नहीं किया गया। दफन क्षेत्र की सुरक्षा, नियमित सफाई, कब्रों की निगरानी और आवारा जानवरों को रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था की जरूरत है। खासतौर पर बारिश के मौसम में कब्रों की स्थिति पर नियमित नजर रखने की व्यवस्था नहीं होने से हर साल समस्या गंभीर हो सकती है।
लावारिस शवों के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी कई चरणों से गुजरती है। पुलिस को सड़क हादसों, रेलवे ट्रैक, अस्पतालों, सार्वजनिक स्थानों या दूसरी परिस्थितियों में ऐसे शव मिलते हैं, जिनकी पहचान तत्काल नहीं हो पाती। कानूनी प्रक्रिया और पोस्टमॉर्टम के साथ पहचान की कोशिश की जाती है। तय अवधि और आवश्यक प्रक्रिया के बाद यदि कोई परिजन सामने नहीं आता तो संबंधित शव के अंतिम संस्कार या दफनाने की व्यवस्था की जाती है।
जबड़ापारा मुक्तिधाम में भी इसी प्रक्रिया के तहत नियमित रूप से लावारिस शव पहुंचते हैं। महीने में करीब 10 से 12 शव दफन होने के कारण यहां लगातार नई कब्रें बनती हैं। ऐसे में शव कहां दफन किया गया, उससे संबंधित रिकॉर्ड क्या है और भविष्य में पहचान की स्थिति बनने पर संबंधित कब्र तक कैसे पहुंचा जाएगा, इसके लिए व्यवस्थित रिकॉर्ड और स्पष्ट मार्किंग जरूरी होती है। यदि कब्रों की मिट्टी बहती रही और जानवर मानव अवशेषों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक खींचते रहे तो बाद में पहचान और जांच की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
मामले ने नगर निगम और स्थानीय प्रशासन की व्यवस्थाओं को भी सवालों के घेरे में ला दिया है। मुक्तिधाम की नियमित देखरेख, परिसर की सुरक्षा, दफन क्षेत्र की सफाई और कब्रों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी किस स्तर पर निभाई जा रही है, इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं। बारिश में मिट्टी बहने से रोकने के इंतजाम, शवों को सुरक्षित गहराई में दफन करने की व्यवस्था, कब्रों की पहचान के लिए मार्किंग और आवारा जानवरों की एंट्री रोकने जैसे इंतजामों की कमी मौजूदा हालात में साफ दिखाई दे रही है।
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