ग्वालियर हाईकोर्ट ने सरकारी जमीन से जुड़े मामलों में राज्य शासन और अधिकारियों की लापरवाही को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि अब किसी भी सरकारी भूमि से जुड़े मामले में राज्य सरकार द्वारा दाखिल किए जाने वाले आवेदन मुख्य सचिव के शपथ पत्र के बिना स्वीकार नहीं किए जाएंगे।
कोर्ट ने अधिकारियों की निष्क्रियता और सरकारी मामलों की पैरवी में गंभीरता की कमी को गंभीर चिंता का विषय बताया। न्यायालय ने मुख्य सचिव से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि क्या वे लापरवाह या संदिग्ध अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे और यदि कार्रवाई हो चुकी है तो उसका विवरण पेश करेंगे।
यह आदेश जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण केंद्र दतिया द्वारा माया बलवानी के खिलाफ दायर सेकेंड अपील पर सुनवाई के दौरान दिया गया। अपील में 2800 स्क्वायर फीट जमीन को सरकारी बताया गया था। हाईकोर्ट ने पाया कि अपील दाखिल करने में कई कानूनी चूकें हुईं। प्रारंभ में अपील राज्य सरकार द्वारा विधिवत रूप से नहीं, बल्कि जिला शिक्षा केंद्र के माध्यम से दाखिल की गई। बाद में राज्य को अपीलकर्ता बनाया गया, लेकिन देरी के कोई संतोषजनक कारण या शपथ पत्र नहीं प्रस्तुत किया गया।
सिकंदर अपील के लिए आवश्यक ‘लीव टू अपील’ का आवेदन भी सही ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके कारण यह लगभग दस वर्ष तक लंबित रहा। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में देरी या विधिवत अनुमति के अभाव में अपील खारिज करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
मुख्य सचिव का हलफनामा अनिवार्य
हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं:
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सभी सरकारी जमीन मामलों में राज्य सरकार का आवेदन अब मुख्य सचिव के शपथ पत्र के साथ ही स्वीकार होगा।
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शपथ पत्र में यह स्पष्ट किया जाना होगा कि लापरवाह या संदिग्ध अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी या नहीं।
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यदि कार्रवाई हो चुकी है, तो उसका पूरा विवरण शपथ पत्र में दर्ज करना अनिवार्य होगा।
कोर्ट ने यह कदम सरकारी जमीन मामलों में गंभीर लापरवाही और संभावित मिलीभगत को देखते हुए उठाया है, ताकि शीर्ष स्तर पर निगरानी सुनिश्चित की जा सके।
कलेक्टर और अधिकारियों पर सख्त टिप्पणी
न्यायालय ने कहा कि लगातार देखा जा रहा है कि कलेक्टर और वरिष्ठ अधिकारी सरकारी जमीन से जुड़े मामलों में गंभीर लापरवाही बरत रहे हैं। यह स्थिति निजी पक्षों को अनुचित लाभ पहुंचाने की संभावना को दर्शाती है। अदालत ने इसे अत्यंत गंभीर मामला बताते हुए कहा कि इस तरह की लापरवाही राज्य की मूल्यवान सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा सकती है।
ग्वालियर हाईकोर्ट का यह आदेश अब सरकारी जमीन मामलों में प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने में मील का पत्थर साबित होगा।
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