मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर भर्ती पर हाईकोर्ट की रोक जैसी टिप्पणी, अंतिम फैसले के अधीन रहेगी चयन प्रक्रिया

जबलपुर (म.प्र.)

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नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज जबलपुर में 40 पदों की सीधी भर्ती को लेकर याचिका, हाईकोर्ट ने नर्सिंग काउंसिल और कर्मचारी मंडल को जारी किया नोटिस

जबलपुर स्थित नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर पदों पर की जा रही सीधी भर्ती प्रक्रिया को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। सोमवार को मामले की सुनवाई करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भर्ती प्रक्रिया याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी। कोर्ट के इस आदेश से मेडिकल कॉलेज में चल रही नियुक्ति प्रक्रिया पर अस्थायी अनिश्चितता बन गई है।

यह मामला जस्टिस विशाल घगट की एकलपीठ के समक्ष प्रस्तुत हुआ, जहां याचिकाकर्ता डॉक्टरों ने तर्क दिया कि जिन 40 पदों के लिए सीधी भर्ती निकाली गई है, वे सभी वर्ष 2024 में स्वीकृत हुए हैं और नियमों के अनुसार इन पदों को पदोन्नति के माध्यम से भरा जाना अनिवार्य है। इसके बावजूद शासन ने सीधी भर्ती का रास्ता अपनाया, जो सेवा नियमों का उल्लंघन है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि मेडिकल कॉलेज में लंबे समय से कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर आवश्यक योग्यता, अनुभव और सेवा अवधि पूरी कर चुके हैं। इसके बावजूद न तो पदोन्नति प्रक्रिया शुरू की गई और न ही पदोन्नति न करने का कोई ठोस कारण रिकॉर्ड पर रखा गया।

राज्य शासन की ओर से पेश अधिवक्ता ने मौखिक दलील में कहा कि जब पदोन्नति संभव न हो, तब सीधी भर्ती की जा सकती है। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि पदोन्नति क्यों संभव नहीं थी। इसी आधार पर न्यायालय ने मध्य प्रदेश कर्मचारी मंडल और भारतीय नर्सिंग काउंसिल सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए हैं।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि वर्तमान में मेडिकल कॉलेज में करीब 12 महिला डॉक्टर असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में पदस्थ हैं, जो सभी पदोन्नति के लिए पात्र हैं। इन डॉक्टरों से लगातार अकादमिक और क्लीनिकल कार्य लिया जा रहा है, लेकिन उन्हें पदोन्नति का अवसर नहीं दिया जा रहा, जिससे सेवा नियमों के साथ-साथ समान अवसर के सिद्धांत का भी उल्लंघन हो रहा है।

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह निर्देश दिया कि जब तक मामले का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता, तब तक भर्ती प्रक्रिया पर किया गया कोई भी निर्णय न्यायालय के अंतिम आदेश के अधीन माना जाएगा। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की है।

यह प्रकरण न केवल मेडिकल शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है, बल्कि सरकारी सेवाओं में पदोन्नति और सीधी भर्ती के बीच संतुलन को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाली सुनवाई में इस बात पर स्पष्टता आ सकती है कि नियमों के तहत पदोन्नति को दरकिनार कर सीधी भर्ती कब और कैसे की जा सकती है।

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19 Jan 2026 By Nitin Trivedi

मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर भर्ती पर हाईकोर्ट की रोक जैसी टिप्पणी, अंतिम फैसले के अधीन रहेगी चयन प्रक्रिया

जबलपुर (म.प्र.)

जबलपुर स्थित नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर पदों पर की जा रही सीधी भर्ती प्रक्रिया को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। सोमवार को मामले की सुनवाई करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भर्ती प्रक्रिया याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी। कोर्ट के इस आदेश से मेडिकल कॉलेज में चल रही नियुक्ति प्रक्रिया पर अस्थायी अनिश्चितता बन गई है।

यह मामला जस्टिस विशाल घगट की एकलपीठ के समक्ष प्रस्तुत हुआ, जहां याचिकाकर्ता डॉक्टरों ने तर्क दिया कि जिन 40 पदों के लिए सीधी भर्ती निकाली गई है, वे सभी वर्ष 2024 में स्वीकृत हुए हैं और नियमों के अनुसार इन पदों को पदोन्नति के माध्यम से भरा जाना अनिवार्य है। इसके बावजूद शासन ने सीधी भर्ती का रास्ता अपनाया, जो सेवा नियमों का उल्लंघन है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि मेडिकल कॉलेज में लंबे समय से कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर आवश्यक योग्यता, अनुभव और सेवा अवधि पूरी कर चुके हैं। इसके बावजूद न तो पदोन्नति प्रक्रिया शुरू की गई और न ही पदोन्नति न करने का कोई ठोस कारण रिकॉर्ड पर रखा गया।

राज्य शासन की ओर से पेश अधिवक्ता ने मौखिक दलील में कहा कि जब पदोन्नति संभव न हो, तब सीधी भर्ती की जा सकती है। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि पदोन्नति क्यों संभव नहीं थी। इसी आधार पर न्यायालय ने मध्य प्रदेश कर्मचारी मंडल और भारतीय नर्सिंग काउंसिल सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए हैं।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि वर्तमान में मेडिकल कॉलेज में करीब 12 महिला डॉक्टर असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में पदस्थ हैं, जो सभी पदोन्नति के लिए पात्र हैं। इन डॉक्टरों से लगातार अकादमिक और क्लीनिकल कार्य लिया जा रहा है, लेकिन उन्हें पदोन्नति का अवसर नहीं दिया जा रहा, जिससे सेवा नियमों के साथ-साथ समान अवसर के सिद्धांत का भी उल्लंघन हो रहा है।

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह निर्देश दिया कि जब तक मामले का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता, तब तक भर्ती प्रक्रिया पर किया गया कोई भी निर्णय न्यायालय के अंतिम आदेश के अधीन माना जाएगा। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की है।

यह प्रकरण न केवल मेडिकल शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है, बल्कि सरकारी सेवाओं में पदोन्नति और सीधी भर्ती के बीच संतुलन को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाली सुनवाई में इस बात पर स्पष्टता आ सकती है कि नियमों के तहत पदोन्नति को दरकिनार कर सीधी भर्ती कब और कैसे की जा सकती है।

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